संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जिन्हें जरूरत नहीं, उन्हें भी गैरजरूरी तोहफा बांटकर मुफ्तखोरी क्यों बढ़ाई जाए?
07-Aug-2020 5:30 PM 3
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : जिन्हें जरूरत नहीं, उन्हें भी गैरजरूरी तोहफा बांटकर मुफ्तखोरी क्यों बढ़ाई जाए?

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की पुलिस ने राखी के दिन लोगों को मास्क बांटने का एक रिकॉर्ड कायम किया है। और आए दिन आसानी से रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट बांट देने वाली एक संस्था, गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड्स ने सीमित 6 घंटों में सबसे अधिक 12 लाख से अधिक मास्क बांटने का रिकॉर्ड रायगढ़ पुलिस के नाम दर्ज किया है। जाहिर है कि ये मास्क ढूंढ-ढूंढकर गरीब और जरूरतमंद को तो दिए नहीं गए होंगे, 6 घंटे में 12 लाख मास्क बांटने का मकसद व्यस्त जगहों पर हर किसी को मास्क दिया गया होगा। वर्ष 2011 की जनगणना में रायगढ़ जिले की आबादी 15 लाख से कम थी। इन 10 बरसों में आबादी बढ़ी भी होगी, तो भी 12 लाख मास्क बांटने के लिए जिले के आधे से अधिक लोगों को इन्हें दिया गया होगा, और 6 घंटों में जिले की आधे से अधिक आबादी कैसे कवर हुई होगी, यह एक अलग हैरानी की बात है। लेकिन इस दावे और दर्ज रिकॉर्ड को चुनौती देना हमारा मकसद नहीं है। हम तो पुलिस के ऐसे मास्क बांटने के बारे में बात करना चाहते हैं। 

राह चलते लोगों को मास्क देकर पुलिस ने उन पर एक उपकार तो किया है, यह एक अलग बात है कि पुलिस ने यह इंतजाम अपने या दूसरों के पैसों से कैसे किया होगा, और क्यों किया होगा? इन दिनों जब पुलिस की साख को चौपट करने के लिए हिंसा के एक-दो वीडियो ही देश भर में काफी होते हैं, तो छत्तीसगढ़ में पुलिस कई तरह के अच्छे काम करके अपनी छवि को बेहतर भी बनाने की कोशिश करती है, और हो सकता है कि सचमुच ही जनसेवा की उसकी नीयत हो। लोगों को याद होगा कि कई महीने पहले राजधानी रायपुर की पुलिस ने इसी तरह 15 हजार लोगों को हेलमेट बांटे थे, और उसमें खासे संपन्न लोग भी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के हाथों हेलमेट लेकर मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवा रहे थे। वे हेलमेट भी जनता के बीच कारोबारी संगठनों से जुटाए गए थे जिन्होंने पुलिस के कहे एक समाजसेवा करने की नीयत से, या मजबूरी से वे हेलमेट दिए थे। 

हमारे पाठकों को याद होगा कि उस वक्त भी हमने इस बात को लेकर लिखा था कि जो लोग लाख-पचास हजार रूपए की मोटरसाइकिल पर चलते हैं लेकिन हजार रूपए से कम में मिलने वाले हेलमेट खरीदकर अपनी जान बचाने, और जुर्माने का खर्च बचाने की जिन्हें न परवाह है, न जिम्मेदारी की नीयत है, उन पर पुलिस समाज का पैसा क्यों खर्च करे? अगर पुलिस के पास इतनी ही अतिरिक्त क्षमता है, तो सोच-समझकर गैरजिम्मेदारी दिखाने वाले, और नियम तोडऩे वाले लोगों का चालान करना चाहिए, और सरकारी खजाने में जमा होने वाले उस पैसे का ट्रैफिक सुधार में या दूसरे नियमों के पालन में कोई इस्तेमाल करना चाहिए। जब सक्षम और संपन्न लोग अपनी गैरजिम्मेदारी और लापरवाही के एवज में पुलिस से तोहफा पाने लगें, तो यह तारीफ की नहीं फिक्र की बात है, कि सरकार की कोई एजेंसी ऐसा क्यों कर रही है? रायगढ़ की पुलिस ने हर आते-जाते को मास्क बांटे होंगे तभी 12 लाख से अधिक मास्क 6 घंटों में बांटे जा सके। क्या सचमुच ही इन तमाम लोगों को मास्क खरीदने की ताकत नहीं थी? और मास्क तो कोई खरीदकर भी बांधना जरूरी नहीं रहता, कोई गमछा भी बांधा जा सकता है, या गरीब लोग घर के किसी पुराने कपड़े के टुकड़े को भी बांधकर काम चला रहे हैं। 

