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अविभाजित एमपी के अकेले आदिवासी सीएम की कहानी : जब वे टैक्सी में बैठकर शपथ लेने राजभवन पंहुचे थे
अविभाजित एमपी के अकेले आदिवासी सीएम की कहानी : जब वे टैक्सी में बैठकर शपथ लेने राजभवन पंहुचे थे
09-Aug-2020 7:43 PM

-डॉ. परिवेश मिश्रा
भोपाल के बड़े तालाब के किनारे की पहाड़ी का नाम है शामला हिल। यहां एक पुराना बंगला है। नवाब साहब के जमाने में इसमें एक अंग्रेज अधिकारी रहते थे सो बंगला कुक साहब के बंगले के नाम से जाना गया। 1956 के अंत में मध्यप्रदेश की राजधानी नागपुर से उठकर भोपाल पंहुची और इस बंगले का पता बना - 6 शामला हिल। यहाँ रहते थे मंत्री (सारंगढ़ के) राजा नरेशचन्द्र सिंहजी।

5 सितम्बर 1967 के दिन राजा साहब ने अपने परिवार और नौकर चाकरों के साथ इस आवास के साथ साथ भोपाल छोड़ दिया। दो दिन पहले नये नियुक्त मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह राजा साहब से सौजन्य भेंट करने आए थे। ये राजा साहब की वरिष्ठता का सम्मान था। वे 1949 के अंत में विधानसभा में मनोनीत हुए और 1952 के पहले आमचुनाव से लगातार विधायक चुने गये थे। 1950 से वे लगातार मंत्रिमंडल के सदस्य रहे थे।

राजा साहब ने अपनी यात्रा कार्यक्रम की जानकारी दी और बंगले की प्रशंसा करते हुए गोविन्द नारायण सिंहजी को यहीं अपना आवास बनाने की सलाह दी। उन्होंने सलाह मानी और सितम्बर 1967 के बाद से यह बंगला मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के आवास के रूप में जाना जाता है।

राजा साहब को सरकारी गाड़ी ने स्टेशन पंहुचाया। किसी सरकारी गाड़ी में यह उनकी अंतिम यात्रा थी। एक महिने पहले तक वे कांग्रेस मंत्रीमंडल के सदस्य थे। द्वारका प्रसाद मिश्र मुख्यमंत्री थे। जुलाई के अंत में गोविन्द नारायण सिंह के साथ कांग्रेस के 32 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी और जनसंघ तथा अन्य के साथ मिलकर सरकार बना ली थी। लेकिन यह कथा कभी और।

राजा साहब अब मात्र विधायक रह गये थे। 15 दिनों के बाद विधानसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए भोपाल वापस आना पड़ा। रहने के लिए सर्किट हाउस में आरक्षण हो गया था। समस्या थी वाहन की।

नरेशचन्द्र सिंहजी ने एक राजा के रूप में हस्ताक्षर कर जब अपने राज्य का विलय भारतीय गणराज्य में किया तब उनके पास सारंगढ़ में रहने के लिए विरासत में मिला एक महल था और जीवन यापन के लिये कृषि भूमि। ट्रक और बस (तब बसों को लॉरी कहा जाता था) से लेकर रोल्स रॉयस कार तक सभी प्रकार के चालीस वाहन थे।

लेकिन इस निस्पृह, अनासक्त, तपस्वी राजा को धन-सम्पत्ति संग्रहण से कभी मोह नहीं हुआ। विलय के बाद सारंगढ़ के एक पुराने व्यवसायी ने रायपुर बसने का निर्णय लिया। जाते समय राजा साहब के सामने अंतिम इच्छा के रूप में एक मांग व्यक्त की। राजा साहब ने इच्छा पूरी कर दी। सारे चालीस वाहनों के साथ वर्कशाप के सारे सामान दान के रूप में रायपुर पंहुच गये। उस दिन के बाद से आजीवन राजा साहब के पास कभी किसी प्रकार का निजी वाहन नहीं रहा। न ही उनकी बेटियों के पास। (इनमें से एक बेटी पंद्रह वर्ष मध्यप्रदेश में मंत्री रहीं। दो अन्य बेटियां क्रमश: पांच और पंद्रह वर्षों तक लोकसभा की सदस्य रहीं।)

स्वयं की आवश्यकताएं सीमित थीं। जितने भी दिन मंत्री के रूप में नागपुर और भोपाल में रहे, अनाज सारंगढ़ से जाता रहा। मंत्री के रूप में उन्होंने राज्य में बहुत दौरे किये। किन्तु इसे अपनी ड्यूटी का हिस्सा मानते हुए सरकार से कभी यात्रा भत्ता नहीं लिया।

राजा साहब को वाहन की कमी कभी महसूस नहीं हुई। मंत्री के रूप में शासकीय वाहन उपलब्ध था। बच्चे हॉस्टल में थे। काम चल जाता था।

यह स्थिति अब बदल गई थी। भोपाल में पहली बार कार नहीं थी। स्टाफ के लोगों को जानकारी थी कि शामला हिल के पुराने आवास के पास सरदार हुसैन रहते थे और यह कि वे टैक्सी चलाते हैं। बस, फिर क्या था। सरदार हुसैन को टैक्सी ले कर स्टेशन बुला लिया गया।

उस दिन के बाद जब भी राजा साहब भोपाल में होते, रोज सुबह से शाम तक सरदार हुसैन अपनी टैक्सी ले कर हाजिर हो जाते। उन्हें भाड़े के रूप में अस्सी रुपये दिए जाते। बीस रुपये अलग से पेट्रोल के लिए।

देखते देखते 13 मार्च 1969 का दिन आ गया (कैसे आया यह अलग कहानी की विषय वस्तु है)। राजा नरेशचन्द्र सिंहजी को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए राज्यपाल का निमंत्रण मिला। कार्यक्रम के बारे में जानकारी ले और दे रहे ए.डी.सी. की स्थिति बड़ी विकट हो गयी जब उन्हें बताया गया कि राजा साहब टैक्सी में पंहुचेंगे। राज भवन के अपने नियम कानून थे। उनके अनुसार राज भवन के अन्दर किसी टैक्सी का प्रवेश प्रतिबंधित था। उसने आग्रह किया कि राजा साहब किसी और के वाहन में आ जाएं। राजा साहब का तर्क था कि जब मेरे पास कोई वाहन नहीं था, यह टैक्सी सदैव मेरे साथ रही। आज मैं कैसे इसे छोड़ दूँ।

बात अंतत: राज्यपाल के.सी. रेड्डी तक पंहुची। उनसे विशेष अनुमति मिलने के बाद राजभवन के कर्मचारियों को चैन मिला। राजा साहब पंहुचे और उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप मे अपने पद और गोपनीयता की शपथ ली।

और इस तरह अविभाजित मध्यप्रदेश के इतिहास में राजा नरेशचन्द्र सिंह जी मुख्यमंत्री की शपथ लेने वाले प्रथम आदिवासी नेता के रूप में दर्ज हुए।

नोट : स्व. राजा नरेशचन्द्र सिंहजी मेरी पत्नी डॉ. मेनका देवी जी के पिता थे।

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