संपादकीय

'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : और अब कोरोना लाने की तोहमत भी मजदूरों पर !
'छत्तीसगढ़' का संपादकीय : और अब कोरोना लाने की तोहमत भी मजदूरों पर !
23-May-2020

और अब कोरोना लाने की
तोहमत भी मजदूरों पर ! 

अब एक-एक कर हर प्रदेश में यह माहौल बन रहा है कि लौट रहे प्रवासी मजदूरों की वजह से कोरोना फैल रहा है। जो आंकड़े आ रहे हैं ये तो यही बता रहे हैं, और पहली नजर में यह तोहमत एकदम खरी लगती है। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि लोग मुसीबत के हर मौके पर एक पसंदीदा निशाना तलाश लेते हैं। जब कोरोना दिल्ली से आगे बढऩा शुरू हुआ तो उस वक्त मानो तश्तरी पर पेश किया हुआ एकदम तर्क मिला कि दिल्ली में तब्लीगी जमात में गए हुए लोगों की वापिसी से कोरोना फैल रहा है, और वे सबके पसंदीदा निशाना बन गए। बात सही थी कि, धर्म के नाम पर ऐसी बेवकूफी करने वाले, विज्ञान को हिकारत से देखकर ऐसी भीड़ लगाने वाले लोगों को तोहमत तो मिलनी ही चाहिए। इसके पहले विदेश से लौटे हुए लोगों की बारी भी आई कि कोरोना तो इम्पोर्टेड बीमारी है, भारत में तो वह पहले थी नहीं, और पासपोर्ट वाले इसे बाहर से लेकर आए, और लाकर राशन कार्ड वालों को तोहफा दे दिया जिसे गरीब बीमारी और बेकारी, दोनों ही शक्लों में भुगत रहे हैं। 

अब मजदूर हैं निशाने पर कि मजदूरों के आने से कोरोना लौट रहा है, कोरोना आ रहा है, कोरोना छा रहा है। यह बात भी सच तो है ही क्योंकि अभी जो कोरोना पॉजीटिव मिल रहे हैं वे तकरीबन सारे के सारे लौटे हुए प्रवासी मजदूर ही हैं, इसलिए तोहमत तो उन्हीं पर आएगी। यहीं पर यह समझने की जरूरत है कि क्या मजदूर तब्लीगी जमात के लोगों सरीखे हैं? या क्या वे अपनी पसंद और मर्जी से विदेश जाने वाले लोगों सरीखे हैं? या उनका मामला कुछ अलग है? हिन्दुस्तानी मजदूर काम-धंधे से लगे हुए थे, और देश के हर विकसित, संपन्न, औद्योगिक, और कारोबारी प्रदेश में गरीब प्रदेशों से गए हुए करोड़ों मजदूर बदहाली में जीते हुए भी परिवार सहित पड़े हुए थे, कहीं गंदी बस्तियों में, तो कहीं कारखानों की कच्ची खोलियों में पड़े रहते थे। मजदूरी के अलावा जिंदगी में कुछ नहीं था लेकिन बहुतों के साथ बीबी-बच्चे रह पाते थे, जो साथ रख नहीं पाते थे वे भी साल में एक बार घर लौटकर आते थे, बचत छोड़ जाते थे, और फिर से शहर लौटकर काम पर लग जाते थे। 

