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प्यास से जूझ रही है अमेरिका की बड़ी आबादी
प्यास से जूझ रही है अमेरिका की बड़ी आबादी
28-Jun-2020 10:13 AM

कट्टर पूंजीवाद के खतरे की मिसाल, सबसे अमीर देश

अमेरिका में 20 लाख लोगों के घर पानी नहीं आता। करीब 3 करोड़ लोगों के घरों में जो पानी आता है, वह सुरक्षित नहीं। लगभग 11 करोड़ आबादी को मिलने वाले पानी में विषैले रसायनों की भरमार है। पानी का बिल नहीं भरने के कारण करीब 1.5 करोड़ आबादी की जल आपूर्ति बंद कर दी गई है।

-महेन्द्र पांडे

हमारे प्रधानमंत्री रसातल में जा चुकी अर्थव्यवस्था के बाद भी 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था की बातें करते हैं और जाहिर करते हैं कि मानो उसके बाद जनता की सारी समस्याएं हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएंगी। ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल किसी के भी मस्तिष्क में उठ सकता है कि क्या अर्थव्यवस्था का विस्तार और जनता की सुविधाओं में कोई संंबंध होता है?

आज की पूंजीवादी और बाजार पर टिकी अर्थव्यवस्था के दौर में इसका सीधा सा उत्तर है, नहीं। अर्थव्यवस्था के बढ़ने से देश में अरबपतियों की संख्या बढ़ती है और साधारण जनता और गरीब सुविधाओं से और वंचित हो जाते हैं। पिछले वर्ष के अंत तक हमारे देश की अर्थव्यवस्था 2.9 ट्रिलियन डॉलर की थी और इस समय देश में 102 अरबपति हैं, पर कोविड-19 के दौर में हम जनता की परेशानियां देख चुके हैं।

इस समय दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका है और भारत छठे स्थान पर है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था 21.5 ट्रिलियन डॉलर की है और वहां 614 अरबपति हैं और आबादी भारत से कम है। जाहिर है, वहां के नागरिकों को सारी सुविधाएं मिलनी चाहिए, पर ऐसा नहीं है। दुनिया का सबसे शक्तिशाली और अमीर देश, अमेरिका, अपने सभी नागरिकों को तो पानी की आपूर्ति भी नहीं कर पाता है।

अमेरिका में लगभग 20 लाख लोगों के घर पानी नहीं आता और इनके घरों में मौलिक प्लम्बिंग की सुविधा नहीं है। इसके अलावा 3 करोड़ से अधिक आबादी के घरों में जो पानी आता है, वह सुरक्षित नहीं है। लगभग 11 करोड़ आबादी तक पहुंचने वाला पानी प्रदूषित है और इसमें विषैले रसायनों की भरमार है। लगभग 1.5 करोड़ आबादी को पानी का बिल नहीं भरने के कारण जल आपूर्ति की सुविधा से बेदखल कर दिया गया है। इन सबके बाद भी, अमेरिका में अरबों डॉलर की कमाई वाली बोतल-बंद पानी का बाजार साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है।

इन सभी चौकाने वाले आंकड़ों का खुलासा द गार्डियन ने अपनी एक रिपोर्ट में किया है, जिसे अनेक अमेरिकी संस्थानों के साथ मिलकर प्रकाशित करने की योजना है। लगभग 10 वर्ष पहले, संयुक्त राष्ट्र ने 28 जुलाई 2010 को, अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत पानी को हरेक व्यक्ति का मौलिक अधिकार करार दिया था। इसके अनुसार पानी का मतलब कैसा भी पानी नहीं, बल्कि साफ, सुरक्षित और पर्याप्त मात्रा में पानी था।

लेकिन, इन दस वर्षों के भीतर ही अमेरिका में पानी की समस्या और विकराल हो गई। अब पानी असमानता, गरीबी, प्रदूषण और व्यापार का पर्यायवाची बन गया है। पानी की कमी से सबसे अधिक प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों की गरीब आबादी, अफ्रीकन-अमेरिकन समुदाय, जनजातियां और प्रवासी आबादी है। यहां लोगों को पानी के अधिकार से वंचित कर खनन, कृषि और उद्योगों को प्राथमिकता दी जा रही है।

प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और पुराने जल-आपूर्ति तंत्र के बाद भी साल 2010 से 2018 के बीच पानी के वार्षिक बिल में औसतन 80 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी है, जिससे गरीब और माध्यम वर्ग की लगभग 40 प्रतिशत आबादी के पास इस बिल को भरने के पैसे नहीं हैं। कहीं-कहीं तो गरीबों की औसतन वार्षिक आय का 12 प्रतिशत से अधिक खर्च केवल पानी के बिल को भरने में चला जाता है।

