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धर्मवीर भारती उन विरले लोगों में थे जिनका सब कुछ उत्कृष्ट होता है
04-Sep-2020 9:59 AM 24
धर्मवीर भारती उन विरले लोगों में थे जिनका सब कुछ उत्कृष्ट होता है

यह उनकी संपादकीय कुशलता का नतीजा था कि ‘धर्मयुग’ हमेशा के लिए एक किंवदंती बन गई. हालांकि इसी दौर में बतौर साहित्यकार धर्मवीर भारती कहीं पीछे छूटते गए

- कविता

कुछ लोग सबकुछ करके भी किसी एक विधा में सिद्धहस्त नहीं हो पाते तो कोई-कोई बस एक ही विधा साध पाते हैं या सिर्फ एक रचना से नाम कमा लेते हैं. पर वे लोग विरले होते हैं, जिनका सबकुछ उत्कृष्ट हो, हर कृति नई बुलंदियों को छूकर आए. धर्मवीर भारती का नाम ऐसे ही लोगों में शामिल है. जहां से भी देखो उनके साहित्यिक कद की ऊंचाई एक समान ही दिखती है.

यह हैरत की बात है कि खुद धर्मवीर भारती अपनी जिस रचना ‘गुनाहों के देवता’ को ‘कलात्मक रूप से अपरिपक्व’ मानते रहे, वही बरसों तक हिंदी की पांच सबसे अधिक बिकने वाली किताबों में शुमार होती रही है. इसे ‘बकवास’ मानने वाले उपेन्द्रनाथ अश्क कहते थे – ‘यह किताब तो कोरा भावोच्छवास है’ साथ ही वे यह कहने को मजबूर होते थे, ‘इत्ती मोटी यह किताब एक सांस में खुद को पढ़ा ले जाती है. यह भी कम बड़ी उपलब्धि नहीं.’ धर्मवीर भारती सफल संपादक थे, कवि थे, सिद्धहस्त उपन्यासकार और ख्यातिलब्ध साहित्यकार भी थे. संपादक के रूप में तो वे अपने जैसे अकेले माने जा सकते हैं.

‘यह भी अदा थी एक मेरे बड़प्पन की / कि जब भी गिरूं मैं, गिरूं समुद्र पार / मेरे पतन तट पर गहरी गुफा हो एक / बैठूं मैं समेटकर जहां अपने अधजले पंख... फिर मैं दिखा सकूं / कि पहला विद्रोही था मैं / जिसने सूरज को चुनौती दी थी. (आत्मकथन - संपाती)

हम बड़े जोधा थे / बड़े फौजदार थे / मगर क्या करते हम / हम दोनों ही पक्षों को अस्वीकार थे. (आत्मकथन – रुक्मी की सेना)

वैसे ये दोनों कवितांश ‘तटस्थता : तीन आत्मकथ्य’ कविता से लिए गए अंश हैं पर इनमें खुद धर्मवीर भारती की दुविधा, उनका आत्मसम्मान और दर्प साफ़-साफ़ झलक जाता है. बिलकुल आत्मस्वीकारोक्ति सा. यहां उनकी अकड़ी हुई गर्दन है तो उनके सपनों के जले हुए पंख भी. वे पंख जो जले हुए होकर भी बताते हैं कि उन्होंने सूरज को चुनौती दी थी. यानी कि आदि विद्रोही थे वे और वे दोनों ही पक्षों को अस्वीकार थे. वह चाहे पूर्व स्थापित प्रलेस (प्रगतिशील लेखक संघ) हो या फिर परिमल (साहित्यकारों द्वारा बनाया गया एक और संगठन).

