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कोरोना संकट के बीच पत्रकारों पर मीडिया हाउस गिरा रहे हैं गाज : कमलेश
कोरोना संकट के बीच पत्रकारों पर मीडिया हाउस गिरा रहे हैं गाज : कमलेश
06-Jun-2020 7:25 PM

मैंने 10 साल उस संस्थान में काम किया है। पन्ने पर बदलाव करने के लिए कई बार घर से देर रात वापस ऑफि़स भी गई ताकि एडिशन ठीक से निकले। लेकिन मेरी 10 साल की सर्विस को ख़त्म करने में उन्हें कुछ ही मिनट लगे।

काजल हिंदी अख़बार नवभारत टाइम्स में काम करती थीं और कुछ दिनों पहले अचानक उनसे इस्तीफ़ा माँग लिया गया है।

नवभारत टाइम्स में वह अकेली नहीं हैं बल्कि सीनियर कॉपी एडिटर से लेकर एसोसिएट एडिटर स्तर तक के कई पत्रकारों से इस्तीफ़ा देने को कहा गया है।

संस्थान में दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ और अन्य ब्यूरो से लोग निकाले गए हैं। सांध्य टाइम्स और ईटी हिंदी बंद हो गए हैं। इसके अलावा फ़ीचर पेज की टीम को भी मिला दिया गया है।

इसी संस्थान के एक और पत्रकार ने बताया कि एक दिन संपादक और एचआर ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके कहा लॉकडाउन के कारण कंपनी नुक़सान में है और इसलिए आपकी सेवाएं ख़त्म की जा रही हैं। आप दो महीने का वेतन लीजिए और इस्तीफ़ा दे दीजिए।

मीडिया में नौकरी जाने की शुरुआत मार्च में लॉकडाउन के कुछ समय बाद ही हो गई थी। अलग-अलग संस्थानों से बड़ी संख्या में पत्रकारों को नौकरी से निकाला जाने लगा। ये सिलसिला अब तक जारी है। मीडिया संस्थानों का कहना है कि लॉकडाउन के कारण उनके अख़बारों का सर्कुलेशन कम हुआ है, सप्लीमेंट बंद हो रहे हैं और विज्ञापन का पैसा भी कम हुआ है। किसी संस्थान ने कर्मचारियों को बिना वेतन की छुट्टियों पर भेज दिया है, किसी ने दो महीने का वेतन देकर इस्तीफ़ा माँगा है तो किसी ने तुरंत प्रभाव से निकाल दिया है।

कहाँ-कहाँ हुई छँटनी

हाल ही में दैनिक हिंदी अख़बार ‘हिंदुस्तान’ का एक सप्लीमेंट ‘स्मार्ट’ बंद हुआ है। इस सप्लीमेंट में करीब 13 लोगों की टीम काम करती थी जिनमें से आठ लोगों को कुछ दिनों पहले इस्तीफा देने के लिए बोल दिया गया।

हिंदी न्यूज वेबसाइट राजस्थान पत्रिका के नोएडा दफ्तर सहित कुछ और ब्यूरो से भी लोगों को टर्मिनेशन लेटर दे दिया गया है। उन्हें जो पत्र मिला है उसमें दो या एक महीने का वेतन देने का भी जि़क्र नहीं है। सिर्फ बकाया लेने के लिए कहा गया है।

इसी तरह हिंदुस्तान टाईम्स ग्रुप में भी पत्रकार से लेकर फोटोग्राफर तक की नौकरियों पर संकट आ गया है। एचटी ग्रुप के ही सप्लीमेंट ‘मिंट’ और ‘ब्रंच’ से भी लोगों को इस्तीफा देने के लिए कहा है।

द क्विंट नाम की न्यूज वेबसाइट ने अपने 200 लोगों की टीम में से करीब 45 को फर्लो यानी बिना वेतन की छुट्टियों पर जाने को कह दिया है।

