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मोदी के 20 लाख करोड़ के पैकेज से मर रहे गरीब मजदूरों का कितना भला होगा? : आलोक जोशी
मोदी के 20 लाख करोड़ के पैकेज से मर रहे गरीब मजदूरों का कितना भला होगा? : आलोक जोशी
13-May-2020

आप चाहें तो गिलास को आधा भरा देख सकते हैं और चाहें तो आधा खाली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंगलवार रात का राष्ट्र के नाम संदेश भी ऐसा ही है। आप चाहें तो ये देख सकते हैं कि उन्होंने बीस लाख करोड़ रुपए का पैकेज लाने का एलान कर दिया। हताश, निराश और एक अभूतपूर्व संकट से जूझते देश को एक नया नारा दिया कि इस संकट को कैसे मौक़े में बदला जा सकता है।

कैसे यहाँ से एक आत्मनिर्भर भारत की शुरुआत हो सकती है, जिसकी पहचान भी कुछ और होगी और जो बदली दुनिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

आप दम भर हवा से अपना सीना फुलाते हुए बोल सकते हैं कि भारत के इतिहास का सबसे बड़ा राहत पैकेज लाकर सरकार ने दिखा दिया है कि वो कितना कुछ कर सकती है।

और आप चाहें तो ये भी देख सकते हैं कि अपने पिछले भाषणों की तरह प्रधानमंत्री ने कुछ नए नारे लगाए, कुछ नए शब्द विन्यास दिखाए, अनुप्रास अलंकार का प्रयोग किया और उन्होंने उन सवालों के जवाब दरअसल नहीं दिए जिनके जवाब आप सुनना चाहते थे।

मसलन, घर जाने के लिए जान देने पर उतारू गरीबों और मजदूरों का क्या होगा, लॉकडाउन अब खत्म नहीं हुआ तो कब होगा और कितना लंबा चलता रहेगा। और मोदी जी ने एलान तो कर दिया है लेकिन खर्च के लिए पैसा आएगा कहां से?

यही नहीं आप हिसाब का खाता खोलकर गिना भी सकते हैं कि सरकार पहले ही पौने दो लाख करोड़ रुपए अपने खाते से खर्च का एलान कर चुकी है। और रिजर्व बैंक के ज़रिए भी उसने आठ लाख करोड़ रुपए बाजार में डालने का इंतजाम किया है। दोनों जोड़ लें तो लगभग दस लाख करोड़ रुपए का ऐलान पहले किया जा चुका है और पैकेज का आधा हिस्सा यानी सिर्फ दस लाख करोड़ रुपए और खर्च होना है।

लेकिन बात इतनी मामूली भी नहीं है। दस लाख करोड़ यानी दस ट्रिलियन आसान ज़ुबान में समझें तो दस के आगे बारह शून्य लगा लीजिए। और पहले के दस भी अभी पूरे खर्च तो हुए नहीं हैं। वो भी सिस्टम में आएँगे, बैंकों से निकलेंगे, बिजऩेस में जाएँगे, खर्च होंगे, इस जेब से उस जेब में जाएँगे तभी तो माना जाएगा न कि पैसा काम पर लगा है।

हरेक के हिस्से 15 हज़ार रुपए ?

टोटल रकम जोड़ लें तो बीस लाख करोड़ का मतलब है महीने में बीस लाख कमाने वाले एक करोड़ लोगों की तनख्वाह। दो लाख कमाने वाले दस करोड़ लोगों की तनख्वाह। बीस हज़ार कमाने वाले सौ करोड़ लोगों की तनख्वाह। यानी एक सौ पैंतीस करोड़ के देश में हिस्सा बाँटें तो करीब-करीब पंद्रह हज़ार रुपए हरेक के पल्ले पड़ जाएँगे।

हालाँकि वॉट्सऐप के गणितज्ञ रात नौ बजे ही हिसाब लगाकर बता चुके थे कि मोदी जी ने हरेक को पंद्रह लाख देने का जो वादा किया था वो पूरा हो गया। लेकिन उन्हें भी दोष नहीं दिया जा सकता।

मगर तत्व की बात यह है कि सरकार ने अपनी तरफ से यह संदेश दे दिया है कि कोरोना से मुकाबले के लिए लॉकडाउन करना उसकी मजबूरी थी तो रही होगी। अब उसे दिखाना है कि यह देश एक बड़े संकट में से कैसे अपने लिए तरक्की की नई राह बना सकता है।

इतिहास, अर्थशास्त्र और व्यवहार बुद्धि तीनों गवाह हैं कि बहुत बड़ी मुसीबत अक्सर बहुत बड़े मौके में बदली जा सकती है। मोदी जी ने अपने भाषण में ङ्घ२्य समस्या का उदाहरण भी दिया। 1991 का उदाहरण हमारे सामने है। दोनों ही वक्त ये लगता था कि अब सब कुछ खत्म हो गया। लेकिन दोनों ही बार अंधकार में एक नई राह खुली और लंबे समय तक उसका फायदा मिलता रहा। आईटी की दुनिया में भारत का दबदबा हो या आर्थिक सुधारों के बाद आठ परसेंट सालाना विकास दर तक पहुँचने की कहानी।