धर्मवीर भारती ने धर्मयुग के अपने संपादन काल में सिर्फ नई प्रतिभाएं को ही नहीं गढ़ा, हर एक विषय को अपनी पत्रिका के सांचे में ढाला – धर्म, राजनीति, साहित्य, फिल्म, कला... कोई भी विषय उनसे अछूता नहीं था

प्रलेस में जमे रहने के लिए फ़िराक गोरखपुरी ने धर्मवीर भारती को एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया था, ‘उनके तेवर और तर्ज के एकाध गीत लिख डालो, उनकी गोष्ठियों में उन्हें वही सुनाते रहो ...और फिर खूब लिखते रहो अपने प्रेम और रोमांस वाले गीत’. पर भारती का जिद्दी मन अड़ा रहा अपनी जिद पर क्योंकि उन्हें कोई मुखौटा पसंद नहीं था. वे डटे रहे अपनी शर्तों और जिदों के साथ. तब के रचे जाने वाले अपने प्रेम गीतों के साथ. अपने इसी स्वभाव से हारकर उन्हें आखिरकार इलाहाबाद छोड़ना पड़ा था, वह प्रोफेसरी भी जिसमें उन्हें केवल सुनने के लिए दूसरे विभागों के बच्चों के हुजूम जमा हो जाते थे. मुंबई और ‘धर्मयुग’ इन्हीं दिनों उनके जीवन में आए थे.

धर्मवीर भारती ने धर्मयुग के अपने संपादन काल में सिर्फ नई प्रतिभाओं को ही नहीं गढ़ा, हर एक विषय को अपनी पत्रिका के सांचे में ढाला – धर्म, राजनीति, साहित्य, फिल्म, कला... कोई भी विषय उनसे अछूता नहीं था. वे यहां तक ही सिमटे नहीं रह गए थे. घरेलू स्त्रियों और बच्चों के लिए भी धर्मयुग में बहुत कुछ था. मतलब यह कि धर्मयुग में उस वक़्त परिवार के हर सदस्य के लिए कुछ न कुछ होता था. कुल मिलाकर यह संपूर्ण और स्तरीय पत्रिका थी जो तब ज्यादा चलन में रहे संयुक्त परिवारों को खूब भाती थी. इसकी अकूत प्रसिद्धि और भारती जी के काल में कुछ हजार से बढ़कर इसकी प्रसार संख्या का लाखों में पहुंचने का सबब भी यही था.

कार्टून जैसी विरल विधा को भी उन्होंने इतना सम्मान दिया कि 25 वर्षों तक धर्मयुग में लगातार छपने के बाद आबिद सुरती द्वारा रचा गया कार्टून ‘ढब्बू जी’ अमर हो गया. और तो और आबिद जी की प्रसिद्धि भी कार्टूनिस्ट के रूप में ही चल निकली, जबकि वे व्यंग्यकार, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार सब थे. यह उदाहरण बताता है कि किस तरह तब धर्मयुग साहित्य की विधाओं और साथ ही रचनाकारों को स्थापित कर रही थी.

हालांकि और बहुत सी बातें उन्होंने उस दौर में धर्मयुग के माध्यम से बतौर संपादक स्थापित की थीं, जिनके लिए उनकी सराहना तो बहुत कम हुई, हां आलोचना लगातार होती रही. उन्हें एक तानाशाह संपादक के रूप में माना जाने लगा. ऐसा संपादक जो बाकी लोगों से अलग उठता-बैठता था. जिससे मिलने के लिए पर्ची भेजनी पड़ती थी और उनके बुलावे पर ही कोई भीतर जा सकता था. रचना के लिए मौलिकता के स्वीकृतिपत्र को संलग्न करने का नियम और ऐसे ही न जाने कितने नियम पत्रिका प्रकाशन जगत में उनके द्वारा प्रचलित किए गए हैं.

