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अब दल बदल नहीं, जनमत का संहार

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अब दल बदल नहीं, जनमत का संहार
29-Jun-2020 10:39 PM

(जन प्रतिनिधियों, राजनीतिक दलों के संदर्भ में)

संसदीय प्रणाली,एवं विधान मंडल सुरक्षित एवं सुदृढ़ रहें, इसके लिए यह आवश्यक है कि इसके सदस्य और राजनीतिक दल सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठतम आचरण एवं व्यवहार का आदर्श स्थापित करें। उनके कार्यकलाप व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं अपितु जनहित व जन सेवा के उद्देश्य से होना चाहिए। संसदीय प्रजातंत्र को सुदृढ़ करना है तो राजनीतिक दलों एवं जन प्रतिनिधियों को अपने आचरण एवं व्यवहार में गुणात्मक परिवर्तन करना होगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात 26 नवंबर 1949 से देश में संविधान लागू हुआ, संविधान सभा ने अंतरिम संसद के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया, पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 15 सदस्यीय मंत्रिमंडल का गठन हुआ, इस प्रथम मंत्रिमंडल में विभिन्न विचारधारा के राजनेताओं को सम्मिलित किया गया।पश्चात मंत्रिमंडल से सदस्यों ने त्यागपत्र देकर विचारधारा के आधार पर राजनीतिक दल गठित किए।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ, डॉ. बी आर अंबेडकर ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन को पुनर्गठित किया जो रिपब्लिकन पार्टी के नाम से स्थापित हुई, आचार्य कृपलानी ने मजदूर प्रजा परिषद, जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया ने सोशलिस्ट पार्टी, और सी राजगोपालाचारी ने स्वतंत्र पार्टी का गठन किया।
विचारधारा के आधार पर गठित राजनीतिक दल शनै:शनै: विघटित होते रहे, अथवा कुछ दलों का प्रभाव केवल कुछ क्षेत्र विशेष, जाति विशेष, अथवा संप्रदाय विशेष तक सीमित रह गया. राजनीतिक दलों की परिवार केंद्रित अथवा व्यक्ति केंद्रित रूप में पहचान स्थापित हुई, व्यक्ति केंद्रित क्षेत्रीय दलों का अभ्युदय हुआ, साथ ही दल की विचारधारा, अथवा दल के प्रति निष्ठा नहीं अपितु व्यक्ति विशेष के प्रति निष्ठा की प्रमुख भूमिका होने लगी।
वर्तमान परिदृश्य में नैतिकता का पाठ भूलकर राजनीतिक दलों का लक्ष्य केवल और केवल सत्ता प्राप्ति का ही रह गया है, और सत्ता प्राप्ति के लिए उन्हें अपनी विचारधारा से समझौता करने, गठबंधन को तोड़कर नया गठबंधन बनाने, और हॉर्स ट्रेडिंग को बढ़ावा देने में भी कोई परहेज नहीं रह गया।
निर्वाचन संसदीय प्रणाली का महत्वपूर्ण अंग है, निर्वाचन की प्रक्रिया में जनता के हर वर्ग का योगदान होना आवश्यक है, आम निर्वाचन वर्ष-1952, वर्ष-1957, वर्ष-1962 तक नेहरू के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रति जनता निरंतर अपना विश्वास प्रकट करती रही, किंतु 1967 के चुनाव में पंडित जवाहरलाल नेहरू एवं लाल बहादुर शास्त्री के निधन के उपरांत अनेक राज्यों में कांग्रेस पार्टी केवल सरकार चलाने योग्य बहुमत पा सकी।
भारत की राजनीति में जन प्रतिनिधियों द्वारा अपने दल के प्रति निष्ठा परिवर्तित करते हुए दूसरे राजनीतिक दल में लाभ के लिए दल बदल करने की शुरुआत वर्ष 1968-69 से प्रारंभ हुई, दल बदल करने का प्रमुख कारण प्रलोभन ही रहा है, और अभी भी है, प्रलोभन चाहे पद का हो या 'सामान' का।
दल बदलने वाली घटनाओं के लिए भारत की राजनीति में 'हॉर्स ट्रेडिंग' शब्द प्रचलन में आया और अब तो सामान्य रूप से एवं शब्द कोश में 'हॉर्स ट्रेडिंग' शब्द का प्रचलन दल बदल करने की घटनाओं से ही होता है.
