संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय- अर्थव्यवस्था चलाने सरकारें मजदूर कानून स्थगित रखने  की तैयारी कर रही हैं ?
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय- अर्थव्यवस्था चलाने सरकारें मजदूर कानून स्थगित रखने की तैयारी कर रही हैं ?
07-May-2020

अर्थव्यवस्था चलाने सरकारें 
मजदूर कानून स्थगित रखने 
की तैयारी कर रही हैं ?

आन्ध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम में एक केमिकल-कारखाने से मुंहअंधेरे जहरीली गैस रिसी, और आठ लोगों की मौत की खबर है, और हजारों इससे प्रभावित हुए हैं। दुनिया के सबसे बुरे औद्योगिक हादसे, भोपाल के यूनियन कार्बाइड कारखाने की याद ऐसे मौके पर आती ही है जिसमें हजारों लोग मारे गए थे, और लाखों की जिंदगी तबाह हो गई थी। चौथाई सदी गुजर जाने पर भी भोपाल उसके जख्मों से उबर नहीं पाया है। वह गैस हादसा भी इसी तरह स्टोर की गई गैस में हुआ था, और इसी तरह सुबह के मुंहअंधेरे हुआ था। 

कल से लेकर आज तक देश के मजदूरों और कारखानों की ही चर्चा हो रही है, और कल इसी जगह हमने देश के कई उद्योगपतियों, और कई उद्योग संगठनों की बात भी लिखी थी जो कि यह सोचते हैं कि लॉकडाऊन के इस दौर में खाली बैठे मजदूर अपने गांव भी न जाएं, और कारखाने-काम शुरू होने का इंतजार करें। दूसरी तरफ मालिकों से किसी तरह की मदद न मिलने पर, जान पर खतरा, जेब खाली, सिर पर अनिश्चितता के चलते मजदूर राह में मरते हुए भी पैदल आगे बढ़ते जा रहे हैं, बचे हुए जिंदा मजदूर। ऐसे में मजदूरों के हक, काम की उनकी गारंटी की बात भी करना जरूरी है। एक खबर यह आ रही है कि भारत के कुछ राज्य मजदूर कानूनों में अगले तीन साल के लिए ढील देने जा रहे हैं ताकि कारखानों के बंद होने की नौबत न आए, और नए कारखाने शुरू करने में लोगों की दिलचस्पी रहे। यह बात कई देशों के सिलसिले में पहले भी हुई है कि किस तरह चीन में मजदूर कानूनों को खत्म करके वहां पर उत्पादन बढ़ाया गया है, और अर्थव्यवस्था आगे बढ़ी है। हिन्दुस्तान में अभी दो-चार दिन पहले ही देश के एक सबसे अच्छे समझे जाने वाले उद्योगपति, नारायण मूर्ति का यह बयान सामने आया था कि लोगों को दस घंटे रोज काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस बात के लिए मजदूरों के बहुत से हिमायती लोगों ने सोशल मीडिया पर उनकी खूब आलोचना भी की थी, और कल से अब तक कर्नाटक के भवन निर्माताओं की आलोचना चल ही रही है कि उन्होंने किस तरह राज्य सरकार पर दबाव डालकर मजदूरों की वापिसी की रेलगाडिय़ां रद्द करवाईं ताकि लॉकडाऊन के बाद काम शुरू होने पर निर्माण मजदूर उपलब्ध रहें। आज एक अखबार की रिपोर्ट है कि उत्तरप्रदेश मंत्रिमंडल ने अगले तीन बरस के लिए बहुत से मजदूर कानून स्थगित कर दिए हैं, लेकिन अभी तक इसकी अधिक पुख्ता जानकारी आई नहीं है कि यह खबर सच है। दूसरी तरफ मध्यप्रदेश को लेकर एक पुख्ता अखबार की जानकारी है कि वहां ऐसी तैयारी चल रही है कि औद्योगिक मजदूरों को लेकर बहुत से कानूनों को स्थगित किया जा सकता है ताकि नए उद्योग वहां आएं। बिहार को लेकर यह बात चल रही है कि आज वहां पर जितनी जनता काम के उम्र की है, उसे भी काम नसीब नहीं है, और इसीलिए लोग बाहर जाते हैं। अब बिहार के सामने यह दिक्कत है कि वहां से बाहर गए 17 लाख मजदूर लौटते हैं, तो वे इस पहले से बेरोजगार चल रहे राज्य में काम क्या करेंगे? और दूसरे प्रदेशों में काम करते हुए वे घर पर जो मजदूरी भेजते थे, उसके बंद होने से बिहार का क्या होगा?

