संपादकीय

दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय :  आज भारत एक देश के बजाय प्रदेशों में बंटे हुए समूह की तरह बर्ताव कर रहा है क्योंकि
दैनिक 'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : आज भारत एक देश के बजाय प्रदेशों में बंटे हुए समूह की तरह बर्ताव कर रहा है क्योंकि
09-May-2020

आज भारत एक देश के बजाय प्रदेशों में बंटे हुए समूह की तरह बर्ताव कर रहा है क्योंकि

आज एक अजीब सी खबर सामने आई है, जब पूरे देश से करोड़ों मजदूर अपने गृहप्रदेश लौटने के लिए हजार-हजार किलोमीटर तक पैदल चल रहे हैं, तब बिहार के मजदूरों की ट्रेन सरकारी मंजूरी के साथ तेलंगाना रवाना हुई है, क्योंकि वहां मिल मालिकों ने उन्हें काम पर बुलाया है, और सरकारी औपचारिकताएं पूरी करके वे काम पर जा रहे हैं। हिन्दुस्तान अलग-अलग प्रदेशों में खंडित देश कभी नहीं रहा है। जब यह अंग्रेजों का गुलाम रहा उस वक्त तो पूरा का पूरा पाकिस्तान, इधर बांग्लादेश सहित कई और देशों तक इस देश का नक्शा, या अंग्रेजीराज का नक्शा फैले रहा। यह तो हाल के बरसों में केन्द्र और राज्यों के बीच एक अभूतपूर्व टकराव खड़ा हुआ है जिसकी वजह से बार-बार देश के संघीय ढांचे की बात उठ रही है। पहले शायद यह बात इसलिए भी अधिक नहीं उठती थी कि देश का अधिकतर हिस्सा अकेली कांग्रेस पार्टी के कब्जे में था, और केन्द्र तथा अधिकतर राज्य एक ही रीति-नीति पर, एक ही लीडरशिप पर चलते थे। आज जब अलग-अलग प्रदेशों से निकलकर मजदूर अपने गांव लौट जाना चाह रहे हैं, ताकि बिना काम के भी वे अपनी झोपड़ी में जिंदा रह सकें, तो यह बात भी उठ रही है कि दूसरे प्रदेशों में जाकर काम करने वालों की ऐसी वापिसी से इन उद्योग-व्यापार का क्या होगा, और अपने प्रदेश जाकर वे क्या करेंगे, उनके लिए रोजगार पहले ही नहीं था तभी तो वे दूसरे प्रदेश पहुंचे थे। अब लौटकर वे अपने गरीब प्रदेश की अर्थव्यवस्था पर क्या एक नया अतिरिक्त बोझ नहीं बन जाएंगे? 

आज हिन्दुस्तान के सभी प्रदेशों के सामने दो किस्म की दिक्कतें चल रही हैं। धंधा बंद है जिससे कि सभी परेशान हैं, जनता से लेकर सरकार तक का जीना मुश्किल हो रखा है। दूसरी बात जम्मू-कश्मीर राज्य के वक्त से वहां जिस तरह का लॉकडाऊन शुरू हुआ, वह राज्य के टुकड़े हो जाने के बाद भी जारी है, और लोगों का जीना कैसे हो रहा होगा, यह बाकी हिन्दुस्तान ने कभी सोचा ही नहीं। आज बाकी हिन्दुस्तान की हालत कमोबेश उसी किस्म की हो रही है जिस तरह कश्मीर की हालत आधा साल पहले से चली आ रही थी। आवाजाही बंद, धंधा बंद, स्कूल-कॉलेज बंद, और धरती की इस जन्नत को बाकी हिन्दुस्तान के मुकाबले एक और अतिरिक्त रोक मिली थी, फोन और इंटरनेट बंद होने की। आज बाकी हिन्दुस्तान कम से कम फोन और इंटरनेट की कमी तो नहीं झेल रहा है। आज देश के बाकी तमाम प्रदेश मंदी से परे एक दूसरी दिक्कत झेल रहे हैं, कुछ के पास कारखाने हैं, कंस्ट्रक्शन के काम हैं, लेकिन मजदूर लौट चुके हैं, या बचे-खुचे लौटने के लिए स्टेशनों पर पहुंचे हुए हैं, या पटरियों पर कटे पड़े हैं। दूसरी तरफ जिन राज्यों में उनके मजदूर लौट रहे हैं, उन राज्यों के पास स्टेशनों पर, या राज्य की सरहद पर मेडिकल जांच की चुनौती है, तमाम मजदूरों की जानकारी दर्ज करने, उन्हें ठहराने, जरूरत पर उनका इलाज करने के लिए दाखिला करने, और फिर उन्हें गांव तक पहुंचाने की चुनौती तो है ही। इससे परे एक और बहुत बड़ी चुनौती यह है कि लाखों से लेकर दसियों लाख तक लोग अलग-अलग राज्यों में लौट रहे हैं, उन्हें कैसे काम से लगाया जाएगा? दूसरे प्रदेशों में मजदूरी या दूसरे काम करके वे लोग जो कमाई घर भेजते थे, अब उसका क्या होगा? घरवालों का क्या होगा? कुल मिलाकर बड़े पैमाने पर बेकारी और बेरोजगारी के जो-जो बुरे असर हो सकते हैं, उन सबसे राज्य कैसे निपटेंगे? 

