संपादकीय

 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय - कश्मीर से कन्याकुमारी तक,  और योगी से कम्युनिस्ट तक,  जाम टकराने में सब शामिल
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय - कश्मीर से कन्याकुमारी तक, और योगी से कम्युनिस्ट तक, जाम टकराने में सब शामिल
05-May-2020

कश्मीर से कन्याकुमारी तक, 
और योगी से कम्युनिस्ट तक, 
जाम टकराने में सब शामिल

केन्द्र सरकार ने लॉकडाऊन खोलने के लिए तमाम प्रदेशों को जो गाईडलाईन दी उसके मुताबिक हर प्रदेश में शराब बिकना शुरू हो गई। जिन राज्यों में पहले से शराबबंदी है, वहां जरूर इसकी बिक्री शुरू नहीं हुई हो, लेकिन बाकी राज्य मानो एक पैर पर खड़े हुए थे कि कब और कैसे बिक्री शुरू की जाए। जब केन्द्र सरकार ने ही रास्ता खोल दिया, तो एक नंबर और दो नंबर, दोनों किस्म की कमाई का एक बड़ा जरिया कौन सी राज्य सरकार छोड़ सकती थी? और आज तो तमाम किस्म के कारोबार बंद पड़े हुए हैं, कोरोना से मुकाबले के लिए खर्च से लेकर मजदूरों पर हो रहे खर्च तक, सारे अभूतपूर्व खर्च हो रहे हैं। ऐसे में सरकारें सरकारी कमाई के लिए, सत्तारूढ़ संगठन के लिए, और सत्तारूढ़ नेता-अफसर-दारू कारखानेदार सबकी कमाई के लिए इस धंधे को शुरू करने पर आमादा थीं। जिन लोगों को छत्तीसगढ़ में यह धंधा खटक रहा है, उनको यह देख लेना चाहिए कि हिन्दुस्तान में किस राज्य ने सबसे पहले शराब कारखानों को लॉकडाऊन के बीच भी उत्पादन शुरू करने का आदेश दिया था। उत्तरप्रदेश के एक योगी मुख्यमंत्री ने सबसे पहले लॉकडाऊन के बीच ही शराब उत्पादन शुरू कराया, और लॉकडाऊन में ढील के पहले घंटे से ही शराब बेचना शुरू भी कर दिया। भगवान राम के जन्मस्थली वाले, और अनगिनत तीर्थों वाले उत्तरप्रदेश में देवी-देवताओं को पता नहीं ऐसी शराबी बेसब्री का कितना बुरा लग रहा होगा। 

हमारा ख्याल है कि दारू के धंधे से होने वाली कई किस्म की वैध और अवैध कमाई से देश के तमाम प्रदेश इस तरह परिचित हैं कि यह भ्रष्टाचार आरटीओ की तरह का एक खुला भ्रष्टाचार है, और देश में शायद ही कोई पार्टी ऐसी हो जिसे अपनी सरकार के चलते ऐसी कमाई से परहेज रहता हो। इसलिए उत्तरप्रदेश हो, या छत्तीसगढ़, या ममता का बंगाल, कल दारू की पहली बोतल बिकने के भी पहले के जो नजारे सामने आए, उन्होंने एक बात साफ कर दी कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत एक है, और हमारी अनेकता में एकता दारू में ही सबसे अधिक है। इसने यह बात भी साफ कर दी कि चालीस दिनों का सूखा भी लोगों की हसरत को जरा भी कम नहीं कर पाया था, और एकाएक शराबबंदी से होने वाले मनोवैज्ञानिक नुकसान को भी हिन्दुस्तानी दारूखोरों ने बड़े अच्छे से झेल लिया और अपने आपको पहली बिक्री की कतार के लिए तैयार रखा। लेकिन पूरे देश में ही इन चालीस दिनों में गैरकानूनी या अघोषित शराब उसी तरह बिकती रही जिस तरह गुजरात में हमेशा से चली आ रही स्थाई शराबबंदी के दौरान शराब बिकती है, जिस तरह बिहार में नीतीश बाबू के सुशासन में शराब बिकती ही है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी शराबबंदी के चुनावी वायदे के साथ सत्ता पर आई थी, लेकिन किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी की तरह अब इस वायदे के लिए भी उसका रूख यही है कि इसे सोच-समझकर किया जाएगा, और वायदे पांच साल में पूरे करने के होते हैं जिसके करीब चार साल अभी बाकी हैं। 