घोड़ों को खरीदने बेचने के लिए वैसे तो हॉर्स डीलिंग शब्द का उपयोग होता रहा, किंतु घोड़ों के मूल्य को आकने और घोड़ों को बेचने में बेईमानी के अवसर अधिक रहने के कारण घोड़ों की खरीद-फरोख्त को 'हॉर्स ट्रेडिंग' कहते हैं, क्योंकि इसमें चालाकी पूर्ण, गुप्त, छल पूर्वक, लाभ उठाने के अवसर रहते हैं।
यद्यपि हॉर्स ट्रेडिंग का शाब्दिक अर्थ घोड़ों की खरीद-फरोख्त है जो बहुत सम्मानजनक तो कदापि नहीं है किंतु दल बदल करने वाले जन प्रतिनिधियों के लिए' हॉर्स ट्रेडिंग' शब्द का प्रयोग उपयुक्त ही प्रतीत होता है।
दल बदल करके व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करने, बिना जनादेश के दल बदल कर के बहुमत प्राप्त सरकार को अल्पमत में परिवर्तित कर सत्ता प्राप्त करने की 1967-68 में हुई शुरुआत को कुछ राजनीतिज्ञ जन भावना के अनुरूप इस विकृति को दूर करने का प्रयास करते रहे, फलस्वरूप विलंब से ही सही वर्ष 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व में प्रतिपक्षी दलों की सहमति से संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़कर दल बदल की विकृति को रोकने का प्रथम बार प्रभावी प्रयास हुआ।
संविधान की दसवीं अनुसूची और इसके अंतर्गत बनाए गए नियमों से “घोड़ों की खरीद-फरोख्त” में कुछ कमी अवश्य आई लेकिन फिर भी कानून में ख़ामियों को ढूंढ कर खरीद-फरोख्त का सिलसिला जारी रहा, सरकारें बनती बिगड़ती रही और स्थिति यह हुई कि विधानसभा की सदस्य संख्या के 30 से 40% सदस्य मंत्री पदों की शोभा बढ़ाने लगे छोटी विधान सभाओं में तो सत्ताधारी दल के कुछ अभागे ही विधायक, मंत्री पद प्राप्त नहीं कर पाते थे।
दल बदल कानून की ख़ामियों को दूर करने और इसे और अधिक सख्त बनाने हेतु अटल बिहारी बाजपेई के नेतृत्व में संविधान एवं संविधान की दसवीं अनु सूची को वर्ष 2003 में संशोधित किया गया, संविधान की धारा 75(1)लोकसभा के लिए तथा164(1) एक राज्य विधान सभाओं के लिए को संशोधित कर मंत्रिमंडल का आकार लोकसभा/विधानसभा की सदस्य संख्या का अधिकतम 15% तक सीमित किया गया, वही दसवीं अनुसूची को संशोधित कर विभाजन के लिए 1/3 सदस्य संख्या के स्थान पर 2/3 सदस्य संख्या निर्धारित की गई वर्ष 2003 के इस संशोधन से दल बदल की घटनाओं में कुछ विराम तो लगा, लेकिन, येन केन प्रकारेण सत्ता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए राजनीतिक दलों ने समय-समय पर दल बदल कानून का निर्वचन, कानून की मूल भावना एवं उद्देश्य को विस्मृत करते हुए करना प्रारंभ किया ।
संविधान की दसवीं अनुसूची और उसके अंतर्गत बनाए गए नियमों के प्रावधानों के अंतर्गत दल बदल कानून आकृष्ट होने संबंधी अर्जियाँ अध्यक्ष विधानसभा के समक्ष प्रस्तुत होने पर :-
1. राजनीतिक दल में विभाजन कब अर्थात किस तिथि को हुआ माना जाए ?
2.विभाजन एक बार की घटित घटना है? या कुछ समय तक चलने वाली प्रक्रिया है? जब प्रक्रिया रुकेगी, तब दल बदल के प्राप्त आवेदन पर अध्यक्ष निर्णय देंगे?