दिल्ली-एनसीआर से चलने वाले न्यूज चैनल न्यूज़ नेशन ने 16 लोगों की अंग्रेजी डिजिटल की पूरी टीम को नौकरी से निकाल दिया था।

टाईम्स ग्रुप में ना सिर्फ लोग निकाले गए हैं बल्कि कई विभागों में छह महीनों के लिए वेतन में 10 से 30 प्रतिशत की कटौती भी गई है। इसी तरह नेटवर्क 18 में भी जिन लोगों का वेतन 7.5 लाख रुपये से अधिक है उनके वेतन में 10 प्रतिशत की कटौती हुई है।

प्रधानमंत्री ने की थी अपील

दूसरों की नौकरी और रोज़ी-रोटी पर मँडरा रहे संकट पर बात करने वाले पत्रकारों का भविष्य अब खुद खतरे में है। जबकि 22 मार्च के अपने संबोधन में पीएम नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि पुलिस और स्वास्थ्यकर्मियों की तरह मीडिया की भी इस महामारी से लडऩे में अहम भूमिका होगी।

प्रधानमंत्री ने आग्रह भी किया था कि 'आप अपने व्यवसाय, उद्योग में साथ काम करने वाले लोगों के प्रति संवेदना रखें और किसी को नौकरी से ना निकालें।

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी अप्रैल में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को पत्र लिखकर मीडिया सेक्टर पर मँडरा रहे संकट का जि़क्र किया था।

उन्होंने ये भी कहा था कि मीडिया संस्थान सिर्फ तीन हफ्तों के लॉकडाउन के बाद महामारी को लोगों की नौकरियां छीनने का बहाना नहीं बना सकते। लेकिन, उसके बावजूद भी संस्थान बेधडक़ अपने कर्मचारियों से इस्तीफा ले रहे हैं। पत्रकारों पर दोहरी मार पड़ी है। लॉकडाउन में नौकरी जाने से दूसरे संस्थान में फिलहाल नौकरी मिलना भी मुश्किल है।

गर्भवती पत्नी और बच्ची का एडमिशन

हिंदुस्तान टाईम्स में कई सालों से काम कर रहे फोटोग्राफर अमन को इस्तीफ़ा देने के लिए बोला गया है। उनकी पत्नी गर्भवती हैं। वो कहते हैं, मुझे अगले कई महीनों तक नौकरी मिलने के आसार नजऱ नहीं आते। अब इस हालत में अपनी पत्नी को क्या बताऊं। उन्होंने मुझे ऐसे समय पर निकाला है जब मुझे इस नौकरी की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी।

एक प्रतिष्ठित हिंदी न्यूज वेबसाइट में कंसल्टेंट के पद पर काम करने वाले रोहित कहते हैं कि उनका कॉन्ट्रैक्ट छह महीने बाद खत्म कर दिया गया।

कंपनी का कहना था कि अभी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है इसलिए कॉन्ट्रैक्ट नहीं बढ़ा सकते। आगे ज़रूरत होगी तो उन्हें सूचना देंगे। रोहित कहते हैं कि वो दिल्ली में किराए पर रहते हैं। कोई मकान मालिक किराया माफ़ करने वाला नहीं है। बेटी को इस साल स्कूल में एडमिशन भी दिलवाना है। खर्चे तो उतने ही हैं, ऊपर से तनख्वाह बंद हो गई है।

निजी पसंद-नापसंद का आरोप

अचानक ही सेवाओं से निकाले गए कई पत्रकारों का ये भी आरोप है कि उन्हें नौकरी से निकालने का ठोस कारण नहीं बताया गया। अगर कंपनी घाटे में है तो उन्हें ही क्यों चुना गया। 

