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फेसबुक की कहानी ही जुकरबर्ग पर भरोसा न करने के लिए काफी है? : दुष्यंत कुमार
फेसबुक की कहानी ही जुकरबर्ग पर भरोसा न करने के लिए काफी है? : दुष्यंत कुमार
14-May-2020

कई बार एक चूक ही किसी कंपनी की उस प्रतिष्ठा पर भारी पड़ जाती है जो उसने एक लंबे समय में कमाई होती है। कुछ समय पहले कैंब्रिज एनालिटिका मामला फेसबुक के लिए ऐसा ही रहा। इस कंपनी पर आरोप है कि इसने अवैध तरीके से फेसबुक के करोड़ों यूजरों का डेटा हासिल किया और इस जानकारी का इस्तेमाल अलग-अलग देशों के चुनावों को प्रभावित करने में किया। इनमें 2016 में हुआ अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव भी है।

इस मामले ने फेसबुक की विश्वसनीयता को भी काफी नुकसान पहुंचाया। कंपनी के मुखिया मार्क जुकरबर्ग को मिन्नतें करनी पड़ीं। वे माफी मांगते हुए यूजर्स को बार-बार यकीन दिलाते रहे कि इस कंपनी को चलाने में उनसे बेहतर अभी भी कोई नहीं है। मार्क जुकरबर्ग ने माना कि उनकी कंपनी यूजर्स का डेटा किसी तीसरी पार्टी (एप डेवलपर्स) को देती थी। लेकन उनका यह भी कहना था कि यूजर्स उन्हें एक मौका और दें क्योंकि फेसबुक को उनसे बेहतर कोई नहीं चला सकता। पत्रकारों से बातचीत में मार्क जुकरबर्ग ने कहा, ‘यह बहुत बड़ी गलती है। यह मेरी गलती है। मुझे एक मौका और दें। लोग गलती करते हैं और उनसे सीखते हैं।

लगभग दो साल पहले जब यह घटना हुई तो फेसबुक ने जानकारी दी थी कि कैंब्रिज एनालिटिका मामले में जिन लोगों का निजी डेटा इस्तेमाल किया गया उनकी संख्या 8।7 करोड़ तक हो सकती है। कंपनी के मुताबिक ज्यादातर यूजर्स अमेरिकी नागरिक हैं जिनसे जुड़ी जानकारियों को कैंब्रिज एनालिटिका ने इस्तेमाल किया था।

आग बुझाने की कवायद

इससे एक महीने पहले यानी मार्च 2018 में मार्क जुकरबर्ग ने अमेरिका समेत दुनिया के बड़े अखबारों में पूरे पेज का माफीनामा छपवाया था। इस माफीनामे में कहा गया था कि यूजर्स का डेटा लीक होना उनसे विश्वासघात है और वे इसे रोकने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं करने के लिए माफी मांगते हैं। जुकरबर्ग ने लोगों से वादा किया कि आगे से ऐसा नहीं होगा। वहीं, इंटरनेट व सोशल मीडिया विशेषज्ञों का कहना है कि मार्क जुकरबर्ग इसलिए माफी मांग रहे थे क्योंकि कैंब्रिज एनालिटिका का मामला बहुत बड़ा हो गया था और इससे कंपनी को बड़ा नुकसान हो सकता था। उनके मुताबिक चुनाव में फेसबुक यूजर्स की निजी जानकारियों का इस्तेमाल किया जाना नई बात नहीं है। जानकारों के मुताबिक फेसबुक को पहले से पता था कि कैंब्रिज एनालिटिका उसके डेटा का इस्तेमाल कर रही है, लेकिन इतने बड़े पैमाने पर (8.7 करोड़) यूज़र्स की निजी जानकारियों में तांक-झांक हो जाएगी इसका उसे अंदाजा नहीं था।

इंटरनेट के इस्तेमाल को लेकर वकीलों के कई समूह सालों से फेसबुक से कह रहे थे कि वह यूज़र्स के डेटा को बाय डिफ़ॉल्ट गोपनीय रखे, लेकिन फेसबुक इन सब बातों की अनदेखी करती रही। रिपोर्टों के मुताबिक जब विवाद सामने आने के 10 दिन के अंदर कंपनी को 9,000 करोड़ डॉलर (5,82,615 करोड़ रुपये) का नुकसान हो गया, अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन ने जांच बिठा दी और अमेरिकी सीनेट ने डेटा सुरक्षा के मुद्दे पर मार्क जुकरबर्ग को गवाही देने के लिए बुला लिया है तब जाकर उन्हें अपनी ‘लापरवाही’ याद आई।