कोरोना के आने के पहले से ही बाजार की मंदी भयानक थी। हिन्दुस्तानी कारखानों और कारोबारों में से शायद ही कोई चैन से दिन गुजार रहे थे। ऐसे में कोरोना इन दो महीनों का धंधा तो खत्म कर ही चुका है, यह बात तय है कि आज ही कोरोना चल बसे, तो भी अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में चार-छह महीने और लगेंगे ही। आज तो हाल यह दिखता है कि हिन्दुस्तानी अर्थव्यवस्था की पटरी भी लोग बेचकर खा चुके हैं, और पटरी भी फिर से बिछानी पड़ेगी। लेकिन यह हालत सिर्फ सरकारों की हो ऐसा भी नहीं है। यह हालत हर कारोबार की भी है। देश के जाने कितने ही टीवी चैनल अपने लोगों को निकाल चुके हैं, बहुत से अखबारों ने छपना बंद कर दिया है, और सिर्फ डिजिटल संस्करण पर आ गए हैं। कल सुबह का टाईम्स ऑफ इंडिया कुल 8 पेज का था, जबकि साल में बहुत से दिन इस अखबार के आठ पेज पलटने के बाद तो इश्तहार खत्म होते थे। यह हाल सभी का है। केन्द्र सरकार की तरफ से यह आदेश जरूर निकाल दिया गया कि कोई मालिक तनख्वाह न काटे, राज्य सरकारों ने आदेश निकाल दिया कि कोई स्कूल फीस न मांगे। अब सवाल यह है कि फीस न लें, तो शिक्षकों को तनख्वाह कहां से दें? इस बारे में हम पहले भी लिख चुके हैं कि मजदूर कानून, और नौकरी की सेवा शर्तों से परे जाकर केन्द्र सरकार का फतवा कोई मायने नहीं रखता है, और सरकार किसी को जबर्दस्ती तनख्वाह नहीं दिला सकती। 

