संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकार से जनता तक लापरवाही-गैरजिम्मेदारी का जानलेवा सिलसिला
18-Aug-2020 4:08 PM 9
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकार से जनता तक  लापरवाही-गैरजिम्मेदारी  का जानलेवा सिलसिला

खाने-पीने के शौक के लिए विख्यात शहर इंदौर की एक तस्वीर किसी ने ट्विटर पर पोस्ट की हैं कि वहां बाजारों में लोग खाने-पीने किस तरह टूट पड़े हैं। उस शहर में खाने-पीने की संस्कृति ऐसी है कि लोग रात खाने के बाद भी घर से निकलकर बाजार जाते हैं, और वहां कुछ-कुछ और भी खाते हैं। इसलिए अब तो वैसी भीड़ वहां दिखनी ही थी। लेकिन छत्तीसगढ़ के अलग-अलग कई शहरों से खबर यह है कि कोरोना पॉजिटिव के आंकड़े चाहे कितने ही बढ़ते जाएं, लोग लॉकडाऊन खत्म होने के तुरंत बाद खाने-पीने के लिए निकल पड़े हैं। आबादी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा ऐसा होगा जो कि कोरोना से डरा हुआ होगा, बाकी लोगों की धडक़ लॉकडाऊन खुलने के साथ ही खुल गई है। 

राजधानी में सुबह की सैर पर निकले लोग बिना मास्क निकलते हैं, और अगल-बगल सटे हुए चलते हुए गप्प मारते जाते हैं। जितना उन्हें अच्छा लगता है, उतना ही अच्छा कोरोना को भी लगता होगा। लोगों को याद होगा कि जिस वक्त लॉकडाऊन दुबारा लगाने की नौबत आ रही थी उस वक्त उसे दो-तीन दिन लेट किया गया क्योंकि सामने हरेली का त्यौहार था। आज फिर पोला के मौके पर उसी तरह का माहौल दिख रहा है, सरकारी जलसा भी चल रहा है, और लोगों के बीच भी त्यौहारों का माहौल सिर चढक़र बोल रहा है। कोरोना को और चाहिए क्या? वह नास्तिकों के बीच तो भूखों मर जाता है, लेकिन आस्तिकों के बीच उसके शिकार चलकर पहुंचते हैं। 

लापरवाह लोगों को याद रखना चाहिए कि उनके परिवार के बच्चे और बूढ़े बेबस हैं कि वे उन्हें रोक नहीं सकते, लेकिन उनसे कोरोना पाने का खतरा जरूर रहते हैं। इसी तरह दफ्तरों के बड़े लोग, कारोबार के मालिक अगर लापरवाह होते हैं, तो उनके मातहत भी खतरा झेलते हैं। ऐसे लापरवाह लोगों को देश का झंडा उठाकर राष्ट्रप्रेम साबित करने में तो बड़ा मजा आता है, लेकिन उन्हें यह फिक्र नहीं रहती कि इस देश के लोगों को बचाने के लिए पुलिस, स्वास्थ्य कर्मचारी, और एम्बुलेंसकर्मियों जैसे लोग अपनी जान दे रहे हैं ताकि कोरोनाग्रस्त लोग बच सकें। जो अब तक कोरोना से बचे हुए हैं, वे न अपनी सोच रहे, न परिवार की, न ऐसे कोरोना-योद्धाओं की। 

आज देश की हालत यह है कि कोरोना के तनाव के चलते आत्महत्याएं लगातार बढ़ रही हैं, और एक-एक आत्महत्या के पीछे दसियों हजार लोग मानसिक अवसाद को शिकार होकर हताश बैठे हैं, दहशत में हैं। इनमें से किसी भी बात की फिक्र किए बिना जब संपन्न और विपन्न सभी किस्म के लोग लापरवाही में ऐसे लगे हैं कि उसका उन्हें कोई भुगतान होना है। ऐसे लोग ही जिंदगियां बचाने वाले लोगों की जिंदगियां लेने के जिम्मेदार भी हैं। 

