विचार / लेख

अश्लीलता की हद तक खुदगर्जों का वक्त : दिनेश श्रीनेत
अश्लीलता की हद तक खुदगर्जों का वक्त : दिनेश श्रीनेत
16-May-2020

अश्लीलता की हद तक खुदगर्जों का वक्त : दिनेश श्रीनेत

मैं आज बहुत दिनों बाद घर से निकला और नेशनल हाइवे-9 पर चिलचिलाती धूप में सिर पर गृहस्थी लादे भटकते पुरुषों, बच्चों और औरतों को देखता रहा। मुझे याद नहीं आया कि मैंने इससे बुरा समय भी कभी देखा था। और जब मैं यह बात कह रहा हूँ तो इसका आशय सिर्फ प्राकृतिक आपदा से नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं का सदियों से मनुष्य सामना करता रहा है। हर देश, हर संस्कृति अपने तरीके से उनसे एकजुट होकर निपटती है।

बहुत गहराई में जाकर देखें हमारा सांस्कृतिक विकास ही इन आसन्न संकटों की वजह से होता है। हमारी आदतें, हमारे खुश रहने के बहाने, हमारे मिल-जुलकर रहने के तरीके, दुख को हल्का करने और मुसीबतों में मुसकुराने के नुस्खे। इन्हीं से हर सभ्यता अपनी संस्कृति का निर्माण करती है।

यह बुरा समय इसलिए है कि इसी संस्कृति का हम विनाश कर रहे हैं। हमने परंपरा के नाम पर अपनी ही सर्वश्रेष्ठ परंपराओं को ध्वस्त कर दिया। हां, यही कहना होगा क्योंकि अब कुछ ऐसा बचा नहीं है जिसे लेकर भविष्य के प्रति आश्वस्त हुआ जाए।

एक ऐसे समाज का निर्माण हो रहा है जहां हर तरफ घृणा की तरंगे हैं। एक ऐसा पढ़ा-लिखा मध्यवर्गीय समाज जो अश्लीलता की हद तक खुदगजऱ् है। इस समाज में औरतों के लिए अपमान की बौछार है। गरीबों के प्रति क्रूर उदासीनता है।

एक ऐसा समाज जहां स्वार्थ को श्रेष्ठ बताया जा रहा है और झूठ को लोग गर्व से माथे पर सजाए घूम रहे हैं। एक ऐसा समाज जो शर्मिंदा नहीं होता है। ऐसे समाज के ऐसे लोग जिनकी रग-रग में हिंसा भर गई है। देवता हिंसक हो उठे हैं। हमारे नारे हिंसक हो गए। हमारे विचारों में हिंसा है। हमारी चुप्पी में हिंसा है। हमारे चुटकुलों में हिंसा है। हमारी हंसी में हिंसा है।

शायद आपको लगे कि यह अतिशयोक्ति है। मगर जब कोई बिना कसूर मर रहा तो उस वक्त चुप्पी क्या हिंसा नहीं है? टीवी चैनल कड़वी हिंसक बहसों का अखाड़ा है। लोग किसी नाटक की तरह निर्लज्जता से उसमें अपना रोल अदा कर रहे हैं। विचारों में हिंसा तभी आती है जब इंसान हर वक्त हर परिस्थिति में खुद को सही ठहराने में जुट जाए।

वो लोग कहां खो गए जो गलतियों पर पछताते थे? उस करुणा का क्या हुआ जो एक मादा क्रौंच पक्षी के विलाप पर वाल्मीकि को द्रवित कर गई थी? बूढ़े, रोगी और मृतक को देखकर सिद्धार्थ के भीतर उठने वाली चिंताएं अब कहां चली गईं? किस संस्कृति का गौरव गान कर रहे हैं हम? क्या हम सिर्फ अपनी लिप्साओं और अहंकार को जायज ठहरा रहे हैं?

आखिर मुश्किल घडिय़ां तो पहले भी आई होंगी। मैं सोचता हूँ कि तब कठिन समय में लोग कैसे जीते थे? इतिहास के पास तो इस सवाल का जवाब होगा? अफसोस, इतिहास के पास कोई तयशुदा जवाब नहीं है। बस इतना समझ में आता है कि समाज में किसी भी जुगत से अपनी कोमलता और सपनों को बचाकर रखा। सबसे सुंदर और मासूम सपनों को सबसे क्रूर समय में सहेजा गया है।

सहेजने वाले बहुत मामूली लोग थे। कोई किशोरी, कोई अकेला वृद्ध इंसान, अपने बच्चों की परवरिश करती कोई स्वप्नदर्शी युवती, कोई अधेड़ पागल, कोई नाकार नौजवान। समाज के सबसे उपेक्षित लोगों ने समाज की सबसे कीमती धरोहर बचाई होगी। सबसे समझदार लोग तो चालाकियों में जुट गए होंगे। सबसे काबिल लोग अपने वक्त के सबसे क्रूर इंसान की हंसी के साथ हंस रहे होंगे। वे शोध कर रहे हों, तमगे जीत रहे होंगे, इमारतें और तोपें बना रहे होंगे। जो खामोश खड़े हैं वे ही मनुष्यता को बचाएंगे। जिसने दरबारों में चल रहे चारणगान के कोरस बीच मन ही मन कोई तितली सी स्वच्छंद कविता रची होगी वो बचाएगा हमारी सभ्यता को नष्ट होने से।

मैंने बहुत बार ऊंची पथरीली दीवारों के बीच छोटी सी हरी-कोमल पत्ती को निकले देखा है। वह अपनी मासूमियत में क्रांति का बिगुल बजा देता है। दीवार में दरार की शुरुआत वहीं से होती है और भग्नावशेष इसकी गवाही देते हैं।

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