3.आवेदन के निपटारे की समय सीमा निर्धारित नहीं है।
फलत: दल बदल होने पर दल बदल कानून के अंतर्गत अध्यक्ष को प्राप्त अर्जियाँ सालों साल तक सत्ताधारी दल को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से अनिर्णय की स्थिति में लंबित रखी जाने लगी।
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने मणिपुर के एक मामले में दल बदल कानून और अध्यक्षों के अधिकार पर पुनर्विचार करने, दल बदल कानून को संशोधित करने संबंधी टिप्पणी की है, जो आज की राजनीति और राजनीतिज्ञों के लिए विचारणीय है।
विगत कुछ माह में कुछ राज्यों में तो निर्वाचित जन प्रतिनिधियों ने “जनमत/जनादेश का संहार” करने में भी परहेज नहीं किया। दल बदल कानून की गिरफ़्त में आने से बचते हुए, सत्ता प्राप्ति के लिए, सभा में बहुमत प्राप्त दल को अल्पमत में लाने का और अल्पमत को बहुमत में बदलने का एक नायाब तरीका “विधायक पद से इस्तीफ़ा” जिसका प्रयोग सत्ता प्राप्ति के लिए विगत कुछ माह में कर्नाटक, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में किया गया।

मध्य प्रदेश में आम निर्वाचन दिसंबर 2018 में जनमत के फैसले के अनुरूप भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को सबसे बड़े दल (114स्थान) और बसपा, सपा तथा निर्दलीय कुल 7 विधायकों का समर्थन प्राप्त होने के कारण माननीय राज्यपाल ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विधायक दल के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया और सात अन्य विधायकों का समर्थन प्राप्त होने पर फ्लोर टेस्ट में बहुमत सिद्ध करते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सरकार गठित हुई।
आश्चर्यजनक घटनाक्रम में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सरकार के पांच मंत्रियों सहित कुल 22 विधायक ने “जनमत/जनादेश का संहार” करते हुए विधायक पद से इस्तीफ़े दिए, फलस्वरूप पूर्व में रिक्त 2 स्थान सहित 230 सदस्यों वाली विधानसभा में 24 स्थान रिक्त हो गए और जब तक रिक्त स्थानों के लिए निर्वाचन नहीं हो जाता, ततसमय की विधानसभा की प्रभावी संख्या(206 सदस्य) के आधार पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अल्पमत में (92 सदस्य)और भारतीय जनता पार्टी (107 सदस्य) का प्रभावी संख्या के आधार पर बहुमत हो गया, इस छद्म बहुमत से भारतीय जनता पार्टी की सरकार गठित हुई।
निश्चित तौर पर यह दल बदल कानून की परिधि के बाहर का मामला है जिसमें दल बदल कानून के प्रावधान आकृष्ट नहीं होते।
प्रश्न यह है कि यह दल बदल नहीं है तो फिर क्या है? क्या भाजपा का सदन में फ्लोर टेस्ट के पश्चात प्राप्त बहुमत,जनता द्वारा दिए गए “जनमत/जनादेश” की भावना के अनुरूप है? क्या यह 'जनमत/जनादेश' की अवज्ञा नहीं है?
