संपादकीय

संपादकीय- राष्ट्र के नाम संदेश में मोदी आखिरी बस पकडऩे से चूके
संपादकीय- राष्ट्र के नाम संदेश में मोदी आखिरी बस पकडऩे से चूके
13-May-2020

राष्ट्र के नाम संदेश में मोदी
आखिरी बस पकडऩे से चूके

बीती रात वही अमूमन 8 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बार फिर देश से मुखातिब हुए। उन्होंने इस देश के सदियों के गौरव को गिनाया, अपने कार्यकाल के कुछ योगदान गिनाए। शुरू के चौदह मिनट लोगों को यह समझ नहीं आया कि वे किस मौके पर क्या बोल रहे हैं, क्या बोलना चाहते हैं, उनके दर्शक-श्रोता कौन हैं, और हिन्दुस्तान की जो जनता इस ऐतिहासिक त्रासदी के मौके पर अपने प्रधानमंत्री को जो सुनना चाहती थी वह कहां है? एक तरफ जीवंत प्रसारण चल रहा था, दूसरी तरफ उसे सुनते हुए लोग ट्विटर पर लगातार लिख भी रहे थे कि प्रधानमंत्री बोलना क्या चाह रहे हैं, वे मुद्दे की बात कब शुरू करेंगे, और अधिक कटुआलोचक या अधिक कट्टर भक्त लोगों की बातों का जिक्र करने का कोई मतलब नहीं है। 

प्रधानमंत्री करीब आधा घंटा बोले होंगे, और इसमें उन्होंने देश का और जनता का विशाल गौरवगान किया, पिछली कई सदियों की गौरवगाथा गिनाई, और अपने कार्यकाल को भी गिनाया, यह अलग बात है कि इसके बीच के आधी सदी से अधिक के कांग्रेस के कार्यकाल का कोई जिक्र उन्होंने नहीं किया, और न ही लोग उनसे उसकी उम्मीद ही कर रहे थे। हमें इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इतना तो सुनने मिला कि 20 लाख करोड़ का एक आर्थिक पैकेज देश को दिया जा रहा है, उसे लेकर भी उन्होंने मुसीबत से उबरने की बातें नहीं कीं, उत्कृष्टता और बेहतरी की बातें अधिक कीं। आधे घंटे सुनने वाले लोग कई मुद्दों पर, कई वजहों से बुरी तरह निराश होकर उठे कि आज जब मजदूरों के छोटे-छोटे बच्चों के पांवों के तलुए सड़क पर जलकर लोहा हुए जा रहे हैं, जब हिन्दुस्तानी गरीब मजदूर मां-बाप और गर्भवती बीबी को उठाकर सैकड़ों किलोमीटर चलने के ओलंपिक से भी बड़े रिकॉर्ड बना रहे हैं क्योंकि वहां तो या तो भार उठाने का रिकॉर्ड रहता है, या लंबी दूरी तय करने का। ये मजदूर तो ये दोनों ही काम कर रहे हैं। दुनिया के इतिहास में, खासकर किसी जिम्मेदार लोकतंत्र के इतिहास में ऐसा बहुत कम होता है कि घर लौटते मजदूर थोक में गाजर-मूली की तरह कतार से कट जाते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के भाषण में इसका कोई जिक्र नहीं था। दरअसल उनके आधे घंटे में एक भी मौत का जिक्र नहीं था, एक भी मानवीय त्रासदी का जिक्र नहीं था, आत्मनिर्भरता का गौरवगान था, और विश्व का मुखिया बनने का एक दावा कहें तो दावा था, भरोसा कहें तो भरोसा था। 

