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संवेदनाशून्य शासन व्यवस्था और झुग्गियों की पीड़ा
16-Sep-2020 1:39 PM 6
संवेदनाशून्य शासन व्यवस्था और झुग्गियों की पीड़ा

-डॉ. राजू पाण्डेय

दिल्ली में रेलवे की जमीन पर काबिज 48000 झुग्गियों को हटाए जाने विषयक सर्वोच्च न्यायालय का आदेश अनेक कारणों से असंगत है और इसलिए इसकी पुनर्समीक्षा की जानी चाहिए। यूएन स्पेशल रेपोर्टर ऑन द राइट टू एडिक्वेट हाउसिंग (28 अप्रैल 2020) के अनुसार ‘इस महामारी के समय में अपने घर से बेदखल किया जाना मृत्युदंड तुल्य है।’ अत: देशों से आग्रह है कि नियम विरुद्ध बने आवासों से जबरन बेदखली या विस्थापन न किया जाए। अनेक देशों के न्यायालयों द्वारा आदेश पारित कर यह सुनिश्चित किया गया है कि वैश्विक महामारी के इस दौर में अवैध आवासों से बेदखली की प्रक्रिया पर रोक लगे। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय का आदेश उस वैश्विक सहमति के विरुद्ध है जो कोविड काल में आवास के अधिकार की रक्षा के संबंध में बनी है।

सर्वोच्च न्यायालय का वर्तमान आदेश मूलभूत नागरिक अधिकारों और बेदखली से संबंधित वर्तमान वैधानिक प्रावधानों एवं स्थापित प्रक्रियाओं से भी संगति नहीं दर्शाता। यह आदेश इन लाखों झुग्गीवासियों के राइट टू हाउसिंग के विषय में मौन है। ओल्गा टेलिस एवं अन्य विरुद्ध बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन मामले में 1985 में सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की एक बेंच ने यह माना था कि संविधान का अनुच्छेद 21 हमें आजीविका और आवास का अधिकार प्रदान करता है। पीठ के अनुसार राइट टू हाउसिंग द्वारा नागरिक को अतिक्रमण हटाने से पूर्व नोटिस दिए जाने और उसके पक्ष की सुनवाई की पात्रता तथा विस्थापन के बाद उस समय प्रचलित सरकारी योजनाओं के तहत पुनर्वास की पात्रता प्राप्त होती है। 

ओल्गा टेलिस मामले में पीठ के निर्णय में बेदखल किए गए लोगों के पक्ष में किए प्रावधानों को विधि विशेषज्ञ कमजोर मानते हैं और इसलिए इस फैसले की आलोचना होती रही है। व्यवहार में नागरिक को मिलने वाले एंटाइटलमेंट अप्रभावी ही सिद्ध होते हैं। नोटिस और सुनवाई का स्वरूप इस प्रकार निर्धारित किया गया होता है कि बेदखली से प्रभावित के पक्ष में निर्णय होने की संभावना नगण्य होती है। इसी प्रकार पुनर्वास के लिए तत्समय प्रचलित योजनाओं के अधीन पात्रता हासिल करना एक दुरूह कार्य होता है क्योंकि उक्त स्थान पर बसने के विषय में जो कट ऑफ डेट निर्धारित की जाती है वह कुछ ऐसी होती है कि अधिकांश प्रभावित उसके बाद से ही उस स्थान पर निवास कर रहे होते हैं और इस प्रकार पुनर्वास का लाभ प्राप्त नहीं कर पाते। कई बार प्रभावितों के लिए दस्तावेजों के अभाव में यह सिद्ध करना कठिन होता है कि वे कब से उक्त स्थान पर निवास कर रहे हैं। अनेक बार पुनर्वास योजनाओं की अनुपलब्धता, उनका स्वरूप और क्रियान्वयन तिथि आदि भी तकनीकी जटिलता उत्पन्न करते हैं। प्राय: बेदखल होने वाले लोग निर्धन,अशिक्षित एवं असंगठित होते हैं और इनके लिए कानूनी लड़ाई लडऩा कठिन होता है।  

उषा रामनाथन जैसे जानकार यह मानते हैं कि ओल्गा टेलिस मामले में पीठ का निर्णय आजीविका और आवास के अधिकार को नोटिस और हियरिंग की न्यूनतम प्रक्रिया में सीमित कर कमजोर कर देता है जबकि अनिंदिता मुखर्जी कहती हैं कि जीवन के अधिकार के तहत आवास की आवश्यकता को न्यायालय स्वीकारते तो हैं किंतु उनकी यह स्वीकृति शाब्दिक अधिक है क्योंकि वे इसके लिए ठोस प्रावधान नहीं करते।

