विचार / लेख

आदिवासी विकास का सपना कब साकार होगा?
आदिवासी विकास का सपना कब साकार होगा?
08-Aug-2020 8:43 PM

डॉ. संजय शुक्ला

09 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस

हर साल 09 अगस्त को देश और दुनिया में ‘विश्व आदिवासी दिवस’ मानाया जाता है। ज्ञातव्य है कि संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर 9 अगस्त 1982 को पहला आदिवासी सम्मेलन आयोजित हुआ था। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि समूची दुनिया के प्रकृति और पर्यावरण का असली संरक्षक सदियों से आदिवासी समाज ही रहा है। देश-दुनिया में प्रकृति के इन पूजकों को मूल निवासी की संज्ञा दी गयी है। पाषाण सभ्यता से लेकर आधुनिक सभ्यता ने भले ही आधुनिक विकास की अनेक करवटें ली हो लेकिन आदिवासी समाज अभी भी दुर्गम वनांचलों में आधुनिक विकास की पहुंॅच से दूर अपनी पुरातन संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा हुआ है।

यह समाज अपने न्यूनतम जरूरतों और सीमिति आकांक्षाओं के चलते अभी भी बीहड़ जंगलों और गुफा-कंदराओं में जीवन-बसर कर रहा है। भारत की एक चौथाई आबादी तथा छत्तीसगढ़ की 32 फीसदी आबादी आदिवासी जनजातियों का है। भारतीय पौराणिक ग्रंथों में आदिवासियों को ‘‘अत्विका’’ या वनवासी कहा गया है, महात्मा गांधी इस समुदाय को गिरिजन यानि पहाड़ों में रहने वाले संबोधित किया करते थे। भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए ‘अनुसूचित जनजाति’’ शब्द निश्चित किया गया है। आमतौर पर देष में संथाल, गोंड़, मुंडा, भील, बोड़ो, खांॅसी, उरांव, सहरिया, मीणा, गरासिया, बिरहोर सहित अनेक जनजाति समूह हैं। छत्तीसगढ़ में 42 जनजाति समूह हैं जिसमें गोंड, बैगा, मुरिया, हल्बा, कोरवा, पंडो, उरांव, कंवर, माडिय़ा, मुडिय़ा, बिंझवार, धनवार, नगेशिया, मंझवार, भुंजिया, महरा, महार, माहरा, पारधी सहित अनेक जनजातियांॅ शामिल हैं। छत्तीसगढ़ में पंडो जनजाति जो विलुप्त होने के कगार पर है को राष्ट्रपति का दत्तक पुत्र घोषित किया गया है।

बहरहाल संविधान लागू होने के बाद देश के विभिन्न जनजातीय समुदायों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए आरक्षण व्यवस्था सहित अनेक कल्याणकारी योजनाएं व कार्यक्रम लागू किया गया। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंॅचाना हर सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है ताकि देश के सभी समाज को समानता का मौलिक अधिकार मिल सके। विचारणीय तथ्य यह कि सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की भरमार के बावजूद आदिवासी समाज आज भी बदहाली से मुक्त नहीं हो पाया है बल्कि इन योजनाओं व कार्यक्रमों के जरिए आदिवासी समाज की बदहाली दूर करने की जवाबदेही जिन हाथों में थी वे साल दर साल मालामाल होते चले जा रहे हैं, इसमें राजनेता, अफसर, ठेकेदार और उद्योगपतियों का नापाक गठबंधन शामिल हैं।