बोलचाल की मजाक की जुबान में कहा जाता है कि एक तरफ पीपल के पेड़ को भूत नहीं मिल रहा है, तो दूसरी तरफ भूतों को पीपल नहीं मिल रहा है। आज प्रदेशों की हालत यही है। कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे बहुत सारे संपन्न, विकसित, और रोजगार की गारंटी वाले राज्य हैं, जो कि अपनी स्थानीय आबादी से अधिक बाहरी मजदूरों पर निर्भर रहते हैं। स्थानीय आबादी खेती में खप जाती है, और दूसरे बहुत से कारोबार दूसरे प्रदेशों के मजदूरों पर टिके रहते हैं। ऐसे लोगों में से बहुत से लोग तो आज भी रोजगार की जगह को छोड़कर अपने गांव लौटने के पहले चार बार सोच रहे हैं कि गांव लौटकर आखिर करेंगे क्या? यहां पर एक बार फिर केन्द्र और राज्य सरकारें की जिम्मेदारी और नाकामयाबी दोनों की चर्चा जरूरी हो जाती है। राज्यों के पास न तो अपने राज्य से बाहर गए हुए मजदूरों, कारीगरों, और दूसरे हुनरमंदों की पुख्ता और पूरी जानकारी है, न ही विकसित राज्यों के पास वहां आए हुए दूसरे प्रदेशों के मजदूरों  की जानकारी है। हालत यह है कि जिन राज्यों के लोग बाहर जाते हैं वहां की सरकार, वहां के नेता, वहां का समाज उसे मजदूरों का पलायन कहता है। हम लगातार हमेशा से इस पलायन शब्द को अन्यायपूर्ण मानते हुए यह लिखते आए हैं कि मजदूर अपनी किसी जिम्मेदारी को छोड़कर बाहर नहीं भागते हैं, जब उनके अपने प्रदेश की सरकारें उन्हें रोजगार नहीं दे पातीं, उन्हें जायज मजदूरी नहीं मिल पाती, तो ही वे काम की तलाश में, बेहतर मजदूरी की तलाश में बाहर जाते हैं। इसी तरह आज जब रोजगार देने वाले प्रदेश इस बात का रोना रो रहे हैं कि जब काम शुरू होने के आसार हैं तो मजदूर उन्हें छोड़कर चले जा रहे हैं, और इसे उल्टा-पलायन कह रहे हैं, तो हम एक बार फिर इस शब्द को भी अन्यायपूर्ण पाते हैं। हमारा मानना है कि रोजगार वाले प्रदेश अगर प्रवासी मजदूरों का ठीक से ख्याल रखते, तो हजार-हजार किलोमीटर के सफर पर मरने के लिए ये गरीब मजदूर निकले ही नहीं होते। इन रोजगारी प्रदेशों ने भी बाहर से आए मजदूरों को मानो स्थानीय कारोबारियों और कारखानेदारों का बंधुआ मजदूर बनाकर आसानी से भुला दिया था क्योंकि ये उन राज्यों के वोटर तो थे ही नहीं। 

