संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कंगना के दफ्तर में  तोडफ़ोड़ के पीछे  बाकी देशों का हाथ?
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : कंगना के दफ्तर में तोडफ़ोड़ के पीछे बाकी देशों का हाथ?
14-Sep-2020 9:02 PM

मुम्बई की जुबानी जंग दिमागी बीमारी की हद तक पहुंची हुई दिख रही है। अब अगर किसी को मानसिक बीमार कहलाने में दिक्कत हो, तो उन्हें हम नशे में होने के संदेह की छूट भी दे सकते हैं। ये दोनों बातें अगर किसी को पसंद नहीं है, तो फिर वे किसी बड़ी साजिश के भागीदार जरूर होंगे। 

सुशांत राजपूत विवाद में बेगानी शवयात्रा में कंगना दीवानी के अंदाज में जो बहस चालू हुई, वह बढ़ते-बढ़ते अब सचमुच ही गांजे के नशे में डूबी हुई दिख रही है। यह अलग बात है कि देश में नशे का कारोबार पकडऩे के लिए बनाई गई राष्ट्रीय एजेंसी इस पर कार्रवाई नहीं करेगी, क्योंकि इस बकवास में पसंदीदा निशाने घेरे में नहीं आएंगे। पिछले दो दिनों में लोगों ने याद दिलाया है कि किस तरह भाजपा के राज वाले कर्नाटक में भाजपा का एक वर्दीधारी कार्यकर्ता गांजे के एक बहुत बड़े स्टॉक के साथ पकड़ाया है, लेकिन इस 12 सौ किलो गांजे पर कार्रवाई के बजाय एमसीबी नाम की एजेंसी मुम्बई में रिया के 59 ग्राम गांजा खरीदी पर पूरी ताकत झोंककर बैठी है। खैर, जब देश गांजे के धुएं से घिरा हो तो ऐसी कई बातें हो सकती हैं, होती हैं। अब जैसे अयोध्या में हनुमानगढ़ी के महंत राजूदास पिछले दिनों अचानक कंगना रनौत के इतने बड़े हिमायती बनकर सामने आए कि शायद कंगना खुद हैरान रह गई होगी कि यह दूसरा अब्दुल्ला दीवाना कहां से आ गया? और इस महंत का बयान कंगना के दफ्तर की तोडफ़ोड़ के खिलाफ आया था जिसमें उसने महाराष्ट्र की सरकार के अन्याय के खिलाफ चुप न बैठने का फतवा दिया था, और कहा था कि उद्धव ठाकरे को अयोध्या आने पर घुसने नहीं दिया जाएगा। 

अब बाबरी मस्जिद गिराने के गर्व के अकेले सार्वजनिक दावेदार बालासाहब ठाकरे के उत्तराधिकारी और उनके बेटे को अयोध्या न घुसने देने का यह फतवा मुम्बई म्युनिसिपल द्वारा कंगना के दफ्तर को तोडऩे पर दिया गया! जाहिर है कि नशे का कारोबार देश भर में कई जगह फैला हुआ है, और उसका इस्तेमाल भी खूब जमकर होता है, और साधुओं के बीच भी उसका खूब चलन है। सुशांत राजपूत की मौत के मामले में जिस तरह कंगना नाम का धूमकेतु आसमान से गिरा था, उसी तरह यह दूसरा धूमकेतु कंगना के टूटे दफ्तर पर अयोध्या से जाकर गिरा है। 

लेकिन गांजे के धुएं का असर दूर-दूर तक दिख रहा है। दो-चार दिन पहले अपने दफ्तर की तोडफ़ोड़ को लेकर कंगना का बयान आया था कि इस पर सोनिया गांधी की चुप्पी इतिहास अच्छी तरह दर्ज कर रहा है। अब मुम्बई में किसी एक दफ्तर के अवैध निर्माण पर वहां की म्युनिसिपल की कार्रवाई पर सोनिया के बयान की उम्मीद कोई सामान्य दिमागी हालत तो कर नहीं सकती। सामान्य दिमाग तो यह जरूर पूछ सकता था कि दिल्ली में जिन 48 हजार झुग्गियों को गिराने का हुक्म सुप्रीम कोर्ट ने दिया है, उन पर केन्द्र सरकार के किसी नेता ने कुछ कहा है क्या? जिनके पांवतले अपनी जमीन नहीं है, सिर पर पक्की छत नहीं है, उनकी फिक्र छोडक़र  मुम्बई में एक अरबपति के अवैध निर्माण की फिक्र सोनिया गांधी से कोई असामान्य दिमाग, या नशे में डूबा दिमाग ही कर सकता है। 

खैर, बात अगर यहीं खत्म हो गई रहती तो भी हमें इस बारे में कुछ लिखना नहीं पड़ता। आज मजबूरी यह है कि कंगना का ताजा बयान देखने लायक है जिसमें उसने अचानक ही अपनी पसंदीदा निशाना शिवसेना के लिए लिखा- आपके लिए ये बहुत अफसोस की बात है कि बीजेपी एक ऐसी व्यक्ति को बचा रही है जिसने ड्रग्स और माफिया रैकेट का भांडाफोड़ कर डाला है। इसका मतलब बीजेपी को शिवसेना के गुंडों को मेरा मुंह तोड़ देने, रेप करने, या लिंच करने से नहीं रोकना चाहिए संजयजी?