दरअसल आदिवासियों के पिछड़ेपन के लिए मुख्यतौर पर भौगोलिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। अधिकांश आदिवासी समुदाय पहुंॅचविहीन दुर्गम वनांचलों में निवास करती है जहांॅ अधोभूत संरचनागत विकास और संचार माध्यमों की पहुंॅच नहीं है। अधोभूत संरचनागत विकास में सबसे ज्यादा बाधक नक्सलवादी और चरमपंथी गुट बने हुए हैं। इस पिछड़ेपन का परिणाम आदिवासियों की अशिक्षा, गरीबी, बीमारी, कुपोषण के रूप में सामने है, दूसरी ओर आदिवासियों में पीढ़ी दर पीढ़ी जारी अंधविश्वास और मद्यपान की कुरीति जनजातियों के सामाजिक विकास में बाधक हैं। आदिवासी समाज आज के राजनीतिक परिवेश में बहुत बड़ी राजनीतिक ताकत है लेकिन राजनीतिक जनचेतना के अभाव के चलते यह समाज अभी भी राजनीतिक रूप से हाशिए पर हैं। हालांॅकि आदिवासियों की नयी युवा पीढ़ी जो सोशल मीडिया के ताकत से लबरेज हैं वे अब अपने अधिकारों और वजूद के लिए संगठित और मुखर होने लगे हैं। लेकिन इन युवा संगठनों से यह अपेक्षा है कि वे लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत अपने समुदाय के शोषण और अंधविश्वास तथा कुरूतियों के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपने समाज के सर्वांगीण विकास के लिए एकजूट हों।

सामाजिक विकास के संघर्ष के इस दौर में उन्हें यह भी सावधानी बरतनी होगी कि उनकी किशोर और युवा पीढ़ी नक्सलवाद या चरमपंथी संगठनों के षडय़ंत्र का शिकार न हो। यह ध्रुव सत्य है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर समस्या का हल केवल और केवल ‘‘बैलेट’’ है न कि ‘‘बुलेट’’। आदिवासियों के विकास में आदिवासी नेतृत्व की एकमात्र अहम भूमिका है, इस लिहाज से इस नेतृत्व से भी यह अपेक्षा है कि वे राजनीतिक मतभेदों को परे रखकर आदिवासी विकास योजनाओं के धरातली क्रियान्वयन के प्रति पूर्ण प्रतिबद्धता और जागरूकता प्रदर्शित करें ताकि अरबों-खरबों के कल्याण योजनाओं की पहुंॅच उनके समाज के अंतिम आदिवासी परिवार को मिल सके। आदिवासी नेतृत्व से यह भी अपेक्षा है कि वह अपनी नयी पीढ़ी को राजनीतिक अवसर दिलाने और उन्हें राजनीतिक रूप से सक्षम बनाने में अपना अहम योगदान दें। यह अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अब आदिवासी नेतृत्व भी वंशवाद और परिवारवाद की मोहपाश में बंधने लगा है।

गौरतलब है कि आदिवासियों की लोककला, काष्ठ कला और शिल्पकला की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी धमक है। महानगरों और नगरों के अभिजात्य तबकों के ड्राईंग रूम से लेकर पांच सितारा होटलों की शोभा बढ़ाने वाले इन आदिवासी कलाकृतियों के असल शिल्पकार आर्थिक शोषण का शिकार हो रहे हैं

जबकि इन कलाकृतियों को बेचने वाले बिचौलिए और बड़े व्यापारी मालामाल हो रहे हैं। विचारणीय है कि आदिवासी समाज आज भी नमक और चावल जैसी बुनियादी जिंसों के लिए शोषण का शिकार हो रहा है। आलम यह है कि आदिवासियों को 50 पैसे किलो मिलने वाले नमक के बदले उतना ही इमली बेचना पड़ता है। इन वनांचलों में पैदा होने वाले वनोपजों को बिचौलिये और व्यापारी आदिवासियों से औने-पौने भाव खरीदकर ऊंॅचे दामों में शहरों में बेच रहे हैं। आर्थिक विकास का यह एकांगीपन बेहद दुखदायी है।

 जनजातीय समुदाय केवल आर्थिक रूप से ही शोषण का शिकार नहीं है बल्कि उसके सदियों पुराने ‘‘घोटूल’’ जैसे सांस्कृतिक परंपरा पर भी आधुनिक सभ्यता हमला करने लगी है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया इस परंपरा के बारे में अनेक आपत्तिजनक कथांकन प्रस्तुत कर रही है। निष्चय ही यह इस समाज के लिए दुखदायी है। बहरहाल आदिवासी क्षेत्रों में जारी धर्मांतरण आदिवासी संस्कृति और परंपराओं के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। नि:संदेह किसी समाज के आर्थिक विकास में शिक्षा और रोजगार की महत्वपूर्ण भूमिका होती है लेकिन विडंबना है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के सहारे कई गैर आदिवासी वर्ग शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आदिवासियों का लगातार हक छिनते चले जा रहे हैं।