अब देश में ऐसे हाल में जब उद्योग-धंधों का एक बड़ा हिस्सा शुरू नहीं होने जा रहा है, उस वक्त कोई सरकार अगर यह सोच रही है कि मजदूर कानूनों को निलंबित रखकर किसी तरह काम-धंधों को शुरू होने दिया जाए, तो एक सरकार के रूप में उसका यह सोचना हमें नाजायज नहीं लगता है। हिन्दुस्तान में एक सदी लड़ते-लड़ते मजदूरों को हक मिले थे, लेकिन ये तमाम हक तभी तक मायने रखते हैं, जब तक उनके साथ-साथ मजदूरी या तनख्वाह भी मिलते रहे। नौकरी ही छूट जाए, काम ही बंद हो जाए, तो मजदूर कानूनों से पेट भरने वाला नहीं है। हमारी यह बात मजदूर विरोधी लग सकती है, लेकिन अगर आज कड़ाई से मजदूर कानूनों को लागू करवाया जाए तो बहुत ही कम काम-धंधे शुरू हो पाएंगे। देश में कई किस्म के काम के लिए केन्द्र सरकार द्वारा तय किए गए वेतनमान आज भी मालिक के हिसाब से व्यवहारिक नहीं हैं, और वे जमीन पर अधिकतर संस्थानों में लागू भी नहीं होते हैं, जिनमें अखबारों को लेकर बनाया गया वेतनमान भी शामिल है। इसी तरह दूसरे कारोबार भी देश की अर्थव्यवस्था के चलते मजदूर कानूनों का बोझ उठाना मुश्किल पा रहे हैं। ऐसे में सरकार में बैठा तबका जरूर यह सोच सकता है कि काम-धंधे चलें तो ही मजदूर-कामगार को काम मिलेगा, और सरकार को टैक्स मिलेगा। आज कोरोना के पहले की बदहाली में कोरोना के बाद की बर्बादी ने जुड़कर हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को ऐसे फटेहाल में पहुंचा दिया है कि मजदूर कानून और रोजगार के बीच आपस में एक टकराव दिखने लगा है। यह नौबत मजदूरों के हित के खिलाफ है, लेकिन यह नौबत मालिकों के काबू के बाहर की भी है। अब आने वाला वक्त कौन से कानून, कौन से अधिकार, और कौन से रोजगार की जगह लेकर आता है, यह बताना अभी मुश्किल है क्योंकि अभी कोरोना का खतरा पूरी तरह से सामने आना भी बाकी है। अभी हो सकता है कि आने वाले महीने सरकार और कारोबार दोनों के लिए इससे भी अधिक चुनौती के रहेंगे, और सब कुछ इन दोनों के काबू के बाहर भी रहेगा। 

हमने मजदूरों-कामगारों, और हुनरमंद स्वरोजगारियों, सभी के लिए पिछले दिनों यह लिखा था कि लॉकडाऊन के दौरान उनको अपने हुनर को बेहतर बनाना चाहिए, कोई बेहतर हुनर सीखना चाहिए क्योंकि आने वाले वक्त किसी भी धंधे का मैनेजमेंट एक कसाई की तरह यह देखेगा कि किस कर्मचारी से उसका कितना काम निकलता है। जिंदा रहने के लिए हर किसी को अपने आज से बेहतर होकर चलना होगा, अधिक मेहनत करनी होगी, वरना गुजारा बहुत ही मुश्किल रहेगा। जिस तरह लोगों को अपने घर के भीतर के खर्च भी घटाने होंगे, सीमित साधन-सुविधाओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करना होगा, कुछ वैसा ही कारोबार का मैनेजमेंट भी करने पर मजबूर होगा। सारे कानून धरे रह जाएंगे अगर मैनेजमेंट अपने कमजोर कर्मचारियों को हटाने पर उतारू हो जाएगा। हिन्दुस्तान में करोड़ों कर्मचारी बिना किसी औपचारिक कागजात के काम करते हैं जिनको कभी भी हटा दिया जाता है, कभी भी हटाया जा सकता है। ऐसे में मजदूर-अदालतें सरकारी अधिकारी ही चलाते हैं, और सरकार का रूख किसी भी तरह धंधे को जारी रखने का होगा। जब तक कर्मचारी संगठन अदालतों तक जाकर मजदूर कानूनों पर कड़ी अमल के आदेश लाकर उन पर अमल करवाएं, तब तक करोड़ों लोगों के भूखे मरने की नौबत आ सकती है। इसलिए आने वाले महीनों के लिए ही तमाम कामगार-कर्मचारी अपने आपको महत्वपूर्ण साबित करने के लिए तैयारी करें, क्योंकि आने वाला वक्त कम संख्या में अधिक काम करने वाले लोगों का रहेगा, वैसे ही लोगों को काम मिलेगा, वैसे ही लोग अपने स्तर पर जिंदा रह पाएंगे। यह वक्त तमाम गैरसरकारी वेतनभोगियों के लिए बहुत ही खतरे का है, और जैसे-जैसे लॉकडाऊन के बाद काम शुरू होगा, नौकरियां जाने लगेंगी। सभी लोग कमर कसकर तैयार रहें। 
-सुनील कुमार

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