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उत्कृष्ट साहित्य : सोपान जोशी की किताब, 'जल थल मल' पुस्तक का एक अंश
11-Jun-2020 2:46 PM 10
उत्कृष्ट साहित्य : सोपान जोशी की किताब, 'जल थल मल' पुस्तक का एक अंश

22 मार्च को भारत में हुए जनता कफ्र्यूू और 24 मार्च से लगातार चल रहे लॉकडाऊन के बीच साहित्य के पाठकों की एक सेवा के लिए देश के एक सबसे प्रतिष्ठित साहित्य-प्रकाशक राजकमल, ने लोगों के लिए एक मुफ्त वॉट्सऐप बुक निकालना शुरू किया जिसमें रोज सौ-पचास पेज की उत्कृष्ट और चुनिंदा साहित्य-सामग्री रहती है। उन्होंने इसका नाम 'पाठ-पुन: पाठ, लॉकडाऊन का पाठाहार' दिया है। इन्हें साहित्य के इच्छुक पाठक राजकमल प्रकाशन समूह के वॉट्सऐप नंबर 98108 02875 पर एक संदेश भेजकर पा सकते हैं। राजकमल प्रकाशन की विशेष अनुमति से हम यहां इन वॉट्सऐप बुक में से कोई एक सामग्री लेकर 'छत्तीसगढ़' के पाठकों के लिए सप्ताह में दो दिन प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछले दिनों से हमने यह सिलसिला शुरू किया है। सबसे पहले आपने इसी जगह पर चर्चित लेखिका शोभा डे का एक उपन्यास-अंश पढ़ा था। और उसके बाद अगली प्रस्तुति थी ज़ोहरा सहगल का आत्मकथा अंश। इसके बाद प्रस्तुत थी विख्यात लेखिका मन्नू भंडारी की कहानी 'यही सच है'। आज हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं सोपान जोशी की किताब, 'जल थल मल' पुस्तक का एक अंश।
यह सामग्री सिर्फ 'छत्तीसगढ़' के लिए वेबक्लूजिव है, इसे कृपया यहां से आगे न बढ़ाएं। 
-संपादक

गोदी में खेलती हैं इसकी हजारों नालियाँ
सोपान जोशी

नाली शब्द अपभ्रंश है संस्कृत के शब्द 'प्रणाली' का, जिसका मतलब है नहर। हमारे उपमहाद्वीप में साल भर का पानी मानसून के कुछ दिनों के कुछ घंटों में ही बरस जाता है। इस पानी को ठीक से सहेजने की प्रणाली पर ही यहां का जीवन टिका रहा है। चतुर्मास की बरसात ही इस उपमहाद्वीप की जीवन प्रणाली है। पानी की आवक-जावक पर ध्यान दिए बिना यहां किसी तरह की बस्ती टिक नहीं सकती।

सिंधु घाटी सभ्यता के प्राचीन शहरों में तो मैले पानी के निकास की प्रणाली भी थी। इस शहरी सभ्यता का लोप क्यों हुआ यह आज तक ठीक से पता नहीं चला है। कई अनुमान हैं। कोई बाढ़ की बात करता है, कोई अकाल की। कोई कहता है कि नदियों ने रास्ता बदल लिया और यहां के लोग पूरब की ओर जा बसे। कुछ वैज्ञानिकों का अंदाज है कि बरसात का ढर्रा बदलने से ये नगर उजड़ गए। कुछ लोगों ने अंदाजा लगाया था कि इस शहरी सभ्यता को तबाह किया बाहर से आए खानाबदोश 'आर्य' लोगों ने। आर्यों का मुख्य देवता था बारिश का देवता, वज्रधारी इंद्र। उसका एक पुराना नाम है 'पुरंदर', यानी पुरों को, नगरों को तबाह करने वाला। इस नाम का एक और अर्थ है, घर में सेंध लगाने वाला चोर।

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प्रमाणों के अभाव में यह ठीक से कहना मुश्किल है कि इतिहास क्या है, कि कथा साहित्य में तथ्य क्या है और मिथ्या क्या है। लेकिन चौमासे का वर्षाफल यथार्थ है। इस उपमहाद्वीप में रहने वाले लोगों को यह बहुत पहले से पता था कि जो नगर या गांव बरसात की अवहेलना करता है उसे बादलों का प्रकोप बहा ले जाता है। शहर हो या गांव, बस्ती बसाने की पुरानी प्रणाली में बरसाती पानी का रास्ता छोड़ा जाता था। जो नहीं छोड़ते होंगे वे निश्चित ही पुरंदर की भेंट हो जाते होंगे।
कई लोक कथाओं और ग्रंथों में इंद्र की वर्षा सत्ता की झलक मिलती है। इनमें एक प्रसिद्ध किस्सा है श्रीमद्भागवत पुराण से। कथा में बालक कृष्ण अपने पिता नंद से पूजा और यज्ञ का कारण पूछता है। नंद बाबा बताते हैं कि वह यज्ञ वर्षा के स्वामी इंद्र को प्रसन्न करने के लिए है। फिर बालक कृष्ण पूछता है कि अगर सभी प्राणी अपने कर्मों के हिसाब से जीते-मरते हैं, तो उन्हें इंद्र से डरने की क्या आवश्यकता है, और इंद्र की जगह वे अपने गोवर्धन पर्वत की पूजा क्यों नहीं करते।
नंद बाबा मान जाते हैं। गोवर्धन की ही पूजा होती है। इंद्र इस विद्रोह से क्रोधित हो जाता है और सात दिन, सात रात तक बारिश करवाता है। ब्रज में बाढ़ आ जाती है लेकिन कृष्ण गोवर्धन को उठा कर सबको बचा लेते हैं। इंद्र का घमंड चूर-चूर हो जाता है। देवताओं की खुशामद करने की बजाए कर्मयोग की जीत होती है। राजस्थान जैसे प्रांतों में वर्षा के बादल बहुत कम पहुंचते हैं, पर यहां इंद्र से कहीं ज्यादा प्रेम और आस्था कृष्ण के प्रति रही है। उन्हें मरुधर कहा जाता है, यानी गोदी में खेलती हैं इसकी हजारों नालि मरुस्थल को धारण करने वाला। वर्षाजल संचयन की राजस्थान में गौरवशाली परंपरा कृष्ण के बताए कर्मयोग से ही रही है, वर्षा के देव इंद्र की खुशामद से नहीं।
ऐसी कथाएं कई पीढिय़ों के अनुभवों को संजो कर बनती हैं। जो गांव और नगर मानसून की बारिश को सहेजने के लिए जमीन नहीं छोड़ते होंगे उन्हें लोगों ने डूबते हुए देखा होगा। आज भी डूबते हैं। हर मानसून में हमारे शहरों में हाहाकार मचता है। चेन्नई शहर दिसंबर 2015 में ताबड़तोड़ बारिश के बाद डूबा। लाखों लोग बेघर हो कर जान बचाने के लिए भागे। पूरा नगर कई दिनों तक ठप्प पड़ा रहा।
मुंबई में 26 जुलाई 2005 को एक मीटर पानी बरसा था। नतीजा 450 लोग मारे गए थे और शहर का तीयां-पांचा खुल गया था। अचानक मुंबई को पता चला कि उसके बीच से कभी मि_ी नाम की एक नदी बहती थी, जिसकी जमीन पाट कर भवन बना दिए गए थे। अगर नदी का दम न घोंटा गया होता तो वह पुरंदर का आवेग ग्रहण कर जाती, फिर उसका मीठा पानी पीने को भी मिल जाता। लेकिन पानी के लिए जगह छोडऩे के इस व्यावहारिक ज्ञान की आजकल जमीन के बाजार में कोई जगह नहीं है। शहरों में बचे हुए जल स्रोतों का आज सिर्फ एक काम बचा है, मैले पानी की निकासी।