हिंदुस्तान अखबार के सप्लिमेंट ‘स्मार्ट’ की टीम का हिस्सा रहे अमित कहते हैं, हम वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे। एक दिन एचआर का फोन आया और हमें ऑफि़स बुलाया। वहाँ जाकर अचानक बोल दिया गया कि कंपनी नुक़सान में है, स्मार्ट बंद हो गया है और आपकी सेवाएँ भी खत्म हो गई हैं। सबसे दुख की बात है कि मैनेजमेंट के पास इसका कोई जवाब नहीं कि हमें ही क्यों निकाला। ना काम में कमी बताई और ना कोई ग़लती। मैं यहाँ पर पिछले एक साल से काम कर रहा हूं। आज मेरे पूरे परिवार के लिए मुश्किल खड़ी हो गई है।

राजस्थान पत्रिका न्यूज वेबसाइट में काम करने वाले सुनील वहाँ कंटेंट राइटर के तौर पर काम कर रहे थे। वह बताते हैं, हमारे यहाँ से छह लोगों को नौकरी से निकाल दिया गया है। मेरा प्रदर्शन कोई खऱाब नहीं था। हाँ, मेरी संपादक से बहस हो चुकी थी। उन्होंने बिना कारण बताए निकाला है तो ज़रूर निजी वजह रही होगी।

राजस्थान पत्रिका में एक कर्मचारी को मिला बर्खास्तगी पत्र

नवभारत टाईम्स की काजल भी कहती हैं कि उन्होंने संपादक की रिश्तेदार के खिलाफ शिकायत की थी। वो लंबे समय से संपादक की नजऱों में खटक रही थीं इसलिए अब लॉकडाउन में मौका मिला तो उन्हें निकाल दिया गया।

बीबीसी ने इन मीडिया संस्थानों से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने की कोशिश की। हिंदुस्तान टाइम्स और हिंदुस्तान में जब एचआर से बात की गई तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

टाइम्स ग्रुप में सीनियर वाइस प्रेजिडेंट एचआर सिद्धार्थ गांगुली ने नौकरी से निकाले जाने के सवाल पर सिर्फ इतना कहा कि ‘उनके यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ है।’ इसके बाद उनकी तरफ़ से कोई जवाब नहीं आया है।

न्यूज़ नेशन चैनल के एडिटोरियल डायरेक्टर मनोज गैरोला ने बीबीसी से बातचीत में 16 लोगों की छँटनी की बात स्वीकार की थी। लेकिन, उनका कहना था कि इस फैसले का महामारी या लॉकडाउन से कोई संबंध नहीं है।

मनोज ने कहा था, हमारी पहचान एक हिन्दी चैनल के तौर पर है और हम डिजिटल में भी इसी भाषा में निवेश कर रहे हैं। इसलिए 16 लोगों की अंग्रेज़ी की टीम को हटा कर हमने सिर्फ हिन्दी वेबसाइट रखने का निर्णय किया है। यह फैसला लॉकडाउन से पहले किया गया था जिसे 1 अप्रैल से लागू किया जाना था।

बीबीसी से बातचीत में द क्विंट के प्रबंधन ने अपने मुलाजि़मों को बिना वेतन छुट्टी पर भेजे जाने की बात स्वीकार की थी लेकिन उन्होंने इस बारे में कुछ और बोलने से इनकार कर दिया था।

राजस्थान पत्रिका में एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपना नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया, संस्थान में कई ब्यूरो और सेंटर से लोगों को निकाला गया है। प्रबंधन का कहना था कि कोरोना वायरस के कारण जिन सेंटर से रिवेन्यू नहीं आ रहा है और पिछले तीन-चार महीनों से जो आर्थिक स्थिति खऱाब है, उसे ध्यान में रखते हुए वेतन में कटौती की गई है और छँटनी का फ़ैसला भी लिया गया है।

लेकिन, ऐसा नहीं है कि किसी को निजी नापसंदगी की वजह से नहीं निकाला गया है। किन लोगों को निकाला जाएगा इस फैसले में कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी शामिल नहीं किया गया। प्रबंधन कभी इस तरह नहीं सोचता। ये फैसला उच्च स्तर पर लिया गया है। कर्मचारियों को कंपनी की स्थिति की सूचना दी गई है।