किंतु सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान निर्णय में तो ओल्गा टेलिस प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट की अधिक बड़ी बेंच द्वारा बेदखली से प्रभावित लोगों को दी गई मामूली राहत का भी ध्यान नहीं रखा गया है। रिषिका सहगल जैसे विधि विशेषज्ञ यह ध्यान दिलाते हैं कि ओल्गा टेलिस मामले का फैसला सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच द्वारा दिया गया था इसलिए इसे 31 अगस्त 2020 को 48000 झुग्गियों को हटाने का आदेश पारित करने वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच को ध्यान में रखना था और यदि वे ऐसा कर पाने में असफल रहे हैं तो यह आदेश विधि विरुद्ध माना जाएगा। इन विशेषज्ञों के अनुसार वर्ष 2010 में सुदामा सिंह मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि यह राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह बेदखली से पहले बेदखली से प्रभावित होने वाले लोगों का सर्वेक्षण कर यह ज्ञात करे कि वे वर्तमान पुनर्वास योजनाओं के अंतर्गत लाभ प्राप्त करने की पात्रता रखते हैं अथवा नहीं और तदुपरांत प्रत्येक बेदखली प्रभावित से चर्चा करते हुए पुनर्वास की प्रक्रिया का सार्थक क्रियान्वयन करे। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सुदामा सिंह प्रकरण में दिए गए इस फैसले के निष्कर्षों को सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2012 एवं 2017 में सही ठहराया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने 18 मार्च 2019 को अजय माकन एवं अन्य विरुद्ध यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य मामले में सुदामा सिंह प्रकरण में दिए निर्णय की ही फिर से पुष्टि की। 

उक्त मामले में रेल मंत्रालय ने बिना नोटिस दिए और बिना तत्कालीन पुनर्वास योजनाओं के अंतर्गत बेदखली प्रभावित लोगों की पात्रता संबंधी सर्वे कराए रेलवे की जमीन पर बनी शकूर बस्ती को ढहा दिया था जिससे 5000 लोग बेघर हो गए थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने इसे गलत ठहराया और सुदामा सिंह मामले में अपनाई गई प्रक्रिया का पालन करने हेतु कहा। सुदामा सिंह और अजय माकन प्रकरणों से यह स्पष्ट होता है कि दिल्ली में दिल्ली स्लम एंड झुग्गी झोपड़ी रिहैबिलिटेशन एंड रिलोकेशन पॉलिसी 2015 अब प्रभावी है, यह पॉलिसी दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड एक्ट 2010 के प्रावधानों के अनुसार तैयार की गई है। यह नीति झुग्गी बस्तियों के उसी स्थल पर उन्नयन और सुधार पर बल देती है जहाँ वे अवस्थित हैं। इस नीति में यह स्पष्ट उल्लेख है कि 2006 से पूर्व निर्मित बस्तियों को असाधारण कारणों से ही हटाया जाए। सुप्रीम कोर्ट का 31 अगस्त 2020 का आदेश इस वैधानिक ढांचे की अनदेखी करता है।

जिस असंवेदनशील, अदूरदर्शी और अविचारित विकास प्रक्रिया के कारण झुग्गी बस्तियां अस्तित्व में आती हैं उसकी छाप इन झुग्गी बस्तियों से संबंधित शासकीय आदेशों और नियमों में भी स्पष्ट दिखाई देती है। जब हम भारत में झुग्गी बस्तियों या गंदी बस्तियों में निवास करने वाले लोगों की विशाल संख्या पर नजर डालते हैं तब प्रशासन तंत्र की यह बेरहमी और डरावनी लगने लगती है। देश की 2011 की जनगणना और यूनाइटेड नेशंस के मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स डाटाबेस, स्लम पापुलेशन इन अर्बन एरियाज ऑफ इंडिया 2014 के अनुसार शहरी झुग्गी वासियों की संख्या 5 करोड़ 20 लाख से 9 करोड़ 80 लाख के बीच है। यह दुर्भाग्य का विषय है कि झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों की संख्या और उनकी जीवन दशाओं के संबंध में मानक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में बारंबार यह उल्लेख मिलता है कि इन अर्बन स्लम्स में रहने वाली आबादी हर स्वास्थ्य मानक में अन्य देशवासियों से कहीं पीछे है। 