टुकड़ों-टुकड़ों में देखें तो अनेक छोटे-छोटे सूत्र बिखरे पड़े हैं। 12 मई के भाषण में ही आत्मनिर्भर भारत के पाँच खंभों (पिलर को हिंदी में यही कहते हैं) का जिक्र हुआ, इकोनॉमी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, सिस्टम, डेमोग्राफी और डिमांड।

आप और हम इन सब पर सवाल पूछ सकते हैं कि क्वांटम जंप, आधुनिक भारत की पहचान, रिफॉम्र्स, और सप्लाई चेन वगैरह का पूरा गणित क्या है। मगर बहुत से लोग हैं जो न सिर्फ सब कुछ समझ गए बल्कि बिल्कुल वैसे समझ गए जैसे परियों की कथा सुनते वकत आप अपने दिमाग में परीलोक की एक तस्वीर बना लेते हैं।

यही वजह है कि भाषण खत्म होते ही तय हो गया कि अगली सुबह शेयर बाजार में एक नया सवेरा आने वाली है। सिंगापुर के बाजार में भारत का जो इंडेक्स खरीदा बेचा जाता है वो करीब साढ़े तीन परसेंट का उछाल दिखा रहा था और इस बात पर कोई विवाद नहीं है कि बुधवार की सुबह भारत के शेयर बाजार धमाकेदार तेजी के साथ खुलेंगे।

शेयर बाजार में दिखेगी तेजी

इसे गैप अप ओपनिंग कहा जाता है। यानी मंगलवार को बाजार जहां बंद हुआ, बुधवार का पहला सौदा ही उससे काफी ऊपर के भाव पर होगा। वजह भी साफ है।  (बाकी पेज 8 पर)

ज़्यादातर जानकारों का कहना है कि बाजार को उम्मीद थी कि सरकार ज्यादा से ज्यादा जीडीपी का पाँच से सात परसेंट ख़र्च करने का एलान करेगी।

जबकि यहाँ आ गया है दस परसेंट का पैकेज। यानी उम्मीद से कहीं ज़्यादा। शेयर बाजार के खिलाड़ी वैसे भी चींटी का पहाड़ बनाने के एक्सपर्ट होते हैं। अमीर को, गरीब को, मिडल क्लास को, उद्योग को, व्यापार को क्या मिलेगा इसका हिसाब लगता रहेगा। किसे कितना मिलेगा इससे किसे क्या फर्क पड़ेगा ये भी बाद में देख लिया जाएगा।

अभी तो सेंटिमेंट सुधर गया है, तो बाजार में पैसा बना लिया जाए। सेंटिमेंट एक ऐसी चीज है जो किसी को दिखती तो कभी नहीं है लेकिन शेयर बाजार को लगातार उठाती गिराती रहती है। सो बुधवार की सुबह सेंटिमेंट अच्छा रहने वाला है इतना साफ है।

लेकिन ये सेंटिमेंट क्या शाम तक ऐसा ही रहेगा? यह भी कोई बता नहीं सकता, फिर लंबे समय के लिए क्या होने वाला है इस सवाल का जवाब तो जाने ही दीजिए।

हाँ, अब भी कुछ विशेषज्ञ हैं जो उत्साह की इस गंगा में डुबकी लगाने से पहले जान लेना चाहते हैं कि पानी कितना गहरा है। वो कह रहे हैं कि अभी यह देखना जरूरी है कि सरकार ने पहले के दस लाख करोड़ के ऊपर जो और दस लाख करोड़ रुपए खर्च करने का एलान किया है वो कहां-कहां खर्च होने जा रहा है। यानी कितनी रकम किसे मिलेगी और वो आएगी कहां से।

सबसे बड़ा सवाल ये है कि सरकार क्या नए रास्ते से पैसा जुटाएगी, नए नोट छापेगी, कर्ज उठाएगी, या फिर वो पहले से तय किसी खर्च को रोककर वो रकम इस पैकेज पर ख़र्च करने जा रही है।

इन सवालों के जवाब यानी पैकेज का पूरा ब्यौरा सामने आने के बाद ही तय हो पाएगा कि देश को, इकोनॉमी को, उद्योग और व्यापार को, गरीबों और किसानों को और नौकरीपेशा या अपने कारोबार में लगे मध्य वर्ग को इतिहास के इस सबसे बड़े पैकेज से क्या मिलने जा रहा है।

वरना कहीं ये ऐसा सम्मान साबित न हो जाए जिसका हल्ला तो बहुत होता है लेकिन जिसमें एक शॉल और एक सर्टिफिकेट के अलावा हाथ कुछ नहीं आता।

(लेखक सीएनबीसी आवाज के पूर्व संपादक हैं और आर्थिक सामाजिक विषयों पर टिप्पणी करते हैं।)

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