2015 से थी जानकारी

दिसंबर 2016 में जर्मन पत्रिका ‘दास मैगज़ीन’ में एक रिपोर्ट छपी थी। बाद में इसका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया और डोनाल्ड ट्रंप के औपचारिक रूप से अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के कुछ ही हफ्तों बाद यह रिपोर्ट वायरल हो गई। रिपोर्ट के मुताबिक कैंब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एलेक्जेंडर कोगन ने अपने मोबाइल एप के लिए फेसबुक से उसके यूजर्स का डेटा मांगा था। फेसबुक का कहना है कि कोगन ने शैक्षिक अनुसंधान करने की बात कहकर उससे डेटा लिया था। टाईम्स की रिपोर्ट के मुताबिक फेसबुक ने कोगन की बातों की पुष्टि करना ज़रूरी नहीं समझा और इस बारे में कोई कार्रवाई नहीं की। बाद में पता चला कि कैंब्रिज एनालिटिका ने कोगन से मिले डेटा का इस्तेमाल 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में किया था। इन आरोपों पर कोगन की भी अपनी सफाई थी। उनका कहना था कि फेसबुक और कैंब्रिज एनालिटिका उन्हें बलि का बकरा बना रहे हैं।

रिपोर्टों के मुताबिक साल 2015 में फेसबुक ने कैंब्रिज एनालिटिका को एक पत्र लिख कर तमाम डेटा डिलीट करने को कहा था। सीए के कर्मचारियों ने बताया कि ऐसा कर दिया गया है। बाद में फेसबुक अपने यूज़र्स से माफी मांग रही थी, लेकिन उस समय उसने उन यूजर्स को जानकारी नहीं देने का फैसला किया था जिनका डेटा कैंब्रिज एनालिटिका ने चुराया था। तब न ही कंपनी ने इस बात को सार्वजनिक किया और न ही कैंब्रिज एनालिटिका पर कोई प्रतिबंध लगाया। जब न्यूयॉर्क टाइम्स और द ऑब्जर्वर ऑफ लंदन ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि डेटा डिलीट नहीं किया गया था तब जाकर कंपनी का भेद खुला। वहीं, कैंब्रिज एनालिटिका के पूर्व कर्मचारियों का दावा है कि 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में इसी डेटा ने उसके काम में अहम भूमिका निभाई थी।

फेसबुक यूजर्स की निजता को लेकर बेपरवाह रही है

यूज़र्स के डेटा को लेकर फेसबुक और मार्क जुकरबर्ग कितने भरोसेमंद हैं, इसका अंदाजा लगाने के लिए फेसबुक व्हिसिलब्लोअर सैंडी पैराकिलस के बारे में जानना ज़रूरी है। सैंडी फेसबुक में काम कर चुके हैं। वहां वे डेटा के इस्तेमाल को लेकर डेवलपर्स द्वारा किए गए उल्लंघनों की जांच करते थे। सैंडी ने द गार्डियन अख़बार को बताया कि उन्होंने फेसबुक के वरिष्ठ अधिकारियों को डेटा लीक होने के बारे में चेतावनी दी थी। उन्होंने अधिकारियों से कहा था कि कंपनी का ढीला रवैया डेटा सुरक्षा को लेकर एक बड़ा ख़तरा पैदा कर सकता है।

सैंडी की चिंता यह थी कि जिन एप्लिकेशन डेवलेपर्स से डेटा साझा किया गया है वे उसके साथ क्या कर रहे हैं। उन्होंने अधिकारियों से कहा कि कंपनी उस मैकेनिज़्म का इस्तेमाल कर नहीं रही जिससे डेटा का गलत इस्तेमाल न होना सुनिश्चित हो सके। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 के बीच ग्लोबल साइंस रिसर्च नाम की कंपनी द्वारा लाखों फेसबुक प्रोफाइलों का डेटा चुराया गया था। कंपनी ने यह डेटा कैंब्रिज एनालिटिका को मुहैया कराया था। जब मामला सामने आया तो सैंडी को यह सोचकर ख़ासी निराशा हुई कि उनके वरिष्ठों ने उनकी चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया था। एक साक्षात्कार में उनका कहना था, ‘यह बहुत दुखी करना वाला है। क्योंकि मैं जानता हूं कि वे इसे रोक सकते थे।’

