संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : इस देश में लोगों की निजता का सम्मान फूटी कौड़ी नहीं
12-Aug-2020 2:57 PM 8
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : इस देश में लोगों की निजता का सम्मान फूटी कौड़ी नहीं

जो लोग सुशांत राजपूत की खबरों को, अफवाहों को पढ़-पढक़र थके हुए हैं, वे न घबराएं इसलिए यह खुलासा कर देना जरूरी है कि आज यहां लिखा जा रहा कि यह सुशांत राजपूत के बारे में नहीं है, यह निजता के बारे में है, प्रायवेसी के बारे में है। मुम्बई में सुशांत राजपूत की खुदकुशी की जो जांच चल रही है, उसमें उनकी दोस्त रही रिया चक्रवर्ती के टेलीफोन की जांच तो होना ही था। आज के वक्त मामूली छेडख़ानी के किसी मामले में भी पुलिस सबसे पहले जुड़े हुए तमाम लोगों के मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स निकालने में जुट जाती है, और पहला मौका मिलते ही सबके फोन जब्त कर लेती है। ऐसे में जांच करने वाली किसी एजेंसी की तरफ से ही यह खबर बाहर निकली है कि रिया के कॉल रिकॉर्ड्स में एक बड़े फिल्मी सितारे का नाम आया है जिन्हें रिया ने एक बार फोन किया था, और इसके बाद उसने उन्हें तीन एसएमएस किए थे। एक और एक्टर का नाम आया है कि रिया ने उसे 30 कॉल की थी, और उसकी तरफ से 14 कॉल आई। इन दोनों के बीच दो एसएमएस भी आए-गए। ऐसे दर्जन भर लोगों के नाम टेलीफोन कॉल्स की कम्प्यूटर से निकाली गई जानकारी के साथ छपे हैं कि किससे कितने बार बात हुई, किसने कितनी कॉल लगाई, कितने मैसेज किए। 

अब सवाल यह उठता है कि अगर इनमें से किसी फिल्मी सितारे या दूसरे किसी व्यक्ति के परिवार में उसकी रिया से दोस्ती को लेकर पहले से तनातनी चल रही हो, तो ऐसी ठोस खबर से उस घर में आग ही लग जाए। जो भी एजेंसी जांच कर रही हो, और जिस किसी से ऐसे कॉल रिकॉर्ड्स बाहर आए हैं, उनसे यह बुनियादी सवाल उठता है कि इन लोगों का क्या गुनाह है जो इनकी जिंदगी की प्रायवेसी इस तरह खत्म की जा रही है? और तो और जांच के घेरे में जो रिया चक्रवर्ती है, वह अगर जांच और मुकदमे के बाद कुसूरवार साबित भी होती है, तो भी यह बुनियादी सवाल तो खड़ा ही रहेगा कि उसने लोगों से फोन पर बात करके या मैसेज भेजकर कोई गुनाह तो किया नहीं है कि उसे इसे लेकर बदनाम किया जा रहा है? और यह खबर फिल्मी दुनिया की किसी पत्रिका के किसी गॉसिप कॉलम की न होकर देश की एक सबसे बड़ी, पेशेवर, और गंभीर समाचार एजेंसी की है। इस एजेंसी ने सीडीआर, कॉल डिटेल्स रिकॉर्ड, के हवाले से यह खबर बनाई है। 

हमारा ख्याल है कि जो जांच एजेंसियां ऐसे कॉल डिटेल्स निकालती हैं, उनकी यह कानूनी जिम्मेदारी रहती है कि वे डिटेल उसके कब्जे से बाहर न जाएं। अदालत का कोई फैसला हो जाने तक भी, और फैसले के बाद भी किसी जांच एजेंसी का यह हक नहीं है कि वह किसी संदिग्ध व्यक्ति, आरोपी, या किसी मुजरिम के कॉल डिटेल्स भी अदालत से परे, मुकदमे की जरूरत से परे उजागर करे। आज हिन्दुस्तान में दस एजेंसियों को लोगों के फोन टैप करने, उनके कॉल डिटेल्स निकलवाने का कानूनी अधिकार मिला हुआ है। लोगों को याद होगा कि जिस वक्त हाल ही में गुजरे हुए सांसद अमर सिंह की कई कॉल रिकॉर्डिंग्स सामने आई थीं जो कि गैरकानूनी रूप से हासिल की गई थीं, तो अमर सिंह को सुप्रीम कोर्ट से स्थगन मिला था कि मीडिया उन रिकॉर्डिंग्स का कोई इस्तेमाल नहीं कर सकता। गैरकानूनी रूप से चारों तरफ फैल चुकीं इन रिकॉर्डिंग्स में कुछ फिल्म अभिनेत्रियों से अमर सिंह की कुछ विवादास्पद बातचीत थी, और कुछ इन अभिनेत्रियों के बारे में किन्हीं और से बातचीत थी। अब आज जब मुम्बई की यह अभिनेत्री सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों, मुम्बई पुलिस की जांच के घेरे में है, तो आज वह अपनी निजता का दावा करते हुए इन एजेंसियों से भला क्या टक्कर ले लेगी कि उसके कॉल डिटेल्स इस तरह सार्वजनिक कैसे हो रहे हैं? 

आज हिन्दुस्तान में हालत यह है कि केन्द्र सरकार की दस बड़ी एजेंसियां तो दूर की बात हैं, राज्यों की पुलिस अपने स्तर पर तरह-तरह तरकीबें निकालकर किसी के भी फोन के कॉल डिटेल्स निकाल लेती हैं, और उनमें कोई नाजुक बात होती है, तो उसे लेकर लोगों को तुरंत दबाव में ले आती हैं। अब अगर कोई दो लोग रोज देर रात घंटों बात करते हैं, तो उसके महज कॉल डिटेल्स उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए काफी हो सकते हैं, लोग अगर अपने जीवनसाथी की जानकारी के बिना किसी और से लगातार और नियमित रूप से लंबी बात करते हैं, तो हो सकता है कि उनमें कई बातें उनकी जिंदगी तबाह करने को काफी हो। 

हिन्दुस्तान में टेक्नालॉजी में पुलिस और बाकी जांच एजेंसियों की आसान दखल, और यहां के कानून में लोगों की निजता, उनकी प्रायवेसी के लिए जरा भी सम्मान न होने ने मिलकर एक ऐसी नौबत ला दी है कि लोगों को मानो चौराहे पर नंगा कर दिया गया हो। फिर जांच एजेंसियां अपने से परे मीडिया में भी ऐसी बातें आमतौर पर सोच-समझकर लीक करती हैं कि जिसकी जांच की जा रही है, वे दबाव में आ जाएं, और जल्दी टूट जाएं। 

यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। लोगों की निजी जिंदगी को बिना कानूनी अधिकार, और बिना कानूनी जरूरत, गैरकानूनी तरीके से उजागर करना छोटा जुर्म नहीं है, और इस पर जब तक जांच एजेंसियों के लोगों को सजा नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला बढ़ते ही चलेगा। 

(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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