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कोरोना में बस्तर, आँखों देखा, और साथ ढोया हाल...
18-Sep-2020 2:23 PM 2
कोरोना में बस्तर, आँखों देखा, और साथ ढोया हाल...

पढ़ें : ‘साथी’ संस्था के भूपेश तिवारी का लिखा -

बस्तर का परम्परागत सपोर्ट सिस्टम (एक दूसरे को सहयोग करने की भावना) अद्भुत है, शादी विवाह, धार्मिक अनुष्ठान, मृत्यु के समय होने वाले कार्यो अथवा अन्य किसी भी प्रकार के सार्वजनिक आयोजनों का प्रबंधन बहुत ही आसान एवं बिना आर्थिक भार के सबके सहयोग से सम्पन्न किया जाता है, जबकि सभ्य एवं विकसित समाजों में इस प्रकार के आयोजनों की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होती है, जिसके यहां कार्यक्रम आयोजित हो रहा है।
 
बस्तर का आदिवासी समुदाय विपरीत परिस्थितियों में, न्यूनतम शासकीय सुविधाओं के बावजूद खुश रहने वाला है। सरकार द्वारा स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, रोजगार आदि जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध ना करवाने के बाद भी कभी शिकायत ना करते हुए जो मिल रहा है उसी में खुश है। 

बस्तर के लोग संग्रह करने की जगह अपरिग्रही है, प्रकृति से उतना ही लेते है, जितने की आवश्यकता है। हमारे जैसे पढ़े-लिखे लोग अपने घरों में सालभर हेतु आवश्यक खाद्यान्न एक बार में ही संग्रह करके रखते हैं, जबकि उसके उलट स्थानीय लोग ज्यादा से ज्यादा 1 या 2 सप्ताह के राशन अथवा अन्य संसाधनों की व्यवस्था करके रखते है।

वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण मार्च माह से जब लॉकडाउन प्रारंभ हुआ तो आनन्द से जीने वाले बस्तर के लोगों को काफी परेशानी में डाल दिया। नारायणपुर, कोण्डागांव, बस्तर जिले के लोगों के साथ ग्रामीण विकास के कार्य करने वाली ‘साथी’ समाज सेवी संस्था ने कोरोनाकाल में अपने हितग्राहियों को कोरोना के कारण उत्पन्न स्थिति में बहुत मुसीबत में देखा तथा अपने सामाजिक दायित्व को समझते हुए आपदा की इस घड़ी में ग्रामीण समुदाय को यथा योग्य सहयोग उपलब्ध कराने का जिम्मा उठाया।

  
नारायणपुर एक छोटा सा जिला जिसकी जनसंख्या सिर्फ 140000 तथा सभी गांवों तक खाने-पीने राशि आदि की सप्लाई या तो नारायणपुर शहर से है या फिर साप्ताहिक हाट बाजारों से है। लॉकडाउन के कारण नारायणपुर शहर तथा गांव-गांव में लगने वाले साप्ताहिक हाट बाजार बंद होने तथा गांवों से शहर तक आने वाले वाहनों का संचालन पूर्णत: जब बंद हो गया तो नारायणपुर से गांव-गांव तक पहुंचने वाली आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बन्द हो गई। गांव के दुकानदारों के पास अपने स्वंय के वाहन ना होने के कारण वो लोग नारायणपुर से आवश्यक वस्तुओं को गांव तक ले जाने में असमर्थ हो गए। ऐसी परिस्थिति में ग्रामीणों को दैनन्दिन खाने पीने की वस्तुओं का मिलना मुश्किल हो गया था। 

साथी समाज सेवी संस्था जो पिछले 30 वर्षों से बस्तर के लोगों के विकास के लिए कार्य कर रही है, जब हमारे संज्ञान में खाने-पीने की वस्तुओं की गांव में अनुपलब्धता की समस्या आई तो संस्था ने इस समस्या के समाधान की दिशा में कार्य करने का निर्णय लिया। हमारा मानना था कि जिस समाज के साथ हम वर्षों से कार्य कर रहे हैं अगर आज हम उस समाज के कठिन समय में उनके साथ खड़े नहीं होंगे तो कल उन्हें अपना मुंह कैसे दिखाएंगे। 