यह पूछे जाने पर कि डेटा को दूसरे डेवलपरों के हवाले किए जाने के बाद फेसबुक का उस पर क्या नियंत्रण रहता था, सैंडी ने कहा, ‘कुछ नहीं। बिलकुल भी नहीं। एक बार डेटा फेसबुक के सर्वरों से निकल जाता तो उस पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता था, और इसकी कोई जानकारी नहीं होती थी कि उसके साथ क्या किया जा रहा है।’ सैंडी के मुताबिक़ सावधानी बरतने पर डेटा के गलत इस्तेमाल को लेकर फेसबुक कानूनन बेहतर स्थिति में होती, लेकिन जानकारी होने के बावजूद ऊपर के लोगों ने इसे अनदेखा किया। सैंडी के शब्दों में ‘यह बहुत ही चौंकाने और डराने वाला था।’

मार्क जुकरबर्ग खुद कितने भरोसेमंद हैं?

डेटा लीक मामले के बाद रॉयटर्स द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिकु दुनिया में केवल 41 प्रतिशत लोग फेसबुक पर भरोसा करते हैं। लोगों में उनकी निजी जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के हाथ में जाने का डर बैठ गया है। नतीजतन, बहुत से लोग अपना फेसबुक अकाउंट डिलीट कर रहे हैं। इस लिहाज से जहां तक भरोसे का सवाल है तो कंपनी और मार्क जुकरबर्ग दोनों को बड़ा नुकसान हुआ है।

वहीं, इस पूरे मामले से अलग मार्क जुकरबर्ग से जुड़ा एक ऐसा तथ्य भी है जिसे जानने के बाद उन पर भरोसा कायम नहीं रह पाता।

 यह बात आज भी कई लोगों को नहीं पता कि जिस फेसबुक के लिए दुनिया मार्क जुकरबर्ग का धन्यवाद करती है, वह मूल रूप से उनका आइडिया नहीं था। यह हकीकत है कि मार्क जुकरबर्ग ने इस वेबसाइट की शुरुआत अनैतिक तरीके से की थी।

दरअसल जिस मूल विचार के साथ फेसबुक की शुरुआत हुई थी वह उनका नहीं बल्कि टायलर विंकल्वॉस, कैमरन विंकल्वॉस (विंकल्वॉस ब्रदर्स) और दिव्य नरेंद्र नाम के तीन लोगों का था। ये सभी हार्वर्ड विश्वविद्यालय में मार्क जुकरबर्ग के सीनियर थे। इन्होंने ‘हार्वर्डकनेक्शन’ नाम की एक वेबसाइट के ज़रिए इंटरनेट पर सोशल नेटवर्किंग करने का विचार खोजा था। यह दिसंबर 2002 की बात है। बाद में वेबसाइट का नाम ‘कनेक्टयू’ हो गया था। इन तीनों ने 21 मई, 2004 को वेबसाइट लॉन्च की थी।

टायलर विंकल्वॉस, दिव्य नरेंद्र और कैमरन विंकल्वॉस

इस तारीख से पहले की कहानी बड़ी दिलचस्प है। वेबसाइट शुरू होने से पहले इस सिलसिले में एक सहायक विक्टर गाओ के कहने पर विंकल्वॉस ब्रदर्स और दिव्य नरेंद्र ने मार्क जुकरबर्ग से संपर्क किया था। बताया जाता है कि तीनों ने जुकरबर्ग को अपने साथ काम करने का प्रस्ताव दिया। जुकरबर्ग एक मौखिक समझौते के तहत हार्वर्डकनेक्शन में इन तीनों के साझेदार बन गए। उन्हें वेबसाइड के लिए कोडिंग से संबंधित काम करना था। विकंल्वॉस ब्रदर्स और दिव्य नरेंद्र ने भरोसा करते हुए जुकरबर्ग को वेबसाइट का प्राइवेट सर्वर लोकेशन और पासवर्ड दे दिए।

