विचार / लेख

अदृश्य महामारी और राजनीतिक संस्कृतियों का अंतर
अदृश्य महामारी और राजनीतिक संस्कृतियों का अंतर
11-May-2020

प्रमोद रंजन

अप्रैल के पहले सप्ताह में अपनी फेसबुक वॉल पर स्वीडन के बारे में लिखते हुए मैंने कोविड -19 से निपटने के उसके तरीके की प्रशंसा की थी। जब यूरोप का एक बड़ा हिस्सा लॉक डाउन में जा रहा था, उस समय स्वीडन ने अपने नागरिकों पर इसे थोपने से इंकार कर दिया था। उस समय विश्व स्वास्थ संगठन, इम्पीरियल कॉलेज (लंदन) आदि  लॉकडाउन नहीं करने पर ‘संभावित’ मौतों के भयावह आंकड़े भी लगातार जारी कर रहे थे, जो अब भी बदस्तूर जारी है। लेकिन स्वीडन ने लॉक डाउन नहीं किया। आज तीन महीने बाद स्वीडन के संबंध में वे सभी अनुमान  अतिश्योक्ति साबित हो चुके हैं। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक स्वीडन में 2700 ऐसे लोगों की मौत हुई है, जिन्हें कोरोना का संक्रमण था। वह भी अधिकांश मामलों में ऐसे बहुत बुजुर्ग लोगों की, जो पहले से ही किसी अन्य जानलेवा बीमारी से पीडि़त थे

स्वीडन का कहना है कि लोकतंत्र और नागरिक-स्वतंत्रता में विश्वास करने वाले हमारे समाज को इस प्रकार के थोपे हुए बंधन स्वीकार नहीं हैं। आरंभिक सप्ताहों में स्वीडन के इस कदम की दुनिया के प्राय: सभी बड़े मीडिया-हाउसों ने आलोचना की तथा उसे शंका से देखा। कहा गया कि स्वीडन की सरकार अपने बुजुर्गों का जीवन खतरे में डालने की क्रूरता कर रही है।  लेकिन स्वीडन ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे। उसने अपने नागरिकों के विवेक पर भरोसा किया तथा सिर्फ आवश्यक ‘गाइडलाइन्स’ जारी की, जिनमें हाथ धोना और सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षित दूरी बनाए रखने की हिदायतें शामिल थीं।

हालांकि सिर्फ स्वीडन ही नहीं, बल्कि बेलारूस, निकारागुआ आदि अनेक देशों ने भी लॉकडाउन नहीं किया है। तुर्की और ब्राजील के राष्ट्राध्यक्षों ने भी लॉकडाउन को लेकर अलग नजरिया रखा है। इन अपेक्षाकृत कमजोर देशों की नीतियों को मूर्खता, तानाशाही आदि कहकर खारिज कर देना अपेक्षाकृत आसान है। आज दुनिया भर के मीडिया संस्थानों में इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों की क्रूरता और मूर्खता के बारे में खबरें प्रकाशित हो रही हैं।

लेकिन दुनिया के सबसे संपन्न, खुश-हाल और 32 नोबेल पुरस्कार विजेताओं को पैदा कर चुके स्वीडन को मूर्ख और तानाशाह कह पाना कठिन है। इसलिए विश्व स्वास्थ संगठन ने भी स्वीडन के मामले पर लंबे समय तक चुप्पी बनाए रखी।

अंतत: 1 मई, 2020 को शर्मिंदा हुए विश्व स्वास्थ संगठन ने ‘किंतु-परंतु’ के साथ स्वीकार किया कि स्वीडन का मॉडल, कोरोना महामारी के मामले में दुनिया के लिए आदर्श हो सकता है। उसके पास इसके अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं था, क्योंकि लॉकडाउन नहीं करने की स्थिति होने वाली ‘संभावित’ मौतों का आंकड़ा स्वीडन में झूठा साबित हुआ था।

इस संबंध में 2 मई को मैंने अपने फेसबुक मित्रों को पुन: इसकी जानकारी दी तो कुछ लोग उन आंकड़ों को दिखाने लगे, जिसमें कहा गया था कि स्वीडन में प्रति-लाख जनसंख्या के हिसाब से कोरोना से मरने वालों की संख्या उसके पड़ोसी देशों की तुलना में ज्यादा है। जबकि कुछ मित्रों का कहना था कि भारत जैसे विशाल और अनुशासनहीन जनता वाले देश में स्वीडन मॉडल लागू नहीं हो सकता।

उन मित्रों के आंकड़े संबंधी सवालों का उत्तर स्वीडन की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी के सलाहकार जोहान गिसेके ने गत 5 मई,  2020 को विश्व प्रसिद्ध मेडिकल-जर्नल  ‘द लान्सेट’ में प्रकाशित अपने छोटे से लेख में दिया है। आगे बढऩे से पहले हम उस लेख को देखेंगे, जिसका अनुवाद मैंने लेखक की अनुमति से किया है।

70 वर्षीय जोहाना गिसेके गिसेके स्टॉकहोम स्थित प्रतिष्ठित मेडिकल यूनिवर्सिटी ‘करोलिंस्का’ में प्रोफेसर रहे हैं। उनकी पहचान विश्व के एक प्रमुख महामारीविद् के रूप में रही है। वे विश्व स्वास्थ्य संगठन के संक्रामक खतरों के लिए रणनीति और तकनीकी सलाहकार समूह के सदस्य भी हैं।

जोहाना गिसेके और उनके सहयोगी  एंडर्स टेगनेल स्वीडन की संभावित कोरोना-विजय के हीरो के रूप में उभरे हैं। दुनिया भर के मीडिया संस्थानों में पिछले तीन महीने से उनके वक्तव्य अलग-अलग तरह से उद्धृत किए जा रहे हैं। प्राय: सभी बड़े टीवी चैनल उनके इंटरव्यू प्रसारित कर रहे हैं। टीवी चैनलों पर जोहाना गिसेके की स्पष्टवादिता, आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक जीवन-दर्शन देखते बनता है।

लान्सेट में 5 मई, 2020 को ‘ऑनलाइन फर्स्ट’ खंड में प्रकाशित जोहान गिसेके का यह लेख उन तथ्यों, और महामारी के प्रति वैज्ञानिक सोच को सामने लाता है, जिससे हम भारतीयों को अवश्य परिचित होना चाहिए।

अन्य खबरें

Comments