देश की 59 प्रतिशत झुग्गी बस्तियां अधिसूचित नहीं हैं। अधिसूचित न होने के कारण जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं के संदर्भ में उन्हें विभिन्न शासकीय योजनाओं का वैसा लाभ प्राप्त नहीं हो पाता जैसा अन्य लोगों को मिलता है। बिजली, पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में झुग्गी वासी भेदभाव का शिकार होते हैं। नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन के 2013 के आंकड़े यह बताते हैं कि 37 प्रतिशत झुग्गियां इस कारण नोटिफाई नहीं हो पाई हैं क्योंकि जिन झुग्गी बस्तियों में ये अवस्थित हैं उनकी जनसंख्या निर्धारित मानकों से कम है। लारा बी नोलान, डेविड ई ब्लूम और रामनाथ सुब्बारमन ने एक शोधपत्र में यह बताया है कि अधिसूचित होने के बाद इन झुग्गी वासियों को मिलने वाले कानूनी अधिकारों में भी भिन्नता है। कई राज्य अधिसूचित झुग्गी बस्तियों को एक निश्चित अवधि तक न उजाड़े जाने का आश्वासन देते हैं और विकास योजनाओं के कारण बेदखल किए जाने पर पुनर्वास का भरोसा भी। अधिसूचित करने के मापदंडों में भी विविधता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली और तमिलनाडु में झुग्गी बस्तियों को अधिसूचित करने के नियम अत्यंत कठोर हैं। दिल्ली में 1973 और तमिलनाडु में 1985 के बाद से किसी स्लम को नोटिफाई नहीं किया गया है। जबकि आंध्रप्रदेश में अधिसूचित करने के नियम सरल और उदार हैं और वहाँ 2012 की स्थिति में 89 प्रतिशत झुग्गी बस्तियाँ अधिसूचित थीं। 

यूएनडीपी की एक रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली की कुल भूमि के 18.9 प्रतिशत भाग पर स्लम्स हैं जबकि कोलकाता के 11.72, चेन्नई के 25.6 और मुम्बई के 6 प्रतिशत भूभाग पर झुग्गी बस्तियां स्थित हैं। 

दिल्ली की आधी आबादी झुग्गियों और अनाधिकृत बसाहटों में रहती है। 69 वें नेशनल सैंपल सर्वे के अनुसार दिल्ली की 6343 झुग्गी बस्तियों में से 28 प्रतिशत रेलवे की भूमि पर हैं। दिल्ली की पुल मिठाई जैसी तीन दशक पुरानी बस्तियों को रेल विभाग 1990 के दशक से ही उजाड़ता रहा है। पिछले 15 वर्षों में भी 2006, 2008, 2009 और 2010 में इस बस्ती को उजाड़ा गया है। यहाँ के निवासियों के पुनर्वास के कोई प्रबंध नहीं किए गए बल्कि इन्हें उन भू माफियाओं की शरण में जाने के लिए छोड़ दिया गया है जो इन्हें उसी स्थान पर या नए स्थान पर अतिक्रमण करने को उकसाते रहे हैं और संरक्षण के बदले में इनसे रकम की वसूली करते रहे हैं।

इंडियन रेलवेज हमारे देश का एक ऐसा महकमा है जिसके पास सर्वाधिक जमीन है। एक आरटीआई के जवाब में रेल विभाग ने यह जानकारी दी थी कि इंडियन रेलवेज के पास पूरे देश भर में विभिन्न राज्यों में फैली 4 लाख 32 हजार हेक्टेयर जमीन है। इसमें से 31 मार्च 2007 की स्थिति में 1905 हेक्टेयर जमीन पर अतिक्रमण था जो इंडियन रेलवेज की कुल भूमि का केवल .44 प्रतिशत है। आरटीआई के जवाब में यह भी कहा गया था कि रेल विभाग राज्यवार डाटा नहीं रखता। 