रचना के लिए मौलिकता के स्वीकृतिपत्र को संलग्न करने का नियम और ऐसे ही न जाने कितने नियम पत्रिका प्रकाशन जगत में धर्मवीर भारती द्वारा प्रचलित किए गए हैं

हालांकि ये नियम पत्रिका के विस्तार, उसे अपना पूरा वक़्त और ध्यान देने और सर्वश्रेष्ठ बनाने के लिए गढ़े गए थे. पर इसने सबसे ज्यादा नुकसान धर्मवीर भारती की बेलौस और लोकतांत्रिक छवि का ही किया. उन्हें लेकर न जाने कितनी किंवदंतियां साहित्यिक समाज में चल पड़ी थीं. ठीक इसी वक़्त तब उनके मातहत रहे रवीन्द्र कालिया ने भारती को केंद्र में रखते हुए एक अभूतपूर्व कहानी लिखी थी – ‘काला रजिस्टर’. यह कहानी संपादक धर्मवीर भारती, उनके नए बनाए तौर-तरीकों का मखौल उड़ाती थी. एक तरह से देखा जाए तो न कालिया ही गलत थे, और न बतौर संपादक भारती. यह समीकरण आधिपत्य और अधीनस्थ के बीच का था, जिसने हिंदी समाज को एक बेहतरीन रचना दी.

कई बार हम किसी को सुधारकर ही नहीं गढ़ते, उसे दबाकर, कुचलकर, अपने खिलाफ करके भी रचते होते हैं. बहरहाल जो भी हो भारती की इस छवि ने उनकी पुरानी, इलाहाबादी मौज मस्ती वाली छवि को लोगों के दिल से निकाल बाहर किया था. मजाकिया, खुशमिजाज और लोगों से खूब घुलने-मिलने वाले भारती अब कहीं नहीं थे. कार्यालय में एक मोटा काला रजिस्टर अब लोगों की हाजिरी दर्ज करता हुआ घूमता फिरता, और काले चश्मे के पीछे से दो जोड़ी आंखें उन्हें देखते न देखते हुए भी हर पल घूरती रहतीं.

धर्मयुग के इन दिनों में सबसे बड़ा नुकसान रचनाकार भारती का ही हुआ. उनके द्वारा कहानियां कविताएं और उपन्यास लिखने का क्रम अब कम से कम होने लगा. धर्मयुग में इस तरह डूबने ने उन्हें बीमार कर दिया था. अपने भीतर के लेखक के प्रति बरती गई क्रूरता और उसके लिए ग्लानि और अपराधबोध इसका मुख्य कारण थे.

1993 के दौरान अपने एक मित्र को लिखे गए पत्र में वे अपनी पीड़ा जाहिर करते हैं - स्वास्थ्य इसी अर्थ में ठीक है कि दो वक़्त खा लेता हूं, और शाम को घर से बाहर थोड़ा घूम आता हूं. इससे ज्यादा शारीरिक या मानसिक मेहनत सहन नहीं कर पाता... अब आधा घंटा लिखूं तो सर चकराने लगता है. वही हाल पढ़ने का भी है. मन अंदर ही अंदर बहुत बुझ गया है. मेरा सारा जीवन व्यस्त-सक्रिय और घुमक्कड़ी वाला रहा है, यह कारागार मुझे कितना कष्ट दे रहा होगा आप सोच सकते हैं.’ कहा जाता है कि तीन गंभीर हार्ट अटैक आने के बाद उनके दिल को रिवाइव करने के लिए 700 वोल्ट के शॉक दिए गए थे. इससे उनकी जिंदगी तो जरूर बच गई लेकिन उनके हृदय को भारी क्षति पहुंची थी. इसी हालत में उन्होंने अपनी जिंदगी के तीन-चार साल और गुजारे और चार सितंबर, 1997 को उनकी मृत्यु हो गई.

