सामान्य ज्ञान

गुले बनफ्शा
गुले बनफ्शा
31-May-2020 12:06 PM

गुले बनफ्शा फूल की कई जातियां होती हैं और जर्मनी में इसे सौतेली मां कहा जाता है। सलाद और सूप में लजीज जायके के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा कई बीमारियों के उपचार में भी इसका उपयोग किया जाता है। 
बनफ्शा सर्दी-खांसी और कफ प्रकोप को दूर करने वाली जड़ी-बूटी है, जो आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा पद्धति में एक समान रूप से उपयोग में ली जाती है। बनफ्शा की पैदावार कश्मीर और हिमालय की घाटियों में पांच से छह हजार फीट की ऊंचाई पर होती है। इसका आयात ईरान से भी किया जाता है और ईरान की बनफ्शा बहुत उत्तम जाति की होती है।
विभिन्न भाषाओं में नाम-संस्कृत- नीलपुष्प, हिन्दी- बनफ्शा, मराठी- बनफ्शाहा, गुजराती- वनपशा, बंगला- बनोशा, तमिल- बयिलेट्टु, फारसी- बनफ्शा, इंग्लिश - वाइल्ड वायलेट, लैटिन - वायोला ओडोरेटा।
बनफ्शा का पंचांग (पांचों अंग) लघु, स्निग्ध, कटु, तिक्त, उष्ण और विपाक में कटु है। स्निग्ध, मधुर और शीतल होने से यह वातपित्त शामक और शोथहर है। यह जन्तुनाशक, पीड़ा शामक और शोथ दूर करने वाला है। यह द्रव्य ईरान से आता है और भारत में कश्मीर और पश्चिमी हिमालय के समशीतोष्ण प्रदेश में पांच-छह हजार फीट की ऊंचाई पर पैदा होता है। उत्तरी भारत में बनफ्शा की जगह इसकी अन्य प्रजातियों का प्रयोग होता है, जिनके नाम हैं वायोला साइनेरिया और वायोला सर्पेन्स। इसके पत्ते अण्डाकार, हृदयाकार, नुकीले, कंगूरेदार, फूल बैंगनी रंग के और क्वचित सफेद होते हैं। इसमें छोटी-छोटी डोड़ी भी लगती है। इसके पंचांग और फूल, दोनों औषधियों के रूप में काम में आते हैं।
दोनों प्रजातियों के गुण-लाभ समान हैं और इनमें बनफ्शा से अधिक सुगन्ध होती है। इसकी जड़ विरेचन गुण वाली, ज्वर शामक, कफ निकालने वाली, पौष्टिक, पसीना लाने वाली, प्यास और जलन को शांत करने वाली होती है।
उत्तरी भारत में बनफ्शा की जगह इसकी अन्य प्रजातियों का प्रयोग होता है, जिनके नाम हैं वायोला साइनेरिया और वायोला सर्पेन्स। इसके पत्ते अण्डाकार, हृदयाकार, नुकीले, कंगूरेदार, फूल बैंगनी रंग के और क्वचित सफेद होते हैं। इसमें छोटी-छोटी डोड़ी भी लगती है। इसके पंचांग और फूल, दोनों औषधियों के रूप में काम में आते हैं।  दोनों प्रजातियों के गुण-लाभ समान हैं और इनमें बनफ्शा से अधिक सुगन्ध होती है। इसकी जड़ विरेचन गुण वाली, ज्वर शामक, कफ निकालने वाली, पौष्टिक, पसीना लाने वाली, प्यास और जलन को शांत करने वाली होती है।
इसके पुष्प में  वायोलिन  नामक एक कटु तिक्त वामक द्रव्य पाया जाता है। प्रोटीन 2 प्रतिशत, सायनिन 5-3 प्रतिशत, रंगजनक पदार्थ, एक ग्लाइकोसाइड और शर्करा होती है। पत्तों में एक सुगन्धित तेल, एक क्षाराभ, रंजक द्रव्य, फायडेलिन, बी-सिस्टोस्टेरॉल और अलकोहल होता है। पत्तों में फूलों से अलग एक सुगन्ध होती है। मूल में एक सैपोनिन 0.1-2.5 प्रतिशत, एक ग्लाइकोसाइड, एक सुगन्धित तेल और ओडोरेटिन नामक एक क्षाराभ (1.41 प्रतिशत) होता है। इसके अतिरिक्त पुष्पों में एक उडऩशील तेल होता है।
 

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