हिन्दुस्तानी मीडिया में रात-दिन कंगना नाम का यह कंगन खनक रहा है, लेकिन अभी तक किसी जगह भी कंगना को रेप की कोई धमकी किसी ने दी हो ऐसा नजर नहीं आया, ऐसा सुनाई नहीं पड़ा। ऐसे में शिवसेना पर अपने से रेप करने की तोहमत लगाना एक बार फिर सामान्य दिमाग का काम नहीं लग रहा है, या तो दिमाग में कोई नुक्स है, या किसी पदार्थ का असर है, या फिर यह किसी साजिश के तहत लिखी गई एक तेजाबी फिल्मी स्क्रिप्ट है जिसके पीछे बड़ी साफ राजनीतिक नीयत है। 

ऐसा इसलिए भी लिखना पड़ रहा है कि अपने दफ्तर को तोडऩे को लेकर कंगना ने जिस अंदाज में उसे बाबर से जोड़ा है, उसे कश्मीरी पंडितों से जोड़ा है, वह गणित आर्यभट्ट को भी आसानी से समझ नहीं आया होता। अभी कल तक की बात है जब शिवसेना बाबरी मस्जिद गिराने की अकेली स्वघोषित दावेदार थी, जिसने कश्मीर में धारा 370 खत्म होने पर सार्वजनिक खुशी जाहिर की थी, तो अब इन दो मुद्दों को लेकर कंगना क्या शिवसेना से अधिक बड़ी हिन्दू बनने जा रही है? 

यह पूरा सिलसिला गांजे के धुएं में धुंधला दिख रहा है, शायद धुंधला भी नहीं दिख रहा। बेगानी शादियों में अब्दुल्ला इस अंदाज में नाच रहे हैं, या नाच रही हैं कि समझ नहीं पड़ रहा कि दुल्हे के रिश्तेदार और दोस्त नाचने कहां जाएं? अयोध्या का एक महंत जिस अंदाज में बाबरी मस्जिद गिराने वाले परिवार के खिलाफ ताल ठोंकते हुए कंगना के साथ कूद पड़ा है, उससे हनुमानगढ़ी के हनुमान भी कुछ हैरान जरूर हुए होंगे।
 
कंगना के तरंगी बयानों में अब तक वेटिकन के खिलाफ, मक्का-मदीना के खिलाफ, और फिलीस्तीन के खिलाफ कुछ न आने पर भी इन तमाम जगहों में बड़ी निराशा है। और मुम्बई में कुछ महंगे किस्म की ग्रास बेचने वाले लोगों की साख चौपट हो रही है कि उनकी ग्रास बेअसर है। विवाद के चलते 10 दिन हो रहे हैं, और अब तक इतनी महत्वपूर्ण जगहों को कंगना के दफ्तर तोडऩे में कोई किरदार नहीं मिल पाया, यह छोटी समस्या नहीं है। देश और दुनिया को कंगना के दफ्तर के अवैध निर्माण टूटने को गंभीरता से लेना चाहिए, और बाबर के बाद के भी कई ऐसे लोग हैं जिनका हाथ इस तोडफ़ोड़ में हो सकता है। कश्मीरी पंडितों की बेदखली के अलावा फिलीस्तीनियों की बेदखली भी इस तोडफ़ोड़ के पीछे हो सकती है। दुनिया को कंगना के बयानों को गंभीरता से लेना चाहिए, और मुम्बई के मनोचिकित्सक यह भी जांचने की कोशिश कर सकते हैं कि कंगना के खिलाफ रेप का कोई बयान सामने न आने पर भी उसे शिवसैनिकों के हाथों रेप की बात कैसे, कहां से, और क्यों सूझ रही है। यह बात मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा के लिए भी बड़ी चुनौती है, और कोरोना तो खैर आता-जाता रहता ही है, इस मन:स्थिति पर शोध पहले हो जाना चाहिए। दिल्ली में जो पार्टियां और जो नेता राजनीति करते हैं, उनको कांग्रेस की तरह की बेवकूफी नहीं करनी चाहिए कि 48 हजार झोपडिय़ों के लोगों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाए। आज देश के इतिहास की सबसे बड़ी बेदखली, 3 लाख कश्मीरी पंडितों की बेदखली से भी बड़ी, कंगना के दफ्तर की तोडफ़ोड़ है, और देश को पहले उस पर ध्यान देना चाहिए। संसद आज से शुरू हुई है, और अगर संसद इस दफ्तर के तोडफ़ोड़ के अलावा किसी भी और मुद्दे पर चर्चा करती है, तो फिर इस संसद का होना न होना एक बराबर है। यह एक अलग बात है कि मुम्बई का धुआं दिल्ली तक पहुंचा है या नहीं, और उसका असर दिल्ली पर उसी तरह हो रहा है या नहीं जिस तरह अयोध्या की हनुमानगढ़ी के महंत पर हो रहा है। बेगानी शादी में अभी भी कुछ और लोगों के नाचने की जगह देश की संसद को निकालनी चाहिए, और राष्ट्रीय महत्व के इस मुद्दे पर चर्चा करनी चाहिए, क्योंकि चीन तो 1962 के पहले से भी समस्या बना हुआ है, और उस मोर्चे पर अभी हाल-फिलहाल तो कुछ दर्जन हिन्दुस्तानी सैनिक ही शहीद हुए हैं, इसलिए महत्व के हिसाब से संसद को भी फिलहाल सिर्फ कंगना के दफ्तर पर अपना फोकस बनाए रखना चाहिए। 

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