संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 3 मई : स्मार्ट सिटी के अतिमहत्वोन्मादी अहंकार से निकलकर स्लम खत्म करने की जरूरत है कोरोनायुग में
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय 3 मई : स्मार्ट सिटी के अतिमहत्वोन्मादी अहंकार से निकलकर स्लम खत्म करने की जरूरत है कोरोनायुग में
03-May-2020

स्मार्ट सिटी के अतिमहत्वोन्मादी

अहंकार से निकलकर स्लम खत्म

करने की जरूरत है कोरोनायुग में

बुरा वक्त बहुत अच्छी नसीहतें, और बहुत अच्छे सबक दे जाता है। आज कोरोना का जो खतरा आया है, और उससे जो तबाही हुई है, उससे न सिर्फ सेहत के मामले में, बल्कि कारोबार के मामले में, शहरी जिंदगी के मामले में, बसाहट और आवाजाही के मामले में, सूचना तंत्र के ढांचे के बारे में बहुत कुछ सीखने मिल रहा है। यह सिलसिला अभी जारी ही है, और अगले कई महीने चलते ही रहेगा। एक किसी बड़े कारोबारी ने अभी यह सुझाया है कि देश की निर्माण-कंपनियां अपने लोगों को दो टीमों में बांट लें, जिनमें से एक टीम अभी तुरंत कोरोनाग्रस्त अर्थव्यवस्था से उबरने के बारे में सोचे और दूसरी टीम दो बरस बाद को लेकर योजना बनाए।

कारोबार तो ठीक है क्योंकि वह मोटेतौर पर एक सीमित दायरे का होता है, और जिसकी कमाई का एक हिस्सा जनता से परे भी जाता है। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों, स्थानीय संस्थाओं, और सार्वजनिक उपक्रमों की तो पूरी ही कमाई जनता की होती है, और जब कभी देश पर कोई मुसीबत आती है तो उससे जूझने की पहली जिम्मेदारी भी इन्हीं पर रहती है। इसलिए कोरोना से सबक लेकर इन सभी को ऐसी योजना बनानी चाहिए जो कि लॉकडाऊन-2 और लॉकडाऊन-3 की तरह अगर या जब कोरोना-2 और कोरोना-3 सामने आए तो उससे जूझने के लिए सरकारें बेहतर तैयार रहें। आज हिन्दुस्तान में कोरोना को विदेशों से आने वाले, और लौटने वाले लोग लेकर आए हैं, लेकिन इससे सबसे बड़ी तबाही सबसे कमजोर तबके की हुई है जो कि पूरे का पूरा बेघर-बेरोजगार हो चुका है। इसलिए आगे की तैयारी इस तबके को ध्यान में रखकर भी करनी चाहिए जो कि देश की कम से कम आधी आबादी तो है ही।

