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कोरोना वायरस के टेस्ट की कीमत इतनी कम हो जाने के बाद भी इतनी ज्यादा क्यों है?
23-Sep-2020 7:20 PM 8
कोरोना वायरस के टेस्ट की कीमत इतनी कम हो जाने के बाद भी इतनी ज्यादा क्यों है?

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-विकास बहुगुणा

अर्थशास्त्र का एक नियम कहता है कि किसी चीज की कीमत उसकी मांग और आपूर्ति के समीकरण पर निर्भर करती है. यानी मांग ज्यादा है और आपूर्ति कम तो कीमत ज्यादा हो जाएगी और इसकी उल्टी स्थिति में कम. लेकिन जैसा कि हर नियम के साथ होता है, इस नियम के भी कुछ अपवाद हैं. पूरी दुनिया को हिला चुके कोरोना वायरस के टेस्ट की कीमत को भी इन अपवादों में शामिल किया जा सकता है. इस कीमत में पहले से काफी कमी होने के बावजूद.

उत्तर प्रदेश सरकार ने बीते दिनों कोविड-19 की पुष्टि के लिए होने वाले आरटी-पीसीआर टेस्ट के दाम पर लगी सीमा को और कम कर दिया है. पहले यह 2500 रु थी जो अब 1600 रु हो गई है. सरकार का कहना है कि कोरोना टेस्टिंग के लिए इससे ज्यादा पैसा वसूलने वाली लैब्स के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. पहले यह सीमा 4500 रु थी जिसे जून में 2500 रु कर दिया गया था. महाराष्ट्र और झारखंड सहित दूसरी राज्य सरकारों ने भी हाल में ऐसे कदम उठाए हैं. इस तरह देखें तो अब देश में हर जगह कोरोना वायरस की टेस्टिंग की कीमत 2000 रु या इससे नीचे आ गई है. मार्च 2020 तक इसके लिए पांच हजार रु तक वसूले जा रहे थे. लेकिन कइयों को यह कीमत अब भी ज्यादा लग रही है.

कोरोना वायरस का टेस्ट तीन तरह से किया जा सकता है. पहला तरीका जेनेटिक है जिसमें मरीज के गले या नाक से लिए गए किसी सैंपल में कोरोना वायरस के डीएनए का पता लगाया जाता है. इसे ‘रिवर्स ट्रांस पॉलीमेरेज चेन रिएक्शन’ यानी आरटी-पीसीआर टेस्ट कहते हैं. दूसरा तरीका एंटीजन टेस्ट है जिसमें सैंपल में वे खास प्रोटीन तलाशे जाते हैं जो कोरोना वायरस की सतह पर पाए जाते हैं और इस तरह शरीर में संक्रमण की पहचान की जाती है. इसकी विशेषता यह है कि यह करीब आधा घंटे में निपट जाता है. हालांकि यह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है क्योंकि इसमें 60 फीसदी तक गलत नतीजे मिलने की बात कही जा रही है.

तीसरा तरीका एंटीबॉडी टेस्ट है. इसमें खून का सैंपल लेकर यह देखा जाता है कि उसमें कोरोना वायरस से लड़ने वाली रक्त कोशिकाएं यानी एंटीबॉडीज मौजूद हैं या नहीं. अगर हैं तो पुष्टि हो जाती है कि संबंधित व्यक्ति को कोरोना वायरस का संक्रमण हो चुका है. हालांकि यह तरीका सक्रिय संक्रमण की पहचान के लिए इस्तेमाल नहीं होता. बाकी दोनों तरीकों में से पीसीआर टेस्ट को ही विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कोरोना वायरस टेस्टिंग का ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ माना जाता है. यही वजह है कि यह सबसे ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है और इसको लेकर ही सबसे ज्यादा बहस भी हो रही है.

पहले यह समझते हैं कि आरटी-पीसीआर टेस्ट कैसे होता है. इसके लिए वायरसों से जुड़ी कुछ मोटी-मोटी जानकारियां समझनी होंगी. वायरस असल में कोशिकाओं में पाए जाने वाले अम्ल (न्यूक्लेइक एसिड) और प्रोटीन से बने सूक्ष्मजीव होते हैं. इन्हें एक जेनेटिक मटीरियल (आनुवांशिक सामग्री) भी कहा जा सकता है क्योंकि ये आरएनए और डीनए जैसी जेनेटिक सूचनाओं का एक सेट (जीनोम) होते हैं. जब कोई वायरस किसी जीवित कोशिका में पहुंचता है तो कोशिका के मूल आरएनए और डीएनए की जेनेटिक संरचना में अपनी जेनेटिक सूचनाएं डाल देता है. इससे वह कोशिका संक्रमित हो जाती है और अपने जैसी ही संक्रमित कोशिकाएं बनाने लगती है. यह ठीक वैसा ही है जैसा कोई सॉफ्टवेयर वायरस करता है. वह किसी सॉफ्टवेयर में प्रवेश करता है, उसे करप्ट करता है और उससे अपने मनचाहे काम करवाता है.

