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भारत-चीन विवाद के बीच अब भूटान की क्यों हो रही है चर्चा?
भारत-चीन विवाद के बीच अब भूटान की क्यों हो रही है चर्चा?
01-Jul-2020 7:09 PM

नई दिल्ली, 1 जुलाई ।लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन की सेना के बीच हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मौत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के कूटनीतिक कामकाज को लेकर लगातार चर्चा हो रही है.

बीते कुछ दिनों के दरम्यान पड़ोसी मुल्कों के साथ भारत के रिश्तों में थोड़ी कड़वाहट देखने को मिली है. बात चाहे बांग्लादेश की हो या नेपाल की. भारत के संदर्भ में इन पड़ोसी देशों की जो प्रतिक्रियाएँ बीते दिनों आई हैं उससे कूटनीतिक रिश्ते असहज हुए हैं.

अब इन देशों में नया नाम भूटान का जुड़ा है. बीते कुछ दिनों से भूटान का नाम काफी चर्चा में है.

क्या है मामला?

हाल ही में भूटान की सीमा से सटे असम के बाक्सा ज़िले में सैकड़ों किसानों ने अपनी नाराज़गी जताते हुए भूटान के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन किया था. इन नाराज़ किसानों का आरोप था कि भूटान ने सीमा पार काला नदी से सिंचाई के लिए मिलने वाले पानी के प्रवाह को रोक दिया था.

जब भारतीय मीडिया में यह ख़बर सुर्खियों में बनी तो भूटान के विदेश मंत्रालय को सामने आकर मामले में अपना पक्ष रखना पड़ा.

भूटान के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में स्थित समड्रोप जोंगखार शहर भारत के असम की सीमा से सटा है. भूटान की इस सीमा के पास असम की तरफ दरंगा, बोगाजुली, ब्रहमपाड़ा जैसे कुल 26 गांव हैं जहां की लगभग पूरी आबादी कृषि पर निर्भर है.

डाउनस्ट्रीम की तरफ़ बसे ये गांव दरअसल काफी पिछड़े हुए हैं. यहां के लोग सालों से भूटान की तरफ़ से आने वाली काला नदी के पानी से खेती करते आ रहे हैं. लेकिन इस साल जब खेती करने के लिए पानी समय पर नहीं मिला तो किसानों ने भूटान पर काला नदी के पानी के बहाव को सिंचाई चैनलों (बड़े नाले) तक रोकने का आरोप लगाया.

गांव के लोगों का दावा है कि वे 1951 से ही काला नदी के पानी से खेती करते आ रहे हैं और इतने सालों में उन्हें कभी कोई असुविधा नहीं हुई.

अब जब उन्हें अपनी खेतों में पानी नहीं मिलने की असुविधा का सामना करना पड़ा तो किसानों की सालों पहले बनाई गई कालीपुर बोगाजुली काला नदी आंचलिक बांध कमेटी ने अपनी मांग को लेकर 22 जून को धरना दिया.

सीमावर्ती किसानों की क्या है समस्या?

पिछले आठ सालों से काला नदी आंचलिक बांध कमेटी का अध्यक्ष पद संभाल रहे महेश्वर नार्जरी ने बीबीसी से कहा, "भूटान से हमारे संबंध काफी पुराने है और इतने सालों में उनकी तरफ़ से हमें कभी कोई तकलीफ़ नहीं हुई. लेकिन हम किसान है और खेती करके अपना पेट भरते है. अगर हमें खेती करने के लिए पानी नहीं मिलेगा तो हमारी आजीविका कैसे चलेगी. हमने धरना प्रदर्शन करने से पहले इस समस्या के समाधान के लिए स्थानीय प्रशासन से आग्रह किया था. लेकिन जब किसी ने हमारी परेशानी की तरफ़ ध्यान नहीं दिया तब जाकर हम धरने पर बैठे. हमारे लोगों ने भूटान के ख़िलाफ़ कोई नारेबाज़ी नहीं की और न ही किसी अपशब्द का प्रयोग किया. असल में हमारी समस्या का हल तो भारत सरकार और असम सरकार को निकालना होगा."