जुकरबर्ग पर आरोप है कि इसके बाद वे अलग-अलग कारण देकर कई दिनों तक तीनों साथियों से नहीं मिले। उस दौरान वे उन लोगों से संपर्क में रहे जिनका वेबसाइट से कोई संबंध नहीं था। कई बार मीटिंग टलने के बाद आखिरकार 17 दिसंबर, 2003 को सभी साथी मिले। जुकरबर्ग ने विंकल्वॉस ब्रदर्स और नरेंद्र को बताया कि साइट लगभग पूरी हो चुकी है। इसके बाद आठ जनवरी, 2004 को उन्होंने ईमेल कर तीनों साथियों को बताया कि वे काम में लगे हुए हैं। मेल में जुकरबर्ग ने बताया कि उन्होंने वेबसाइट में कुछ बदलाव किए हैं और वे काफी बेहतर लग रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे 13 जनवरी, 2004 को वेबसाईट को लेकर बातचीत कर सकते हैं।

लेकिन इससे पहले ही 11 जनवरी, 2004 को ज़ुकरबर्ग ने वेबसाइट को ‘दफेसबुकडॉटकॉम’ डोमेन नेम से रजिस्टर करा लिया। 14 जनवरी को वे हार्वर्डकनेक्शन की टीम से मिले। उस समय उन्होंने साइट के रजिस्ट्रेशन को लेकर कोई बात नहीं की। अपने साथियों से जुकरबर्ग ने इतना कहा कि वे इस पर आगे और काम करेंगे और टीम को इस बारे में मेल करेंगे। इसके बाद चार फरवरी, 2004 को जुकरबर्ग ने हार्वर्ड के छात्रों के लिए दफेसबुकडॉटकॉम को लांॅच कर दिया।

उधर, विंकल्वॉस ब्रदर्स और दिव्य नरेंद्र को 6 फरवरी को हार्वर्ड में छात्रों के लिए प्रकाशित होने वाले अख़बार के जरिए पता चला कि मार्क जुकरबर्ग ने अपनी वेबसाइट खोल ली है। यह उनके लिए जबरदस्त झटका था क्योंकि जुकरबर्ग ने उनकी बौद्धिक संपदा का गलत फायदा उठाया था। बाद में जुकरबर्ग के इन सीनियर्स ने उनकी शिकायत विश्वविद्यालय प्रशासन से की। प्रशासन ने उन्हें कोर्ट जाने की सलाह दी जिसके बाद तीनों ने जुकरबर्ग पर मुकदमा किया। साल 2008 में मुक़द्दमे की सुनवाई पूरी हुई और अदालत के फैसले के तहत फेसबुक साढ़े छह करोड़ डॉलर का मुआवजा देने को राज़ी हुई।

उधर, मार्क जुकरबर्ग का रेफ्रेंस देने वाले विक्टर गाओ ने बाद में विंकल्वॉस ब्रदर्स और दिव्य नरेंद्र के लिए उनकी वेबसाइट की कोडिंग का काम पूरा किया। चार दिसंबर, 2004 को हार्वर्डकनेक्शन का नाम बदलकर उसे कनेक्टयू के नाम से लांॅच किया गया। विक्टर गाओ का कहना था कि जुकरबर्ग ने हार्वर्डकनेक्शन की कोडिंग का काम पूरा किया ही नहीं था।

इस मामले में मार्क जुकरबर्ग पर कई तकनीकी गड़बडिय़ां करने के आरोप थे। उनकी इस हरकत से उनके तीनों साथी सकते में थे और दुखी भी। कनेक्टयू के ‘हमारे बारे में जानें’ सेक्शन में उनके हवाले से लिखा गया था, ‘हमने (वेबसाइट के लिए) कई प्रोग्रामरों के साथ काम किया। इनमें वह व्यक्ति (मार्क जुकरबर्ग) भी शामिल था जिसने हमारे समक्ष प्रतिद्वंदी वेबसाइट खड़ी करने के लिए हमारे ही आइडिया चुरा लिए। उसने हमें बिना बताए ऐसा किया। हम उसके इरादों से वाकिफ नहीं थे।’ (सत्याग्रह)

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