यह समझने की बात है कि इस बार का यह वायरस-संक्रमण मोटे तौर पर हवा में सफर नहीं कर रहा है। इसके मरीजों वाले अस्पताल के कमरों में एयरकंडीशंड हवा में कहीं-कहीं यह वायरस हवा में चला है, लेकिन खुले में इसकी ताकत हवा में उडऩे की नहीं है। अब हिन्दुस्तान को एक ऐसे वायरस की कल्पना करके तैयारी करनी चाहिए जो कि हवा में भी सफर करता हो, तब लोगों का क्या होगा? जब इस देश के मुम्बई जैसे महानगरों में धारावी जैसी एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी हो, जहां हर घर दूसरे कई घरों से चिपका हुआ हो, जहां एक-एक पखाने पर सैकड़ों आबादी मोहताज हो, वहां पर कोरोना से अधिक उड़ान भरने वाले किसी वायरस के आने पर क्या होगा? यह भी समझने की बात है कि पिछले पांच बरस में हिन्दुस्तान में चुनिंदा सौ-दो सौ शहरों को हजार-हजार करोड़ रूपए सालाना के अधिक की फिजूलखर्ची से स्मार्ट बनाने की केन्द्र सरकार की जो अतिमहत्वोन्मादी योजना चल रही है, उसने हिन्दुस्तान हांकने वालों को एक अजीब किस्म के झूठे गौरव से भर दिया है कि वे देश को स्मार्ट बना रहे हैं। हकीकत यह है कि केन्द्र ने अपनी इस योजना के लिए प्रदेशों में एक झूठा उत्साह बो दिया, और उन्हें एक अंधी दौड़ में लगा दिया कि कौन सी स्मार्ट सिटी दूसरों से आगे है। नतीजा यह निकला कि केन्द्र से आए सौ-दो सौ करोड़ के साथ राज्य को उससे कई गुना अधिक रकम अपनी जेब से लगानी पड़ी, और केन्द्र सरकार के पैमानों और शर्तों के मुताबिक उसे खर्च करना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि केन्द्र के एनडीए गठबंधन के विरोध वाली राज्य सरकारों ने भी यह दिमाग नहीं लगाया कि स्मार्ट सिटी की पूरी योजना स्थानीय म्युनिसिपल के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को अलग रखकर ही बनाई गई है, और इस हिसाब से वह पूरी तरह अलोकतांत्रिक भी है। लेकिन अभी हम उस बुनियादी बात को अधिक कुरेदना नहीं चाहते क्योंकि उससे आज की जरूरी बात धरी रह जाएगी।

आज की बात यह है कि क्या हिन्दुस्तान गंदगी का एक ऐसा समंदर बने रह सकता है जिसमें तमाम लोगों के हक के पैसे लगाकर अतिसंपन्नता और अति सुविधा की योजनाओं वाली स्मार्ट सिटी नाम के सौ-दो सौ टापू रहें? कोरोना के पहले तक तो यह फिर भी ठीक था क्योंकि भारत जैसे लोकतंत्र में गैरबराबरी तो एक आम बात है लेकिन अब कोरोना यह सिखा रहा है कि कुछ लोगों को स्लम की घनघोर गरीबी और गंदगी में रखकर महंगे बंगलों के लोग भी महफूज नहीं रह सकते। आज हिन्दुस्तान को स्मार्ट सिटी और स्लम के बीच का एक रास्ता ढूंढना होगा जिसमें बेतहाशा फिजूलखर्ची वाली स्मार्ट सिटी न बनाकर देश को स्लममुक्त पहले बनाया जाए और फिर सभी को एक साथ स्मार्ट होने की एक बहुत दूर की मंजिल की तरफ ले जाया जाए। स्मार्ट सिटी की योजना मोदी सरकार के वक्त ही शुरू हुई, और राज्य सरकारों को ऐसा लगा कि बाकी प्रदेश स्मार्ट हो जाएंगे, और वे भोंदू ही बने रह जाएंगे। इसलिए उन्होंने दौड़-दौडक़र अपने शहरों को केन्द्र सरकार की योजना में जुड़वाया, और राज्य का अनुपातहीन अतिरिक्त पैसा गिने-चुने शहरों पर झोंक दिया। नतीजा यह हुआ कि पूरे प्रदेश में गंदी बस्तियों की जो बेहतरी होनी थी, उसकी रकम चाहे केन्द्र की जेब से, चाहे राज्य की जेब से, स्मार्ट सिटी पर लगती चली गई।

