संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बेकाबू कोरोना के बीच छत्तीसगढ़ एक बार फिर लॉकडाऊन की ओर बढ़ा, यह नासमझी भरा न हो...
19-Sep-2020 4:14 PM 1
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बेकाबू कोरोना के बीच छत्तीसगढ़ एक बार फिर लॉकडाऊन की ओर बढ़ा, यह नासमझी भरा न हो...

छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में रोजाना सैकड़ों कोरोना पॉजिटिव मिल रहे हैं, और राजधानी रायपुर तो हर दिन पांच सौ से अधिक का आंकड़ा पेश कर रही है। ऐसे में अब तक रायपुर और उससे लगे हुए औद्योगिक जिले दुर्ग में लॉकडाऊन की घोषणा की गई है। आज जब यह घोषणा हो रही थी उस वक्त राजधानी की सडक़ों का हाल यह था कि उस पर से गुजर रहे लोगों में से आधे लोग भी मास्क लगाए हुए नहीं थे, और सडक़ किनारे फल-सब्जी और दूसरी चीजें बेचते हुए लोगों में से पांच फीसदी लोग भी मास्क लगाए नहीं दिख रहे थे। यह देश ऐसे गैरजिम्मेदार लोगों का देश हो गया है कि जो न अपने मरने की परवाह करते, न ही अपने आसपास के लोगों की मौत की। ऐसी ही गैरजिम्मेदारी लोगों में हेलमेट और सीट बेल्ट को लेकर दिखती है, लेकिन उसमें मौत उनकी अकेले की होती है, हेलमेट न पहनने से दूसरे नहीं मारे जाते, लेकिन मास्क न पहनने से जो संक्रमण फैल रहा है उससे दूसरे लोग भी मारे जा रहे हैं। 

छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से प्रदेश हैं जहां लोग इसी तरह गैरजिम्मेदार हैं। और ऐसे लोगों के बीच राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी बनती है कि महामारी कानून का कड़ा इस्तेमाल करके अराजक लोगों पर बड़ा जुर्माना लगाए, उनकी गाडिय़ां जब्त करे, गिरफ्तारी छोडक़र बाकी किस्म की सजा मिलने पर ही लोगों पर कोई असर हो सकता है। आज गिरफ्तारी की बात हम इसलिए नहीं सुझा रहे क्योंकि जेलें अपने आपमें खतरनाक जगह हो गई है, और सरकार को वहां की आबादी घटाना भी चाहिए। लेकिन लोगों पर मोटा जुर्माना लगे, उनकी गाडिय़ां जब्त हों, अगर बिना मास्क लगाए वे सामान बेच रहे हैं तो सामान जब्त हों, तो ही जाकर लोगों को कुछ अकल आ सकती है। महामारी को रोकने के लिए एक कड़ा कानून बना इसीलिए है कि नालायकों से संक्रमण बेकसूर और जिम्मेदार लोगों तक न पहुंचे, बीमारी और मौत पर काबू पाया जा सके। 

हम लगातार इस मुद्दे पर लिख रहे हैं, और कल ही हमने इम्तिहानों के खिलाफ लिखा था, और स्कूल-कॉलेज खोलने के खिलाफ लिखा था। आज जिस प्रदेश में नौबत इतनी खराब है कि हर दिन आधा दर्जन से लेकर एक दर्जन तक जिलों में सौ-सौ से अधिक कोरोना पॉजिटिव निकल रहे हैं, वहां पर स्कूल-कॉलेज खोलने का फैसला एक आत्मघाती बेवकूफी के अलावा और कुछ नहीं हो सकता था। आज भी यह साफ नहीं है कि सरकार स्कूल-कॉलेज के बारे में भी कोई फैसले ले रही है, या नहीं। लेकिन जिस राजधानी में बाकी जिलों के मुकाबले बहुत अधिक पुलिस है, वहां हाल यह है कि लोगों के मास्क पहनने की निगरानी नहीं रखी जा रही है। आमतौर पर राजधानी प्रदेश में एक नमूना होती है कि जिसे देखकर बाकी जिलों के अफसर भी कुछ सोचें, लेकिन छत्तीसगढ़ में आज राजधानी में कोई अफसर किसी तरह की सख्ती बरतना नहीं चाह रहे हैं, सडक़ों पर मास्क लागू करवाने का काम भी नहीं हो रहा है। ऐसे गैरजिम्मेदार जिले में यह तो होना ही था कि कोरोना इस रफ्तार से बढ़ता। आज भी अगर राजधानी को देखकर बाकी जिलों के लोग सबक नहीं लेंगे, तो श्मशान पर जलने के लिए भी जगह नहीं मिलेगी। 