संस्था के कार्यकर्ताओं तथा पदाधिकारियों के संयुक्त प्रयासों से 5 लाख रुपये एकत्रित कर उससे राहत सामग्री वितरण का कार्य प्रारंभ किया। राहत सामग्री में हमने राशन तथा स्वच्छता किट का वितरण करना प्रारंभ किया, प्राथमिकता के आधार पर पहचान कर अति जरूरतमंद परिवारों तक राशन पहुंचाने का जो सिललिसा अप्रैल माह में प्रारंभ हुआ वो आज भी जारी है, संस्था ने अपने सहयोगी संस्थानों को प्रस्ताव भेज कर राहत सामग्री वितरण हेतु सहयोग मांगा और अधिकतर संस्थाओं ने हमें भरपूर सहयोग उपलब्ध कराया है, प्रमुख रूप से अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन, अजीम प्रेमजी फिलियोथ्रोपिक इनीशियेटिव, अकाई फाउण्डेशन, क्रियेटिव डिग्निटी, जीव दया फाउण्डेशन के साथ व्यक्तिगत रूप से शेफाली खन्ना डिजाइनर तथा रूचि एवं आकाश शर्मा लंदन, रवि शर्मा बैंगलोर, डॉ बी.एल. शर्मा, ग्वालियर आदि ने बढ़-चढक़र इस राहत के यज्ञ में अपना योगदान दिया । 

नारायणपुर जिले में बुजुर्ग, दिव्यांग, गर्भवती महिलाओं, विधवाओं, परित्यक्ताओं, सिंगल मदर्स आदि को मिलाकर लगभर 1347 परिवारों के 5611 लोगों तक प्रथम चरण में राहत सामग्री पहुंचाई गई।

सघन मलेरिया, डायरिया तथा कोविड-19 से बचाव हेतु जागरूकता अभियान 

नारायणपुर छत्तीसगढ़ राज्य का अत्यंत पिछड़ा जिला है, जिले का ओरछा (अबुझमाड़) विकासखण्ड तो विकास के कोसों दूर है। साथी संस्था नारायणपुर जिले में यूनिसेफ के सहयोग से वर्ष 2012 से लगभग 140 गांवों में स्वास्थ्य एवं पोषण हेतु कार्यरत है, नारायणपुर जिले में मातृ मृत्युदर तथा शिशु मृत्यृदर राज्य के औसत की तुलना में बहुत अधिक है, विगत 9 वर्षों में संस्था ने मातृ मृत्युदर एवं शिशु मृत्युदर को कम करने हेतु कई नवाचार प्रारंभ किये हैं जिसके परिणामस्वरूप दोनों की मृत्युदर में कमी दर्ज की गई है। जब कोरोना महामारी के कारण स्थितियां भारत में बिगडऩे लगी तो हमारी समझ में एक बात पूरी स्पष्टता से आई कि बस्तर क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं, सेवा प्रदाताओं के साथ अन्य संसाधनों की भारी कमी तो है ही शासन के लिए भी यहां के क्षेत्रफल को देखते हुए सेवाएं दे पाना एक बड़ी चुनौती है, अशिक्षा, जागरूकता की कमी तथा पराम्परागत, नकारात्मक व्यवहारों को अपनाने के कारण अगर यहां के ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना आ गया तो परिस्थितियों अत्यंत भयानक तथा अनियंत्रित हो सकती हैं, यही सोचकर संस्था ने 16 मार्च 2020 से ही अपने लगभर 65 कार्यकर्ताओं को कोरोना से बचाव एवं जागरूकता हेतु सतर्क रहने तथा समुदाय के साथ सतत संपर्क बनाकर रहने के दिशा निर्देश जारी कर दिये थे।
जिसके परिणामस्वरूप प्रत्येक गांव में बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक के साथ-साथ प्रत्येक घर में हाथ धोने हेतु साबुन एवं पानी की व्यवस्था  गांव में चेक पोस्ट पर गांव के युवाओं की ड्यूटी के साथ वहां पर भी ड्रम में पानी रखवाने की व्यवस्था की गई । स्थानीय भाषा में छोटे-छोटे ऑडियो द्वारा साफ एवं स्पष्ट संदेश व्हाट्सअप गु्रप में डाले गए। लगभग 72 गांवों में कला जत्था दल के माध्यम से मलेरिया, डायरिया, हैजा तथा कोरोना से बचाव हेतु जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया।
 
