संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकार, कारोबार, और समाज को अपने तरीके बदलने होंगे ताकि...
07-Sep-2020 5:04 PM 10
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकार, कारोबार, और  समाज को अपने तरीके बदलने होंगे ताकि...

रेलगाडिय़ों और रेलवे स्टेशन पर भीख मांगने वाले या बीड़ी-सिगरेट पीने वाले अब जुर्माना देकर बरी हो सकेंगे। अब तक उन्हें जेल की कैद सुनाने का कानून लागू है इसे बदलने का प्रस्ताव रेल मंत्रालय ने केन्द्र सरकार को भेजा है। जिन लोगों ने हिन्दुस्तानी ट्रेनों में सफर किया है वे जानते हैं कि एक दिन अगर तमाम भीख मांगने वालों और सिगरेट-बीड़ी पीने वालों को कैद हो जाए, तो हिन्दुस्तान की तमाम जेलें कम पड़ेंगी। यह उन कानूनों में से एक है जिसका इस्तेमाल शायद भ्रष्टाचार के लिए होता होगा कि रेलवे पुलिस को रिश्वत न दें, तो इन लोगों को कैद करवाई जा सकती है। और पुलिस के ऊपर अदालत की प्रक्रिया भी कोई बहुत ईमानदार रहती हो, ऐसा तो हिन्दुस्तान में मुमकिन दिख नहीं रहा है। 

अभी जब रेल मंत्रालय के इस प्रस्ताव की खबर आई, तो ही इस तरफ ध्यान गया कि ऐसा कोई कानून लागू है जिसमें इतनी कड़ी सजा हो सकती है। इसके बिना ऐसी सजा अगर किसी को होती भी है, तो भी वह खबरों तक नहीं पहुंच पाती। हिन्दुस्तान में रेलगाडिय़ों और स्टेशनों पर करोड़ों लोग भीख मांगते हैं, वहां पर गुजारा करते हैं। वहां सिर छुपाने को कोई कोना मिल जाता है जहां बारिश से बचाव हो सके, जहां ठंड के मौसम में एक आड़ मिल सके। वहां लोगों को बचा हुआ खाना मुसाफिरों से मिल जाता है, और कोई मुसाफिर खुशी का सफर करते हैं तो वे खुशी के मौके पर कुछ लोगों को भीख दे देते हैं, और कुछ लोग तकलीफ का सफर करते हैं, इलाज के लिए जाते होते हैं, तो वे भिखारियों की दुआ खरीदने के लिए उन्हें कुछ दे देते हैं। इसलिए हिन्दुस्तान में बेघरों के लिए, अनाथ बच्चों के लिए, भिखारियों के लिए रेलवे स्टेशन देश का सबसे बड़ा आसरा है। 

देश में बहुत से ऐसे गैरजरूरी कानून हैं जिनको खत्म किया जाना चाहिए। केन्द्र की मोदी सरकार का यह दावा है कि उसने सैकड़ों या हजारों ऐसे गैरजरूरी कानून खत्म किए भी हैं, लेकिन जाहिर है कि अब बदले हुए वक्त में जब किसी को जेल में रखना एक राष्ट्रीय खतरा हो सकता है, तब सरकारों को और अदालतों को कैद से बचना चाहिए। ऐसे जो भी कानून लोगों को जेल भेजने वाले हैं उनके बारे में फिर से सोचना चाहिए क्योंकि लोगों को जेलों में रखना सरकार पर एक बोझ है, और हाल के महीनों में जिस तरह गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों की कमर टूटी है, उसमें किसी घर से कमाने वाले लोगों को कम करना ठीक नहीं है। कोरोना का खतरा लोगों को, सरकारों को एक मौका दे रहा है कि वे अपने पुराने ढर्रे पर चलना छोडक़र नए तौर-तरीके इस्तेमाल करें जो कि कोरोना, या ऐसी आने वाली किसी और बीमारी के वक्त अधिक खतरा न बने। जेलों में कैदियों की जिंदगी बहुत साफ-सुथरी तो हो नहीं सकती, और वहां बीमारी पनपने पर तेजी से बढऩे का खतरा रहता है। अभी अनौपचारिक चर्चाओं में पुलिस से यह पता लगता है कि छोटे-मोटे मामलों में पुलिस जिन्हें पकडक़र जेल भेजने के लिए अदालत में पेश कर रही है, उन्हें अदालतें दरियादिली से जमानत दे रही हैं ताकि जेल जाने की नौबत न आए। ऐसे में केन्द्र और राज्य सरकारों को भी यह सोचना चाहिए कि वे जेलों का बोझ अपने सिर पर और क्यों बढ़ाएं, सरकारों को सजा देने के दूसरे तरीके देखने चाहिए क्योंकि आज हिन्दुस्तान में यह बात साफ हो गई है कि किसी प्रदेश की सरकार के पास कोरोना से जूझने का मेडिकल-ढांचा बच नहीं गया है। अगर साल-छह महीने यह खतरा इसी तरह चला, इसी तरह आगे बढ़ा तो देश के कोई स्टेडियम भी नहीं बचेंगे जहां और बिस्तर लगाए जा सकें। 