क्या धरना देने के बाद अभी यहां के किसानों को भूटान से पानी मिल रहा है?

इस पर नार्जरी कहते हैं, "भूटान ने इस साल खुद अपने लोगों से सिंचाई के लिए पानी के चैनल बनाकर दिए हैं लेकिन हमें अब भी पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है. इतने सालों तक हमारे किसान खुद भूटान की सीमा में जाकर अपने हिसाब से बांध बनाकर चैनलों के ज़रिए पानी खेतों तक ला रहे थे लेकिन कोविड-19 के लिए भूटान ने अपनी सीमा में प्रवेश पर रोक लगा रखी है. दरअसल खेती के सीजन के दौरान हमें नदी से पानी लाने के लिए कई बार उस पार जाकर नाले बनाने पड़ते हैं. क्योंकि इन अस्थाई कच्चे नालों में पत्थर और मिट्टी भर जाने से पानी की धार कम हो जाती है. अब भूटान के लोग बार-बार हमारे लिए नाले की खुदाई थोड़े ही कराते रहेंगे. अगर इस समस्या का स्थाई हल नहीं निकाला गया तो यहां पांच सौ परिवार बर्बाद हो जाएंगे."

इंडिया भूटान फ्रेंडशिप एसोसिएशन के समड्रोप जोंगखार शाखा के सलाहकार सदस्य त्शेरिंग नामग्येल भी पानी रोकने को लेकर भूटान पर लगे आरोपों को ग़लत बताते हैं.

वे कहते हैं, "भारत-भूटान के संबंधों का लंबा इतिहास रहा है. आज भी सीमा के दोनों तरफ लोगों में बहुत अच्छे संपर्क हैं. सीमावर्ती गांवों में बसे असम के किसान सालों से काला नदी का पानी अपने खेतों में ले रहे है लेकिन कभी कोई विवाद नहीं हुआ. जबकि हमने खुद मज़दूरों को पैसा देकर नालों की खुदाई करवाई है. भूटान को लेकर भारत के मीडिया में जिस तरह की ख़बरें प्रकाशित हुई है, दरअसल ये पूरी तरह ग़लत सूचना है."

पानी रोकने के विवाद पर क्या बोला भूटान?

ऐसे में सीमावर्ती भारतीय किसानों के विरोध और पानी रोकने के आरोपों का जवाब देते हुए भूटान की शाही सरकार के विदेश मंत्रालय ने 26 जून को एक बयान जारी कर कहा, "24 जून 2020 से भारत में प्रकाशित कई लेखों में आरोप लगाया गया है कि भूटान ने उन जल आपूर्ति माध्यमों को अवरुद्ध कर दिया है जो असम के बाक्सा तथा उदालगुड़ी ज़िलों में भारतीय किसानों तक सिंचाई का जल पहुँचाते हैं. लेकिन ये तमाम आरोप आधारहीन और तकलीफदेह है. क्योंकि इस समय जल प्रवाह को रोकने का कोई कारण ही नहीं है."

भूटान के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट करते हुए कहा, "असम के किसान कई दशकों से भूटान के जल स्रोतों से लाभान्वित होते आ रहे हैं और कोविड-19 महामारी जैसे वर्तमान कठिन समय में भी उन्हें इसका लाभ मिल रहा हैं. कोविड-19 की महामारी के चलते भारत में लॉकडाउन और भूटान की सीमाओं को बंद करने के कारण असम के किसान सिंचाई चैनलों को बनाए रखने के लिए भूटान में प्रवेश नहीं कर पा रहे थे, जैसा कि अतीत में वे करते आ रहे थे. लिहाज़ा असम के किसानों की परेशानी का ध्यान रखते हुए जब भी असम में पानी के सुचारू प्रवाह को लेकर समस्याएँ होती हैं, तो हमारे समड्रोप जोंगखार ज़िला प्रशासन के अधिकारी और स्थानीय लोग सिंचाई चैनलों को दुरुस्त करने का काम करते रहे हैं.