शुरूआती महीनों में छत्तीसगढ़ सुरक्षित लगता था। उसकी एक वजह यह थी कि यहां न कोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा था, और न ही किसी पड़ोसी देश की सरहद इस प्रदेश को छूती थी। यह महानगरों से बहुत दूर भी था, और आदिवासी इलाकों, ग्रामीण इलाकों का शहरों से संपर्क कम था इसलिए बीमारी यहां तेजी से नहीं फैली थी। लेकिन अब यह प्रदेश बेकाबू दिख रहा है, और यह अकेले स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, यह पूरे राज्य शासन की जिम्मेदारी है जो कि प्रशासन का उपयोग नहीं कर पा रहा है। 

हमने कल इसी जगह दुकानों और बाजारों में भीडक़े बारे में लिखा था, दारू दुकानों में बेकाबू धक्का-मुक्की के बारे में लिखा था, और विश्वविद्यालय-कॉलेजों में छात्र-छात्राओं की धक्का-मुक्की वाली भीड़ के बारे में लिखा था। पूरी बात को यह दुहराना जगह की बर्बादी होगी लेकिन हम इतना जरूर कहना चाहते हैं कि जहां-जहां भीड़ लगती है, उन जगहों को अगर सरकार खुला रखना चाहती है, तो उन्हें रात-दिन पूरे वक्त के लिए खोल देना चाहिए। सीमित घंटों की खरीददारी में ऐसी ही मारामारी होना तय है। अभी फिर लॉकडाऊन के दौरान सीमित घंटों के लिए जरूरी सामानों की दुकानें खुलने देने का फैसला लिया गया है। ये सीमित घंटे ही कोरोना का संक्रमण बढ़ाएंगे, और जब तक भीड़ को शून्य करने का इंतजाम नहीं होगा, तब तक यह लॉकडाऊन बेअसर रहेगा। हम अफसरों की ऐसी सोच से बिल्कुल सहमत नहीं हैं कि किराना-सब्जी अगर रात-दिन खुले रखे जाएंगे, तो लोग इस बहाने घूमते रहेंगे। कोरोना लोगों की सडक़ों पर आवाजाही से नहीं फैल रहा है, भीड़ से फैल रहा है। ठेलों पर साथ में खाने से फैल रहा है, दारू दुकानों पर धक्का-मुक्की से फैल रहा है, कॉलेजों में उत्तरपुस्तिका के लिए धक्का-मुक्की से फैल रहा है। प्रदेश में जिलों का मैनेजमेंट कमजोर है क्योंकि अफसरों ने कभी ऐसी महामारी को काबू करना सीखा नहीं है। बेहतर यह होगा कि भीड़ और धक्का-मुक्की रोकने के बहुत आसान से मौजूद तरीके इस्तेमाल किए जाएं, न कि घंटों का प्रतिबंध लगाया जाए। 

बड़े नेताओं को भी अपना चेहरा बिना मास्क के दिखाना बंद कर देना चाहिए। तस्वीरों में चेहरा दिखने का मौका आगे कई बरस रहेगा, लेकिन आज अगर बड़े लोग ही बिना मास्क दिखते हैं, तो आम जनता का लापरवाह होना स्वाभाविक लगता है। नेताओं को कैमरा देखकर मास्क हटाने की आदत रहती है, लेकिन आम जनता तक अगर मास्क का संदेश देना है, तो कैमरों के सामने भी नेताओं के चेहरों को अपने को काबू में रखना होगा। और देश के कुछ नेता जिस तरह कलफ लगाया हुआ, प्रेस करके तह जमाया हुआ गमछा मुंह के सामने लपेटकर कोरोना से बचाव का संदेश देते हैं, वह भी बेअसर है। ऐसा कोई कडक़ और तह किया हुआ गमछा कोई कोरोना नहीं रोक सकता। 

आने वाले वक्त में कोरोना-महामारी कितनी बेकाबू हो सकती है यह अंदाज लगाना नामुमकिन है, इसलिए राज्य सरकार को जिलों के मार्फत सख्त फैसले लेने होंगे, और हमारा इतना अंदाज तो है कि हफ्ते भर का लॉकडाऊन काफी नहीं होगा। लॉकडाऊन आधी अधूरी इच्छाशक्ति से लागू नहीं होना चाहिए। जनता को भी इससे अधिक लंबे लॉकडाऊन के लिए तैयार रहना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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