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लॉकडाउन और मजदूरों की उपेक्षा : डॉ. गोल्डी एम. जार्ज
लॉकडाउन और मजदूरों की उपेक्षा : डॉ. गोल्डी एम. जार्ज
22-May-2020

लॉकडाउन के दौरान ही उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात की भाजपा सरकारों ने श्रम कानूनों को या तो रद्द कर दिया है अथवा उन्हें शिथिल बना दिया। इस तरह से तमाम श्रम कानून व अधिकारों को निरस्त करना संविधान के खिलाफ है। उत्तरप्रदेश के योगी सरकार ने तीन साल की अवधि के लिए लगभग सभी श्रम कानूनों को स्थगित कर दिया है। उसी तर्ज पर मध्यप्रदेश सरकार ने श्रम कानूनों में भी बदलाव लाए हैं। गुजरात भी इसी राह पर चल रहा है और उसने भी 12 घंटे के कार्य दिवस को मंजूरी दे दी है।

कोविड-19 के तहत हुए लॉकडाउन के अब लगभग दो महीने पूरे हो गए हैं। कोरोना पर निरंतर अपडेट कर रही वेल्डोमीटर के अनुसार भारत अब पूरे दुनिया की अत्यधिक संक्रमित देशों की सूची में 11वें स्थान पर है। वेल्डोमीटर के अनुसार अब तक भारत में 1,12,442 लोग इस रोग से संक्रमित हुए हैं, तथा 3438 लोगों की मृत्यु हो चुकी हैं। एक तरफ यह परिस्थिति काफी गंभीर है, तो दूसरी ओर लॉकडाउन के चलते अन्य कई सारे नए संकट भी सामने आए हैं। इन परिस्थितियों के प्रति केंद्र सरकार का रवैया काफी निराशाजनक है, जबकि राज्य सरकारें भी पीछे न रही।

निर्माण कार्य में देश की रीढ़ की हड्डी माने जाने वाले मजदूर वर्ग को इस दो महीने के दौरान पूर्णता वेंटिलेटर पर डाल दिया गया। प्रवासी मजदूरों के दृश्य काफी दर्दनाक हैं। अपने बूढ़ी माँ को गोद में उठाकर चलने वाला दृश्य अभी भी ताजा है। ट्रेन से रौंदा हुआ शरीर के अंग, बस से कुचले गए लोग, ट्रक दुर्घटना से मारे गए लोग, भूख से मरे लोग, या फिर आत्महत्या से मरे लोगों के खून के रंग अभी धुंधलाये नहीं हैं।

आज भी देश की सडक़ों पर लोग चल रहे हैं। पैदल, ट्रकों में ठुंसकर, ऑटो, साइकिल या अन्य दोपहिया वाहनों पर, बैलगाड़ी में अथवा जुगाड़ वाहनों से वे लंबी दूरियां तय कर रहे हैं। हाल ही के कुछ दिनों में कुछ राज्यों ने बस व ट्रेन से मजदूरों को लाने की व्यवस्था की हैं। इस तरह का चौतरफा पलायन दुनिया के इतिहास में कभी भी कहीं भी नहीं हुआ है, जहां सारे मजदूर पलायन कर रहे हैं और वह भी एक दूसरे के विपरीत दिशा में। निस्संदेह यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे दुर्गम पलायन है। इनके लिए न कोई पैकेज है और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था।

बीते 24 मार्च, 2020 को अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोगों को घर के भीतर रहने की फरमान जारी करते व्यक्त यह उनके सोच में भी न आया कि शहर में जितने लोग घरों में रहते हैं, उतने ही लोग बेघर भी होते हैं। वैसे इन बेघरों की गिनती नागरिकों की श्रेणी में आती भी नहीं है। हालांकि यही लोग शहरों के बस्तियों में रहकर सभी निर्माण कार्य करते हैं, लेकिन शहर के गणमान्य लोगों के लिए ये सब कूड़ेदान ही है। भारत के जनतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन लोगों ने इन शहरों का निर्माण किया है, उन्हीं के खून से देश के सडक़ों को रंगा जा रहा है।

दूसरी ओर केंद्र सरकार द्वारा बिना योजना के अचानक लागू किए गए लॉकडाउन से सबसे अधिक नुकसान करोड़ों की तादाद में आने वाले इन प्रवासी मजदूरों को हुआ। आखिर इतने सारे मजदूर है कौन? यह किसी भी संदेह से परे है कि ये प्रवासी श्रमिक ज्यादातर दलित, आदिवासी और सामाजिक-आर्थिक पिछड़े वर्गों से हैं। एक तरफ लॉकडाउन में सरकार का श्रमिकों के प्रति प्रतिकूल रवैया तो दूसरी ओर मालिकों का मजदूरों के प्रति दुश्मन सा व्यवहार। शैतान और गहरे समुद्र के बीच फंसे मजदूर वर्ग, बिना भोजन, पानी, पैसा और आशियाना के छोड़ दिया गया। देश के विभिन्न महानगर, शहर, कस्बे, नगर, आदि स्थानों पर फंसे गए।