किसी व्यक्ति के शरीर में कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि के लिए उसके नाक या गले से स्वाब लेकर उसे लैब में भेजा जाता है क्योंकि कोरोना वायरस यहीं पैठ जमाए होता है. यह स्वाब मानव कोशिकाओं, वायरस और जीवाणुओं का मिश्रण होता है. इसके बाद कई तरह के केमिकल्स के जरिये इस सैंपल से प्रोटीन और दूसरी अवांछित चीजें हटाई जाती हैं. इसके बाद जो बचता है वह संबंधित व्यक्ति और वायरस (अगर वह संक्रमित है तो) दोनों के जेनेटिक मटीरियल का मिश्रण होता है. यानी सैंपल में दोनों का आरएनए होता है.

अब प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए इस आरएनए को डीएनए में बदलने की जरूरत पड़ती है. ऐसा रिवर्स ट्रांसक्रिप्टेस नाम के एक एंजाइम की मदद से किया जाता है. लेकिन इसके नतीजे में मिले डीएनए की मात्रा इतनी नहीं होती कि इसका ठीक से और सटीक विश्लेषण किया जा सके इसलिए इस डीएनए की असंख्य प्रतिलिपियां यानी कॉपीज बनाई जाती हैं. इस चरण को पॉलीमेरेस चेन रिएक्शन या पीसीआर कहते हैं. इसके लिए सैंपल में एक विशेष एंजाइम मिलाकर और उसे एक मशीन में रखकर इस मिश्रण को कई बार गर्म और ठंडा किया जाता है.

गर्म और ठंडा करने का हर चक्र कुछ ऐसी रासायनिक अभिक्रियाओं को जन्म देता है जिससे डीएनए की कॉपीज बनने लगती हैं. हर चक्र में यह संख्या दोगुनी हो जाती है. यानी पहले चक्र में दो कॉपीज बनती हैं तो दूसरे में चार और तीसरे में आठ. सटीक नतीजे के लिए औसतन ऐसे 35 चक्र दोहराये जाते हैं. इसका मतलब यह है कि यह चरण खत्म होने तक डीएनए की अरबों कॉपीज बन चुकी होती हैं. इसी दौरान सैंपल में एक फ्लूरोसेंट यानी चमकने वाली डाइ मिलाई जाती है और अगर इस प्रक्रिया के दौरान उसकी चमक एक खास स्तर को पार कर जाती है तो सैंपल में कोरोना वायरस के जेनेटिक मटीरियल की पुष्टि हो जाती है. यानी साफ हो जाता है कि मरीज कोरोना पॉजिटिव है. इस पूरी प्रक्रिया में कम से कम 24 घंटे का समय लगता है. लेकिन अच्छी बात यह है कि मशीन में एक साथ कई सैंपल्स का परीक्षण किया जा सकता है.

इसी आरटी-पीसीआर टेस्ट की कीमत को लेकर कुछ समय से बहस गर्म है जिस पर अलग-अलग पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं. नोएडा में लॉजिस्टिक्स के कारोबार से जुड़े विभांशु द्विवेदी कहते हैं, ‘कुछ दिनों पहले हमारे पास दक्षिण अफ्रीका से एक रिक्वायरमेंट आई जिसमें क्लाइंट को कोरोना टेस्टिंग किट चाहिए थी. तो हमने इसकी कॉस्टिंग वगैरह पर काम किया. किट में एक कॉटन स्वाब स्टिक और कंटेनर होते हैं जिनकी मदद से मरीज के नाक या गले से सैंपल लिया जाता है और लैब तक पहुंचने तक सुरक्षित रखा जाता है. हमने कुछ मैन्युफैक्चरर्स से पता किया तो इन दोनों चीजों की लागत 12 रु के करीब आ रही थी. सात रु की स्वाब स्टिक और पांच रु का कंटेनर.’ सवाल है कि इसके बाद लैब संबंधी प्रक्रियाओं से जुड़े दूसरे तमाम खर्चों का भी हिसाब लगा लें तो क्या टेस्ट के लिए डेढ़ से लेकर दो हजार रु या कुछ समय पहले की साढ़े चार हजार रुपये की कीमत को सही ठहराया जा सकता है?