ऐसे मजदूरों के सिर पर ठीक आज ही के दिन दो महीने पहले बिजली गिरी, जब एक दिन का जनता कफ्र्यू लगा, और इसके तुरंत बाद लॉकडाऊन कर दिया गया। कारखाने बंद, धंधा बंद, किसी भी तरह का कारोबार बंद, इमारतों और घरों में कामवालों का जाना बंद, जाहिर है कि तनख्वाह या मजदूरी, या ठेके का हिसाब, ये सब भी साथ-साथ बंद हो गए, बकाया मिलना थम गया, महज भूख जारी रही, और दहशत बढ़ती चली गई, एक अनसुनी बीमारी की भी, और बेकारी की भी। इस देश में यह सवाल पूछना देश के साथ गद्दारी हो गया, आज भी है, कि आज करोड़ों मजदूरों के सैकड़ों मील के पैदल सफर से गांव पहुंच जाने के बाद भी करोड़ों मजदूर अभी गांव लौटने की कतार में क्यों लगे हैं? जो रेलगाडिय़ां डेढ़ महीना निकल जाने के बाद भी शुरू की गईं, वे रेलगाडिय़ां लॉकडाऊन के शुरूआत में ही क्यों शुरू नहीं की गईं, और क्यों मजदूरों को इस बदहाली से गुजरते हुए कोरोना का शिकार होने दिया गया? भूखों मरने दिया गया, लोकतंत्र पर से उनका विश्वास खत्म किया गया? इसके पीछे क्या वजह थी, इसका क्या फायदा था? सिवाय उन कारखानेदारों और कारोबारियों के, जिन्हें पहले दो हफ्ते का लॉकडाऊन खुलने के तुरंत बाद मजदूरों की जरूरत पडऩी थी, और मजदूरों के बिना जिनका धंधा चल नहीं  सकता था। ऐसे कारखानेदारों और कारोबारियों के अलावा मजदूरों को शहरों में बेबस बंदी बनाकर रख लेने में और किसका फायदा था? लेकिन यह सवाल भी पूछना आज देश के साथ गद्दारी करार दी जाएगी क्योंकि लोगों के पास अटकलों के ऐसे आंकड़े हैं कि अगर लॉकडाऊन उस वक्त नहीं किया जाता, तो देश कोरोना में डूब गया रहता। इन आंकड़ों पर कोई बात भी नहीं कर रहे हैं कि देश में कितने मजदूरों को कितने महीनों का काम खोकर, कितने महीनों की मजदूरी छोड़कर, कितने हफ्तों का पैदल सफर करके घर लौटना पड़ा, और उनके लिए अब वर्तमान क्या है, और भविष्य क्या है? देश के एक प्रमुख पत्रकार शेखर गुप्ता ने कुछ दिन पहले ट्वीट किया कि मजदूरों की तबाही और त्रासदी के इस दौर में क्या किसी को याद है कि इस देश का श्रम मंत्री कौन हैं? क्या श्रम मंत्री का कोई बयान आया? किसी फैसले में श्रम मंत्री का नाम भी आया? यह जिज्ञासा सही है क्योंकि आज यह लिखते हुए भी हमें खुद होकर यह याद नहीं पड़ रहा है कि देश का श्रम मंत्री कौन हैं? गूगल पर पल भर में पता चल जाएगा, लेकिन दो महीनों में मजदूरों पर दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदी गुजर रही है, और देश का श्रम मंत्री नजरों से ओझल है, खबरों से ओझल है, अस्तित्वहीन है। 