बारिश के पानी को सहेजने की 'प्रणाली' आज मैले पानी की 'नाली' बन गई है। जल स्रोतों को मैला पानी इसलिए ढोना पड़ता है क्योंकि तेजी से बढ़ते शहरों को विशाल सीवर चाहिए। लेकिन सीवर की व्यवस्थित नालियां हमारे शहरों में बहुत ही कम हैं। सन् 1999 में केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने पहली बार यह पता करने की कोशिश की कि हमारे 301 मुख्य शहरों में पानी, मैले पानी के निकास और कचरा हटाने की व्यवस्था कैसी है। मंत्रालय की रपट छह साल बाद जारी हुई, सन् 2005 में। रपट कहती है कि मैले पानी की निकासी हमारे सभी शहरों की बड़ी मुसीबत है। इस रपट के 871 पन्नों से एक बदबू उठी, एकभयानक गंदी तस्वीर खिंची।
301 शहरों में से सीवर तंत्र पाया गया केवल 100 नगरों में। जिन शहरों में सीवर था उनमें रहने वाले लोगों में भी केवल 58 प्रतिशत के पास यह सुविधा थी। शहरी विकास का व्यापक अनुमान लेने के लिए केंद्र सरकार की एक स्वायत्त शोध संस्था ने सन् 2011 में एक रपट जारी की थी। यह कहती है कि हमारे 5,161 छोटे-बड़े शहरों में से केवल 300 में ही किसी भी प्रकार की सीवर व्यवस्था है। बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में आधे घर भी सीवर की नालियों से जुड़े नहीं हैं। जहां सीवर की नालियां लगी हुई हैं उनमें से 40 फीसदी नालियां 'कम्बाइंड' सीवर की हैं, जिनमें बारिश का पानी और मैला पानी मिल जाता है।
कुछ शहरों ने ढेर सा धन डाल कर सीवर की नालियां बनाई हैं। जैसे शिमला ही लीजिए, जहां से एक समय भारत भर पर राज होता था और जो अब हिमाचल प्रदेश की राजधानी है। सन् 2011 की एक रपट कहती है कि शिमला नगर के 70 प्रतिशत इलाकों में सीवर की नालियां बिछाई जा चुकी हैं। लेकिन शहर के 40,000 भवनों में से केवल 12,500 ही सीवर से जुड़े थे। बाकी लोगों ने अपने घर सीवर तंत्र से जोड़े ही नहीं हैं, क्योंकि यह खर्चा भवनों के मालिकों की जिम्मेदारी है। उनका मैला पानी जमीन में बने गड्ढों में जाता है, और वहां से पहाड़ी इलाके के भूजल के संपर्क में।

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सीवर में जाने वाला मैला पानी भी प्रदूषण करता है। सन् 2007 में शिमला में पीलिया फैल गया। पुणे के राष्ट्रीय वाएरालॉजी संस्थान के वैज्ञानिक वहां पहुंचे। उन्होंने बताया कि पीने के पानी के स्रोत में मैला पानी रिस रहा है, एक मैला पानी साफ करने के कारखाने से ही। उसके बाद से शिमला और आसपास के इलाकों में बार-बार पीलिया फैल चुका है- 2008 में, 2010 में और फिर 2013 में। सन् 2016 के पहले दो महीनों में ही शिमला में 1,100 से ज्यादा लोग पीलिया के शिकार थे और सात लोगों की मृत्यु हो गई थी। मैले पानी के कारखाने में कोताही बरतने के लिए एक इंजीनियर और एक सुपरवाइजर को हिरासत में लिया गया, लेकिन कारखाना चलाने वाला ठेकेदार फरार हो गया। शिमला में छह कारखाने हैं मैले पानी का उपचार करने के लिए लेकिन इनकी स्थिति बहुत ही खराब है। इन पर ध्यान गया पीलिया फैलने के कारण, नहीं तो इस तरह के हालात हमारे शहरों में आम हैं।

किसी को सही-सही पता नहीं है कि हमारे शहर कुल कितना मैला पानी पैदा करते हैं। इसका अंदाजा लगाने के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सन् 2005 में एक रपट निकाली। सन् 2009 के आंकड़ों के हिसाब से इस रपट को बोर्ड ने ठीक भी किया। वैज्ञानिक इस अनुमान पर चलते हैं कि कुल जितना पानी एक शहर में इस्तेमाल होता है उसका 80 प्रतिशत मैले पानी के रूप में सीवर में बह जाता है। तो बोर्ड ने 498 ऐसे शहर चुने जिनकी आबादी 10 लाख से ज्यादा है, और उनमें पानी की आपूर्ति और मैले पानी के निकास की छान-बीन की।
पता यह लगा कि 498 शहर रोज 3,825 करोड़ लीटर मैला पानी पैदा कर रहे थे। सन् 2005 में इन शहरों में मैला पानी साफ करने वाले 231 कारखाने थे, और 38 कारखानों पर काम चल रहा था। अगर ये सब कारखाने लगातार, निर्विघ्न चलते तो भी हर रोज 1,178 करोड़ लीटर से ज्यादा मैला पानी नहीं साफ कर सकते थे। यानी आदर्श परिस्थितियों में भी केवल एक-तिहाई मैला पानी साफ हो सकता था। 498 शहरों में केवल आठ ऐसे निकले जो अपने कुल मैले पानी का आधा भी साफ कर पा रहे थे। उपचार कारखानों की कुल क्षमता का लगभग आधा केवल दो शहरों में था, दिल्ली और मुंबई, जो कुल मैले पानी का छठा हिस्सा भर पैदा करते हैं। 
बोर्ड ने मार्च 2015 में ऐसे कारखानों का लेखा-जोखा नए आंकड़ों के हिसाब से दुरुस्त कर के जारी किया। कई नए कारखाने इस दशक में बन चुके थे। कागज पर अब कुल 816 कारखाने आ चुके थे, जिनमें 2,327 करोड़ लीटर मैला पानी साफ किया जा सकता है। लेकिन बोर्ड ने बताया कि इनमें से केवल 522 कारखाने ही काम कर रहे हैं, बाकी या तो खराब पड़े हैं, या बनाए जा रहे हैं, और 70 कारखाने तो अभी केवल प्रस्ताव के रूप में हैं। जो कारखाने काम कर रहे हैं उनकी क्षमता हर दिन 1,888 करोड़ लीटर मैला पानी साफ करने की है। लेकिन कुल मैला पानी पैदा करने का अनुमान 2005 और 2015 के बीच लगभग दोगुना हो गया है। आज हमारे बड़े नगर 6,200 करोड़ लीटर मैला पानी पैदा करते हैं। यानी उपचार की क्षमता एक-तिहाई से भी नीचे आ गई है। इस दुनिया को करीब से जानने वाले बताते हैं कि हमारे देश में केवल एक-तिहाई मैले पानी का ही उपचार असल में होता है।
मैला पानी साफ करने की इस दुनिया में वास्तविकता और आदर्श में बहुत ज्यादा अंतर है। हमारे नगर निगमों के पास ऐसे कारखाने बनाने को धन नहीं होता, कुछ तो आधे-अधूरे बने पड़े रहते हैं। बने हुए कारखाने चलाने को धन नहीं होता। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का उदाहरण लीजिए। कुछ समय पहले वहां का एक चमचमाता कारखाना बेकार पड़ा था। एक शोधकर्ता ने कारण पूछा तो पता चला कि नगर निगम के पास बिजली का बिल भरने को धन नहीं है, सो मैला पानी चलाने वाले पंप बेकार पड़े हैं। 
दूसरी जगहों से भी इस तरह के किस्से आए दिन सुनने को मिलते हैं। कारखानों की क्षमता और उनकी वास्तविक कार्यकुशलता में बहुत बड़ा अंतर है। सरकारी कागज की सच्चाई और नाली में बहते पानी की सच्चाई एकदम अलग है। इसलिए जब कहीं जल स्रोतों को साफ करके उन्हें निर्मल बनाने की कसम खाई जाती है, आप मान सकते हैं कि उस प्रतिज्ञा में आशा की मात्रा कहीं अधिक है, अपेक्षा का अनुपात कम ही है। गंगा नदी के बाबत ऐसी बातें खूब होती हैं। गंगा को बचाने की कसम खाना आम बात हो चुकी है।