पुलिस में ऐसे कामों के लिए, लौटते हुए मजदूरों में खाना बांटने के लिए उत्साह बहुत अधिक रहता है। पुलिस के अफसरों के कहे हुए लोग ऐसी मदद देने के लिए तैयार हो जाते हैं, और पुलिस के इलाके में लोगों को धंधा करना है, तो वे उसकी किसी बात पर आमतौर पर मना भी नहीं करते। लेकिन अपने इस दबदबे का ऐसा अंधाधुंध बेजा इस्तेमाल ठीक नहीं है। समाज में मुफ्तखोरी की आदत इतनी नहीं बढ़ जानी चाहिए कि कार-स्कूटर वाले लोग भी, काफी कमाने वाले लोग भी मुफ्त बंटते हुए सामान को लेने के लिए खड़े हो जाएं। 

हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों में मंदिरों और दूसरे धर्मस्थलों के आसपास कई दानदाता रोज मुफ्त में खाना बांटने के लिए खड़े हो जाते हैं, और राह चलते गैरगरीब भी कतार में लग जाते हैं कि मुफ्त में मिल रहा है। इस सिलसिले के खिलाफ भी हम कई बार लिख चुके हैं कि दान के नाम पर, ईश्वर के नाम पर, प्रसाद या मदद के नाम पर हर किसी को मुफ्त खिलाना गलत सिलसिला है। यह इसलिए भी है कि दानदाताओं के पास असली जरूरतमंदों की शिनाख्त करने, वहां तक पहुंचने का कोई आसान जरिया नहीं है। इसलिए कई बार सचमुच ही लोगों की सेवा करने की हसरत वाले, और कई बार अपने किसी अपराध या पाप के बोझ से मुक्ति पाने के लिए लोग ऐसे भंडारे खोल लेते हैं, खाना बांटने लगते हैं। गैरजरूरतमंदों की ऐसी मदद उन्हें और नालायक, और निकम्मा बनाने के अलावा कुछ नहीं करती, और ऐसा खर्च करने वाले लोगों को मन में यह झूठी राहत मिलती है कि उन्होंने पुण्य का कोई काम किया है। ऐसे दानदाताओं की नजरों से दूर सचमुच के भूखे लोग भूखे रह जाते हैं, और शहर के आते-जाते लोग मोटरसाइकिलें रोक-रोककर खाने की कतार में लग जाते हैं। 

लॉकडाऊन और कोरोना जैसे खतरों के चलते हुए समाज में कई किस्म की मदद की जरूरत भी है। लेकिन यह मदद मुफ्तखोरी को बढ़ाने वाली नहीं होनी चाहिए। आधी आबादी को मास्क बांटने का मतलब यही है कि बहुत से लोग खरीदने की ताकत रखने के बावजूद या तो मास्क लगा नहीं रहे थे, या मुफ्त में मिल रहा है तो लेकर चले गए थे। न पुलिस न किसी दूसरे विभाग को ऐसे काम में पडऩा चाहिए। जो सबसे ही गरीब लोग हैं उन्होंने भी अब तक मास्क या चेहरा बांधने का कपड़़ा न होने की कोई शिकायत नहीं की है। पुलिस अगर दानदाता जुटाकर उनसे कोई काम करवा सकती है, तो वह सार्वजनिक हित के होने चाहिए, निजी गैरजरूरी मदद वाले नहीं। 

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