विचार / लेख

सौर ऊर्जा से रोशन होते आदिवासी गांव

रेम्हला पारा भुरकुडवा की मुटो बाई सोलर किट मरम्मत करते हुए

सौर ऊर्जा से रोशन होते आदिवासी गांव
08-Aug-2020 1:07 PM

-बाबा मायाराम

‘मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं और न ही कभी छत्तीसगढ़ से बाहर गई हूं, लेकिन जब पहली बार राजस्थान गई और वहां सोलर इंजीनियर का प्रशिक्षण लिया, सौर बल्बों व बैटरी को सुधारना सीखा, तो मुझमें हिम्मत आई, आत्मविश्वास बढ़ा, और एक नई पहचान मिली।’ यह सरगुजा के मैनपाट की लोटाभावना गांव की पुष्पा लकड़ा थीं।

सरगुजा जिले में वे अकेली बेयरफुट सोलर इंजीनियर नहीं हैं, बल्कि यहां 8 महिलाओं ने इसका प्रशिक्षण प्राप्त किया है। पुष्पा लकड़ा की तरह पसेना गांव (लुंड्रा विकासखंड) की इंजूरिया, करदना गांव की झूंझापारा (बतौली विकासखंड) की अर्चना, टिरंग गांव (बतौली विकासखंड) की मुनेश्वरी आदि ने प्रशिक्षण लिया है।

सौर ऊर्जा से जलने वाले बल्ब उन गांवों में लगाए गए हैं, जहां अब तक बिजली नहीं पहुंची है, या उसकी उपलब्धता कम है। यह पहाड़ और जंगल के इलाके हैं जो दुर्गम हैं। पुष्पा लकड़ा कहती हैं कि जब उन्होंने अपने गांव में सौर ऊर्जा के बल्ब लगाए थे, तब वहां बिजली नहीं आई थी। बाद में पहुंची है,पर लोग सौर ऊर्जा के बल्बों को अब भी पसंद करते है, क्योंकि इसमें कोई बिल नहीं लगता है।

पुष्पा लकड़ा का गांव मैनपाट के इलाके में है, जो एक पर्यटन स्थल भी है। इसे छत्तीसगढ़ का शिमला कहा जाता है। प्राकृतिक रूप से बहुत ही खूबसूरत इलाका है। यहां के जलप्रपात, झरने, नदियां, पहाड़ और जंगल मोहते हैं, आकर्षित करते हैं, पर लोगों का जीवन कठिन है।

राजस्थान में अजमेर जिले के तिलोनिया गांव में बेयरफुट कालेज है। इसे विख्यात सामाजिक कार्यकर्ता बंकर राय व उनकी संस्था ने शुरू किया है। यहां पर उन गांववासियों को सीखने व प्रशिक्षण प्राप्त करने का मौका दिया जाता है, जो गांव की समस्याओं के समाधान में जुडऩा चाहते हैं। इसमें भी महिलाओं को विशेष तौर पर इससे जोड़ा जाता है।

बेयरफुट का हिन्दी में अर्थ नंगे पांव है, पर यहां उसका विशेष संदर्भ है। इस प्रशिक्षण केन्द्र का अर्थ है कि ऐसे व्यक्तियों को प्रशिक्षण देना जिन्हें गांव की, परिवेश की, जरूरतों की समझ व जानकारी हो और उनके समाधान में कोई व्यक्ति जुडऩा चाहता हो। चाहे वह डिग्रीधारी व डिप्लोमा प्राप्त भले ही न हो। ऐसे प्रशिक्षणकर्ताओं को बेयरफुट कहा गया है। इस कालेज में आपको बेयरफुट डाक्टर, टीचर, इंजीनियर, आर्किटेक्ट, मैकेनिक मिलेंगे।

सरगुजा जिले में आदिवासियों के अधिकारों पर काम करने वाली चौपाल संस्था (चौपाल ग्रामीण विकास प्रशिक्षण एवं शोध संस्थान) है। संस्था के प्रमुख गंगाराम पैकरा बताते हैं कि जब राजस्थान स्थित बेयरफुट कालेज से जब हमें सौर ऊर्जा का काम करने का प्रस्ताव मिला तब शुरू में कोई भी महिला वहां प्रशिक्षण के लिए जाने को तैयार नहीं थी। एक तो इसमें 6 महीने का लम्बा समय लगता है, दूसरा गांव की महिलाएं इससे पहले कभी बाहर नहीं गई थीं। फिर भी हमने उन्हें समझाया कि यह गांव के हित में है, तब वे वहां गईं और प्रशिक्षण प्राप्त किया।

इस इलाके में पहाड़ी कोरवा, पंडो और उरांव आदिवासी हैं। पहाड़ी कोरवा उन आदिम जनजाति में से एक है जिनका जीवन पहाड़ों व जंगलों पर निर्भर है। पहाड़ी कोरवा, भारत सरकार द्वारा घोषित विशेष पिछड़ी जनजाति समूह श्रेणी के हैं। इन इलाकों में बुनियादी सुविधाएं अब तक नहीं पहुंची हैं। जो महिलाएं, सोलर इंजीनियर का प्रशिक्षण प्राप्त करने राजस्थान गईं थीं, वे इन्हीं आदिवासियों में से थीं।