निर्वाचित जन प्रतिनिधि, संसदीय प्रणाली की रीढ़ हैं, निर्वाचन के पश्चात उनका आचरण एवं व्यवहार “जनमत/जनादेश” की भावना के अनुरूप होना चाहिए, तभी यह संसदीय प्रणाली पुष्पित पल्लवित और सुदृढ़ हो सकती है, सत्ता प्राप्त करने के प्रलोभन से दल बदल करने जैसी बुराई को विगत 50 वर्षों में हम पूरी तरह समाप्त भी नहीं कर पाए थे कि 'जनमत/ जनादेश' का संहार करते हुए सत्ता प्राप्ति की इस नई विधा ने दल बदल कानून को निष्प्रभावी कर दिया |
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली को अपनाए हुए, अभी लगभग 68 वर्ष हुए हैं, ऐसा प्रतीत होता है, कि इस प्रणाली के एक महत्वपूर्ण तत्व, जन प्रतिनिधि एवं राजनीतिक दलों की आस्था एवं विश्वास अभी भी संसदीय प्रणाली पर पूर्णत: स्थापित होना शेष है।
यही कारण है कि जनता द्वारा जिस राजनैतिक दल एवं उसके कार्यक्रम के प्रति विश्वास व्यक्त किया जाता है, जन प्रतिनिधि यदि उसका त्याग करता है, तो वह जनमत/जनादेश के साथ विश्वासघात ही कहलायेगा, चाहे वह वैयक्तिक हो या सामूहिक।
जन प्रतिनिधि को यह समझना होगा कि वह, जनमत/जनादेश का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रतिनिधि मात्र है, और उसका यह दायित्व है कि जनता ने जो जनमत/जनादेश दिया है, वह संविधान एवं इसके अंतर्गत निर्मित विधियों के अनुरूप अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें।
जनमत/जनादेश की अवज्ञा सत्ता प्राप्ति अथवा अपने व्यक्तिगत स्वार्थ, के लिए किया जाना संसदीय प्रणाली के लिए घातक है।
यहां इस देश के सबसे लोकप्रिय और संसदीय प्रणाली एवं परंपराओं के प्रति गहरी आस्था रखने वाले पंडित अटल बिहारी बाजपेई के वर्ष 1995 में 13 दिन की सरकार के अंतिम दिन लोकसभा में दिए गए भाषण के कुछ अंश उद्धृत कर रहा हूं :-
“मुझ पर आरोप लगाया गया है और यह आरोप मेरे हृदय में घाव कर गया है, आरोप यह है कि मुझे सत्ता का लोभ हो गया है ……...जनता दल के मित्रों के साथ, मैं सत्ता में भी रहा हूं कभी हम सत्ता के लोभ से गलत काम करने के लिए तैयार नहीं हुए………... लेकिन पार्टी तोड़कर सत्ता के लिए नया गठबंधन करके अगर सत्ता हाथ में आती है तो मैं ऐसी सत्ता को चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा”
विगत कुछ वर्षों से देश में दल बदल कानून में संशोधन/ बदलाव पर भी निरंतर विचार विमर्श चल रहा है, विधायकों द्वारा इस्तीफ़े दिए जाने के परिपेक्ष में अब केवल दल बदल कानून नहीं अपितु निर्वाचन विधि में भी संशोधन की आवश्यकता प्रतीत होती है.
दल बदल कानून/ निर्वाचन विधि मैं संशोधन के कुछ प्रारंभिक सुझाव :-
1 दल बदल कानून में यह स्पष्ट परिभाषित हो कि जो सदस्य किसी दल के चुनाव चिन्ह पर जीत कर यदि सदस्यता से त्यागपत्र देकर किसी दूसरे दल में सम्मिलित होता है, तो वह विधानसभा की उस अवधि में जिसके लिए वह निर्वाचित हुआ है किसी अन्य दल के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने के अयोग्य होगा, किंतु वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ सकेगा।
2 ऐसा सदस्य विधानसभा की उस अवधि में जिसके लिए वह निर्वाचित हुआ है, सरकार में किसी भी प्रकार के पद को ग्रहण करने के लिए अयोग्य होगा।
3 कोई भी राजनीतिक दल, दल छोड़ने वाले सदस्य को विधानसभा की उस कार्यकाल की अवधि में अपने दल की सदस्यता नहीं देंगे, तथा आगामी एक कार्यकाल तक अपने दल का प्रत्याशी नहीं बनाएँगे। इस हेतु दल द्वारा यह घोषणा पत्र भी प्रत्याशी के नामांकन के साथ संलग्न करना होगा।
4 सदस्यता से इस्तीफ़ा देने वाले सदस्य से, उसके निर्वाचन में चुनाव आयोग द्वारा होने वाले व्यय की वसूली की जाएगी, साथ ही साथ ही प्रत्याशी द्वारा जितना व्यय किया गया है उसके समतुल्य राशि भी अर्थ दंड के रूप में वसूली जावेगी ।
प्रजातांत्रिक व्यवस्था में संसदीय प्रणाली की सफलता के लिए राजनीति में नैतिकता तथा राजनीतिक दलों एवं जन प्रतिनिधियों के द्वारा जनमत /जनादेश का सम्मान मूल तत्व है।
(देवेंद्र वर्मा, पूर्व प्रमुख सचिव, छत्तीसगढ़ विधानसभा)

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