इसी अवधि के दौरान जल आपूर्ति और सफाई के लिए मिलने वाली सरकारी मदद में लगभग 80 प्रतिशत की कटौती कर दी गई है। फूड एंड वाटर वाच की वाटर जस्टिस एक्सपर्ट मैरी ग्रांट के अनुसार अमेरिका का हरेक क्षेत्र पानी के आपातकाल से जूझ रहा है। यहां पानी के बुनियादी ढांचे में परिवर्तन की आवश्यकता है। पानी को किसी उत्पाद या फिर अमीरों की सुविधा के तौर पर नहीं देखना चाहिए।

अमेरिका में नस्लवाद और रंगभेद विरोधी आंदोलनों का एक बड़ा मुद्दा यह भी है, क्योंकि पानी की कमी से अफ्रीकन-अमेरिकन, एशियाई और अल्पसंख्यक आबादी सबसे अधिक प्रभावित है। डेट्रॉइट की लगभग 80 प्रतिशत आबादी अफ्रीकन-अमेरिकन और एशिया के लोगों की है। जाहिर है यहां पानी की किल्लत होगी और पानी का बिल नहीं भर सकने वाली आबादी भी अधिक होगी। यहां पिछले 2 वर्षों के भीतर लगभग डेढ़ लाख घरों से जल आपूर्ति के कनेक्शन काटे जा चुके हैं। इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में चर्चा भी की जा चुकी है। दूसरी तरफ, पुराने और जर्जर जल आपूर्ती ढांचे के कारण अमेरिका में लगभग 6 अरब डॉलर मूल्य का पानी बर्बाद हो जाता है।

दूसरी तरफ, पिछले वर्ष अमेरिका के जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज में जोआन रोज की अगुवाई में प्रस्तुत एक शोध पत्र ने सेप्टिक टैंक पर ही गंभीर सवाल उठाए थे। जिन घरों में प्लम्बिंग की सुविधा नहीं है, वहां शौचालय सोक पिट और सेप्टिक टैंक से ही जुड़े हैं। इस अध्ययन को नदियों से संबंधित सबसे बड़ा अध्ययन कहा जा रहा है। इसके अनुसार सेप्टिक टैंक से फीकल कोलीफार्म को आप भूमि या नदियों में जाने से नहीं रोक पाते हैं।

वैज्ञानिक जगत में यह सबसे बड़ी भ्रान्ति है कि भूमि मानव और मवेशियों के मल के लिए प्राकृतिक उपचारण का काम करती है। प्रचलित धारणा के अनुसार नदी के उन क्षेत्रों में जहां सेप्टिक टैंक की संख्या सबसे अधिक है, वहां नदी में फीकल कोलिफौर्म की संख्या कम होनी चाहिए थी, पर इस दल ने अपने अध्ययन में ठीक इसका उल्टा पाया।

पिछले वर्ष अमेरिका के शहरों में पीने के पानी की जांच की गई थी। राजधानी वाशिंगटन डीसी में जिस पानी की घरों में आपूर्ति की जाती है, उस पानी में 10 से अधिक ऐसे प्रदूषक तत्व मौजूद थे, जिनकी सांद्रता तय मानक से अधिक थी और इनमें ऐसे रसायन मौजूद थे जिनसे कैंसर हो सकता है। सितंबर 2019 में जर्नल हेलियो में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार अमेरिका में पीने के पानी में प्रदूषण और विषैले पदार्थों की उपस्थिति के कारण लगभग एक लाख लोगों को कैंसर होता है। इसका मुख्य कारण पानी में आर्सेनिक की मौजूदगी है, जो प्राकृतिक तौर पर पानी में मौजूद रहता है।

एनवायर्नमेंटल वर्किंग ग्रुप की वरिष्ठ वैज्ञानिक ओल्गा नैदेंको के अनुसार यह प्रदूषण बड़ी संख्या में लोगों में कैंसर उत्पन्न करने में सक्षम है। हाल में ही अमेरिका के बाजार में मिलने वाले बोतल-बंद पानी की जांच की गई और इसमें भी आर्सेनिक मौजूद था। कंज्यूमर रिसर्च के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ जेम्स दिकर्सन के अनुसार यह आश्चर्य का विषय है कि मंहगा बोतल-बंद पानी भी प्रदूषण से मुक्त नहीं है। उनके अनुसार आर्सेनिक के प्रभाव से कार्डियोवैस्कुलर रोग, कैंसर, बच्चों में बौद्धिक क्षमता का अपूर्ण विकास और भी अनेक रोग हो सकते हैं।

डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने के समय ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का नारा दिया था और अब दुनिया उस महानता को प्यासे, भूखे, बेरोजगार, नस्लभेदी और सत्तालोभी राष्ट्रपति के तौर पर देख रही है। कट्टर पूंजीवाद में पानी और खाने की नहीं बल्कि जीडीपी की बात की जाती है, अरबपतियों की बातें की जाती हैं। जाहिर है, जिस दिन अमेरिका ग्रेट हो जाएगा उस दिन कम से कम डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति के तौर पर नहीं चुनेगा।  (www.navjivanindia.com)

 

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