विचार / लेख

प्रतिबंध का हल-पारदर्शिता : प्रकाश दुबे
प्रतिबंध का हल-पारदर्शिता : प्रकाश दुबे
06-Jun-2020 7:28 PM

नई चुनौती का विरोध क्यों होता है? हिचक के कारण। हिचक किस बात की? सबसे पहले तो यह चिंता कि चुनौती का सामना कर सकेंगे या नहीं? वर्तमान से असंतुष्ट व्यक्ति नियमों की बेडिय़ां तोडऩा चाहता है। यह है, दूसरा कारण। ऐसे अनेक कारण हैं। वर्तमान और भविष्य के बीच चुनौती का समय देश के अनेक राज्यों में शुरु हो चुका है। कुछ अपवाद छोडक़र आठ जून से सामान्य स्थिति बहाल हो सकती है।

नियमों का कड़ाई से पालन कराने के लिए लम्बे समय तक कही गई बातें याद कर आम नागरिक ठिठका हुआ है। कवायद पूरी करने के बाद सुनता है-कोरोना के साथ जीना है। चीन में लोकतंत्र नहीं है। उसे अपवाद के रूप में छोड़ दें। आंख और विवेक की अनसुनी कर हर आदेश का पालन करने वाले  लोग असमंजस में फंसे हैं। कारोबार और नौकरी की गुंजाइश सिकुड़ गई है। जान का जोखिम मोल लेकर काम करने में अक्लमंदी है या नहीं?

पहला असमंजस यह। उससे बड़ी चिंता इस बात की है कि समूचे समाज को सडक़ और कार्यस्थल पर उस तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता, जैसा अभी तक किया गया। लोग भूले नहीं है कि वाहन दुर्घटनाएं रोकने के लिए संसद ने कानून बनाया। उसे लागू करने से इन्कार करने वालों में सत्ता दल की राज्य सरकारें अव्वल थीं।  भ्रष्ट तंत्र  ऐसे कानून को वसूली में बदलता है।  कुछ शहरों ने चेहरे पर पट्?टी बांधे बगैर घूमने वालों पर जुर्माना ठोंकने का निर्णय किया। सामान्य जन के मन में अभी से घारणा घर कर गई- नियम भंग करने वाले से वसूली शुरु होगी। ले देकर छोडऩे से संक्रमण का खतरा आसपास मंडराता रहेगा। कुछ देशों में पालक बच्चों को स्कूल भेजने के लिए राज़ी नहीं हुए। विश्वसनीयता की इस कमी को कोई सरकार या प्रशासन अकेले दूर नही कर सकता।

रेलें और हवाई जहाज पहले भी चलते थे। उड़ानें रद्द होती थीं। दुर्घटनाएं होती थीं। सारे देश में सामान्य परिवहन थमा था। इसके बावजूद परिवहन गड़बड़ाया। कुछ विशेष रेलगाडिय़ों और उड़ानों के परिचालन में गड़बड़ी से फैली घबराहट दूर करने की पहल कठिन नहीं है। पहले भी रेलें समय पर चली हैं। चलें। खामियों को दिखाने और दुरुस्त करने का अवसर देने वाले रास्ते बंद करने से नई समस्या पैदा हुई है। बीमारी फैलाने की अफवाह के कारण संवादहीनता की स्थिति पैदा हुई। आपात्काल में  उस वक्त की सबसे बड़ी ताकत को  एकतरफा संवाद का खमियाजा उठाना पड़ा था।

समस्या और समाधान

प्रतिबंध का विरोध कम करने का सबसे आसान तरीका पारदर्शिता है। प्रशंसा और प्रचार राग के बजाय समस्या और समाधान के लिए सभी माध्यमों से पहल की जाए। स्पष्ट बताया जाए कि अमुक सुविधाएं फिलहाल नहीं मिलेंगी। कच्चे माल की कमी, मजदूरों के अभाव या अन्य कारणों से  जिन कल कारखानों को तत्काल शुरु करना संभव नहीं है, उनकी सूची सार्वजनिक की जाए। वापसी के इच्छुक मजदूरों तथा तकनीशियनों से अभी से तालमेल रखा जाए। 

भ्रष्टाचार देश का पुराना रोग है। सरकारी योजनाओं के लाभ में खामियां तलाश कर कड़ी कार्रवाई करने पर अविश्वास की खाई कम होगी। संसद में सार्थक बहस नहीं होती। इसलिए कई तरह के भ्रम फैले। कोराना से निबटने के उपायों में भ्रष्टाचार की शिकायतें आमंत्रित की जानी चाहिए। किसी विश्वसनीय संस्था से जांच हो। सारा बोझ न्यायपालिका पर डालने से विलम्ब होगा। केन्द्रीय सतर्कता आयोग के बारे में सबकी राय समान नहीं है। लोग भूल चुके हैं कि इस देश में बहुत विलम्ब के बाद लोकपाल का गठन हुआ। अब तक उन्हें कार्यालय और कर्मचारी मिल चुके होंगे। पता तो लगे कि लोकपाल और लोक आयुक्त संस्था देश में कहां कितनी है और कितनी कारगर है?

भय से मुक्ति

कुछ राज्यों के निर्वाचित प्रतिनिधि संक्रमण का उपचार करा स्वस्थ हुए। देश के बड़े वर्ग में इस जानकारी से साहस का संचार हुआ। कम लोग जानते हैं कि देश के रक्षा सचिव  संक्रमित हैं। रक्षा सचिव दिल्ली के साउथ ब्लाक में बैठते हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय और नौकरशाहों के मसलों पर निर्णय करने वाले कार्मिक विभाग के मंत्री और आला अफसर साउथ ब्लाक में बैठते हैं। संक्रमण के कारण दिल्ली के निर्माण भवन के एक हिस्से को दो दिन के लिए बंद कर दिया गया है। शहरी विकास सहित कई मंत्रालय इस इमारत में हैं।

कुछ दिन पहले रेल भवन के एक हिस्से को संक्रमण मुक्त करने के लिए बंद किया गया था। इन जानकारियों को छिपाने से उल्टा असर होगा। मुंबई के धारावी से लेकर शहरों की  सघन बस्तियों में जांच अपर्याप्त है।  दूसरी तरफ शिखर पर विराजमान लोग स्वयमेव जांच कराने से बच रहे हैं। बचाव में लगे महाराष्ट्र के करीब एक दर्जन पुलिसकर्मी कोरोना के कारण जान गंवा चुके हैं।

 रोग के आकस्मिक हमले के कारण केन्द्रीय बजट की सार्थकता प्रभावित हुई।  जिन संस्थानों और योजनाओं को समयबाह्य और घाटे का घर बताकर फरवरी में बंद करने की पहल की जा रही थी,  अब वे प्राथमकता सूची में हैं। दूरदर्शिता की कमी बताकर मात्र आलोचना से लाभ नहीं होगा।  बजट प्रावधानों की समीक्षा कर सरकार बदलाव करने में सक्षम है। इस पारदर्शिता से आम आदमी के मन में आशा अंकुरित होगी। अफवाहबाज परास्त होंगे।

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)

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