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वाराणसी में गंगा में मैला पानी गिरने से रोकने के लिए कुछ साल पहले एक योजना बनी। केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इसकी लागत का 95 प्रतिशत देने को तैयार हो गए। पर योजना फिर भी खटाई में पड़ गई। इससे जुड़े लोग बताते हैं कि वाराणसी नगर निगम बचा हुआ 5 प्रतिशत देने को राजी नहीं था। वाराणसी दुनिया के सबसे पुराने जीवित शहरों में से है और उसका वजूद गंगा से ही है। नदी में डुबकी लगा कर पाप धोने वाले असंख्य तीर्थयात्रियों के पर्यटन से चलने वाला यह शहर अपने मैले की धुलाई का धन देने के लिए तैयार नहीं था।
सरकारी रपटें ही बताती हैं कि साधनों के अभाव में कई परिशोधन कारखाने काम नहीं करते हैं। जो करते हैं वे रामभरोसे चलते हैं। उनमें कभी बिजली होती है और कभी नहीं होती, कभी मशीनें और उपकरण ठीक काम करते हैं, कभी नहीं करते। कभी उनमें आने वाले मैले पानी की मात्रा बहुत बढ़ जाती है, जैसे बारिश के बाद। मजबूरी में कारखाना चलाने वालों को उसे बिना साफ किए आगे भेजना पड़ता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कहना है कि दिल्ली के 35 कारखाने अपनी कुल क्षमता का दो-तिहाई मैला पानी भी साफ नहीं कर पाते हैं।
यह सब गणित डरावना लगता है। थोड़ा और गहरा देखने से पता चलता है कि यह सारी जानकारी अधूरे आंकड़ों पर आधारित है। यह सच हमें समझाती है सन 2012 की एक रपट, जिसे निकाला था दिल्ली की गैरसरकारी संस्था 'सेंटर फॉर साइंस एंड एनवाएरमेंट' ने, जिसे सी.एस.ई. भी कहा जाता है। दो खंड और 772 पन्नों की यह पुस्तक 71 शहरों के सर्वे से बनी है। इस विषय पर अब तक का यह सबसे प्रामाणिक अध्ययन माना जाता है। रपट बताती है कि पीने के पानी और सीवर के पानी के गणित में एक बड़ी चूक है। हमारे शहरों में इस्तेमाल होने वाले पानी का एक बड़ा हिस्सा मोटर से चलने वाले ट्यूबवेलों से आता है। इस भूजल का हिसाब किसी के पास नहीं होता। कई साल तक हमारे शहरों में कोई भी ट्यूबवेल गाड़ सकता था। अब कुछ नगरपालिकाओं ने इस पर रोक लगाई है, इसके नियम बनाए हैं। असंख्य ट्यूबवेलों का असर ये होता है कि नगर निगम जितना पानी पाइप के जरिए लोगों तक पहुंचाते हैं उससे कहीं ज्यादा पानी शहरों में इस्तेमाल होता है। इसका मतलब यह भी है कि हमारे सीवरों में आंकलन से अधिक मैला पानी बहता है। कितना ज्यादा?
दिल्ली का उदाहरण लीजिए। दिल्ली जल बोर्ड ने 2005 में अपनी जल आपूर्ति के आंकड़ों से अंदाजा लगाया कि शहर हर रोज 300 करोड़ लीटर मैला पानी पैदा करता है। पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिल्ली की यमुना नदी में बहने वाला सीवर का पानी नापा। उसने पाया कि नाले 370 करोड़ लीटर मैला पानी हर दिन नदी में उलट देते हैं। सरकारी हिसाब से 70 करोड़ लीटर मैला पानी गायब था। सी.एस.ई. का 71 शहरों का सर्वेक्षण ज्यादातर नगर निगमों के हिसाब में ऐसी चूक दिखाता है।
एक तो पहले ही मैले पानी के उपचार के कारखाने जितने होने चाहिए उतने हैं नहीं, उनकी क्षमता भी कम है, और उनको चलाना नगरपालिकाओं पर भारी पड़ता है। फिर यह तक हमें नहीं पता है कि हमारे शहर कितना मैला पानी पैदा करते हैं। सरकार इस आधी-अधूरी जानकारी के दम पर अगर ठीक निर्णय ले भी तो उसका परिणाम क्या होगा?

पिछले 20-25 सालों में हुई आर्थिक तरक्की का एक आकलन मैले पानी में दिखता है। केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय की रपट बताती है कि ठीक से काम करने वाले सीवर तंत्र और सफाई कारखाने लगाने के लिए हमारे शहरों को बहुत सारा धन चाहिए। कितना धन चाहिए यह किसी को ठीक पता नहीं है क्योंकि यही नहीं पता कि कितना मैला पानी पैदा होता है। एक अंदाजा कहता है कि इसके लिए कोई डेढ़ लाख करोड़ रुपये चाहिए। इतना धन कहां से आएगा? अगर केंद्र सरकार इतनी राशि खर्च करने को राजी हो भी जाए और कई नए कारखाने लगा भी दिए जाएं, तो नगरपालिकाएं इन्हें चलाएंगी कैसे? क्या शहरी लोग अपना मैला पानी साफ करने की थोड़ी भी कीमत चुकाएंगे?
इसका जवाब उन शहरों में मिल सकता है जो हमारी नई आर्थिक तरक्की के झंडाबरदार हैं। जैसे गुडग़ांव और बेंगलुरु। तीस साल पहले गुडग़ांव दिल्ली के पड़ोस में बसा एक छोटा सा कस्बानुमा शहर था। आज यह नए भारत की आर्थिक राजधानियों में गिना जाता है। यहां वह सब कुछ है जो विकास की कसौटी मान लिया गया है। ढेरों नई अट्टालिकाएं, दसियों जगमगाते मॉल, व्यापार और वाणिज्य की दुनिया के सबसे बड़े नाम, फर्राटे से दौड़ती चमचमाती मोटर गाडिय़ां। यह सब निजी निवेश से हुआ है, सरकार की भागीदारी इसमें न के बराबर रही है। लेकिन मैले पानी पर निजी कंपनियों और सरकार में कोई अंतर नहीं है। गुडग़ांव का एक बड़ा हिस्सा भूजल पर चलता है और किसी को पता नहीं है कि यह शहर कितना मैला पानी पैदा करता है। सरकारी अनुमान में तथ्य कम हैं, तुक्के ज्यादा हैं।
कई करोड़ लीटर पानी रोज साफ करने वाले कारखाने यहां हैं, लेकिन ज्यादातर पुराने शहर की नालियां ही इनकी ओर आती हैं। सी.एस.ई. का सर्वेक्षण बताता है कि गुडग़ांव की 30 फीसदी आबादी ही सीवर की नालियों से जुड़ी है। बाकी का मैला पानी यहां-वहां बह जाता है या जमीन के अंदर बने अनगिनत सेप्टिक टैंकों में समा जाता है। जहां सीवर हैं वहां कई नालियों की हालत खराब है। पुराने सीवर जितनी आबादी के लिए बने थे उससे कहीं ज्यादा लोग गुडग़ांव में आज रहने लगे हैं। कई नालियां तो गाद के जमने से अटकी पड़ी हैं, कई में टूट-फूट भी है। नई बस्तियों में लोग मैला पानी निकालने के लिए टैंकर बुलाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे पीने के पानी के टैंकर मंगवाए जाते हैं। बरसात में मैला पानी हर कहीं बहता दिख सकता है।

मैले पानी के उपचार के लिए लगे एक कारखाने का सन् 2005 में राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जाएजा लिया। पाया गया कि वहां साफ हुआ पानी भी मैला ही था। बोर्ड ने यह भी पाया कि कभी-कभी मैला पानी बिना साफ किए ही छोड़ा जाता है, खासकर बारिश के दिनों में। पश्चिम यमुना नहर से होते हुए जिस नदी का पानी गुडग़ांव की प्यास बुझाता है उसे गुडग़ांव मैला पानी वापस करता है। दिल्ली के दक्षिण-पश्चिम में बसे गुडग़ांव का मैला पानी नजफगढ़ नाले में दिल्ली से होता हुआ उसके दूसरे छोर तक जाता है, उत्तर-पूर्व के वजीराबाद इलाके में यमुना नदी में विसर्जित होता है। मैले पानी को इतना लंबा रास्ता इसलिए तय करना पड़ता है क्योंकि वह एक पुरानी, बरसाती नदी में बहता है। जिसे आज नजफगढ़ नाला कहा जाता है वह एक समय साहिबी नाम की प्रणाली थी जो अरावली पर्वतमाला के बगल से बह कर यमुना से दिल्ली के उत्तर में मिलती थी। यमुना नदी दिल्ली में जो निर्जीव और बदबूदार पानी ढोती है उसमें गुडग़ांव की तरक्की का अर्क भी मिलता है।