इस साल मार्च में कोरोना वायरस संक्रमण से निपटने के लिए देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान हुआ था. उस समय चुनिंदा सरकारी लैब्स को ही कोरोना टेस्ट की अनुमति थी. धीरे-धीरे प्राइवेट लैब्स को भी इस कवायद में शामिल किया गया और अब सरकार के ही मुताबिक देश भर में 1700 से भी ज्यादा लैब्स कोरोना वायरस की टेस्टिंग कर रही हैं. लेकिन इस टेस्टिंग की कीमत तय किए जाने को लेकर मापदंड क्या हैं, इसे लेकर अब भी ज्यादा जानकारी नहीं है. कई लोग मौजूदा कीमत के बारे में मानते हैं कि इसे काफी बढ़ा-चढ़ाकर तय किया गया है. उनके मुताबिक इससे सबसे ज्यादा परेशानी उन्हें हो रही है जिन्हें अपना इलाज निजी अस्पतालों में कराना पड़ रहा है क्योंकि पीड़ितों को यह टेस्ट कई बार कराना पड़ता है.

स्वास्थ्य क्षेत्र पर नजर रखने वाली संस्था ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क से जुड़ीं मालिनी आइसोला का कुछ समय पहले हमारी सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल.इन से बात करते हुए कहना था, ‘ये टेस्ट उतना महंगा है ही नहीं जितना इसे बना दिया गया है.’ उनकी मांग थी कि सरकार को यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए कि वह जो कीमत तय कर रही है उसका आधार क्या है.

कोरोना वायरस संक्रमण के शुरुआती महीनों में पूरी दुनिया में उथल-पुथल मची हुई थी. सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) से लेकर टेस्टिंग किट तक कोरोना वायरस की पहचान, इससे सुरक्षा और इसके इलाज से जुड़ी हर चीज की एकाएक भारी मांग पैदा हो गई थी जबकि आपूर्ति कम थी. हालांकि जानकारों के मुताबिक उस समय भी कोरोना टेस्टिंग के दाम पांच या साढ़े चार हजार रखने को जायज नहीं ठहराया जा सकता था. अब तो न पीपीई की कमी है, न किट की और न ही एंजाइम या दूसरे केमिकल्स की. इसके बावजूद टेस्ट के दाम 1600 या 2000 रु क्यों हैं, कइयों के मुताबिक यह एक बड़ा सवाल है.

जैसा कि एक सरकारी संस्था में काम करने वाले बायोटेक्नॉलॉजिस्ट एन रघुराम कहते हैं, ‘हम शोध संबंधी काम के लिए अपनी लैब में आरटी-पीसीआर टेस्ट करते रहते हैं और इसकी लागत प्रति टेस्ट 500 रु से भी काफी कम आती है.’ हालांकि वे पौधों को संक्रमित करने वाले वायरसों का आरटी-पीसीआर टेस्ट करते हैं, लेकिन उनका दावा है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि टेस्ट की प्रक्रिया और उसमें काम आने वाली चीजें लगभग वही होती हैं. नाम न छापने की शर्त पर एक प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ाने वाले एक अन्य बायोटेक्नॉलॉजिस्ट कहते हैं, ‘सब कुछ मिलाकर आरटी-पीसीआर टेस्ट की कीमत 450-500 रु तक निपट जानी चाहिए.’

तो सवाल उठता है कि यह टेस्ट अब भी डेढ़ से दो हजार रु के बीच क्यों हो रहा है. कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट में अपने एक हलफनामे में इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने कहा था कि टेस्ट का दाम उस विशेष किट की कीमत के आधार पर तय किया गया है जो इस टेस्ट के लिए इस्तेमाल हो रहा है. जानकारों के मुताबिक पहला फर्क इसी से पैदा हो रहा है. एन रघुराम कहते हैं कि निजी और सरकारी लैब्स को किट्स सप्लाई कर रहे उत्पादक इन्हें बहुत ज्यादा कीमत पर बेच रहे हैं और इसलिए टेस्ट की कीमत भी बहुत बढ़ जा रही है. मसलन सैंपल निकालने और कलेक्ट करने के लिए 12 रु की लागत वाला किट अभी भी कम से कम 500 रु में बेचा जा रहा है.

उधर, टेस्टिंग के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियों की दलील है कि सिर्फ किट की लागत का हिसाब लगाकर इस टेस्ट की कीमत तय नहीं की जा सकती. उनका कहना है कि आरटी-पीसीआर टेस्ट की प्रक्रिया में कई तरह के दूसरे संसाधन भी लगते हैं और आलोचकों को इस पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए. थायरोकेयर टेक्नॉलॉजीज के एमडी ए वेलुमनी के मुताबिक पूरे टेस्ट की कीमत में किट के दाम की हिस्सेदारी सिर्फ 25 फीसदी होता है. स्क्रोल.इन से बातचीत में वे कहते हैं, ‘जब आप एक फ्लाइट का टिकट खरीदते हैं तो उसकी लागत में सिर्फ ईंधन की कीमत शामिल नहीं होती. वह कुल रकम का एक हिस्सा भर होती है.’ इंदौर की एक निजी कंपनी सेंट्रल लैब का भी कहना है कि टेस्टिंग की कीमत तय करने में मुख्य भूमिका किट की नहीं होती.