धर्मवीर भारती का काव्य नाटक – ‘अंधा युग’ उनके व्यक्तित्व को समझने का बड़ा महत्वपूर्ण जरिया है. महाभारत के अंतिम दिनों की झलक दिखाती यह रचना दरअसल संशय की कथा है

धर्मवीर भारती का काव्य नाटक – ‘अंधा युग’ उनके व्यक्तित्व को समझने का बड़ा महत्वपूर्ण जरिया है. महाभारत के अंतिम दिनों की झलक दिखाती यह रचना दरअसल संशय की कथा है. यहां सभी का जीवन निरर्थक है. टुकड़े-टुकड़े में बंटा है सबका अस्तित्व. सभी यहां बौने हैं और सभी महाकाय. अपने ही भीतर छिपे मैं को चीर-फाड़कर देखना यानी उसके पोस्टमार्टम का काम यह रचना बड़े सधे ढंग से करती है. इसके लिए जो बेरहमी और बेबाकी चाहिए थी, उसके लिए एक उलझा हुआ और प्रश्नाकुल मन चाहिए था. ऐसा मन जो भिड़ता रहे अपने से, जो लगातार खुद से जिरह करता रहे.

यह एक सुलझा-सरल इंसान नहीं कर सकता. भोला-भाला तो बिलकुल नहीं. यह वही कर सकता है, जो छला भी जाए और छलने की ताकत भी रखता हो और इस छलने और छले जाने पर फूट-फूटकर रो भी सके. निसंदेह धर्मवीर भारती ठीक ऐसे ही इंसान थे. और अगर नहीं थे, तो उन्होंने खुद को इस रूप में विकसित किया.

उनके सहयोगी, तबके मित्र सेवाराम यात्री उनके इसी रूप पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं, ‘रचनाकार भारती के निकट जाने पर भी उनका सूक्ष्म और संवेदनशील सर्जक आसानी से पकड़ में आनेवाला नहीं था. वे भीतर ही भीतर कई स्तरों पर द्वंद्व झेलते थे. उनकी मानसिक बुनावट बहुत ही सूक्ष्म और संश्लिष्ट थी. न कुछ लगने वाली बात भी उनके मन में फांस बनकर गड़ जाती थी. उनके भीतर एक रचनाकार और स्रष्टा का अहम भी कम नहीं था, जो गलत ढंग से छूते ही भयानक नाग की तरह फुफकार उठता था. उन्हें समर्पणशीलता से ही जीता जा सकता था. इसका उदाहरण उनके जीवन से जुड़े कितने प्रसंग रहे. पहली पत्नी कांता भारती से उनका अलगाव भी.’ इस रूप में खुद को विकसित किया जाना व्यक्ति के रूप में धर्मवीर भारती के कितने काम आया कहना मुश्किल है. पर उनकी रचनाओं के फलने-फूलने का सबब यह जरूर बना. व्यक्ति के अंतर्विरोधों उसकी शंकाओं और डर को बखूबी बयान करने का सबब भी.

कनुप्रिया से गुजरते हुए लगातार भारती जी की पहली पत्नी कांता भारती की स्मृति होती है. वे ठीक उसी राधा की तरह कांपती प्रत्यंचा, बुझी हुई राख, टूटे हुए गीत, डूबे हुए चांद और किसी रीते हुए पात्र सी दीख पड़ती हैं

भारती की जो तीन कृतियां समय के वैरूप्य को पढ़ती हैं, उसे नए सिरे से जांचती हैं, और प्रश्नों की तरह पेश करती हैं, वे हैं – ‘सूरज का सातवां घोड़ा’, ‘अंधा युग’ और ‘कनुप्रिया’. ‘गुनाहों के देवता’ के सरल बहाव के ठीक विपरीत का सूरज का सातवां घोड़ा कहानी कहने के नए शिल्प गढ़ती हुई, कहानी और उपन्यास के शिल्प में कुछ अनुपम प्रयोग करती है. यहां सात स्वतंत्र कथाएं हैं, जो कहीं न कहीं एक दूसरे से मिलती हैं, वैसे ही जैसे नदिया समुद्र में जाकर. इसके पात्र एक कहानी से दूसरी कहानी में बेरोक-टोक आते-जाते मिल जाएंगे. इन तीनों रचनाओं में एक तुर्शी है, एक तीखापन और चहुंओर दिखने वाला अन्धकार है. अंधा युग के लिए उन्होंने खुद ही कहा है - गोकि यह अंधकार भी रौशनी की एक खोज ही है - यह कथा ज्योति की है, अंधों के माध्यम से’ पर यह कथा सतत खोज की ही कथा रह जाती है, ज्योति कथा उस तरह बिलकुल नहीं हो पाती. पर कई बार हम केवल अन्धकार की भी आशंका व्यक्त करते हुए उसी अन्धकार का विरोध रचते होते हैं, यह भी एक तरह से ज्योति की अनुशंसा ही है. एक ज्योतिर्मय भविष्य की चाहना भी.