वर्ष 2006 से ही रेल विभाग अपने अधिकार की ऐसी भूमि को जो उसकी आवश्यकताओं के अतिरिक्त है, व्यावसायिक प्रयोजन हेतु प्रयुक्त कर लाभ कमाने के विषय में सोचता रहा है और इसी वर्ष 2006 में रेलवे लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी की स्थापना की गई थी जिसका उद्देश्य रेलवे की भूमि को अतिक्रमण मुक्त कर व्यावसायिक प्रयोजन हेतु उपयोग में लाना था। रेलवे दो कानूनों के माध्यम से अपनी भूमि को अतिक्रमण मुक्त करता है- पब्लिक प्रीमाईसेस (एविक्शन ऑफ अनऑथोराइज़्ड ऑक्यूपैंट) एक्ट,1971 तथा द रेलवेज एक्ट, 1989।  जैसा कि हर शहर में रेलवे की जमीन के साथ है,  दिल्ली में भी रेलवे की अतिक्रमित भूमि  प्राइम लोकेशन में है और देश के नामी धनकुबेरों के लिए इससे बड़ी खुशकिस्मती और क्या हो सकती है कि सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से सारे अवरोध हटा दिए जाएं एवं रेलवे इस भूमि को आननफानन में अतिक्रमण मुक्त कर उन्हें औने पौने दामों पर बेच दे। हालांकि रेलवे बोर्ड की गाईड लाईन में यह प्रावधान भी है कि यदि अतिक्रमण की गई भूमि रेलवे के लिए अनुपयोगी है तो यह राज्य सरकार को मार्केट वैल्यू के 99 प्रतिशत के भुगतान के बाद 35 साल की लीज पर भी दी जा सकती है। 

जो झुग्गी बस्तियां रेलवे की भूमि पर स्थित हैं वे अधिकांशतया अधिसूचित नहीं हैं। लोग यहाँ मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अमानवीय दशाओं में वर्षों से रह रहे हैं। दिल्ली की कुछ झुग्गी बस्तियां तो तीस से भी अधिक वर्षों से मौजूद हैं फिर भी यहाँ सार्वजनिक शौचालय तक नहीं बनाए गए हैं और लोग पटरियों के किनारे शौच के लिए विवश हैं। भारतीय रेलवेज के पास कोई रिहैबिलिटेशन एंड रीसेटलमेंट पॉलिसी नहीं है। भारतीय रेलवेज के अनुसार हाउसिंग राज्य का विषय है और रेलवे की जमीन से बेदखल किए गए झुग्गीवासियों के पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर है।  यद्यपि दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार की आर एंड आर पॉलिसी में ऐसे प्रावधान हैं जिनके अनुसार रेलवे की जमीन से बेदखल किए गए लोगों के पुनर्वास पर आने वाला खर्च पूर्ण या आंशिक रूप से रेलवे द्वारा वहन किया जाएगा-किंतु जैसा बेदखली और विस्थापन के हर प्रकरण में होता है कि यह केवल घर पर बुलडोजर चलाने की प्रक्रिया नहीं होती बल्कि आजीविका छीनने और सपनों को कुचलने का क्रूर प्रक्रम होता है- इन सारे प्रावधानों के लाभ कदाचित ही प्रभावितों को मिल पाते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय के 31 अगस्त 2020 के आदेश के समर्थन में अनेक वेब पोर्टल्स में और सोशल मीडिया पर कुछ टिप्पणियां एवं आलेख पढऩे को मिले। इन आलेखों से गुजरना एक डरावना अनुभव है। इनमें बताया गया है कि यह झुग्गी बस्तियां देश की राजधानी के चेहरे पर एक बदनुमा दाग की भांति हैं। यह राजधानी में गंदगी, बीमारी और अपराध फैलाने के केंद्र हैं। यहाँ के लोगों की आजीविका अवैध शराब, ड्रग्स, देह व्यापार, हथियारों की खरीद बिक्री आदि के माध्यम से चलती है। कुछ एक सोशल मीडिया पोस्टों में यह भी कहा गया था कि इन झुग्गी बस्तियों में रोहिंग्या मुसलमान रहते हैं जो देश की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं। यह कल्पना करना भी कठिन है कि नफरत, संदेह और अविश्वास के नैरेटिव का विस्तार नव उदारवादी आर्थिक विकास के दुष्परिणामों के शिकार इन निरीह झुग्गी वासियों तक हो सकता है। किंतु ऐसा हो रहा है और ऐसी पोस्टों को हजारों लाइक्स और शेयर भी मिल रहे हैं।