प्रधानमंत्री का भाषण सुनकर हमें थोड़ी सी नहीं, ज्यादा हैरानी हुई है। जब उनके पास सुनने वाले प्रशंसकों और आलोचकों की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी मौजूद है, और हिन्दुस्तान के इतिहास का आजादी के बाद का यह सबसे अधिक त्रासदी भरा हुआ मौका उनको अपना दिल-दिमाग देश के सामने रखने का मौका हासिल था, तब वे यह मौका चूक गए। अभी हम और बातों को गिनाना नहीं चाहते कि वे और क्या-क्या चूके।  लेकिन इतना जरूर गिनाना चाहते हैं कि अपनी ऐतिहासिक चूक को, अपनी ऐतिहासिक गलतियों को कुबूल करके, उनसे आगे बढऩे का जो मौका उनके हाथ था, वह मौका वे चूक गए। जो कि अब भविष्य में कभी वे इस बात पर अपनी गलती, अपनी चूक, अपनी नाकामयाबी कुबूल भी करना चाहेंगे, तो उस रास्ते की आखिरी बस कल रात 8 बजे निकल गई। हर व्यक्ति की जिंदगी में एक ऐसा मौका आता है जब वे अपनी पिछली गलतियों, या गलत कामों के लिए माफी मांगकर अपने रिकॉर्ड को कुछ हद तक दुरूस्त कर सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बीती रात वह मौका बुरी तरह चूक गए। सड़कों और पटरियों पर हो रही दर्जनों मौतों को लेकर भी उनके पास कहने को कुछ नहीं था। उन्होंने आधे घंटे में शायद एक या दो बार मजदूर शब्द का जिक्र किया हो, लेकिन उससे परे उनकी पूरी की पूरी बात प्रसंगहीन, और एक किस्म से बेरहम की। आज जब देश विभाजन के बाद की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी से गुजर रहा है तब हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था को लेकर एक ऐसा भाषण जो कि पूंजीपतियों को संबोधित दिख तो रहा हो, हालांकि शायद ही कोई पूंजीपति उससे प्रभावित हुआ हो। ऐसी शाम जब लोग अपने जख्मों को लिए हजार मील के सफर पर कहीं रूककर टीवी देख रहे होंगे कि उसमें से मरहम आएगा, और उसमें से देश के इतिहास के गौरवगान, और भविष्य को लेकर विश्व का मुखिया बनने की उम्मीदें पता नहीं किसमें भरोसा जगा पाएंगे। जब जिंदगी की हकीकत इस कदर जलती-सुलगती हो कि तलुओं की आग को बुझाना किसी देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, और खासकर प्रधानमंत्री के लिए सबसे बड़ा मुद्दा होना चाहिए, तब उन तलुओं के ऊपर के देह तक की चर्चा न हो, तो क्या राष्ट्र के नाम ऐसे संदेश का न होना बेहतर नहीं होता, दुख और तकलीफ के बीच जो लोग इस नौबत के जिम्मेदार हैं, इसके लिए जवाबदेह जिन्हें रहना चाहिए वे लोग अगर मिलें, आधे घंटे बात करें, और इस दुख-दर्द की चर्चा भी न करें, तो वह लोगों के जख्मों पर बिना नमक के नमक डालने सरीखा हो जाता है। अगर प्रधानमंत्री को बीती रात मुद्दे की इतनी ही बात करनी थी कि 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की जानकारी कल आएगी, तो यह बात तो दर्द के इस मौके को गंवाए बिना कोई सरकारी प्रवक्ता भी कर सकता था, या जैसा कि आजकल अधिक आम हो चला, वित्तमंत्री ऐसा ट्वीट कर सकती थीं, कि कल वे किस वक्त यह घोषणा करेंगी। 

प्रधानमंत्री की आलोचना करना आज यहां मकसद नहीं है, लेकिन हम अपनी तकलीफ, अपनी निराशा, और अपना सदमा अगर नहीं लिखेंगे, तो हम भी इसे जाहिर करने का यह मौका चूक जाएंगे। प्रधानमंत्री की कल की बात कर आज न लिखा जाए, तो बाद में फिर कभी लिखना तो एक जिक्र भर रह जाएगा। लोकतंत्र महज सरकारी फैसलों का नाम नहीं है, लोकतंत्र जनता के बीच भरोसा जगाने का नाम भी है। जो लोग आज मरने की कगार पर हैं, जो लोग अपने बूढ़े मां-बाप को जीते जी मुर्दों की तरह ढोकर चल रहे हैं, इस पल भी किसी सफर में हैं, उनके लिए राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता का मतलब शायद मोदी की कही आत्मनिर्भरता से कुछ अलग है। उनके लिए आत्मनिर्भरता यही है कि सरकारों की मदद के बिना, लोकतंत्र की मदद के बिना, समाज के संपन्न तबके की मदद के बिना, निजी गाडिय़ों के दर्जनों हार्सपॉवर की ताकत के बिना वह अपने मां-बाप के जीते जी उन्हें जिंदा लाश की तरह ढोकर एक अंतहीन सफर पर निकले। इस मौके पर अगर भारतीय लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के पास आधे घंटे के भाषण में उसके लिए महज एक ऐसी संख्या है, जिस 20 लाख करोड़ का वह मतलब भी नहीं समझता, तो हमारे हिसाब से यह भाषण जमीन को छू भी नहीं रहा था। नरेन्द्र मोदी और उनके भाषण लेखक या तो वक्त की नब्ज को टटोल नहीं पा रहे, या फिर नब्ज से आती हुई आवाज पर कुछ कहने का वे साहस नहीं जुटा पाए। 
-सुनील कुमार

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