कनुप्रिया से गुजरते हुए लगातार भारती जी की पहली पत्नी कांता भारती की स्मृति होती है. वे ठीक उसी राधा की तरह कांपती प्रत्यंचा, बुझी हुई राख, टूटे हुए गीत, डूबे हुए चांद और किसी रीते हुए पात्र सी दीख पड़ती हैं. उनके सवाल भी ठीक वही हैं जो कनुप्रिया की राधा के हैं – ‘मान लो मेरी तन्मयता के गहरे क्षण / रंगे हुए / अर्थहीन / बस आकर्षक शब्द थे / तो सार्थक क्या था, कनु?... क्या में एक सेतु थी / तुम्हारे लिए / लीलाभूमि और युद्ध क्षेत्र के / अलंघ्य अन्तराल में?’

कांता भारती की आत्मकथा ‘रेत की मछली’ धर्मवीर भारती के से सधे हुए लेखकीय अंदाज में न लिखे जाने के बावजूद उनके व्यक्तित्व पर, उनके आडम्बरों पर लगातार प्रहार करती है

अपने एकमात्र उपन्यास ‘रेत की मछली’ में कांता भारती भी लगातार बस इन्हीं सवालों से जूझती और लड़ती दिखती हैं. कनुप्रिया की राधा अगर एक शाश्वत प्रश्न है, न जाने कितने सवालों के साथ प्रश्नचिन्ह सी अड़ी खड़ी है तो यह आत्मकथा भी धर्मवीर भारती के से सधे हुए लेखकीय अंदाज में न लिखे जाने के बावजूद उनके व्यक्तित्व पर, उनके आडम्बरों पर लगातार प्रहार करती है. हैरत की बात यह है कि ये वही कांता थीं, जो एक समय धर्मवीर भारती का सबकुछ थीं. जिनके लिए लिखते-कहते समय भारती जी की जुबान विराम नहीं लेती थी - ‘हम थे, कांता थी और नवम्बर की दोपहर और मीलों तक सुनसान पहाड़ और जंगल... एक बात और है, कांता को पाकर बचपन पाने की अनुभूति कभी-कभी होती है. सफ़र के लिए बहुत लाजवाब साथिन है. कांता एक ब्रोनिक कैमरा ले आई थी. उसने बड़ी मजेदार तस्वीरें ली हैं. आकर दिखायेंगे...’ (धर्मवीर भारती द्वारा नैनीताल से जगदीश गुप्त को लिखे एक पत्र का अंश).

कई बार जिंदगी हमारे किसी पल के शाश्वत सत्यों को भी झुठला और बदल जाती है. कांता भारती राधा तो बन सकी थीं लेकिन रुक्मिणी होने और जीवनपर्यंत भारती जी के साथ चलने का सुख केवल पुष्पा भारती के हिस्से आया. यह एक त्रासद कथा थी, जो धर्मवीर भारती के जीवन पर ग्रहण की तरह कुछ अरसे तक छाई रही. भारती के प्रशंसकों के लिए अगर उनको जानना उदेश्य हो तो लोक भारती प्रकाशन से छपे कांता भारती के इस अनगढ़ उपन्यास को भी पढ़ा जाना बेहद जरूरी है. ताकि धर्मवीर भारती अपनी सम्पूर्णता में, अपनी प्रतिभा के साथ साथ अपनी कायरता और दुरुहता में भी दिखाई दें.(satyagrah)

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