केंद्र की मोदी सरकार ने इन्हीं मजदूर वर्ग के खिलाफ लगभग एक अघोषित युद्ध छेड़ रखा है। पहले तो स्वयं ही केंद्रीय स्तर पर श्रम कानूनों में संशोधन की बातें चलीं। बाद में केंद्र सरकार ने शांत रहकर कई राज्यों में राज्य सरकारों को या तो श्रम कानूनों में संशोधन या नए कानून बनाने या मौजूदा कानून को निरस्त करने की अनुमति दे दी। यह सब केवल श्रमिक वर्ग की मौजूदा सामाजिक-आर्थिक स्थिति को और अधिक बदतर करेगा।

लॉकडाउन के दौरान ही उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और गुजरात की भाजपा सरकारों ने श्रम कानूनों को या तो रद्द कर दिया है अथवा उन्हें शिथिल बना दिया। इस तरह से तमाम श्रम कानून व अधिकारों को निरस्त करना संविधान के खिलाफ है। उत्तरप्रदेश के योगी सरकार ने तीन साल की अवधि के लिए लगभग सभी श्रम कानूनों को स्थगित कर दिया है। उसी तर्ज पर मध्यप्रदेश सरकार ने श्रम कानूनों में भी बदलाव लाए हैं। गुजरात भी इसी राह पर चल रहा है और उसने भी 12 घंटे के कार्य दिवस को मंजूरी दे दी है।

भाजपा शासित एक अन्य प्रदेश कर्नाटक में भी इसी तजऱ् पर श्रम कानून को बदलने की बात जारी है। यहां तो और एक किस्सा हुआ। श्रमिकों के पक्षधर होने की वजह से श्रम विभाग के सचिव कैप्टन पी. मनिवंन्नन को उद्योगपतियों के दबाव में विभाग से ही हटा दिया गया। मणिवंन्नन ने उन मालिकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की, जिन्होंने श्रमिकों को वेतन नहीं दिया या देने में विलंब कर रहे थे। उन्होंने श्रमिकों को सोशल मीडिया के माध्यम से वेतन कटौती या भुगतान में देरी की त्वरित सूचना देने की अपील की था। बहरहाल उन्हें दूसरे विभाग सौंपा गया है। यह तो बात थी भाजपा शासित प्रदेशों की।

अब अन्य कुछ राज्यों को भी देखें। कांग्रेस के नेतृत्व वाले राजस्थान और पंजाब में श्रम कानून में कई तब्दीलियां ला चुके हैं, जबकि बीजू जनता दल की ओडिशा ने कई परिवर्तन कर दिए हैं। इसी तर्ज में सरकारें उद्योगपतियों की बात ज्यादा सुनने लगीं हैं और मजदूरों के हितों की उनकी दृष्टि में कोई कीमत नहीं रह गई है। यह तो कुछ उदहारण मात्र है। वास्तविकता तो और भी भयानक है। राज्यों के द्वारा इस तरह से कानून में फेरबदल और प्रवासी श्रमिकों की उपेक्षा कई सवालों को खड़ा करती हैं।

यह स्वयंसिद्ध संवैधानिक सिद्धांत है कि कोई भी संशोधन श्रमिकों के लिए स्थापित मौलिक अधिकारों के अनुरूप होने चाहिए, साथ ही राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत जो राज्य को अपनी नीतियों में श्रमिकों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए बाध्य करती हैं।

भाजपा सरकार बड़ी चतुराई से कोविड-19 लॉकडाउन का इस्तेमाल अपनी जन-विरोधी नीतियां लागू करने के लिए कर रही है। श्रमिक-विरोधी कदमों इसका जीता जागता उदाहरण हैं। पीयूडीआर बनाम भारत संघ (1982) में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अनुबंध श्रमिक और अंतर-राज्य प्रवासी मजदूर की रक्षा करने वाले कानूनों का उद्देश्य बुनियादी मानव गरिमा सुनिश्चित करना हैं। इन कानूनों में बदलाव संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन होगा।

लेखक एक सामाजिक कार्यकर्ता है, तथा वर्तमान में फॉरवर्ड प्रेस नई दिल्ली में सलाहकार संपादक है।

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