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समर्पण को सलाम...
समर्पण को सलाम...
09-May-2020

रूचिर गर्ग

रायपुर की एक समर्पित महिला को रूचिर गर्ग का सलाम

इस कोरोना काल में सरकारें तो जूझ ही रही हैं लेकिन कोई संदेह नहीं कि देश भर में विभिन्न राजनीतिक दलों, जनसंगठनों और स्वयंसेवी संगठनों के हजारों साथी और साथ में सामाजिक, धार्मिक, व्यापारिक संगठन और समूह भी जिस तरह मैदान में हैं उसने यह साबित किया है कि इनके बिना यह लड़ाई लड़ी नहीं जा सकती थी।

ये सब जिस शिद्दत के साथ मैदान में हैं वो बेमिसाल है। ऐसे असंख्य लोग हैं। मेरे शहर (छत्तीसगढ़ के रायपुर) में भी, देश के कोने-कोने में भी। इतने कि सब का नाम दर्ज करना मुमकिन नहीं है। लेकिन मैं अपने शहर की जुझारू एक्टिविस्ट मंजीत बल का जिक्र जरूर करूँगा।

सेवानिवृत्त प्राध्यापक की बेटी मंजीत बल से परिचय तो पहले था लेकिन उनके तेवर पहली बार तब देखे थे जब वो पिछली सरकार के एक ताकतवर मंत्री के खिलाफ खड़ी हुईं। बतौर संपादक मुझे एक बार उनसे यह सुनने को मिला था- ये मामला आप लोगों के बस का नहीं है। मुझे अकेले ही लडऩा होगा। वो लड़ रही हैं।

मंजीत बल जितनी जुझारू हैं, जीवट हैं उतनी ही संवेदनशील भी। जीवों से बहुत प्रेम है उन्हें। जहरीले सांपों को खेल-खेल में पकड़ती हैं और जब कोई किसी सांप से डर कर मारने की बात करता है तो विचलित मंजीत पूछती हैं कि सांप ने आपका क्या नुकसान किया?

लेकिन ये संवेदनाएं केवल पशु प्रेम तक सीमित नहीं हैं। अगर आपको इंसानियत की इस जीती जागती मिसाल से मिलना है तो इन दिनों रायपुर के लाभांडी इलाके में इनके नेतृत्व में चल रहे शेल्टर होम में आना चाहिए।

इस शेल्टर होम में मजदूरों को रखा जा रहा है। उन मजदूरों को जो बच्चों को अपने काँधों पर और जान को हथेली पर लिए घर लौटने के लिए निकले हैं, जिन्हें रास्ते में कहीं किसी मंजीत बल के आश्रय स्थल की छांव मिल पाती होगी।

पिछले शायद डेढ़ महीने से यह सिलसिला चल रहा है। रोज डेढ़ सौ, दो सौ मजदूर या दीगर लोग यहां होते हैं। अपनी संस्था को मिलने वाले अनुदान से या इधर-उधर से मदद जुटा कर मंजीत बल अपनी क्षमता की सीमाओं को भी पछाड़ते हुए जुटी हैं। उन्होंने करीब 35 लोगों की एक टीम खड़ी कर ली है। कोरोना काल में उनकी सेवा और जतन देख कर सरकार और प्रशासन में भी उन्हें सम्मान से देखा जाता है। इन दिनों आपको मंजीत बल से मिलना है तो दोपहर या देर रात, किसी हाईवे पर मजदूरों के किसी जत्थे के खाने का इंतजाम करती हुई या किसी जत्थे को गाड़ी से कहीं पहुंचाती हुई मिलेंगी।

एक परिचित टैक्सी वाले से उन्होंने कहा है कि एक महीने तक वो उनसे गाडिय़ां लेंगी और पैसे देंगी पर कब और कैसे ये आज नहीं बता सकतीं!

मंजीतजी इस समय फुर्सत में नहीं होतीं। अगर आपको उनसे बात करनी हो तो तभी बात करिये जब आप मदद का हाथ बढ़ाने आ रहे हों वर्ना उनका समय अभी भूखे, थके हारे मजदूरों के लिए आरक्षित है ।

उनका नम्बर रायपुर में तो, और बाहर भी, ढेर सारे लोगों के पास होगा। मैं यहां भी शेयर करना चाहता हूँ अगर वो अनुमति देंगी।

इस समय सरकार को, प्रशासन को और मंजीत बल जैसे हस्तक्षेप को बहुत मदद की जरूरत है। हिंदुस्तान का समाज जितना छोटी-छोटी बचतों के लिए जाना जाता है उतना ही छोटे-छोटे दान के लिए भी।

चिंता करिये कि एक मंजीत अपनी टीम के साथ दिन और रात बेसुध जुटी हुई हैं। इन्हें शुभकामना की भी जरूरत है और मदद की भी। जितनी मदद मिलेगी उतने ज्यादा भूखे, थके हारे गरीबों के लिए राहत जुट सकेगी।

ऐसी मदद लखनऊ को भी चाहिए, भोपाल ,पटना, कानपुर, अहमदाबाद, मुम्बई, इंदौर, जयपुर या कोलकाता से लेकर छोटे-बड़े कस्बों और गांवों को भी।

सरकार, प्रशासन से लेकर ऐसी संस्थाओं और ऐसे लोगों के साथ खड़े होने का यह सबसे जरूरी समय है। बहुत छोटी मदद भी कहीं भी बड़ी राहत का हिस्सा बन सकेगी।

फिलहाल तो मंजीत बल के लिए केदारनाथ अग्रवाल की यह पंक्तियां-

मैंने उसको

जब-जब देखा,

लोहा देखा...

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