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आर्थिक नब्ज जानने वाले को नक्सली कहा जाता है : हृदयेश जोशी
आर्थिक नब्ज जानने वाले को नक्सली कहा जाता है : हृदयेश जोशी
19-May-2020

खुद को बड़े गर्व से सोशली लेफ्ट कहने वाले भी आर्थिक नीतियों की बात हो तो फैशनेबली राइट हो जाते हैं। संसद की रिपोर्टिंग के दिनों में पीआईबी कार्डधारक सारी मुफ्तखोरी-रेल यात्रा में छूट से लेकर सीजीएचएस हेल्थ स्कीम तक  का फायदा उठाने वाले पत्रकारों को भी मैंने फ्री-बीज के खिलाफ जमकर बोलते सुना है। किसी तर्क को सुनने-समझने की कोशिश न करने वाले कई दोस्त इस हद तक जाते कि कहते किसानों को खेती करने की जरूरत ही क्या है!!! उन्हें कारखानों काम करना चाहिए। ये वह दौर था जब वित्तमंत्री पी. चिदम्बरम हुआ करते थे और वह कहते हिन्दुस्तान की अधिक से अधिक आबादी को शहरों में रहना चाहिए। चाहे हमारे शहरों में रहने की सुविधा तो दूर प्रवासी मजदूरों के शौच की व्यवस्था तक नहीं थी।

लेकिन उस दौर में बाज़ार उफान पर था। लोगों ने हफ्तों में करोड़ों बनाए। ऑफिस टाइम में काम छोडक़र भी लोग पूरे देश में प्रॉपर्टी खरीदने-बेचने से लेकर शेयर मार्केट पर नजर रखे थे। वह भारत का स्वर्णिम दौर था लेकिन तभी अमेरिका में सब प्राइम संकट आ गया। लीमन ब्रदर्स समेत बड़े बड़े बैंक डूब गए। पूंजीवाद घुटनों पर आ गया। लेकिन भारत की कहानी पटरी से नहीं उतरी क्योंकि यहां पूंजीवाद पर साम्यवाद की नकेल थी। भारत की अर्थव्यवस्था का एक्सपोजऱ तो था लेकिन सेफगार्ड्स नहीं हटाए गए थे।

उस वक्त जिन दो बड़े आर्थिक सुधारों होने से रोका गया वह था बीमा क्षेत्र में विदेश निवेश और भारत के बैंकों का निजीकरण। वैश्विक मंच पर मची उथल-पुथल के बावजूद उसी बाजारू मध्य वर्ग की पूंजी सुरक्षित रही जो बाजारवाद का घोर समर्थक था। लेकिन बात इससे भी कहीं बड़ी थी। साल 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार बनने के साथ ही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट बना, जिसे नरेगा या मनरेगा के नाम से जाना गया। इसकी बाजारू ताकतों ने खूब आलोचना क्योंकि यह स्कीम गरीब के पास पैसा भेजने की बात करती थी। ऐसा नहीं होता कि हर स्कीम में सब कुछ ठीक-ठाक होता है और सुधार की गुंजाइश नहीं होती लेकिन यह स्कीम बाजारू मध्यवर्ग को शुरू से ही फूटी आंख नहीं सुहाई लेकिन इससे गरीब लोगों तक राहत जरूर पहुंची। 2004 में 140 सीटें जीतने वाली कांग्रेस 2009 के चुनाव में 200 पार पहुंच गई।

इसी दौर में अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ से मैंने झारखंड के गांवों में मुलाकात की जो अब भी खाद्य सुरक्षा, पोषण और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के लिये लड़ रहे हैं। द्रेज़ किसी आलीशान घर में नहीं रहते, किसी चमकदार चेम्बर में नहीं बैठते, हवाई जहाज या एसी ट्रेन से नहीं चलते और कोट-पैंट नहीं पहनते। उनकी जीवनशैली ही उनका अर्थशास्त्र है। वह सरकार की हर जनोन्मुखी योजना को ज़मीन पर लागू कराने के लिये एक चौकीदार की तरह पैदल, साइकिल या मोटरसाइकिल पर गांव-गांव धक्के खाते हैं।

द्रेज ने झारखंड के लातेहार गांव में एक स्कूल में अंडा कार्यक्रम कराया। जब सरकार बच्चों को मध्यान्ह भोजन में अंडा नहीं दे रही थी तो भोजन में अंडा शामिल कराने के गांव वालों ने चंदा किया और बच्चों को दोपहर के भोजन में अंडा दिया। द्रेज ने सरकारी कर्मचारियों से कहा कि जब गांव के गरीब लोग पैसा जमा करके बच्चों को अंडा खिला सकते हैं तो सरकार क्यों नहीं।

यह कागजी इकोनॉमिक्स नहीं थी ज़मीन प्रयास था। इसी तरह गरीब को राशन और मातृत्व वंदना जैसी योजना समेत तमाम योजनाओं के लिए लड़ते मैंने उन्हें देखा। 2018 में एनडीटीवी की नौकरी छोडऩे के पीछे द्रेज जैसे लोग मेरी प्रेरणा रहे हैं। मैं उनके साथ झारखंड के कई गांवों में घूमा हूं।

2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने जिस मनरेगा का मज़ाक उड़ाया उसकी नींव रखने में ज्यां द्रेज और उनके साथियों का बड़ा रोल है। संसद में मनरेगा को नाकामियों के गड्ढे बताने वाले मोदी को आज उसी मनरेगा को मजबूत करना पड़ रहा है। यह पूंजीवाद के खोखलेपन को दर्शाने के साथ जनवादी नीतियों की ताकत को दिखाता है। भारत अमीर देश होने का ढकोसला तो कर सकता है लेकिन सच्चाई यह है कि उसकी असली ताकत गांवों में बसती है। यह बात हमें द्रेज जैसे अर्थशास्त्री ही समझा सकते हैं जो एक कुर्ते और जीन्स में कई दिन गांवों में गरीबों, आदिवासियों के साथ बिताते हैं।

द्रेज की दो बातें और पहली उन्होंने नोटबंदी की नाकामी को सबसे पहले पहचाना और कहा था कि यह भारत जैसे देश में अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार भागती गाड़ी के टायर पर गोली मारने जैसा है। वही हुआ। हम नोटबंदी के झटकों से नहीं उबर पाये।

फिर उन्होंने पूरे देश में लागू लॉकडाउन पर हमें चेताया और कहा था कि यह कितना बड़ा संकट खड़ा करेगा। वही संकट हमारे सामने है। लेकिन गरीब के लिए जीने-मरने और आर्थिक सेहत की नब्ज जानने वाले द्रेज जैसे लोगों को हमारे समाज में झोला वाला और नक्सली कहा जाता है ।

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