रेल मंत्रालय ने यह समझदारी का फैसला लिया है कि छोटी-छोटी बातों पर कैद की सजा को हटाया जाए। लेकिन आज महामारी के तजुर्बे के बाद देश-प्रदेश की हर सरकार को तुरंत ही यह सोचना चाहिए कि वे सरकारी दफ्तरों का कामकाज कैसे घटा सकते हैं, कैसे कागज कम मांगे जाएं, कैसे कागजों पर जानकारी कम मांगी जाए, कैसे इलेक्ट्रॉनिक और ऑनलाईन काम बढ़ सके। आज हालत यह है कि हम अपने आसपास सरकारी अमले को बड़ी संख्या में कोरोना का शिकार होते देख रहे हैं। आज जब निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के सामने घरों में सुरक्षित बैठने का विकल्प हासिल है, तब सरकारी अमला बड़े अफसरों या नेताओं के हुक्म मानकर काम पर जाने को बेबस है। स्वास्थ्य विभाग, पुलिस, सफाई विभाग, स्टेशन और एयरपोर्ट जैसी जगहों पर काम करने वाले सरकारी कर्मचारियों का कोई बचाव नहीं है, उन्हें तो काम पर जाना ही है। ऐसे में हर जगह किसी सामान को छूना, किसी कागज का लेन-देन, कहीं कुर्सी पर जाकर बैठना, कतार में लगना, इन सबको कम से कम करना चाहिए। रेलवे की जिस बात से हमने आज यहां लिखना शुरू किया है, सरकारी सावधानी की यह बात उससे सीधी जुड़ी हुई नहीं दिखेगी, और एक ही जगह इन दो मुद्दों पर लिखना कुछ अटपटा भी लगेगा, लेकिन इन दोनों से एक ही किस्म की नौबत बढ़ती है, और उसे घटाने के लिए ऐसे अलग-अलग दर्जनों तरीके इस्तेमाल करने पड़ सकते हैं। सरकार को, कारोबार, और परिवार को सबको अलग-अलग, और मिलकर भी यह सोचना होगा कि किस तरह महामारी के खतरे को कम किया जाए क्योंकि अभी इसके खत्म होने की कल्पना ही की जा रही है, और इसका टीका विकसित हो जाने का एक अतिमहत्वाकांक्षी अनुमान ही लगाया जा रहा है। न तो इस बीमारी के घटने की कोई गारंटी है, न ही टीका समय पर आने, या उसके सब लोगों को मिल जाने, या उसके असरदार हो जाने का कोई ठिकाना अभी दिख रहा है। इसलिए तमाम तबकों को अपने तौर-तरीकों को ही सुधारना होगा ताकि इस खतरे को बढऩे से रोका जा सके। आज हिन्दुस्तान भर में अस्पतालों के बिस्तर खत्म हो जाने पर कोरोना-पॉजिटिव, लेकिन बिना लक्षण वाले लोगों को घरों में ही रहने की छूट दी जा रही है। यह अच्छी नौबत नहीं है, और इससे यह खतरा छलांग लगाकर आगे बढ़ सकता है, इसलिए बचाव में ही इलाज है, और कोई इलाज नहीं है ऐसा मानना बेहतर होगा। जिस तरह रेलवे कोरोना को देखते हुए, या किसी और वजह से भी जेलों पर दबाव घटाने जा रही है, उसी तरह सरकारी दफ्तरों से, सार्वजनिक जगहों से बोझ घटाने की जरूरत है।   (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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