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ये मिस मैनेजमेंट लंबे समय याद रखा जाएगा : पुष्य मित्र
ये मिस मैनेजमेंट लंबे समय याद रखा जाएगा : पुष्य मित्र
02-Jun-2020 7:06 PM

गृह मंत्रालय के आदेश की प्रति पढक़र यही समझ आ रहा है कि सरकार खुद लॉक डाउन में फंस गई है और अब इससे बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रही है। 68 दिन का लॉक डाउन लगाकर सरकार को समझ आ गया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ा, सिवाय किस्म किस्म के उलझनों के। दुनिया का सबसे बड़ा लॉक डाउन भी भारत में कोरोना पर काबू करने और संक्रमित मरीजों की संख्या को कम करने में कामयाब नहीं हो सका। कर्व अभी तक ऊपर ही जा रहा है।

सरकार के प्रवक्ता और उनके समर्थक जरूर दावे कर रहे हैं कि अगर लॉक डाउन नहीं होता तो मरीजों की संख्या दस गुनी या बीस गुनी होती। मगर यह सब खाम ख्याली है। यह तो वे कह नहीं सकते कि लॉक डाउन नाकाम रहा, वास्तविक नतीजे कुछ हैं नहीं। तो कुछ काल्पनिक नतीजे पेश किए जा रहे हैं। मगर यह सब वैसा ही है, जैसे नोटबन्दी के वक़्त भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खत्म हो जाने के वादे किए गए थे।

गंभीरता से कहूं तो भारत जैसे देश के लिये इतना लंबा लॉक डाउन कोई सही कदम नहीं था। सम्भवत: सरकार को देश की स्थिति, यहां की गरीब आबादी के हालात का भान नहीं था। इस लॉक डाउन को सबसे अधिक गरीबों ने भुगता है। इस बात को इसी तरह समझा जा सकता है कि सिर्फ श्रमिक ट्रेन में 80 मजदूर मर गए। रोड पर मरने वालों के आंकड़े अलग हैं। और बेरोजगार, हैंड टू माउथ हुए लोगों की तो कोई गिनती ही नहीं है।

गरीबों के बाद अब मिडिल क्लास का नम्बर आया है। वे छटनी, सैलरी कट और दूसरी मुसीबतों का शिकार हुए हैं। छोटे-मोटे व्यवसाय करने वालों की स्थिति का तो अंदाजा लगाना मुश्किल है। जिस किसी से बात करता हूँ, वह या तो खतरे की जद में आ गया है या आने की आशंका में है। किसानों का हाल यह है कि आधे पौने कीमत में फसल को बेचना लाचारी बन गयी है। सब्जियां कौडिय़ों के भाव बिक रही है, कोसी का मक्का, भूसे की दर से बेचा जा रहा है।

देश के पौने दो लाख लोग कोरोना संक्रमण की चपेट में हैं, जबकि कम से कम एक अरब लोग लॉक डाउन की दुर्घटना के शिकार हैं। कोरोना मरीजों में 80 परसेंट बिना लक्षण वाले हैं। लॉक डाउन के शिकार 80 परसेंट लोगों में लक्षण नजर आने लगे हैं। कोरोना संक्रमित 96 फीसदी लोग 15 दिन में रिकवर हो जा रहे हैं। लॉक डाउन पीडि़त लोग कितने सालों में रिकवर होंगे उसका कोई ठिकाना नहीं है।

तो सरकार क्या करती? यह बड़ा जेनुइन सा सवाल बार बार पूछा जाता है। इसका जवाब भी उतना ही सरल है, जो साउथ कोरिया ने किया, केरल ने किया। हमारे पास तो सारे उदाहरण सामने हैं। दिक्कत यह हुई कि सरकार ने कोरोना से लडऩे के लिये सफल उदाहरणों को फॉलो नहीं किया, केरल और कोरिया से नहीं सीखा। इटली और अमेरिका जैसे असफल उदाहरणों को फॉलो किया।

पहले सक्रिय होने में देर की। फिर टेस्टिंग में ढिलाई बरती। सारी उम्मीदें लॉक डाउन से पाल लीं। लॉक डाउन को खींच कर 68 दिन तक ले गए और देश की अर्थव्यवस्था को खुद तहस नहस कर लिया। अगर पहला लॉक डाउन 24 मार्च के बदले, 10 मार्च को लगाया होता। अगर 21 दिनों के पहले लॉक डाउन में टेस्टिंग पर पूरा फोकस किया होता। तो आज देश कोरोना मुक्त होता।

मगर अब लगभग हर जगह कोरोना थर्ड स्टेज में है। कम्युनिटी स्प्रेड हो रहा है, भले सरकार छुपाती रहे। देश की हालत ऐसी है कि लॉक डाउन खोलना भी पड़ रहा है। अब आगे अंधी दुनिया है। धीरे धीरे सरकार टेस्टिंग की जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ती नजर आ रही है। फिर घर में रहकर या खुद इलाज करने के लिये कहेगी। कुल मिलाकर कोरोना अब हमलोगों की अपनी अपनी समस्या हो गई। हमें आत्मनिर्भर होने कह दिया है।

ये मिस मैनेजमेंट के ऐसे उदाहरण हैं, जिन्हें इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

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