हालांकि, जिन कंपनियों ने भी अपने कर्मचारियों को निकालने का कारण बताया है, उन्होंने लॉकडाउन के चलते हुए नुक़सान की बात कही है। उनका कहना है कि अख़बारों के पन्ने कम हो गए हैं, सप्लीमेंट बंद हो गए हैं और विज्ञापन आना कम हुआ है।

कितना बड़ा है संकट

लेकिन, क्या कंपनियों की मुश्किलें इतनी बढ़ गई हैं कि कुछ ही महीनों में इतने बड़े स्तर पर कर्मचारियों को निकाल दिया जाए। इसे लेकर हमने भारतीय जन संचार संस्थान के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डॉक्टर आनंद प्रधान से बात की।

डॉ। आनंद प्रधान कहते हैं, ये आर्थिक संकट पिछले एक-डेढ़ साल से चल रहा था। अख़बार से लेकर न्यूज चैनल तक की विज्ञापनों से कमाई में कमी आ रही थी। अब कोरोना वायरस के कारण ये संकट अचानक और गहरा गया है जिसका असर हम देख रहे हैं। लेकिन, ये भी सही है कि बड़े मीडिया समूहों कि आर्थिक स्थिति इतनी खराब नहीं है कि उन्हें लोगों को नौकरी से निकालना पड़े। ये लोग एक-डेढ़ साल मैनेज कर सकते थे। शीर्ष प्रबंधन स्तर पर वेतन में कटौती हो सकती थी।

लेकिन, ये सभी कारोबारी हैं, लिस्टेड कंपनियाँ हैं जिन्हें अपना मुनाफ़ा दिखाना होता है। इसलिए ये लोग हायर और फायर की नीति अपनाते हैं। आज ज़रूरत कम है तो निकाल दिया और कल हालत सुधरने पर जब विस्तार करेंगे तो फिर से नए लोगों को रख लिया। वहीं, प्रेस एसोसिएशन के अध्यक्ष जयशंकर गुप्ता भी मुसीबत के इस दौर में कर्मचारियों को निकालने को सही नहीं मानते।

वह कहते हैं, कंपनियों को घाटा नहीं हुआ है बस उनका मुनाफ़ा कम हो गया है और ये लोग उसी मुनाफ़े की भरपाई कर्मचारियों से कर रहे हैं। अगर 25 पन्नों का अख़बार 15 पन्नों का हो गया है तो उसकी छपाई का ख़र्च भी कम हुआ है। फिर ये कंपनियाँ जब कई गुना मुनाफ़ा कमाती हैं तो क्या उसी अनुपात में कर्मचारियों को भी फ़ायदा देती हैं लेकिन नुक़सान में उनसे ही भरपाई करती हैं।

जयशंकर गुप्ता इस संबंध में सरकार के हस्तक्षेप की बात कहते हैं। वह कहते हैं कि सरकार से इन अख़बारों को सब्सिडी मिलती है तो क्यों नहीं इन पर दबाव डालकर लोगों की नौकरी बचाई जाती है।

हालांकि, आनंद प्रधान मानते हैं कि सरकार का निजी कंपनियों पर बहुत ज़्यादा ज़ोर नहीं चल सकता। सरकार कुछ वित्तीय मदद कर सकती है लेकिन ये कंपनी और कर्मचारी के बीच का मामला होता है। सरकार पर भी कंपनियों की ओर से काफ़ी दबाव होता है।

वह कहते हैं कि आज हर सेक्टर में नौकरियाँ जा रही हैं। मीडिया कारोबारी स्तर पर दूसरे सेक्टर या कंपनियों से अलग नहीं है। लेकिन, जैसे कि इससे लोग सूचना पाते हैं, जागरुक होते हैं तो ये जन कल्याण से जुड़ा काम है।

इसलिए अगर मीडिया संस्थान बंद होने लगे या टीम छोटी होने लगे तो लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी, सूचना और विचारों की विविधता व बहुलता पर बुरा असर पड़ेगा। (बीबीसी)

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