गंगाराम पैकरा बताते हैं कि पहली बार वर्ष 2015-16 में हमने 4 महिलाएं प्रशिक्षण लेने के लिए भेजीं। दूसरी बार फिर 4 महिलाएं गईं। इस प्रकार, 8 महिलाओं ने 6 महीने प्रशिक्षण प्राप्त किया। वहां से सौर बल्ब लगाने का सामान आया, बैटरी, सोलर पैनल और बल्ब आए, और गांव सौर बल्बों की रोशनी से रोशन हुए। करीब 10 गांव मोहल्लों में 500 बल्ब लगाए गए हैं। इससे लोग मोबाइल चार्ज भी करते हैं। अगर कोई बल्ब नहीं जलता है तो सोलर इंजीनियर महिला सुधार देती है। इसके लिए मरम्मत के लिए तीन कारखाने भी हैं जहां बल्ब, बैटरी, सोलर लालटेन सुधारी जाती हैं। सोलर इंजीनियर घर-घर जाकर देखती हैं कि कोई बल्ब खराब तो नहीं है, कई बार छत पर चढक़र देखती हैं।

सोलर इंजीनियर को हर माह 1000 रूपए की राशि दी जाती है। यह राशि गांव से ही एकत्र की जाती है। प्रत्येक घर से माहवार 50 रूपया लिया जाता है। गांव में ही ग्रामीण ऊर्जा एवं पर्यावरण समिति है, जिसका सचिव सोलर इंजीनियर को बनाया गया है। इस समिति का बैंक में खाता है, जो राशि गांव से एकत्र की जाती है, वह बैंक में जमा होती है। और उसी से सोलर इंजीनियर को मानदेय राशि दी जाती है। लेकिन गांव में लोगों की माली हालत ऐसी नहीं है कि वे 50 रूपए भी दे सकें, इसलिए कई बार यह राशि भी एकत्र नहीं हो पाती। लेकिन संस्था का प्रयास है कि यह काम नियमित रूप से चलता रहे।

चौपाल संस्था के 4 डिजीटल नाइट स्कूल भी हैं। हालांकि यह स्कूल रात में नहीं, दिन में चलते हैं, क्योंकि जंगल पहाड़ में बच्चों के लिए रात में स्कूल में आना मुश्किल है। इनमें से दो स्कूल लखनपुर विकासखंड में हैं और दो बतौली विकासखंड में। मैंने फरवरी माह में खिरखीरी गांव का डिजीटल नाइट का स्कूल देखा था। वहां के शिक्षक सुलेमान बड़ा से मिला था। यहां सौलर पैनल से संचालित प्रोजेक्टर से टेबलेट के माध्यम से बच्चों की पढ़ाई की जा रही थी। यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ था। यहां जो शिक्षक हैं, वे कम से कम 12 वीं तक पढ़े लिखे हैं, और स्थानीय हैं।

कुल मिलाकर, इस पूरे काम के अच्छे परिणाम आए हैं। स्कूली बच्चे सौलर बल्ब की रोशनी में पढ़ रहे हैं, खाना पकाया जा रहा है, महिलाएं अतिरिक्त आमदनी के लिए खाली समय में चटाई, रस्सी व झाडू बना रही हैं, रात में धान कुटाई व घरेलू काम करती हैं, पुरूष रात में खाट बुनाई का काम करते हैं। जंगल में अंधेरी रात में आना जाना भी मुश्किल है, सोलर बल्ब की रोशनी में अब इसमें आसानी हो गई है। सांप- बिच्छू के काटने से भी लोग बचते हैं। जंगली जानवरों के आक्रमण से भी बचाव कर पाते हैं। मोबाइल चार्ज भी कर पाते हैं।

इसके अलावा, ग्रामीण प्रतिभाओं को समस्याओं के समाधान में जुडऩे का मौका मिला है। उनके परिवेश व जरूरतों के अनुसार उभरने, खिलने व कार्य करने का अवसर मिला है। गांव समुदायों में आत्मनिर्भरता व आत्मविश्वास को बढ़ावा मिलता है। चूंकि सभी सोलर इंजीनियर आदिवासी महिलाएं हैं, इसलिए यह महिला सशक्तीकरण का भी अच्छा उदाहरण है। जो महिलाएं कभी घर से बाहर निकली थीं, वे गांव गांव जाकर सोलर बल्ब की मरम्मत कर रही हैं। जलवायु बदलाव के दौर में अक्षय ऊर्जा का महत्व बढ़ गया है, जब तेल, गैस व कोयला जैसे संसाधनों में कमी देखी जा रही है। विशेषकर छोटे पैमाने पर यह बहुत उपयोगी है। यह सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय पहल है। (vikalpsangam)
(विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख)

 

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