पहले औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण और अब नव उदारवाद ने नगरीकरण को बढ़ावा दिया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि की उपेक्षा कर यह हालात पैदा किए गए हैं कि लोग आजीविका की तलाश में शहरों की ओर पलायन करें और शहरी कारखानों को सस्ते मजदूर मिल सकें। शहरी सभ्यता को इन मजदूरों की मेहनत की आवश्यकता तो है किंतु इन्हें सम्मानजनक आवास और जीवन सुविधाएं देने को कोई तैयार नहीं है। सस्ते आवास की तलाश इन झुग्गी बस्तियों के निर्माण और विस्तार का कारण बनती है। पुख्ता वोट बैंक तलाशते राजनेता, भ्रष्ट पुलिस महकमा और नगरीय प्रशासन तथा इनसे जुड़े अपराधी तत्व लोगों को इन झुग्गी बस्तियों में बसने के लिए प्रेरित करते हैं। धीरे धीरे नगरों का विस्तार होता है और यह गंदी बस्तियां नगर के मध्य में आ जाती हैं। फिर इन्हें शहर के सौंदर्यीकरण के नाम पर हटाया जाता है। बेदखली के बाद पुनर्वास के अभाव में इनके निवासी फिर शहरों से बाहर दूसरी जगह तलाशने लगते हैं और फिर नेताओं,स्थानीय प्रशासन और पुलिस का भ्रष्ट और स्वार्थी गठबंधन इनके मददगार के रूप में खड़ा मिलता है। इन सुविधाहीन, जनसंकुल और सघन बस्तियों में कुछ अपराधी तत्व भी शरण ले लेते हैं और इनके कारण इन झुग्गी बस्तियों में निवास करने वाले हजारों मजदूरों पर अपराधी का ठप्पा लग जाता है यद्यपि ये रोज हाड़तोड़ मेहनत कर अपनी आजीविका अर्जित करते हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने यह कहा कि कोरोना काल में लगाए गए लॉकडाउन के कारण अपना रोजगार गंवाकर पलायन करने और अपनी जान गंवाने वाले प्रवासी मजदूरों के आंकड़े उसके पास उपलब्ध नहीं हैं इसलिए उन्हें मुआवजा देने का प्रश्न ही नहीं उठता। यह प्रवासी मजदूर ही इन गंदी बस्तियों में सर्वाधिक संख्या में निवास करते हैं। यह सरकारी आंकड़ों से बाहर और सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित लोग हैं जिन्हें जब चाहा बसाया और जब चाहा उजाड़ा जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला उस दृष्टिकोण को बढ़ावा दे सकता है जिसके अनुसार यह झुग्गी बस्तियाँ अपराध, आतंकवाद, गंदगी और रोग फैलाने के लिए उत्तरदायी हैं और इनके निवासियों के साथ वैसा ही बर्ताव होना चाहिए जैसा किसी अपराधी के साथ होता है। ऐसा ही एक निर्णय वर्ष 2000 में अलमित्रा एच पटेल वर्सेज यूनियन ऑफ इंडिया मामले में दिया गया था। इस निर्णय से भी ऐसा संकेत गया था कि झुग्गियां और झुग्गी वासी गंदगी फैलाते हैं और इस गंदगी की सफाई जरूरी है। यह फैसला भी इन झुग्गीवासियों के मूल मानवीय अधिकारों के विषय में मौन था। इसी प्रकार का  फैसला एनजीटी ने 2015 में एक पीआईएल पर दिया था जब उसने रेल ट्रैक के किनारे के प्लास्टिक और अन्य कचरे के लिए रेलवे के स्थान पर इन झुग्गियों को जिम्मेदार ठहराया था और इन्हें हटाने हेतु दिल्ली सरकार को निर्देशित किया था।

रेलवे की परियोजनाएं वैसे ही पर्यावरणीय उत्तरदायित्वों से मुक्त रहती हैं और एनजीटी के इस प्रकार के निर्णय अंतत: निर्धनों की परेशानियों में इजाफा करेंगे। पूंजीवादी पर्यावरणवाद अपने फायदे के लिए पहले भी आदिवासियों को वनों और दुर्लभ वन्य पशुओं के विनाश के लिए उत्तरदायी ठहराने की कोशिश करता रहा है ताकि उनका विस्थापन किया जा सके।
 
बहरहाल नए भारत में मनुष्य होना और उस पर भी निर्धन होना यदि अपराध की श्रेणी में आने वाला है तो इन झुग्गी वासियों के लिए आने वाला समय बहुत कठिन होगा।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)

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