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लिखने का मकसद, और निकलने वाला मतलब
21-Aug-2020 12:22 PM 4
लिखने का मकसद, और निकलने वाला मतलब

(तस्वीर इसी उपन्यास पर आधारित 1960 में बनी फिल्म से)

-दिनेश श्रीनेत
यह जरूरी नहीं कि रचनाकार जिस मकसद से किताब लिखे, अपनी संपूर्णता में किताब उसी अर्थ को संप्रेषित करे। किशोरवस्था या जिसे हम वय:संधि कहते हैं, यानी 11-12 साल की उम्र में मैंने लियो तोलस्तोय का उपन्यास पहली बार पढ़ा था। वैसे यह उनका आखिरी उपन्यास था। उसका विषय मेरी उम्र के अनुकूल नहीं था। यही वजह थी कि मैं उसे पहली बार में समझ नहीं पाया। जब मैं थोड़ा और बड़ा हुआ तब उपन्यास पूरी तरह से मेरे समझ में आया। जब समझ में आया तो उसने मुझे एक गहरे नैतिकबोध से भर दिया।

यह उपन्यास था ‘पुनरुत्थान’ जो अंगरेजी में ‘रिसरेक्शन’ के नाम से जानी जाती है। इसका भीष्म साहनी ने बहुत सुंदर अनुवाद किया था। कहानी दो अलग-अलग समय रेखाओं में चलती है। इसकी नायिका कात्यूशा जो एक वेश्या है कभी एक मासूम युवती थी। कात्यूशा पर चलने वाले मुकदमे की ज्यूरी में मौजूद नेख्लूदोव ने कभी अपनी जवानी के दिनों में कात्यूशा के साथ जबदस्ती यौन संबंध बनाए थे और उसे गर्भवती छोडक़र चला गया था। कात्यूशा जो एक उमंगों से भरी स्त्री थी और नेख्लूदोव की वासना को अपने प्रति प्रेम समझने की भूल कर बैठी थी, उस भयानक घटना के बाद पतन की ओर बढ़ती चली जाती है। पहले काम से और घर से निकाला जाना, नवजात शिशु की मौत और अंत में वेश्यालय में शरण।

नेख्लूदोव प्रायश्चित में डूबा हुआ है। वह कात्यूशा की मदद करना चाहता है मगर उसकी भूल के लिए न तो माफी की गुंजाइश बची है और न ही कात्यूशा की त्रासद जिंदगी में वह कोई सुधार ला सकता है। उपन्यास के अंत में वह बाइबिल की शरण में जाता है। कहानी संकेत देती है कि वह अपना जीवन दूसरों की भलाई के समर्पित करने का संकल्प लेता है। तोलस्तोय को अपना यह उपन्यास अन्ना कैरेनीना तथा युद्ध और शांति से ज्यादा पसंद था। जबकि आलोचकों को उनका यह उपन्यास कमजोर लगता है। इसके चरित्र एकरेखीय लगते हैं। यहां तक आते-आते तोलस्तोय ईसाई नैतिकता की शरण में सामाजिक दुखों का हल खोजने लगे थे। इस लिहाज से भी पुनरुत्थान को कमजोर उपन्यास माना गया है।

उसी दौरान संभवत: मदनलाल मधु की आलोचनात्मक पुस्तक ‘गोर्की और प्रेमचंद’ में इन्हीं नैतिक आग्रहों की वजह से मॅक्सिम गोर्की के समक्ष तोलस्तोय को कमजोर लेखक ठहराया गया है। मुझे यह उपन्यास अपनी बारीकियों और डिटेलिंग के कारण पसंद है। इसमें तत्कालीन रूसी जीवन के करीब-करीब सभी पहलुओं को छुआ गया है। इसमें जमींदार, कुलीन वर्ग, सरकार, न्यायालय, चर्च, जेल और वेश्यावृति का बहुत विस्तार से जिक्र है। उपन्यास का अंत बाइबिल के उपदेशों से भरा है, जो मुझे भी खास पसंद नहीं आया क्योंकि अंत तक पहुँचते-पहुँचते नेख्लूदोव अपनी पीड़ा और समाज में बहुत व्यापक स्तर पर फैली विषमताओं का जैसे बहुत आसान हल निकाल लेता है।

मगर इसमें बहुत कुछ ऐसा है जो इसे एक महान उपन्यास का दर्जा देता है। उपन्यास में मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया कात्यूशा के किरदार ने। यह एक भोली सी निर्दोष युवती से दृढ़ स्त्री बनने की कहानी है। सामाजिक रूप से एक अपराधी और पेशे से वेश्या महिला अपनी आंतरिक मजबूती की वजह से एक बेहद मजबूत स्त्री के रूप में उभरती है। दूसरे, अतीत के गुनाह से उपजे अपराधबोध से छुटकारा पाने के लिए नेख्लूदोव जब जेल में कात्यूशा से मिलने जाता है तो उसका सामना अन्य कैदियों से भी होता है। वह उनकी कहानियां सुनता है। धीरे-धीरे उसे यह एहसास होता है कि उसके आसपास क्रूरता, अन्याय और पीड़ा की एक बहुत बड़ी दुनिया है।

वह एक के बाद दूसरी कहानी सुनता चला जाता है। वह देखता है कि लोगों को बिना कारण जंजीर में बांधा गया है, बिना कारण पीटा जा रहा है, बहुत से लोग बिना कारण पूरा जीवन काल कोठरी में बिता रहे हैं। भीतर से बाहर की तरफ नेख्लूदोव की इस यात्रा में बहुत गहराई है। तोलस्तोय आहिस्ता-आहिस्ता नेख्लूदोव की निजी ग्लानि और अपराधबोध को तत्कालीन रूसी समाज की व्यापक पीड़ा से जोड़ देते हैं। खुद की निगाहों मे दोषमुक्त होने के लिए नेख्लूदोव एक रास्ता चुनता है और वह है खुद को लोगों की भलाई के लिए समर्पित कर देना। उपन्यास की अंतिम लाइनें हैं, ‘उस रात नेख्लूदोव के लिए एक बिल्कुल ही नया जीवन आरंभ हुआ। इसलिए नहीं कि उसके लिए जीवन की परिस्थितियां बदल गई थीं, बल्कि इसलिए कि उस रात के बाद जो कुछ भी वह करता उसका उसके लिए नया और सर्वथा भिन्न अर्थ होता। समय ही बताएगा कि उसके जीवन के इस नए अध्याय का अंत किस भांति होगा।’

कहते हैं कि ‘पुनरुत्थान’ ने मोहनदास को महात्मा गांधी बनने की राह दिखाई थी। सामाजिक जीवन की कुरूपताओं और विद्रूपताओं का चित्रण करने वाले इस उपन्यास को पढ़ते हुए आप मानव मन के कलुषित पक्ष से भी परिचित होते हैं। यह उपन्यास हमें मुक्त करता है। ज्यादा मानवीय और उदार बनाता है और यह सब कुछ मन के भीतर अंत में आई बाइबिल की प्रार्थनाओं से नहीं जगता बल्कि पाप मुक्ति की तलाश में भटकते दो मनुष्यों की कहानी से जगता है जो आपस में न तो प्रेमी थे, न शत्रु और न ही एक-दूसरे का जीवन निर्धारित करने वाले। अभिशप्त आत्माओं की तरह भटकते हुए वे अंत में जीवन को किसी उजाले की तरफ ले जाने में सफल होते हैं। (फेसबुक से)

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