संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय -  मजदूरों की गांव वापिसी न हो  सके, क्या यह साजिश थी?
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय - मजदूरों की गांव वापिसी न हो सके, क्या यह साजिश थी?
06-May-2020

मजदूरों की गांव वापिसी न हो 
सके, क्या यह साजिश थी?

देश के कुछ प्रदेशों से उद्योग संगठनों की यह खुली मांग सार्वजनिक मंचों पर सामने आ रही है कि अगर औद्योगिक क्षेत्रों और महानगरों को छोड़कर मजदूर अपने गांव लौट जाएंगे तो कारखाने शुरू नहीं हो पाएंगे। यह बात महीने भर से हवा में तैर रही थी कि जब लॉकडाऊन किया गया तो दूसरे प्रदेशों में फंसे हुए प्रवासी मजदूरों और कामगारों के लौटने का बहुत आसान-मुमकिन इंतजाम इसीलिए रोक दिया गया था कि जल्द ही लॉकडाऊन उठने की नौबत आ जाएगी तो कारखाने और कारोबार मजदूर और कामगार कहां से लाएंगे। कुछ लोगों का तो यह भी मानना रहा कि लॉकडाऊन की घोषणा के चार घंटे के भीतर देश भर की ट्रेन-बस, और बाकी तमाम गाडिय़ों को इसीलिए बंद कर दिया गया था कि मजदूर वापिस न जा सकें, और धंधे शुरू होने पर मालिकों को हासिल रहें। हमने ऐसी आशंका पर पहले इसलिए नहीं लिखा था कि उसका कोई सुबूत नहीं था। लेकिन अब जब एक-एक करके कई उद्योगपति या औद्योगिक संगठन यह फिक्र जाहिर कर रहे हैं, और इस हद तक ट्वीट भी कर रहे हैं कि मानो मजदूर नमकहराम थे, और जब तक काम रहा किया, और फिर निकल गए। ऐसे में यह बात सोचने को हम मजबूर होते हैं कि क्या लॉकडाऊन के फैसले के चार दिन पहले पूरे देश की रेलगाडिय़ों और बसों को मजदूरों को उनके प्रदेश वापिस पहुंचाने में झोंका नहीं जा सकता था? और क्यों नहीं झोंका जा सकता था? आज जब एक-एक मजदूर-स्पेशल ट्रेन के लिए तमाम इंतजाम करने पड़ रहे हैं, तो लॉकडाऊन के पहले के चार दिनों में जब हिन्दुस्तानी रेलगाडिय़ां हर दिन ढाई करोड़ से अधिक मुसाफिरों को हर दिन ढो रही थीं, तो चार दिनों में हर मजदूर अपने घर पहुंच गए होते, बजाय महीने भर से अधिक के पैदल सफर के, और सड़क पर जान देने के। 