कंप्यूटर और इंटरनेट की जिस दुनिया ने गुडग़ांव को बदला है उसका गढ़ तो बेंगलुरु है। यमुना जैसी कोई बड़ी नदी यहां नहीं है, पर बेंगलुरु को तालाबों का शहर कहा जाता है। एक सर्वेक्षण के हिसाब से सन् 1973 में यहां 379 तालाब थे। सन् 1996 में इनमें से 246 ही बचे थे। आज इनकी संख्या 206 बताई जाती है। जो तालाब बचे हुए हैं उनमें भी बहुत सी जमीन पर अवैध कब्जा हो चुका है। बेंगलुरु के भारतीय विज्ञान संस्थान की एक रपट बताती है कि 1973 में तालाबों के नीचे 5,742 एकड़ जमीन थी। यह घट कर 2013 में केवल 445 एकड़ बची थी। यानी 40 साल में दसवें हिस्से से भी कम जमीन बची है तालाबों के नीचे।
सन् 2015 में कर्नाटक की विधानसभा की एक समिति ने बेंगलुरु के शहरी और देहाती इलाकों का निरीक्षण करवाया। इसमें 200 सर्वेक्षकों ने 14 महीने की अवधि में घूम-घूम कर जानकारी इक_ी की, उसका जमीनी जाएजा भी लिया। जब जनवरी 2016 में इसकी रपट जारी हुई तो पता लगा कि 10,472 एकड़ की तालाबों की जमीन पर कब्जे हो चुके थे। इस जमीन की बाजार में कीमत डेढ़ लाख करोड़ रुपये बताई गई। 11,595 ऐसे व्यक्तियों और सरकारी संस्थानों के नाम भी समिति ने सामने रखे जिन्होंने तालाबों की जमीन दबोच रखी है। कहीं रिहायशी या व्यावसायिक भवन हैं, कहीं स्कूल, जनवासे और न जाने क्या-क्या। इस सूची में नगर के कई नामी-गिरामी बिल्डरों के नाम हैं, कई सरकारी विभागों के भी।
पिछले 25 सालों में आए नए पैसे से शहर बहुत तेजी से बढ़ा है। पर नए इलाकों में सीवर की नालियां नहीं हैं। इनका मैला पानी कहां जाता है इसकी कोई पक्की जानकारी नहीं है। कहीं किसी निचले इलाके या तालाब में छोड़ दिया जाता है या जमीन में गड्ढा कर के उसमें डाला जाता है। इन गड्ढों को साफ करने का एक आधुनिक तरीका निकला है जिससे सरकार पूरी तरह बेखबर है। पीले रंग के ट्रक जिनमें पानी खींचने की मोटर लगी है और एक हवाबंद टंकी भी। इन्हें 'पिटसकर' या 'हनीसकर' कहा जाता है, यानी गड्ढा चूसने वाले या शहद चूसने वाले ट्रक। पर ये मैला पानी निकालने के बाद डालते कहां हैं? कुछ तो जहां-कहीं खाली जगह मिले वहीं खाली कर दिए जाते हैं। कुछ मैले पानी के कारखाने में खाली होते हैं। कुछ ट्रक वालों का समझौता होता है शहर के आसपास के किसानों के साथ। मैला पानी उनके खेत में डलता है, जमीन में शहद जैसी उर्वरता उड़ेलता है।
कुछ किसान नए इलाकों की चमचमाती इमारतों और फ्लैट से निकला मैला पानी पसंद नहीं करते क्योंकि उसमें विषैली दवाएं अधिक होती हैं। इन इमारतों में जो पढ़े-लिखे, साधन-संपन्न लोग रहते हैं उन्हें चमचमाते, रोगाणुओं से मुक्त शौचालय चाहिए होते हैं। लेकिन जीवाणुओं को मारने वाली दवाएं फसल को नुकसान पहुंचाती हैं। यह बात किसानों को किसी वैज्ञानिक परीक्षण से नहीं, बल्कि अपने तजुर्बे से पता चली है। मैले पानी की खबर लेते हुए ऐसा कई बार दिखता है कि अविकसित और पिछड़े माने गए लोग ज्यादा समझदारी दिखा जाते हैं। 
सूचना क्रांति के आकाशदीप बेंगलुरु में हर तरह की जानकारी कंप्यूटर के 'माउस' की एक 'क्लिक' से मिल जाती है। लेकिन किसी कंप्यूटर का कोई भी सर्च इंजन कितने भी क्लिक करने से यह ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि यहां कितना मैला पानी पैदा होता है। नगर निगम का अंदाजा रोजाना 111 करोड़ लीटर का है, लेकिन इसमें भूजल खींचने वाले अनगिनत ट्यूबवेलों का हिसाब नहीं है।
सन् 2005 के एक गैरसरकारी सर्वेक्षण ने 2,61,573 ट्यूबवेलों का आंकड़ा निकाला, जबकि नगरपालिका के पास केवल 1,70,000 ट्यूबवेल पंजीकृत थे। हर साल अंदाजन 6,500 नए ट्यूबवेल खोदे जाते हैं। इस बेहिसाब पानी के इस्तेमाल से बेहिसाब मैला पानी निकलता है। साफ कितना होता है? जिस मैले पानी का हिसाब सरकारी विभागों के पास है उसका एक-तिहाई भी साफ करने की क्षमता बेंगलुरु में नहीं है। अगर कुल कूवत ही इतनी कम है तो साफ कितना होता होगा? जो साफ नहीं होता वह कहां जाता है? उन तालाबों में जिनसे पहले पीने का पानी आता था। फिर पीने का पानी अब कहां से आता है? या तो भूजल से या कावेरी नदी से।
बेंगलुरु ही क्या, हर शहर के जल स्रोतों की यही कहानी है। पानी के पास रहना सौंदर्य और विलासिता का प्रतीक रहा है। सबसे आलीशान और महंगे भवन जल स्रोतों के इर्दगिर्द ही बनते रहे हैं। लेकिन आज किसी जल स्रोत का पता हवेलियों और बावडिय़ों के शिल्प से नहीं, मैले पानी के दुर्गंध से लगता है। नए और महंगे इलाकों में मैले पानी के प्रबंध में कोई सूझ-बूझ नहीं होती है और जल स्रोत मैले पानी के पात्र बना दिए जाते हैं। हमारे शहरों का अपने जल स्रोतों के साथ संबंध खत्म होता जा रहा है क्योंकि ये बहुत दूर-दूर से पानी छीन कर ला सकते हैं। अपने जल स्रोत बचाने में उनकी कोई रुचि, कोई स्वार्थ नहीं बचा है। लेकिन जल स्रोतों को मैले पानी का पात्र बनाने में शहरों का स्वार्थ है। उदाहरण के लिए फिर दिल्ली लौटते हैं।
उत्तरी दिल्ली के वजीराबाद में यमुना दिल्ली में प्रवेश करती है। आज यहां एक अजब नजारा दिखता है। बरसात का मौसम छोड़ दें तो वजीराबाद बांध के उत्तर में हरा-नीला साफ पानी लबालब भरा दिखता है। यहां पर नदी एक झील में बदल जाती है, क्योंकि बांध से नीचे पानी छोड़ा नहीं जाता है। यहां से सारा पानी दिल्ली के इस्तेमाल के लिए निकाल लिया जाता है। बांध के ठीक नीचे यमुना खाली पड़ी दिखती है। लेकिन कुछ दूरी तक ही। जरा आगे नजफगढ़ नाला उत्तर-पश्चिम दिल्ली का मैला पानी यमुना में उड़ेलता है। इस बदबूदार घोल को पतला करने के लिए नदी में पानी नहीं होता है। बांध के ऊपर होती है हरे-नीले पानी की लबालब झील, बांध के नीचे एक पतली सी काली धारा। एक आधुनिक शहर का अपने जल स्रोत से यह विकराल संबंध उपग्रह के चित्रों में भी दिखता है और इंटरनेट पर गूगल के नक्शों में भी।
दिल्ली का यमुना से संबंध सदा से ऐसा नहीं था। अरावली से आने वाली कई छोटी-बड़ी बरसाती नदियां यमुना में मिलती थीं। ये नदियां कई कुओं, बावडिय़ों और तालाबों से जुड़ी हुई थीं। दिल्ली बाग-बगीचों का शहर कहा जाता था। चाहे आज यहां रहने वालों को इसकी भनक तक न हो, फिर भी वे दिल्ली के पानीदार इतिहास को जाने-अनजाने याद करते हैं जब शहर के इलाकों के नाम पुकारे जाते हैं। हौज खास, मोतीबाग, धौला कुआं, झील खुरेजी, हौज रानी, पुल बंगश, खारी बावली, अठपुला, लाल कुआं, हौजे शम्सी, पुल मिठाई, दरियागंज, बारहपुला, नजफगढ़ झील, पहाड़ी धीरज, पहाडग़ंज, सतपुला, यमुना बाजार... 
चौमासे की बारिश के बाद अरावली से बह कर आने वाली नदियां फैलती थीं, इनसे आसपास का भूजल बढ़ता था जो कुओं और तालाबों में पहुंचता था। गर्मी में जब नदियों में पानी कम पड़ जाता था तो अगल-बगल के भूजल से उनमें पानी रिसता हुआ वापस आता था। इस लेन-देन की बदौलत दिल्ली पानी के मामले में बहुत अमीर रहा है, और शहर बसाने के लिए आदर्श स्थान। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि कई बार उजडऩे के बाद भी नए नगर और किले यहीं, अरावली और यमुना के बीच में बार-बार बसे। इस विलक्षण भूगोल और पानी के लेन-देन की वजह से दिल्ली बाढ़ से बचा रहा है, पुरंदर के हाथ नहीं चढ़ा।