लेकिन सरकार और राजनीतिक दलों के दारूप्रेम को छोड़ दें, और आज कोरोना के खतरे के बीच दारू से जुड़ गए अतिरिक्त खतरों को देखें तो भयानक नजारा सामने आ रहा है। छत्तीसगढ़ से कई गुना अधिक धक्का-मुक्की के कुछ ऐसे वीडियो बंगाल और दक्षिण भारत के सामने आए हैं कि जिन्हें देखकर लगता है कि कल कोरोना ने कोई काम नहीं किया होगा, और महीनों के बाद पूरी तरह छुट्टी मनाई होगी क्योंकि कल उसके हिस्से का काम दारू कर रही थी। पिछले चालीस दिनों में प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक ने, और फिल्मी कलाकारों से लेकर खिलाडिय़ों तक ने लोगों को शारीरिक दूरी बनाए रखने के लिए जितना कुछ कहा था, वह कल दारू की पहली धार ने बहा दिया, और नशेड़ी-नशेड़ी भाई-भाई का स्थगित चला आ रहा रिश्ता फिर से मजबूती से कायम कर लिया। पूरे देश ने कल जिस तरह कमजोर शारीरिक प्रतिरोधक क्षमता वाले शराबियों की जो धक्का-मुक्की देखी है, वह अभूतपूर्व रही, और इस देश में गांधी-नेहरू, या इंदिरा-राजीव के अंतिम संस्कार के बाद शायद ही कभी ऐसी धक्का-मुक्की देखी हो। नतीजा यह हुआ कि चालीस दिनों से देश जिस सावधानी पर चल रहा था, वह कुछ घंटों में ही चल बसी, और कल हिन्दुस्तानियों ने दस-बीस करोड़ तक लोगों को एक-दूसरे का कई किस्म का संक्रमण लिया-दिया होगा, और उसमें कोरोना कितना रहा होगा यह पता नहीं। पूरे देश में कम से कम दस अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों की राज्य सरकारें हैं, लेकिन एक भी सरकार दारू की घोषित या अघोषित कमाई के खिलाफ नहीं है, और न ही गठबंधनों वाली  केन्द्र सरकार ही इसके खिलाफ है। जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपनी एक मर्जी के देश पर तमाम किस्म की बंदिशें पल भर की सूचना पर लाद देते हैं, जहां पर वे चाहते तो दारू की बिक्री शुरू करने की बात न लिखवाते, और कम से कम कोरोना के फैलने की रफ्तार कुछ धीमी हुई होती। लेकिन केन्द्र सरकार ने जब दारू शुरू करने की बात लिख दी, जब एकदम खालिस भाजपा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके पहले से ही औपचारिक तैयारी शुरू कर दी थी, तो फिर बाकी राज्य भला क्यों पीछे रहते। 

लॉकडाऊन खुलने से देश के कारोबार को आगे बढऩे का, फिर से शुरू होने का एक मौका मिलता, और मरे पड़े धंधे कामों पर उठ खड़े होने की शुरूआत करते। लेकिन केन्द्र और राज्य सरकारों ने बिना किसी मतभेद के, सर्वसम्मति से अगर कोई धंधा देश में सबसे पहले शुरू होने दिया, सबसे पहले शुरू किया तो वह सबसे बड़ी काली कमाई वाला दारू का सरकारी धंधा ही था। अभी सड़क किनारे पंक्चर बनाने वाले का कारोबार भी शुरू नहीं हुआ था कि देश की सरकारों ने हरेक ने एक दिन में करोड़ों-अरबों का काम कर लिया। भूखे बेरोजगार कारोबार यह देख ही रहा है कि सरकार सबसे चतुर और एकाधिकारवादी कारोबारी है, और सबसे पहले जनता को लूटने का धंधा उसने भारी उत्साह के साथ शुरू कर दिया है। अब जब दारू बिकना एक हकीकत हो ही गई है, तो नशे में लोगों के नाली में छह-छह फीट की दूरी पर गिरने का नियम तो लागू नहीं किया जा सकता, दारू दुकानों पर से भीड़ घटाने के लिए उन्हें अधिक घंटे खोला जाना चाहिए, अधिक दुकानें खोल देनी चाहिए, और जिस तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार ने दारू पर 70 फीसदी कोरोना-टैक्स लगाया है, बाकी राज्यों को भी शराब को ऐसा ही महंगा कर देना चाहिए, ताकि जो दारू पर खर्च से अपना सत्यानाश कर रहे हैं, वे हिन्दुस्तानी मुहावरे के मुताबिक सवा सत्यानाश करें। जहां सत्यानाश, वहां सवा सत्यानाश। और इस अतिरिक्त कमाई को सरकार केजरीवाल की तरह कोरोना से लडऩे के लिए इस्तेमाल करे। हमारा साफ मानना है कि दारू से सरकार को जितनी कमाई होती है, उससे कहीं अधिक उसको जनता की दवा पर खर्च करना पड़ता है, उन दवाओं पर जो कि दारू से जुड़ी होती है। लेकिन जब हिन्दुस्तान के देवताओं को सोमरस पसंद है, जब बहुत से देवताओं को दारू चढ़ती है, तो दारूखोरों और सरकारों के दिमाग से हम दारू कैसे उतार सकते हैं? इस मौके पर साफ-साफ यह न लिखना जिम्मेदारी से मुंह चुराना होगा कि कोरोना से तो यह देश एक बार बच भी जाता, लेकिन अकेली दारू ने देश के तमाम डॉक्टरों और नर्सों की मेहनत पर पानी फेर दिया है। शराब की वजह से कोरोना के फैलने का खतरा इतना बढ़ गया है जितना कि मजदूरों की घरवापिसी की वजह से भी नहीं बढ़ा है। सरकारों को अधिक लिहाज नहीं करना चाहिए, और जब उन्होंने दारू बेचना तय कर ही लिया है, तो सौ दुकानों की जगह दो सौ दुकानें शुरू कर देना चाहिए, और किसी भी सभ्य कारोबार की तरह इस धंधे सभ्यता से करना चाहिए। किसी धंधे को गंदगी के साथ, जुर्म के अंदाज में करने का कोई मतलब नहीं है। जो प्रदेश शराब को पहले भी गैरजरूरी और नाजायज नियमों से बांधकर नहीं चलते थे, वहां पर शराब के धंधे में भ्रष्टाचार भी कम था, और पैसे बर्बाद करने पर आमादा शराबियों को पसंद की बेहतर शराब भी मिलती थी। राज्य सरकारों को इस धंधे को अपने नाजायज काबू में कैद करके रखने की चाहत छोडऩी चाहिए, और दुनिया से सभ्य देशों की तरह लोगों को ढंग से पीने देना चाहिए, और हो सकता है कि वैसे में उसका पीना घटे। फिलहाल कल की रिपोर्ट यह है कि बिना किसी मेहनत के अपनी एक दिन कामयाबी पर कोरोना खुशी में छककर दारू पी रहा है। 
-सुनील कुमार

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