आज दुनिया के कई समझदार देशों में शहरीकरण और बसाहट के विशेषज्ञ अपनी अब तक की तमाम समझ को किनारे रखकर एक क्लीन स्लेट को लेकर बैठे हैं कि कोरोना को देखते हुए अब आगे की बसाहट कैसी होनी चाहिए। किसी बसाहट या शहर की योजना 25-50 साल के हिसाब से बनती है, इसलिए यह भी याद रखना चाहिए कि किसी अलग किस्म का कोई वायरस आकर जो खतरा पैदा कर सकता है, क्या उससे भी बचाव के तरीकों को नई बसाहट के वक्त सोचा जा सकता है? आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक तरफ तो कोरोना से लडऩे के लिए सरकार की पूरी ही ताकत लग जा रही है, तो दूसरी ओर इस शहर में पिछले 25-50 बरस से चली आ रही पानी की पाईप लाईनें नालियों के भीतर डूबकर, सडक़र, नाली की गंदगी लोगों के बदन तक पहुंचा रही हैं, और इसी शहर पर पिछले बरसों में केन्द्र का थोड़ा, राज्य का पूरा, हजारों करोड़ रूपए खर्च किए गए हैं। क्या सचमुच ही ऐसी स्मार्ट सिटी को जनता के पैसों पर सैकड़ों करोड़ खर्च करके आलीशान गौरवपथ बनाने का हक है जहां पर शहर की गरीब आबादी का एक बड़ा हिस्सा म्युनिसिपल के पीने के पानी के पाईप से नाली की गंदगी पा रहा है, और पीलिया में पड़ा हुआ है, पीलिया-मौतें हो रही हैं।  क्या ऐसा शहर अपने को स्मार्ट साबित करने के एक भोंदू-अहंकारी नशे को छोड़ सकता है? या फिर ऐसी बड़ी और योजनाबद्ध लागत वाली योजनाओं की कमाई सबको सुहाती है?

इस देश को, खासकर इसके प्रदेशों को देश के संघीय ढांचे में अपनी आजाद सोच के हक का इस्तेमाल करते हुए स्मार्ट नाम के झांसे से बाहर आना चाहिए। यह पूरा सिलसिला न सिर्फ गैरबराबरी का है, बल्कि यह अलोकतांत्रिक भी है। कोरोना से भी अगर यह देश नहीं सीखेगा कि अपने सबसे गरीब और सबसे कमजोर लोगों को ध्यान में रखते हुए अपनी बसाहट, अपने रोजगार, अपनी आवाजाही, अपने इलाज के ढांचे को बनाना जरूरी है, तो वह गैरगरीब और गैरकमजोर पर से खतरे को कभी नहीं हटा सकेगा। कोरोना से लोगों को सबक लेना चाहिए कि आज अगर पासपोर्ट वालों ने राशन कार्ड वालों को यह जानलेवा-तोहफा दिया है, तो कल राशन कार्ड वाले भी कोई रिटर्न-गिफ्ट पासपोर्ट वालों को दे सकते हैं। इसलिए आज सही वक्त है कि देश स्मार्ट बनने के अपने अतिमहत्वोन्मादी नशे से बाहर आए, और स्लम खत्म करे, शहरों में और कारखानों के इलाकों में मजदूरों की बसाहट के बारे में सोचे, और संसद भवन के इर्द-गिर्द 20 हजार करोड़ रूपए बर्बादी की अपनी मौजूदा योजना को छोड़े। जब देश भुखमरी की कगार पर खड़ा हुआ है, जब कोरोना की मार और देशों के मुकाबले अब तक पांच फीसदी भी नहीं हुई है, और प्रदेशों के साल भर के इलाज के बजट महीने भर में ही चुक गए हैं, तब सरकार दिल्ली के कुछ किलोमीटर पर 20 हजार करोड़ रूपए खर्च करके हैवानियत से हॅंसी पा सकती है, इंसानियत तो उस पर रो ही सकती है। इस दुनिया के इतिहास में, आज के हिन्दुस्तान में 20 हजार करोड़ रूपए का यह खर्च काले अक्षरों से लिखा जाएगा, और सैकड़ों बरस पहले हिन्दुस्तानी राजा अकाल के वक्त भी जिस तरह नाच-गानों में डूबे रहते थे, वही मिसाल इससे याद आएगी। किसी दिन समझदार सरकार को अपने इतिहास में इतना काला पन्ना छोडक़र नहीं जाना चाहिए। आज देश को आम गंदगी से आजादी की जरूरत है, और वही स्मार्ट-लोकतंत्र होगा।

-सुनील कुमार 

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