कल ही कर्नाटक की यह खबर आई थी कि वहां बिल्डर्स की मांग पर कर्नाटक सरकार ने मजदूरों के वापिस जाने के लिए तय की गई रेलगाडिय़ां रद्द कर दीं ताकि काम शुरू होने पर भवन निर्माताओं को मजदूर हासिल रहें। जो उद्योगपति आज मजदूरों को कोस रहे हैं, उन्हें अपने दिल से पूछना चाहिए कि अगर ऐसी मुसीबत के बीच उन्होंने अपने बड़े-बड़े अहातों में, इमारतों में, या आसपास की किसी और जगह पर अपने मजदूरों को ठहराकर उनका साथ दिया होता, तो क्या वे सचमुच ही महीने भर के पैदल सफर पर निकले होते? जब मालिक या रोजगारदाता साथ छोड़ देते हैं, तभी मजदूर और कामगार जिंदगी और मौत के बीच के ऐसे मुश्किल सफर पर निकलने को बेबस होते हैं। उनके बदन पर मालिकों की तरह अतिरिक्त चर्बी नहीं होती कि जिसे छांटने को उन्हें इस तरह पैदल चलना पड़े। और उन्हें धोखेबाज करार देने के पहले मालिकों को यह सोचना चाहिए कि जिन मजदूरों के चलते उनके कारखाने और कारोबार चल रहे थे, उनको ऐसा भूखा और बेबस बनाकर क्यों निकाल दिया था? क्या वे यह उम्मीद करते थे कि मजदूर चालीस दिनों के लॉकआऊट को बिना खाना खाए निकाल देंगे? आज उनकी यह फिक्र जायज है कि मजदूर अगर गांव पहुंच गए तो शायद वे जल्द वापिस शहरी कारखानों तक नहीं लौटेंगे। और लौटेंगे भी क्यों? आने वाले खेती के महीनों में उन्हें कुछ तो रोजगार खेतों में मिल जाएगा, और कुछ तो छत्तीसगढ़ जैसे कामयाब राज्य मनरेगा जैसी रोजगार योजना में रिकॉर्ड रोजगार देकर उन्हें उनका हक दे रहे हैं। कारखानेदार थोड़े समझदार तो थे जो उन्होंने सोचा था कि मजदूरों की गांव वापिसी को रोक दिया जाए, तो वे वहीं बेसहारा पड़े हुए जैसे ही काम शुरू होगा, काम पर आ ही जाएंगे। अगर इस नीयत से भी ट्रेन और सड़क की तमाम गाडिय़ों को बंद किया गया था, तो भी हिन्दुस्तानी गरीब ने, मेहनतकश मजदूर ने यह साबित कर दिखाया कि उसके पैरों में इतना दम है, इरादों में ऐसे पंख लगे हैं कि वह जान भी गंवाते हुए हजार-हजार किलोमीटर तक पैदल जा सकते हैं, अपने घर के बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को उठाकर भी ले जा सकते हैं। पसीने ने पूंजी की तमाम साजिशों को नाकामयाब करके दिखा दिया। आज अगर कोई यह सोचे कि देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए मजदूरों को कारखाने लौटना चाहिए, तो उनकी मुसीबत के वक्त दगाबाज साबित हो चुके पूंजीवाद पर अहसान करने के लिए उनके पास और पसीना भी बाकी नहीं है। हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था मजदूर को पुर्जे की तरह आखिरी दम तक इस्तेमाल करके उसे फेंक देने की सोच के साथ अगर चल रही है, तो उसे पुर्जों से किसी वफादारी की उम्मीद भी नहीं करना चाहिए। पुर्जे तो पुर्जे ही होते हैं, वे क्या वफादार होंगे, और वे क्या बेईमान होंगे। यह लिखते हुए हमें पिछले दिनों छापे हुए एक कार्टून की याद आती है जिसमें शतरंज की एक बिसात मुड़कर एक छत की तरह बारिश को रोक रही है, और महज प्यादों को खुली बारिश में छोड़ दिया गया है, तमाम राजा-रानी-वजीर उस छत के नीचे महफूज हैं। इस बार का लॉकडाऊन कुछ वैसा ही था और राजा-रानी-वजीर के पास तो चालीस दिन जिंदा रहने का इंतजाम था, प्यादों को सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया गया था। अब प्यादों को वफादारी का तकाजा गिनाया जा रहा है। पिछले बरसों में गरीबों और मजदूरों ने यह देखा है कि उनके खाते में अगर कुछ रकम थी, तो भी वह नोटबंदी के दौरान अपने इलाज के काम भी नहीं आ सकती थी। उनके पास पुराने नोट अगर कहीं दबे हुए थे, तो उनकी वह मेहनत भी मानो दफन हो गई थी। इस बार उन्होंने लॉकडाऊन की बेरहमी देखी है, और जाहिर है कि अगर मालिकों ने ही उनका साथ दिया होता तो वे चिलचिलाती धूप में जलती सड़कों पर दुधमुंहे बच्चों से लेकर चलने में अशक्त बुजुर्गों तक को ढोकर ऐसे अंतहीन सफर पर क्यों निकले होते? 

हिन्दुस्तानी मजदूर के सामने एक बात साफ है, मुसीबत के वक्त मालिक और सरकार के मुकाबले हो सकता है कि कोरोना उसके काम आ जाए। ऐसे तजुर्बे वाले मजदूर से देश की अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए खुद मर जाने की उम्मीद करना एक ज्यादती भी होगी, और उसकी समझ को कम आंकना भी होगा। हो सकता है कि हिन्दुस्तान की आज की तथाकथित अर्थव्यवस्था आने वाले वक्त में एक नई शक्ल ले जब गांव लौटे हुए मजदूर गांव में ही रोजगार की सोचें, वहीं पर कोई काम करने की सोचें। यह गांव की गांव की तरफ वापिसी का एक वक्त भी हो सकता है, और कोई भी समझदार राज्य सरकार इस मौके को इस्तेमाल भी कर सकती है। शहरों से हुनरमंद मजदूर और कारीगर लौट रहे हैं, और गांवों में कुटीर उद्योग लगाने और बढ़ाने का यह एक बड़ा मौका साबित हो सकता है। 

फिलहाल कारखानेदार और उनके संगठन आज जब मजदूरों को बिना शब्दों के इस्तेमाल के दगाबाज और नमकहराम साबित करने की कोशिश कर रहे हैं, तो वे मजदूरों के साथ अपने संबंधों की हकीकत को सामने रख रहे हैं, और साबित कर रहे हैं कि वे कितने बुरे मालिक थे। ऐसी जुबानी कड़वाहट से परे रहते लोगों को वक्त रहते अपने मजदूरों का साथ देना था, जो कि उन्होंने नहीं दिया। 
-सुनील कुमार

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