लेन-देन आज भी है। शहर नदी से पानी लेता है और मैला पानी उसे लौटा देता है। अरावली से आने वाली छोटी-छोटी कई नदियां मैले पानी के नालों में तब्दील हो चुकी हैं। जमीन की कीमत देखते हुए इन्हें पाट कर सड़क या भवन बनाए जा रहे हैं। भूजल को बढ़ाने जितना पानी न तो दिल्ली की यमुना में बचा है और न ही उसकी सहायक नदियों में। जमीन को पक्का कर देने से बारिश का पानी जमीन में बैठने की बजाए बाढ़ का रूप लेता है।
दिल्ली का चमचमाता नया एयरपोर्ट कम-से-कम तीन तालाबों की जमीन पर बना है। सन् 2013 में बारिश का पानी एयरपोर्ट के भीतर तक आ गया था और अखबारों में घुटने तक पानी में चलते यात्रियों की तस्वीरें छपी थीं। जलवायु परिवर्तन से वैसे भी चौमासे की बरसात का स्वभाव बदल रहा है। बारिश के दिन कम हो रहे हैं, लेकिन जब वर्षा होती है तब पुरंदर कई दिनों का पानी एक साथ नीचे पटक देता है। गर्मी में घनघोर प्यास और चौमासे में बाढ़। मानसून के किसी भी दिन दिल्ली में अब वे ही नजारे दिख सकते हैं जो 26 जुलाई 2005 को मुंबई में दिखे या दिसंबर 2015 में चेन्नई में दिखे। पुरंदर अब दिल्ली को ललकारने लगा है।
शहर की प्यास भी बढ़ रही है। कौन कितना विकसित है यह इससे पता लगता है कि वह कितना पानी इस्तेमाल कर सकता है, कितना पानी निचोड़ कर निकाल सकता है। दिल्ली जल बोर्ड के ही 3,000 से ज्यादा ट्यूबवेल चलते हैं। एक लाख निजी ट्यूबवेल पंजीकृत हैं।
केंद्रीय भूजल बोर्ड का अंदाजा है कि दिल्ली में कुल निजी ट्यूबवेलों की संख्या चार लाख भी हो सकती है। कितने हैं यह किसी को ठीक से पता नहीं है। लेकिन यह पता है कि कैसे भी कर के दिल्ली की प्यास बुझती नहीं है। यमुना और उसकी सहयोगी नदियों को सुखा लेने के बाद, भूजल को निचोडऩे के पश्चात, दिल्ली की नीयत हमेशा दूसरों के जल स्रोतों पर रहती है।
1960 के दशक में भाखड़ा परियोजना बनने के समय से पंजाब की रावी और ब्यास नदियों का पानी दिल्ली लाया जा रहा है, 355 किलोमीटर दूर से। दिल्ली से 300 किलोमीटर उत्तर में टिहरी बांध के बनने का एक कारण दिल्ली की जल आपूर्ति था। गंगा का पानी तो पहले ही ऊपरी गंगा नहर से दिल्ली लाया जा रहा है। अब दिल्ली की नजर 305 किलोमीटर दूर हिमाचल के सिरमौर की तरफ है, जहां 20 गांवों को डुबोकर रेणुका बांध परियोजना बनाने का प्रस्ताव है। इन गांवों के लोग अपना विस्थापन बचाने के लिए जैसे-तैसे कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली जितना पानी रेणुका परियोजना से चाहता है उतना पानी तो शहर के रिसते हुए पाइप यूं ही बहा देते हैं। हर रोज 120 करोड़ लीटर।
दिल्ली में शिकायत केवल प्रवासियों की बढ़ती आबादी की ही होती है, उस पानी की नहीं होती जो राजधानी दूर-दूर से बलात् ले आती है। अगर आप दिल्ली के 400 किलोमीटर की परिधि में रहते हैं तो अपने जल स्रोत संभाल कर रखिए। दिल्ली की नीयत खराब है। मौका लगते ही राजधानी आपका पानी छीन सकती है। दिल्ली की ताकत दूसरों को प्रेरित करती है। हमारा हर शहर आज अपने जल स्रोत सहेजने की बजाए दूसरों का पानी लूटना चाहता है। जल प्रबंधन की शाश्वत परंपरा वाला हमारा देश आज पानी लूटने वालों का देश है। शहरी विकास की प्रणाली अब यही है।
पानी की लूट और मैले पानी के फेंकने का असर नदियों और तालाबों पर साफ दिखता है, पर भूजल की हालत दिखती नहीं है। शहरों में ट्यूबवेल हर साल-दो-साल पर गहरे करने पड़ते हैं। दक्षिणी दिल्ली के अमीर इलाकों में पानी की गरीबी बहुत तेजी से बढ़ रही है- भूजल स्तर हर साल 10 फुट गिर रहा है। उसके स्रोत का मैले पानी से प्रदूषण भी हो रहा है। जो मैला पानी खुली नालियों में या गड्ढों में डाल दिया जाता है वह रिस कर भूजल में पहुंचता है।
हमारे देश के सिविल इंजीनियरी के पाठ्यक्रमों में सीमेंट के भवन बनाने की पढ़ाई तो होती है, शुचिता का विचार नहीं सिखाया जाता है, न उन्हें भवन की बनावट के भूजल पर पडऩे वाले असर के बारे में ठीक से पढ़ाया जाता है। ऐसे पढ़े इंजीनियर भवन बनवाते हैं। नतीजतन सेप्टिक टैंक में वे सावधानियां नहीं बरती जातीं जो मल-मूत्र को भूजल में रिसने से बचाती हैं। अगर सिविल इंजीनियर तैयार भी हों तो भवन बनवाने वाले बढिय़ा सेप्टिक टैंक बनाने के लिए खर्च करने को तैयार नहीं होते। इस सब का असर भूजल पर भले ही दिखे नहीं, पर वह पानी की गुणवत्ता में झलकता है। बेंगलुरु में 735 जगहों से निकले भूजल के नमूनों की जांच सन् 2003 में हुई। आधे नमूने भी पीने लायक नहीं थे। विकार का कारण था 'नाइट्रेट' की अधिक मात्रा। इनमें से 100 नमूनों की जांच बैक्टीरिया के लिए की गई। तीन चौथाई में वे बैक्टीरिया पाए गए जो हमारे मल में पाए जाते हैं, और जिनका भूजल में पहुंचने का मैले पानी के सिवा कोई और तरीका नहीं है।
देश भर के जल स्रोतों के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बस्तियों से निकला मैला पानी ही है, ऐसा केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बरसों से कह रहा है, कई रपटों में कह चुका है। उसके परीक्षणों में लगभग हर बड़े शहर के पानी में मल से आने वाले 'नाइट्रेट' और बैक्टीरिया की मात्रा हद से बहुत ज्यादा है। भारत पर यूनिसेफ की 2013 की रपट जल प्रदूषण को 'टाइम-बम' बताती है।
अगर जल स्रोतों में मल-मूत्र सीधा पहुंच रहा है तो पानी से फैलने वाली बीमारियों को अब तक महामारी का रूप ले लेना चाहिए था। ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि नगर निगम जो पानी पाइप के जरिए पहुंचाता है उसका गहन उपचार होता है। शहरों में घर-घर में पानी साफ करने की मशीनें भी लगने लगी हैं। फिर भी मैला पानी टूटी-फूटी नालियों के जरिये पीने के पाइप में पहुंच जाता है। जून 2013 के आखिरी हफ्ते में दक्षिणी दिल्ली के एक मुहल्ले में दो लोग मैले पानी से फैलने वाले रोग से मारे गए और 40 बीमार पड़ गए।
कर्नाटक राज्य के एक भूतपूर्व आला अफसर वी. बालासुब्रह्मण्यम ने बेंगलुरु पर एक अध्ययन करने के बाद कहा कि कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर शहर को दस साल में खाली करना पड़े, क्योंकि तब तक उसके जल स्रोत मैले पानी से इतने दूषित हो चुके होंगे। पर्यावरण के प्रदूषण से कैंसर रोग का सीधा संबंध होता है। भारत में कैंसर पर शोध कर रहे कुछ वैज्ञानिकों ने सन् 2012 में पाया कि भारत में कहीं भी कैंसर के कई रूप उतने व्याप्त नहीं हैं जितने गंगा के इलाके में हैं, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में। पाप धोने वाली पवित्र गंगा को हमने जानलेवा रोगों का स्रोत बना दिया है। इसमें उद्योगों से आने वाले जहरीले पानी का भी हाथ है। गंगा के पानी में अब कैंसरकारक रसायन पाए जाते हैं। यह इलाका कुछ सौ सालों से कुओं और तालाबों पर टिका हुआ है। लेकिन अब भूजल को ट्यूबवेल या हैंडपंप से दोहने का जमाना है। आर्सेेनिक, यानी संखिया का जहर भूजल के साथ ऊपर आने लगा है। इसके प्रमाण गंगा के पानी में भी मिलते हैं। कुछ वैज्ञानिक मानते हैं कि सरकारी स्वच्छता अभियान में बनने वाले शौचालयों की टंकियों से मैला पानी रिस-रिस कर, मिट्टी में बंधे हुए आर्सेनिक के जहर को मुक्त कर देगा। और बड़े इलाके में इसका प्रकोप फैलेगा। एक जाने-माने वैज्ञानिक बेतरतीब शौचालय बनाने वाले स्वच्छता अभियानों को गंगा के इलाके को जहरीला बनाने का अभियान कहते हैं।