लाल पैथ लैब्स के सीईओ ओपी मनचंदा भी इन दोनों की बातों से इत्तेफाक रखते हैं. वे कहते हैं, ‘कई ऐसे खर्च हैं जो करने पड़ रहे हैं, लेकिन उनकी बात नहीं होती. उदाहरण के लिए कर्मचारियों का बीमा.’ तर्क यह भी है कि संक्रमण की आशंका के चलते लैब कर्मचारियों पर परिवार की ओर से काम न करने का दबाव है इसलिए लैब्स को उन्हें ज्यादा पैसा भी देना पड़ रहा है. ए वेलुमनी कहते हैं, ‘इसके अलावा सैंपल लाने वालों को पीपीई किट देने पड़ते हैं. ऑफिस स्पेस और इसकी मेंटेनेंस का खर्च होता है. एचआर कॉस्ट है. सैंपल को लैब तक लाने में भी खर्च होता है.’ उदाहण के लिए यह व्यवस्था भी करनी पड़ती है कि लैब तक पहुंचने के समय सैंपल का तापमान दो से आठ डिग्री के बीच रहे. ऐसा न होने पर सैंपल खराब होने और नतीजा गलत आने का जोखिम रहता है.

इसके अलावा स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकार कहते हैं कि अगर काम का दबाव ज्यादा हो तो लैब्स को शिफ्टें और कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी पड़ सकती है. साथ ही पीसीआर और दूसरी मशीनों की संख्या में भी बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है. पीसीआर मशीन में जितने ज्यादा सैंपल एक साथ जांचे जा सकें, एंजाइमों और नतीजनत लागत में उतनी ही अधिक बचत हो सकती है. लेकिन जब नतीजे जल्द से जल्द देने का दबाव हो तो मशीनों की कुल क्षमता से कम सैंपल्स के साथ भी टेस्ट शुरू करना पड़ता है.

हालांकि दूसरे वर्ग का दावा है कि इन सब कारकों को ध्यान में रखते हुए भी टेस्ट की कीमत में अभी कमी की गुंजाइश है. उसके मुताबिक मार्च की तरह अब पीसीआर मशीनों के क्षमता से कम सैंपल्स के साथ चलने जैसी स्थिति बिल्कुल नहीं है क्योंकि अब रोज ही 10 लाख से ज्यादा टेस्ट हो रहे हैं. यानी 1700 लैब्स के हिसाब से देखें तो एक लैब रोज औसतन करीब 600 टेस्ट कर रही है. विभांशु कहते हैं, ‘इसी तरह मार्च में जो स्टैंडर्डाइज पीपीई किट 1100 रु का मिल रहा था वो अब करीब 250 रु का आ रहा है.’ जानकारों के मुताबिक इसी तरह और भी खर्च काफी कम हुए हैं. जहां तक मशीनों की बात है तो करीब 100 सैंपलों की क्षमता वाला एक थर्मोसाइक्लर (जिसमें कूलिंग और हीटिंग को अंजाम दिया जाता है) डेढ़ से दो लाख रु में उपलब्ध है. कुछ जानकारों के मुताबिक टेस्टिंग के आंकड़े देखें तो लैब्स को इस तरह की मशीनों में एक या दो की ही बढ़ोतरी करनी पड़ी होगी जो कि कोई बहुत भारी निवेश नहीं है.

यानी दोनों तरफ से अपनी-अपनी दलीलें हैं. यही वजह है कि कई जानकार इस मामले में सरकार का भी दोष मानते हैं. उनके मुताबिक जब वह इस टेस्ट की कीमत तय कर रही है तो उसे यह जानकारी भी सार्वजनिक कर देनी चाहिए कि इसका आधार क्या है. इन लोगों के मुताबिक अगर ऐसा हो जाता तो कीमत को लेकर उठ रहे सवाल अपने आप ही खत्म हो जाते. वहीं, कुछ लोगों का यह मानना है कि यह जानकारी इसीलिए सार्वजनिक नहीं हो रही है क्योंकि इससे आरटी-पीसीआर टेस्ट के नाम पर हो रही मुनाफाखोरी को लेकर नए सवाल खड़े हो सकते हैं. (satyagrah)

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