अब जब केन्द्र सरकार ने करीब डेढ़ महीने पहले लॉकडाऊन किया, तो उसने इनमें से किसी भी किस्म के प्रदेश से चर्चा नहीं की, जहां मजदूर थे उनसे चर्चा नहीं की कि सबसे आसान काम, उन्हें उसी प्रदेश में जिंदा रहने में मदद करता, कैसे किया जाएगा। दूसरी तरफ जिन प्रदेशों में ऐसे करोड़ों मजदूर लौट सकते थे, उनसे भी बात नहीं की कि इनके वापिस आने का क्या इंतजाम होगा, लौटकर वे कहां रहेंगे, क्या करेंगे, और क्या कमाएंगे-खाएंगे। नतीजा यह हुआ कि आज हर राज्य एक किस्म से अनाथ हो गया है और उसे अपने धंधों की, या अपने बंदों की फिक्र सारी की सारी खुद करनी पड़ रही है। नतीजा यह हुआ है कि भारत एक देश के बजाय प्रदेशों में बंटे हुए एक समूह की तरह बर्ताव कर रहा है क्योंकि जिम्मेदारी आकर प्रदेश की सरहद पर खत्म हो रही है, या वहां से शुरू हो रही है। जब कभी राष्ट्रीय स्तर की कोई समस्या होती है, विपदा होती है, या राष्ट्रीय स्तर का कोई समाधान ढूंढना होता है, तो भारत के संघीय ढांचे में सबसे बड़ी जिम्मेदारी, और शायद अकेली जिम्मेदारी केन्द्र सरकार पर ही आती है, जो कि राज्यों को भरोसे में लेकर, उनमें तालमेल बिठाकर, जरूरत के मुताबिक उनकी मदद करके विपदा से पार पाती है। लेकिन आज केन्द्र सरकार मोटे तौर पर एकतरफा बंदिशें लागू करने वाली एक तमाशबीन की तरह दिख रही है जो कि राज्यों के बीच किसी भी किस्म के तालमेल से बिल्कुल ही हाथ झाड़ बैठी है। यह नौबत भारतीय लोकतंत्र और उसकी शासन व्यवस्था को बनाने वाले लोगों ने शायद सोची भी नहीं होगी कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर की सबसे भयानक विपदा के वक्त केन्द्र सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी, और प्रदेशों के बीच अपने-अपने अस्तित्व का संकट उन्हें आत्मकेन्द्रित और आत्मरक्षा के फैसले लेने पर मजबूर करेगा। आज हालत यह है कि कुछ प्रदेश बिना किसी इंतजाम के बेबस मजदूरों को बेबसी में रोके रखना चाहते हैं, ठीक बंधुआ मजदूरों की तरह। कई प्रदेश यह बिल्कुल भी नहीं चाहते हैं कि कोरोना-संक्रमण के इस भयानक दौर में उनके प्रदेश के मूल निवासी मजदूर दूसरे प्रदेशों से वापिस लौटें, और सरकार की मुसीबत को कई गुना बढ़ा दें। और जिन प्रदेशों से होकर मजदूर गुजर रहे हैं, वे सारे ही प्रदेश यह चाहते हैं कि यह बला जल्द से जल्द उनकी जमीन से पार हो जाए, और अगले प्रदेश में चले जाए। कड़वा सच यह भी है कि प्रदेशों के भीतर भी मजदूरों की राह में पडऩे वाले जिलों के अफसर भी इतने आत्मकेन्द्रित हो गए हैं कि वे अपने जिलों में दाखिल होने वाले मजदूरों को जल्द से जल्द अगले जिले में दाखिल करवा देना चाहते हैं, ताकि उनके जिले पर से बला टले। 

केन्द्र सरकार के एक गलत, और बिना तैयारी, बेमौके के लॉकडाऊन के एकतरफा फैसले ने राज्यों को केन्द्र से अलग कर दिया है, और राज्यों के भीतर एक जिले ने उसको दूसरे जिले से अलग कर दिया है। अखंड भारत की सोच रखने वाले लोगों को यह खंड-खंड भारत, और उसके खंड-खंड जिले आसानी से समझ नहीं आएंगे क्योंकि भावनाओं की पट्टी आंखों के साथ-साथ दिमाग को भी ढांक लेती है। फिलहाल यह बरस निकल जाए, तो उसके बाद लोकतंत्र के शोधकर्ताओं को भारत के संघीय ढांचे पर कोरोना की चुनौती नाम का एक दिलचस्प मुद्दा शोध करने के लिए मिलेगा। 
-सुनील कुमार

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