हमारे जल स्रोतों को साफ करने की कई तरह की कोशिशें हुई हैं। सन् 2003 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कुछ उद्योगों की अर्जी पर यमुना के तल और तट से झुग्गी-झोपडिय़ां हटाने का आदेश दिया। कारण दो थे। एक, इन बस्तियों से नदी के आसपास का माहौल खराब हो रहा था। दो, इन से यमुना का प्रदूषण हो रहा था। इन दिनों 2010 के राष्ट्रकुल खेलों के लिए दिल्ली को सुंदर बनाने पर जोर था। आदेश के बाद 20,000 से ज्यादा परिवार यमुना के पास से हटाए गए और उनका पुनर्वासन किया गया दूर, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के बवाना में। इसके बाद नदी में प्रदूषण कम होना चाहिए था पर अगले साल यमुना में प्रदूषण और बढ़ चुका था।
ऐसा कैसे हुआ? कुछ सामाजिक संगठनों ने इसकी पड़ताल की। मैले पानी का हिसाब लगाने के सरकारी तरीके के मुताबिक इन बस्तियों का यमुना के प्रदूषण में हिस्सा 0.33 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकता था। यह भी इस पर निर्भर था कि इन बस्तियों में सरकार जरूरत जितना पानी पहुंचाए, और यहां सीवर की नालियां भी बिछी हों। पर ऐसा था नहीं। कई तरह के शोध दिखा चुके हैं कि धनवान इलाकों में रहने वालों की तुलना में झुग्गियों में रहने वाले लोग कम पानी इस्तेमाल करते हैं और उनसे जल प्रदूषण भी कम होता है। फिर भी यमुना की सफाई के नाम पर कोई एक लाख लोगों को बेघर किया गया। उसी जमीन को बाद में अक्षरधाम मंदिर, राष्ट्रकुल खेलगांव और मेट्रो रेल को दे दिया गया।
जिन न्यायाधीशों ने झोपडिय़ां हटाने का आदेश दिया उन्होंने यह भी नहीं पूछा कि न्यायालय के जिन शौचालयों का वे खुद इस्तेमाल करते हैं उनका मैला पानी कहां जाता है। अगर पूछते तो पता लगता कि यमुना को मैली करने का सबसे बड़ा स्रोत अनधिकृत बस्तियां और झुग्गियां नहीं हैं, बल्कि वैधानिक तौर पर बसाए इलाकों का मैला पानी है। इसमें दिल्ली उच्च न्यायालय का मैला पानी भी आता है। उस सर्वोच्च न्यायालय का भी जो सरकार से खबर लेता रहता है कि यमुना मैली क्यों है।
अगर देश में किसी नदी को साफ हो जाना चाहिए था तो वह है दिल्ली की यमुना। दिल्ली से ज्यादा धन और साधन किसी शहर के पास नहीं हैं। हमारे देश में कुल मैला पानी साफ करने की क्षमता का एक बड़ा हिस्सा दिल्ली में ही है, जबकि यहां पैदा होने वाला मैला पानी हमारे सारे शहरों के कुल योग का दसवां हिस्सा ही है। राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना में कुल 172 शहर आते हैं, जिनमें मार्च 2010 तक 5,148 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसमें से लगभग 13 फीसदी केवल दिल्ली पर खर्च हुआ है: 650 करोड़ रुपये। इस योजना में खर्च हुई कुल राशि का चौथा हिस्सा (1,353 करोड़ रुपये) केवल एक नदी पर खर्च हुआ है, और वह है यमुना। इसमें से 1,200 करोड़ रुपये तो सिर्फ दिल्ली में मैला पानी साफ करने के 17 कारखाने लगाने पर खर्च हुए। पवित्र गंगा का मूल्य इस योजना में केवल 932 करोड़ रुपये निकला।
कई तरह की नई प्रणालियों पर पैसा पानी की तरह बहाया गया है। केंद्र सरकार और दिल्ली राज्य सरकार ही नहीं, न्यायपालिका भी यमुना साफ करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस सबके बावजूद यमुना है कि साफ होती ही नहीं है। नदी की हालत जानने के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वैज्ञानिकों को परेशान करने की जरूरत नहीं है। न ही बोर्ड की वेबसाइट पर जा कर प्रदूषण के आंकड़े निकालने की। आंख और नाक वह बताती हैं जो शायद वैज्ञानिक भी न बता पाएं। यमुना की कुल लंबाई का केवल 2 प्रतिशत दिल्ली से बहता है, यानी 22 किलोमीटर। इतनी सी लंबाई में यमुना का 80 फीसदी प्रदूषण हो जाता है। यह है राजधानी का उसकी नदी के साथ संबंध।
जल प्रदूषण का मामला जब कभी उठता है सरकार पर कुछ करने का दबाव बढ़ता है। एक और खर्चीली योजना, एक और नई प्रणाली निकाली जाती है। ऐसी ही एक योजना है 'गंगा ऐक्शन प्लैन' या 'गैप', जो सन् 1986 में शुरू हुई थी। सन् 2000 तक इस योजना में 900 करोड़ रुपये खर्च हो चुके थे। सरकारी खाते में धन खर्च हो जाने का मतलब होता है काम पूरा हुआ। सन् 2000 की केंद्रीय नियंत्रक और महालेखाकार की रपट बताती है कि योजना में साधनों का घोर दुरुपयोग हुआ।
सरकार ने इस योजना का दूसरा चरण सन् 1993 में चालू कर डाला, जिसे दो साल बाद ही राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना का नाम दे दिया गया। धीरे-धीरे कई और नदियों के लिए वैसे ही प्रदूषण निवारण कार्यक्रम बनाए गए जिनसे गंगा साफ नहीं हो पाई थी। गैप के पहले दो चरणों में 2,300 करोड़ रुपये मैला पानी साफ करने के कारखाने बनाने जैसे कामों पर खर्च हुए। कई हजार करोड़ रुपयों की इस योजना में धन खर्च करने की आपाधापी है। पर इसका नदी पर असर दिखता नहीं है। शहरों में रहने वालों का मल-मूत्र, उनके सीवर का मैला पानी ही नदी के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। गंगा किनारे के शहरों ने सरकारी योजना का धन पचा लिया, और अभी भी इंतजार में हैं कि उन्हें अपना दारिद्रय धोने का अगला मौका मिले।
इनमें से तीन लीजिए, कानपुर, इलाहाबाद और वाराणसी। तीनों शहरों में मैला पानी साफ करने के कारखाने लगे हुए हैं। गंगा को साफ करने के लिए तीनों शहर ऐसे कई और कारखाने लगाना चाहते हैं, पर इन शहरों के 71-84 प्रतिशत इलाकों में सीवर की नालियां ही नहीं हैं। मैला पानी भवनों से कारखानों तक पहुंचेगा कैसे, कोई नहीं जानता। योजनाएं हैं, उनमें धन है, सो खर्च करने के कल्पनाशील तरीके भी शहर निकाल ही लेते हैं, लेकिन इस सब से नदियां साफ नहीं होतीं। 
ऐसी ही एक कठिन नाम वाली एक योजना सन् 2005 में शुरू हुई, नाम था 'जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन'। इसके तहत नगर निगम वे काम करने के लिए केंद्र सरकार से सहायता पा सकते हैं जो वे अपने खर्चे से या राज्य सरकार की मदद से कर नहीं सकते हैं। मार्च 2012 में इसका पहला चरण पूरा होने तक इसमें 60,000 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके थे। दूसरी सुविधाओं की ही तरह मैला साफ करने के संयंत्र भी इस योजना में लगाए जा सकते थे। लेकिन इस मिशन के साथ काम करने वाले लोगों का कहना है कि सबसे ज्यादा धन साफ पानी की आपूर्ति में ही खर्च हुआ है। इतनी बड़ी योजना में खूब गुंजाइश थी कि जल स्रोत ठीक किए जाएं और मैला पानी साफ करने के साधन खड़े किए जाएं। पर ऐसा नहीं हुआ। सन् 2014 में नई सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया। इसकी जगह एक और कठिन नाम की योजना की घोषणा की: 'अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन', जिसे अंग्रेजी में 'अमृत' भी कहा जाता है।