भूटान ने पानी रोकने की इन ख़बरों को 'भ्रामक जानकारी' फ़ैलाने और भूटान तथा असम के मित्रवत लोगों के बीच ग़लतफ़हमी पैदा करने के लिए यह निहित स्वार्थों से किया गया सोचा-समझा प्रयास बताया है.

भारत-चीन तनाव के बीच भूटान के नाम पर क्या हो रही है राजनीति?

ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या भारत-चीन के बीच मौजूदा तनाव के माहौल में भूटान का नाम उछाल कर सत्ताधारी बीजेपी पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है?

असल में भूटान से सटा यह पूरा इलाक़ा अर्थात ये तमाम गांव बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) के अंतर्गत आते हैं. एक समय यह पूरा इलाक़ा बोडो चरमपंथी संगठनों की सक्रियता के कारण काफी अशांत रहा है. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 10 फ़रवरी, 2003 को हाग्रामा मोहिलारी की अध्यक्षता वाले विद्रोही संगठन बोडोलैंड लिबरेशन टाइगर्स (बीएलटी) के साथ एक समझौता किया. जिसके आधार पर बीटीसी का गठन हुआ.

इस समझौते के बाद से हाग्रामा मोहिलारी की पार्टी बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) लगातार काउंसिल की सत्ता संभाल रही है. बीपीएफ ने अपने 12 विधायकों के साथ असम की सत्ता संभाल रही बीजेपी को समर्थन दे रखा है. लेकिन इस साल होने वाले बीटीसी चुनाव को लेकर बोडोलैंड इलाके में बीजेपी-बीपीएफ आमने सामने हैं.

इलाक़े के दौरे पर जा रहे बीजेपी के नेता बीपीएफ के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं. वहीं बीपीएफ पर व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार करने के आरोप लग रहे है. फिलहाल बीटीसी के कार्यकाल का पांच साल पूरा हो जाने से अगले चुनाव तक यहां का प्रशासन अब राज्यपाल के अधीन है.भारत-चीन तनाव के बीच भूटान के नाम पर क्या हो रही है राजनीति?

ऐसे में सवाल उठते हैं कि क्या भारत-चीन के बीच मौजूदा तनाव के माहौल में भूटान का नाम उछाल कर सत्ताधारी बीजेपी पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है?

असल में भूटान से सटा यह पूरा इलाक़ा अर्थात ये तमाम गांव बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल (बीटीसी) के अंतर्गत आते हैं. एक समय यह पूरा इलाक़ा बोडो चरमपंथी संगठनों की सक्रियता के कारण काफी अशांत रहा है. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने 10 फ़रवरी, 2003 को हाग्रामा मोहिलारी की अध्यक्षता वाले विद्रोही संगठन बोडोलैंड लिबरेशन टाइगर्स (बीएलटी) के साथ एक समझौता किया. जिसके आधार पर बीटीसी का गठन हुआ.

इस समझौते के बाद से हाग्रामा मोहिलारी की पार्टी बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (बीपीएफ) लगातार काउंसिल की सत्ता संभाल रही है. बीपीएफ ने अपने 12 विधायकों के साथ असम की सत्ता संभाल रही बीजेपी को समर्थन दे रखा है. लेकिन इस साल होने वाले बीटीसी चुनाव को लेकर बोडोलैंड इलाके में बीजेपी-बीपीएफ आमने सामने हैं.

इलाक़े के दौरे पर जा रहे बीजेपी के नेता बीपीएफ के कामकाज पर सवाल उठा रहे हैं. वहीं बीपीएफ पर व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार करने के आरोप लग रहे है. फिलहाल बीटीसी के कार्यकाल का पांच साल पूरा हो जाने से अगले चुनाव तक यहां का प्रशासन अब राज्यपाल के अधीन है.