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या रोज कमाने-खाने वाले, हर हफ्ते चुकारा पाने वाले मजदूरों को कोरोना पसंद था? आज अगर जो लौटकर गांव आ रहे हैं, और उनमें से कुछ कोरोना पॉजीटिव निकल रहे हैं, तो क्या इसके लिए वे जिम्मेदार हैं? या देश-प्रदेश की वे सरकारें जिम्मेदार हैं जो कि स्टेशनों और बस अड्डों पर, प्रदेश की सरहदों पर लाखों मजदूरों की भीड़ लगने दे रही हैं, क्योंकि उनके पास मजदूरों की घरवापिसी का कोई रास्ता नहीं है, और उनके रोजगार के शहरों में उनके जिंदा रहने का कोई इंतजाम भी न सरकारों के पास है, न शहरों के पास है। जिस केन्द्र सरकार ने अचानक यह लॉकडाऊन किया था, उसे मानो दस करोड़ से अधिक ऐसे मजदूरों के अस्तित्व का ही एहसास नहीं था। जैसे-जैसे लॉकडाऊन आगे बढ़ा, वैसे-वैसे सरकारों को दिखा कि अरे इस देश में मजदूर ही हैं। और फिर ऐसे मजदूरों को एक-एक कोठरी में पच्चीस-पचास लोगों के सोने पर मजबूर होना पड़ रहा था, कहीं दूध के टैंकर में एक पर एक लदकर, तो कहीं सीमेंट कांक्रीट मिक्सर में सीमेंट के घोल की तरह भरकर सफर करना पड़ा। एक-एक ट्रक पर सौ-सौ लोगों को एक-दूसरे पर चढ़े हुए सफर करना पड़ा, रास्ते में एक-एक सरहद की चेकपोस्ट पर हजारों को भीड़ की शक्ल में कतार में लगना पड़ा, राशन के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी, पानी के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी, वापिसी की ट्रेन के रजिस्ट्रेशन के लिए धक्का-मुक्की करनी पड़ी। क्या यह सब कुछ मजदूरों की पसंद का था? जिन मालिकों ने इन मजदूरों को रखा था, वे चाहे कारोबारी हों, चाहे घरेलू हों, अगर वे इनको गुजारे के लायक मदद करते तो क्या ये मजदूर पूरे के पूरे ऐसी दहशत में गांव लौटते? जाहिर तौर पर सरकार, कारोबार, और परिवार, किसी ने भी अपने मजदूरों, कामगारों, और नौकरों का साथ नहीं दिया। उन्हें लौटने से रोकने के लिए मारा, सड़कों पर नाकाबंदी की ताकि उन्हें उनके ही प्रदेश में घुसने न मिले, नतीजा यह हुआ कि पटरियों पर कटते हुए भी ये मजदूर पटरी-पटरी गांव लौटे। क्या इसके लिए भी वे खुद जिम्मेदार थे? जो रेलागाडिय़ों आज दो महीने बाद चलाई जा रही हैं, क्या वे लॉकडाऊन के पहले के जनता कर्फ्यू के और पहले से नहीं चलाई जा सकती थीं? उस वक्त तो मजदूर बिना कोरोना लिए हुए भी लौट सकते थे क्योंकि कोरोना मोटेतौर पर विदेशों से लौटने वाले लोगों, उनके शहरों, और उनके प्रदेशों तक सीमित था। लेकिन लॉकडाऊन को दुनिया के इतिहास की सबसे कड़ी नागरिक-कार्रवाई साबित करने के लिए, ऐसा एक रिकॉर्ड बनाने के लिए उसे इस तरह थोपा गया कि छत वालों की तो छतों ने बोझ ले लिया, लेकिन बिना छत वाले या कच्ची छत वाले मजदूरों के कंधों और कमर को इस बोझ ने तोड़ दिया। ऐसे में जानवरों से बदतर हालत में ये इंसान जब घर लौट रहे हैं, तो शहरी-संपन्न मीडिया को वे कोरोना लेकर आते हुए दिख रहे हैं। कल तक जो मजदूर थे, मेहनतकश थे, वे आज मुजरिम भी ठहराए जा रहे हैं कि मानो वे अपनी पीठ पर अपने मां-बाप, विकलांग बच्चों, या गर्भवती पत्नी को ढोकर नहीं लाए, कोरोना ढोकर लाए हैं। 

ऑस्ट्रेलिया में अभी कुछ बरस पहले जब सरकार ने आदिवासियों के खिलाफ कई दशक पहले तो अपने एक ऐतिहासिक जुर्म को कुबूल किया, तो वहां की संसद में आदिवासियों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित करके पूरी संसद ने खड़े होकर आदिवासियों से माफी मांगी थी। कायदे की बात तो यह है कि हिन्दुस्तान की संसद में अगर धेले भर की भी शर्म हो, तो मजदूरों को संसद में आमंत्रित करके पूरी संसद को पूरे गैरमजदूर देश की तरफ से, खासकर देश-प्रदेश की सरकारों की तरफ से माफी मांगनी चाहिए कि इस आजाद हिन्दुस्तान में इन मजदूरों को नागरिक तो छोड़ इंसान भी नहीं माना गया था, और इसलिए यह लोकतंत्र चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहता है, और इसलिए देश के प्रतिनिधि के रूप में यह संसद सिर झुकाकर हाथ जोड़कर माफी मांगती है। 

जितने जानवरों का एक गाड़ी में लादकर ले जाना पशु प्रताडऩा कानून के तहत कैद का हकदार बनाता है, उससे कई गुना ज्यादा इंसानों को अपने सामान बेचकर भी ट्रकों में इस तरह लदकर जाना पड़ा, कि मानो वे हिन्दुस्तानी नागरिक न हों, किसी और देश से तस्करी से लाया गया नशा हों। धिक्कार के हकदार ऐसे लोकतंत्र में आज लौटे हुए मजदूरों को कोरोना लाने का जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, ऐसा बेईमान, और ऐसा बेशर्म देश, खासकर इसका गैरमजदूर-तबका किसी अधिकार का हकदार नहीं है, धिक्कार का हकदार है। 

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