दरअसल हिन्दुस्तानी लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी की भावना शून्य है। सडक़ पर कोई एक फिसलकर गिर पड़े, तो आसपास के तमाम लोगों को पहले हॅंसी आती है, उसके बाद उन्हें उठाने के लिए उनके हाथ बढ़ते हैं। किसी सामान की ट्रक पलटती है तो उसे लूटने में लोग सबसे आगे रहते हैं। पुलिस मुफ्त में हेलमेट या मास्क बांटती है, तो संपन्न तबके लोगों की लार भी टपकने लगती है कि मुफ्त का जो-जो मिल जाए अच्छा है। जिस देश को अपने ऊपर दुनिया का सबसे अच्छा देश होने का घमंड हो, जो अपने आपको सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां बताता हो, उस देश का हाल यह है। लोग दूसरों की जान ले लेने की हद तक लापरवाह हैं, गैरजिम्मेदार हैं, और सरकारें इस कदर कायर हैं कि वे ऐसे लापरवाह लोगों पर कोई कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मुफ्त में मास्क बांटती हैं। मुफ्त के मास्क के मुकाबले हजार-हजार रूपए जुर्माना होने लगे, तो हिन्दुस्तानी जनता में जिम्मेदारी थोड़ी सी आ भी सकती है। 

इस देश में सरकारें इस कदर गैरजिम्मेदार हैं कि जून के आखिरी हफ्ते में केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर ने कोरोना-वैक्सीन पर मानव परीक्षण के लिए इतनी तैयारियां कर लेने को कहा था कि 15 अगस्त को उसकी घोषणा हो सके। उस वक्त तक मानव परीक्षण बस शुरू होने की तारीख भर आई थी कि 7-8 जुलाई से परीक्षण शुरू होगा, और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने वैक्सीन उतारने की तारीख भी छांट ली थी कि आजादी की सालगिरह पर यह काम किया जाएगा। ऐसे गैरजिम्मेदार देश में आम जनता की गैरजिम्मेदारी किसी हैरानी की बात नहीं है। सरकार और केन्द्र सरकार के संगठनों के रूख लोगों का रूख भी तय करते हैं। आज देश में सामूहिक जिम्मेदारी और सामूहिक जवाबदेही शून्य है। यह बात किसी भी राष्ट्रीय खतरे की घड़ी में खतरे को कई गुना बढ़ा सकती है, बढ़ाती है। अमरीका कोरोना के खतरे के बीच एक अलग किस्म का खतरा झेल रहा है, वहां पर लोग मास्क न पहनने को अपना बुनियादी संवैधानिक अधिकार मानकर चल रहे हैं, और मास्क की तमाम बंदिशों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, सार्वजनिक और सामूहिक रूप से मास्क जला रहे हैं। अपने बुनियादी अधिकारों को लेकर लोगों को सेहत के खतरे भी दिखना बंद हो गए हैं, और सरकार के निर्देश मानना भी उन्हें गैरजरूरी लग रहा है। हिन्दुस्तान में सरकार कागजी निर्देश तो इतने दे रही है कि कोई फोन करने पर पहले 20 सेकेंड सिर्फ कोरोना से सावधानी सुननी पड़ रही है, ऐसे में कभी यह भी हो सकता है कि किसी इमरजेंसी में, पुलिस, फायरब्रिगेड, या एम्बुलेंस को बुलाने के लिए फोन लगाया जाए, और कोरोना सुनते हुए ही कोई दम तोड़ दे। दूसरी तरफ लोगों के बीच यह टेलीफोन-चेतावनी मजाक बन गई है, कोरोना का खतरा मजाक बन गया है। एक से अधिक मामलों में केन्द्र सरकार के संगठन यूजीसी या दूसरे कोई संगठन ऐसे माहौल में भी इम्तिहान लेना तय कर रहे हैं, और अपने महफूज टापुओं पर बैठे सुप्रीम कोर्ट के जज उन इम्तिहानों पर रोक भी नहीं लगा रहे हैं। खुद जज तो मामलों की सुनवाई वीडियो के मार्फत कर रहे हैं, क्या इम्तिहान देने वाले बच्चों को ऐसी हिफाजत हासिल हो सकेगी?
 
देश का यह सिलसिला जानलेवा साबित होगा। यह लापरवाही जितनी लंबी खिंचेगी, उतनी ही लंबी लोगों की बेरोजगारी, बेकारी, गरीबी भी रहेगी। लोगों को अगले कुछ महीने जिंदा रहने की मदद करके, नियम-कानून कड़ाई से लागू करके, किसी वैक्सीन के आने तक कोरोना के खतरे को अगर टाला जाए, तो ही बेहतर है। आज लापरवाह लोगों को उनकी जुर्माना-भुगतान की ताकत के मुताबिक तगड़ा जुर्माना लगाना चाहिए ताकि लोग बिना मास्क मटरगश्ती करना भूल जाएं, और डॉक्टर-पुलिस जैसे तबकों के लिए खतरा न बनें। सरकारों को इस मौके पर अपनी लोकप्रियता, और वोटरों को खुश रखने की फिक्र नहीं करना चाहिए, देश और दुनिया को इतिहास के इस सबसे बड़े खतरे से बचाने की जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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