गौरतलब है कि भारत के संविधान में जनजाति समुदाय के नैसर्गिक अधिकारों के संरक्षण और उनके विकास के लिए अनेक कानून मौजूद हैं लेकिन ये महज संविधान किताबों में ही कैद है। पांचवीं और छठवीं अनुसूची तथा पेसा कानून ऐसे संवैधानिक व्यवस्था है जो आदिवासियों को संपूर्ण स्वायतता और अपने विकास के लिए खूद योजनाएं बनाने के लिए प्रावधान निश्चित करती है। पेसा कानून के तहत आदिवासी इलाकों के त्रि-स्तरीय पंचायतों को आदिवासी क्षेत्रों के विकास के लिए ग्राम सभाओं के द्वारा संपूर्ण अधिकार मुहैया कराने से जुड़ा कानून है लेकिन छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों में फर्जी ग्राम सभाओं के द्वारा आदिवासियों को उनके जमीन से बेदखल करने के दर्जनों उदाहरण मौजूद हैं। छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों में पेशा कानून आंशिक रूप से लागू है फलस्वरूप आदिवासी इस कानून के अधिकार से वंचित है। पांॅचवीं अनुसूची के तहत आदिवासी संस्कृति, भाषा, जीवनशैली और अधिकारों को राज्यपाल के निगरानी में संवैधानिक संरक्षण प्रदान करने का प्रावधान है। छठवीं अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित जिलों को पूर्ण स्वायतता देने के प्रावधान है जिसमें संपूर्ण प्रशासन स्थानीय निवासियों के हाथों सौंपने की व्यवस्था है। इस कानून के पृष्ठभूमि में उद्देश्य यह है कि आदिवासी इलाकों में बाहरी लोगों की घुसपैठ रूक सके ताकि आदिवासी अपनी विशिष्ट जीवनशैली और परंपराओं को संरक्षण करते हुए अपने क्षेत्र का विकास कर सके, लेकिन संविधान प्रदत्त इन व्यवस्थाओं को अब तक पूरी तरह से लागू नहीं किया जा सका है।

बहरहाल आदिवासी समुदाय इन कानूनों को पूरी तरह लागू करने के लिए लगातार आवाज उठा रहे हैं लेकिन सत्ता के नक्कारखाने तक यह आवाज नहीं पहुंॅच पा रही है फलस्वरूप आदिवासी क्षेत्रों में ‘‘पत्थलगढ़ी’’ जैसी घटनाएं भी घटित हो रहे हैं। आदिवासी विकास और अधिकार के परिप्रेक्ष्य में विरोधाभाष यह भी है कि जब भी कोई आदिवासी व्यक्ति या समुदाय अथवा मानवाधिकार संगठन आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों की बात करता है तो प्रशासनिक व्यवस्था उसे एक सिरे से माओवाद करार दे देती है। आलम यह है कि आदिवासी माओवादी और सुरक्षाबलों के दो पाटों के बीच लगातार पिस रहा है। रेड कॉरीडोर के बरास्ते कश्मीर से नेपाल, बिहार, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, प.बंगाल, उड़ीसा और आंध्रप्रदेश तक अपनी सल्तनत कायम करने की सपने संजोए कथित माओवादियों की बरबरता का शिकार आदिवासी वर्ग दशकों से होते आ रहा है। ये माओवादी आदिवासियों को अपने कथित जनअदालत में पुलिसिया मुखबीर बताकर कत्लेआम कर रहे हैं तो दूसरी ओर सुरक्षाबल इन मूक आदिवासियों को माओवादी समर्थक, संघम सदस्य या जनमिलिशिया सदस्य करार कर उनका फर्जी मुठभेड़ कर रहे हैं या जेल की सींखचों के पीछे ढकेल रहे हैं। बहरहाल ‘‘विश्व आदिवासी दिवस’’ की सार्थकता तभी है जब आदिवासियों के विकास के लिए ऐसी योजनाएं तैयार किया जावे जो उन्हें उनके पुरातन संस्कृति-परंपराओं और जल, जंगल, जमीन से जोड़े रखे।

(लेखक शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, रायपुर में सहायक प्राध्यापक हैं)

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