भारत-भूटान के सीमावर्ती लोगों के बीच लंबे समय से समन्वय बनाए रखने का काम करते आ रहे भूटान के गेलेफु टाउन के रहने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया, "इस पूरी घटना के पीछे एक राजनीतिक कहानी छिपी हुई है. इस इलाके में बीपीएफ के कई बड़े नेता इस बार बीजेपी के साथ जाने वाले हैं और वे बीपीएफ के मौजूदा उम्मीदवार के ख़िलाफ़ काम कर रहे हैं. ऐसी जानकारी मिली थी कि ये नेता पानी के प्रभाव को रोकने के लिए समड्रोप जोंगखार के कुछ अधिकारियों को प्रभावित करने की कोशिश में लगे थे और उन्हीं लोगों ने असम के किसानों को विरोध करने के लिए उकसाया. लेकिन भूटान के अधिकारी इस बात को समझ गए और किसानों की समस्या का समाधान कर दिया. भूटान हमेशा से भारत का सबसे अच्छे दोस्त रहा है. इस तरह की राजनीति से दोनों देशों के लोगों के बीच न केवल मतभेद पैदा होंगे बल्कि विश्व के समक्ष भारत-भूटान की दोस्ती पर असर पड़ेगा."

बोडोलैंड इलाक़े की एक मात्र लोकसभा सीट कोकराझाड़ से निर्दलीय सांसद नव कुमार सरनिया सीमावर्ती गांवों में सिंचाई के लिए केंद्र सरकार से आवंटित फंड में भ्रष्टाचार करने का आरोप लगाते हैं.

वे कहते हैं, "भूटान के साथ भारत का मसला चीन और नेपाल जैसा नहीं है. सीमावर्ती किसानों को पानी नहीं मिलने के इस मसले पर अगर ज़िला प्रशासन के लोग भूटान से बात कर लेते तो समस्या हल हो जाती. इन सीमावर्ती गांवों में सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं है. लोग भूटान के अंदर जाकर मिट्टी-पत्थर के अस्थाई नाले बनाकर खेतों में पानी लाते हैं. मैंने सीमावर्ती गांवों के सिंचाई, भू-कटाव, पानी का जलाशय बनाने जैसे मुद्दे कई बार संसद में उठाए हैं. बीटीसी में सिंचाई के काम के लिए जो करोड़ों रुपये आए हैं उसमें व्यापक भ्रष्टाचार हुआ है. काला नदी (भारत की तरफ) पर चार करोड़ रुपये खर्च कर बांध बनाया गया था, वह बांध भी बर्बाद हो गया. उस इलाक़े में राजनीति करने वाले कुछ लोगों ने किसानों को धरने पर उतार दिया. जबकि यह इतना बड़ा मुद्दा ही नहीं था."

भारतीय जनता पार्टी के स्थानीय नेता मानते है कि पानी रोकने के नाम पर भूटान के साथ भारत के संबंधों को मीडिया में उछालने के पीछे राजनीति हो सकती है.

असम प्रदेश बीजेपी उपाध्यक्ष विजय कुमार गुप्ता कहते हैं, "भूटान हमेशा से हमारा एक अच्छा मित्र रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले भूटान का दौरा किया था और आज उसी की बदौलत वहां कई पनबिजली प्रोजेक्ट चल रहे हैं. सीमावर्ती किसानों को पानी नहीं मिला या फिर असल समस्या क्या थी उसे समझना ज़रूरी है. कुछ लोग प्रोपगैंडा में ग़लत तरीक़ों का प्रयोग करके इस तरह की छोटी सी बात को बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं. भूटान ने इस मामले में अपनी बात कही है और वहां का शासन हमारे लोगों की मदद कर रहा है. इसके बावजूद कोई राजनीति कर रहा है तो वह अपने देश को ही नुक़सान पहुंचा रहा है. क्योंकि इससे भारत-भूटान के मज़बूत रिश्तों पर असर पड़ता है."

क्या बोली असम सरकार?