सरकारी कार्यक्रम असरकारी नहीं माने जाते हैं। सरकार टेंडर के आधार पर काम करती है। टेंडर में वह अपनी जरूरत बताती है और सबसे सस्ते में काम पूरा करने का वायदा करने वाले को टेंडर दे दिया जाता है। इसमें दोनों पक्षों को बैठ कर काम का कारगर तरीका ढूंढऩे का मौका नहीं रहता। टेंडर का आवेदन भरने वाले प्रस्तावित दाम कम-से-कम रखने के लिए हर तरह के समझौते करते हैं। यह कटौती दिखाई देती है काम पूरा होने के बाद। अब तो खुद सरकारें ही निजी क्षेत्र के साथ काम करने की बात करती हैं। गंगा की सफाई के अभियान में अब बार-बार पंजाब के बाबा बलबीर सिंह सींचेवाल का नाम लिया जाता है। उन्होंने सन् 2000 में एक सामाजिक अभियान शुरू किया था काली वेईं नामक एक छोटी सी नदी की सफाई के लिए। 160 किलोमीटर लंबी इस नदी का सिख धर्म में गहरा महत्व है। गुरु नानक देव 14 साल इसके किनारे रहे थे और यहीं पर उन्हें दिव्य ज्ञान मिला था।
कुछ ही सालों के भीतर बाबा सींचेवाल ने आसपास के गांव के लोगों और सरकारी विभागों को जोड़ कर नदी को साफ करने का काम कर दिखाया। उनका सामाजिक प्रभाव इतना है कि उनके बुलाने से लोग कार सेवा करने उमड़ आते हैं। यही नहीं, दूर अमेरिका और कनाडा में बसे सिखों ने जी भर के साधन भेजे हैं। सरकार में आजकल 'सींचेवाल मॉडल' की खूब चर्चा है। लेकिन सरकारी योजनाओं में वह सामाजिक प्रभाव कैसे आएगा जिसकी वजह से बाबा सींचेवाल ने लोगों को काली वेईं नदी से एक बार फिर जोड़ दिया?
सरकार पर ही सारी जिम्मेदारी मढऩा शायद गलत होगा। सीवर प्रणाली के मूल में ही कुछ कमियां हैं। मैला पानी कारखानों तक पहुंचाना महंगा सौदा पड़ता है। एक अंदाजा बताता है कि मैला पानी साफ करने की कुल लागत का 80 प्रतिशत तो केवल नालियों को बिछाने, मैले पानी को इनमें चलाने के लिए बिजली के पंप लगाने, फिर बिजली के बिल चुकाने और दूसरी तरह के रखरखाव में खर्च होता है। इसमें यह अपेक्षा रहती है कि इतनी बिजली पहले से मौजूद है और तंत्र को ठीक से चलाने के लिए प्रशिक्षित कामगार भी, जो अमूमन हमारे शहरों में होता नहीं है। सीवर प्रणाली में पानी बहुत लगता है। साल भर जगह-जगह शौचालयों से मल-मूत्र बहाने के लिए इतना पानी कहां से आएगा? हमारे देश में कुल बारिश का 90-70 प्रतिशत पानी मानसून के तीन महीनों में ही गिर जाता है। फिर शहरों में इतनी जमीन कहां से आएगी कि इस मैले पानी को साफ करने के कारखाने लगाए जाएं? जमीन मिल भी गई तो उसे खरीदने और फिर इन संयंत्रों को बनाने और निर्विघ्न चलाने का धन कैसे जुटेगा?
चाहे आधुनिक शहर के ढांचे में सीवर व्यवस्था अनिवार्य हो, लेकिन मल-मूत्र हटाने का यह तरीका बेहद अस्वाभाविक है। जितना मैला पानी इक_ा होता जाता है उसे साफ करना कई गुणा कठिन और महंगा होता जाता है। फ्लश कमोड से निकले पानी को साफ करने का एक व्यावहारिक तरीका है मैला पानी जहां पैदा हो वहीं उसका उपचार किया जाए, उसे आगे भेजने के पहले। इससे कई तरह के खर्चे बचाए जा सकते हैं। ऐसा करना असंभव नहीं है, कुछ देशों ने यह कर के दिखाया भी है।
इनमें मुख्य है जापान। हालांकि वहां के ज्यादातर हिस्सों में बड़े-बड़े कारखाने हैं मैले पानी के उपचार के लिए। पर देश के पांचवें हिस्से के मैले पानी का उपचार छोटे-छोटे कारखानों में होता है, खासकर उन इलाकों में जहां की आबादी 20,000 से कम हो। इन्हें 'जोकासो' कहते हैं। किसी छोटी गाड़ी या पानी की टंकी का इसका आकार होता है, इसलिए किसी इमारत के आसपास या तलघर में ही ऐसे कारखाने लग सकते हैं। जापान में पिछले 40 साल से ये लग ही रहे हैं, और काम भी कर रहे हैं। इनमें एक इमारत या बस्ती का मैला पानी सीवर की नाली में जाने के पहले ही साफ कर दिया जाता है। उसमें बदबू नहीं बचती। कई जगहों पर ऐसे साफ किए पानी की जांच भी होती है, यह पता करने के लिए कि संयंत्र ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं।
इन्हें भवनों के मालिक अपने खर्च पर लगवाते हैं, जबकि सरकार इनकी कीमत पर 40-90 प्रतिशत का अनुदान भी देती है। कुछ कारखाने तो स्थानीय सरकारें ही चलाती हैं। जापान अमीर देश है और हर कहीं सीवर की नालियां पहुंचाने का माद्दा रखता है। लेकिन जापान के ज्यादातर हिस्से पहाड़ी हैं और यहां हर कभी भूचाल आते रहते हैं। ऐसे में हर जगह सीवर की पक्की नालियों से मैला पानी इक_ा कर के ले जाना और फिर उसका उपचार करना व्यावहारिक नहीं होता। इसलिए कुछ जगहों पर मैला पानी जहां पैदा होता है वहीं उसका उपचार किया जाता है।
इन संयंत्रों के काम करने का सिद्धांत सीवर के विशाल कारखानों से थोड़ा अलग होता है। डी.आर.डी.ओ. के बनाए बायोडाइजेस्टर शौचालय की ही तरह जोकासो भी बिना ऑक्सीजन के रहने वाले जीवाणुओं पर चलते हैं। ये बैक्टीरिया अंधियारी और बंद जगहों में फलते-फूलते हैं, अगर इन्हें रहने के लिए जगह मिल जाए। इसके लिए इन छोटे संयंत्रों में जालियां या छोटे-मोटे पत्थरों के खाने बने होते हैं, जिनके बगल से मैला पानी बहता है। घर मिल जाए तो पानी से मैल निकालकर उसे जीवाणु खुद भोजन बना लेते हैं। पर ये जीवाणु आते कहां से हैं? कुछ तो हमारे पेट से निकले मल में पहले से ही मौजूद होते हैं, कुछ और अपने आप से अंधेरी, ऑक्सीजन-विहीन जगहों पर सहज प्रकट हो जाते हैं।
हमारे यहां इस पद्धति से मैला पानी साफ करने वाला डी.आर.डी.ओ. ही अकेला संस्थान नहीं है। कुछ और संस्थाएं भी ऐसे छोटे-छोटे कारखाने बना रही हैं। इनमें बिजली की जरूरत तो होती ही नहीं है, इन्हें लगाने के लिए जमीन भी कम लगती है। जाहिर है, लागत भी बड़े कारखानों की तुलना में बहुत कम आती है।
इस किफायती व्यवस्था का अंग्रेजी में महंगा सा नाम है- 'डीसेंट्रलाइज्ड वेस्टवॉटर ट्रीटमेंट सिस्टम्स', या संक्षिप्त में 'डीवॉट्स'। कठिन हिंदी में अनुवाद करें तो होगा 'विकेंद्रीकृत मैला पानी सफाई व्यवस्था'। जब तक इसके कुछ और व्यावहारिक नाम न गढ़े जाएं, डीवॉट्स ही बेहतर है। इन पर काम करने वाली संस्थाओं में बेंगलुरु की 'सी.डी.डी.' का नाम सबसे पहले आता है। डीवॉट्स पद्धति समझाने के लिए संस्था ने अपने दफ्तर के एक हिस्से में एक रोचक प्रदर्शनी लगाई है। दूसरी संस्थाओं के साथ काम करने के अलावा सी.डी.डी. ने अपने दफ्तर के बगल में एक कारखाना डाला है ऐसे छोटे कारखाने बनाने के लिए। इनकी बनावट ऐसी होती है कि इन्हें ट्रक पर लाद कर कहीं भी भेजा जा सकता है।
सी.डी.डी. ने ही 150 से ज्यादा जगहों पर ऐसे संयंत्र खुद लगाए हैं और 350 से ज्यादा कारखाने सहयोगी संस्थाओं के साथ लगाए हैं। इनमें से कुछ में साफ किए पानी का परीक्षण किया गया और उसे निर्दोष पाया गया। कुछ तो आदर्श नतीजे दे रहे हैं, कुछ उतने अच्छे नहीं चले। हर नए संयंत्र के साथ इस काम को करने वालों का तजुर्बा बढ़ रहा है। सी.डी.डी. सामाजिक संस्था है पर उसकी कोशिश है कि मैला पानी साफ करने का व्यापार भी खड़ा हो जाए, जिसके लिए किसी अनुदान या सहयोग की जरूरत न पड़े। जो मैला पानी पैदा करते हैं वे ही उसके उपचार का खर्चा उठाएं, इसे नगर निगम या सरकार पर न छोड़ें। जो लोग 'डीवॉट्स' से मैले पानी का उपचार करने का बीड़ा उठाएं उनकी आजीविका भी इससे निकल आए।