नारायणपुर जिला प्रशासन को सक्रिय सहयोग-
जिला प्रशासन नारायणपुर द्वारा जिले में फंसे बाहर के मजदूरों के लिए स्थापित शिविरों में राशन एवं हरी सब्जियों की व्यवस्था संस्था द्वारा लगातार की जाती रही। जब बाहर के मजदूर जो बाहर से वापस आए थे उनके लिए बनाए गए क्वॉरंटीन सेन्टर्स में भी राशन सब्जी, सेनिटाइजर, सेनेटरी पैड, साबुन आदि की व्यवस्था लगातार उपलब्ध कराई जाती रही। दक्षिण भारत से वापस आने वाले मजदूरों को कोण्डागांव से नारायणपुर तक पहुंचाने हेतु वाहनों की व्यवस्था भी की गई, तमिलनाडु में फंसे नाबालिग बच्चों को रेस्क्यू कराने में भी साथी संस्था ने चाइल्ड लाइन के माध्यम से महत्वपूर्ण सहयोग दिया ।

परम्परागत हस्तशिल्पियों को राहत वितरण का द्वितीय चरण
वैश्विक महामारी कोविड-19 का प्रभाव वैसे तो सभी के ऊपर पड़ा है, व्यापारी, नौकरीपेशा, छोटे व्यवसायी, उद्योगपति कोई भी इसकी भार से अछूता नहीं हैं। बस्तर की विभिन्न हस्तशिल्प कलाओं से जुड़े समुदायों पर इसका बहुत प्रभाव पड़ा है, स्थानीय अथवा बाहरी बाजारों की मांग अनुरूप अपनी शिल्प कला का उत्पादन करने वाले लोहार, कुम्हार, घड़वा, बांस शिल्पी आदि के ऊपर बहुत विपरीत प्रभाव पड़े है । इन सभी शिल्पकारों का असली व्यापार का सीजन मार्च से प्रारंभ होकर दीपावली के बाद तक चलता है, जिससे ये शिल्पकार अपने वर्ष भर की आवश्कताओं की पूर्ति हेतु कमाई कर लेते है। कुम्हारों ने पूरी तरह से अपनी गर्मी का धंधा खोया, गणेश उत्सव, दुर्गापूजा, दीपावली के मुख्य त्यौहारी सीजन में किसी शिल्पकार के पास कोई काम धंधा नहीं है, हाट बाजार, बाहर शहरों में प्रदर्शनी पूरी तरह बंद है, यहां तक कि ये शिल्पी अपने ऑर्डर की आपूर्ति भी नहीं कर पा रहे है। देश भर के हस्तशिल्प के व्यापार से जुड़े लोग असमंजस में है इस कारण शिल्पकारों को दिये गये लगभग सभी आर्डर निरस्त हो गए है ऐसी परिस्थितियों में साथी समाज सेवी संस्था ने महसूस किया कि कोण्डागांव, नारायणपुर तथा जगदलपुर जिले के अधिकांश शिल्पी मुसीबत में है। अपना जीवन चलाने हेतु ऊंची दरों पर ब्याज में ऋण लेकर अपने भोजन की व्यवस्था कर रहे है तथा जिनके पास अपने कार्य हेतु जो थोड़ी बहुत पंूजी है उसे अपने भोजन पर खर्च कर रहे है । ऐसी गंभीर स्थिति में साथी संस्था ने अपने सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बहुत ही संवेदनशीलता से निभाते हुए कोण्डागांव जिले के लगभग 1660 परिवारों तक तथा जगदलपुर के 123 परिवारों तक एक माह का राशन पहुंचाकर शिल्पकार समुदायों की मदद की। 

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