असम सरकार के मुख्य सचिव कुमार संजय कृष्णा ने भूटान के पानी रोकने की बात मीडिया में आने के बाद एक ट्वीट कर कहा, "हाल में आई मीडिया रिपोर्ट्स में ग़लत बताया गया है कि भूटान ने भारत को हो रही पानी की आपूर्ति को रोका है. भारतीय क्षेत्रों में अनौपचारिक सिंचाई चैनलों में प्राकृतिक अवरोध इसका वास्तविक कारण है. भूटान वास्तव में इस रुकावट को दूर करने में लोगों की मदद कर रहा है."

भारत-भूटान सीमावर्ती गांव में बीते 20 सालों से काम कर रहे राजू नार्जरी कहते हैं, "किसानों को पानी नहीं मिलने वाली बात स्थानीय समस्या है, इस लेकर दोनों देशों के बीच कोई विवाद नहीं है. पहले इस इलाक़े में बार्डर ही नहीं था. दोनों तरफ़ के लोग बिना रोक-टोक के आना जाना करते थे. अगर कोई परेशानी होती तो आपस में बात करके समाधान कर लेते थे. लेकिन 2003 में रॉयल भूटान आर्मी के साथ सेना ने असम के अलगाववादी विद्रोही समूहों के ख़िलाफ़ ऑपरेशन ऑल क्लियर नाम से सैन्य अभियान चलाया और उसके बाद से भूटान के प्रवेश गेट तथा इसके आसपास सीमा पर फेंसिंग लगाई गई. दोनों तरफ़ सुरक्षा बलों को तैनात किया गया. अब लोगों को अंदर जाने के लिए आई-कार्ड और पास बनाने पड़ते हैं. लिहाज़ा जो लोग खेती करते हैं उनका अब भूटान के अंदर जाना पहले की तरह आसान नहीं रहा."

भूटान में पनबिजली बांध निर्माण में भारत के निवेश से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए राजू कहते हैं, "भूटान से 56 नदियां निकली हैं और वे सारी बोडोलैंड में गिरती हैं. भूटान के लोग सही कह रहे हैं कि उन्होंने पानी को नहीं रोका. लेकिन यहां के किसानों को पहले के मुक़ाबले खेती के लिए पानी कम मिल रहा है. भारत हज़ारों मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए भूटान की नदियों पर बांध निर्माण करवा रहा है. इन बांधों में प्रवाह के लिए पानी की धार कई बार कम हो जाती है. असल में भारत सरकार को इन बांधों से नीचे की तरफ बसे किसानों को क्या नुक़सान हो सकता है उस बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. क्योंकि यह सैकड़ों किसानों की आजीविका से जुड़ा मुद्दा है."

भारत-भूटान संबंध

भूटान के साथ लंबे समय से भारत के काफी अनोखे और विशिष्ट संबंध रहे हैं. 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने पहले विदेश दौरे के रूप में भूटान को ही चुना था. प्रधानमंत्री मोदी शुरू से कहते रहे हैं कि पड़ोसी मुल्कों से मजबूत संबंध बनाए रखना उनकी प्राथमिकता होगी.

भूटान के संबंध देश की आज़ादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ज़माने से ही काफी अच्छे रहे हैं. 1958 में नेहरू ने भूटान का दौरा किया और भूटान की स्वतंत्रता के लिए भारत के समर्थन को दोहराया. फिर उन्होंने भारतीय संसद में घोषणा की कि भूटान के ख़िलाफ़ किसी भी आक्रमण को भारत के ख़िलाफ़ आक्रमण के रूप में देखा जाएगा.

लिहाज़ा भूटान उस ज़माने से भारत के साथ अपने मज़बूत रिश्तों को कायम रखे हुए है. फिर चाहे भारत में किसी भी पार्टी की सरकार रही हो.

इन दोनों देशों के बीच संबंध कितने प्रगाढ़ हैं इसका ताज़ातरीन उदाहरण 600 मेगावाट के खलोंगछु जेवी-हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट को लेकर किया गया समझौता है. सोमवार को हस्ताक्षर किए गए इस परियोजना के तहत भारतीय कंपनी भूटान में बिजली उत्पादन करेगी.(bbc)

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