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ऐसी कोशिशें देश के कई हिस्सों में छोटी-छोटी कंपनियां और रसायनशास्त्री कर रहे हैं। ऐसे रसायनों की खोज भी हो रही है जिनसे मैला पानी और तेजी से साफ हो सके। मैले पानी के उपचार में कई लोगों को मुनाफा दिख रहा है। अगर यह बढ़ता है तो हमारे जल स्रोतों के लिए अच्छा लक्षण ही है। लेकिन यह नया उभरता हुआ व्यापार उतना साफ-सुथरा नहीं है जितना लगता है।
इस व्यापार में लगे लोग जो समाधान बेचते हैं वे किसी-न-किसी तरह के बैक्टीरिया और कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं से तैयार होते हैं, जिनके सिद्धांत जग-जाहिर हैं। इस व्यापार में लगे ज्यादातर लोग यह दावा करते हैं कि उनके जीवाणु और रसायन खास हैं, कि उनके नुस्खे में जादुई शक्ति है। यह भी कि जितने अच्छे और तेजी से मैले पानी का उपचार उनका तरीका कर सकता है उतना और कोई नहीं कर सकता। उनके नुस्खों में असल में क्या है, इसकी जानकारी कोई कंपनी या ठेकेदार सार्वजनिक नहीं करता। हर कोई अपने-अपने तरीकों पर पेटेंट निकाले हुए है। वे अपने काम करने के तरीकों को गोपनीय रखना चाहते हैं, ताकि उनके प्रतियोगियों को उनके शोध और आविष्कार से मुनाफा न हो। इस होड़ में मैले पानी के नए और छोटे-छोटे तरीके फैलने की बजाए अपने-अपने गड्ढों में पड़े हुए सड़ रहे हैं।
इस व्यापारिक गोपनीयता का एक और नुकसान है। यह कहना कठिन है कि कौन सा तरीका कारगर है और कौन सा बेकार है। हर किसी के बड़े-बड़े दावे हैं। उन दावों का कोई परीक्षण नहीं होता, कोई वैज्ञानिक विश्लेषण नहीं हो सकता। कई लोग अपने-अपने जादुई नुस्खे से मैला साफ करने के वादे भी करते हैं और उससे कमाई भी। अगर कोई व्यक्ति या समूह अपना मैला पानी साफ करना चाहे तो उन्हें कोई पुख्ता जानकारी इन उद्यमियों से नहीं मिलती। किसका नुस्खा खरीदें यह निर्णय किसी लाटरी खरीदने से कम नहीं है। लगी तो लगी, वरना जय रामजी की। कोई सभा, समिति या आयोग नहीं है जो इस नए उद्योग को व्यवस्थित कर सके, या बाजार में बिक रहे नुस्खों और दावों की जांच कर के उनकी हुंडी भरे।
मैले पानी का एक और उपयोग कई शहरों में हो रहा है जिसका असर मालूम नहीं है। मैले पानी को खेतों में उर्वरक और सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है, खासकर सब्जी की खेती में। ऐसा कई शहरों के आसपास के खेतों में देखा जा सकता है। एक दृष्टि से तो यह बहुत अच्छा है, क्योंकि मैले पानी में ढेर सारे उर्वरक होते हैं। उसका सदुपयोग तो यही है कि ये उर्व रक जमीन में जाएं, खेती के काम आएं। लेकिन शहरों से आए मैले पानी में मल-मूत्र और उर्वरक ही नहीं होते, कई तरह के रोगाणु भी होते हैं और विषैले पदार्थ भी, जैसे पारा और सीसा जैसी भारी धातुएं। फिर कई तरह के कीटनाशक, दवाएं और तरह-तरह के रसायन भी मैले पानी के साथ बह कर आ जाते हैं। इनका फसलों पर क्या प्रभाव होता है यह ठीक से समझा नहीं गया है।
मैले पानी की दुनिया अज्ञान और नासमझी में ही चलती है। बारिश का देवता भले ही पुरंदर हो, लेकिन मैले पानी का कोई देवता हमारे यहां नहीं है। ढेर सा पानी इस्तेमाल कर के, ढेर सा मैला पानी पैदा करना तो हमने पिछले कुछ दशकों में तेजी से सीख लिया है। लेकिन इतने मैले पानी का क्या करना है, यह कि सी को पता नहीं है। कई तरह की नालियां और प्रणालियां उभर रही हैं। इसमें कहीं-कहीं छटपटाहट है। कहीं दिखता है कि नुकसान हो जाएगा, तो कहीं मुनाफे की उम्मीद भी। लेकिन क्या कोई आदर्श प्रणाली भी है? क्या कोई ऐसा शहर है जो अपना मैला कि सी बेहतर तरीके से साफ कर लेता हो? जिसके पास मैले पानी का खतरा टालने का वाजि ब और समयसिद्ध तरीका हो?
राजधानी एक्सप्रेस लीजिए और दिल्ली से चलि ए कोलकाता।
(चित्रकार-सोमेश कुमार)
[जल थल मल पुस्तक से]

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