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इसरो और उसका मॉर्स ऑर्बिटर मिशन
25-Sep-2020 2:19 PM 9
इसरो और उसका मॉर्स ऑर्बिटर मिशन

अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में भारत ने उस समय नायाब उपलब्धि हासिल की, जब इसरो का मार्स ऑर्बिटर मिशन यानी मंगलयान मंगल की कक्षा में प्रवेश कर गया। भारत दुनिया में पहला ऐसा देश बन गया है, जिसने अपने पहले ही प्रयास में यह सफलता हासिल की है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) भारत का राष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थान है जिसका मुख्यालय कर्नाटक प्रांत की राजधानी बैंगलुरू में है। संस्थान में लगभग सत्रह हजार कर्मचारी एवं वैज्ञानिक कार्यरत हैं। संस्थान का मुख्य कार्य भारत के लिए अंतरिक्ष संबधी तकनीक उपलब्ध करवाना है। अन्तरिक्ष कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों में उपग्रहों, प्रमोचक यानों, परिज्ञापी राकेटों और भू-प्रणालियों का विकास शामिल है।
 इसरो के वर्तमान निदेशक के. राधाकृष्णन हैं। आज भारत न सिर्फ अपने अंतरिक्ष संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सक्षम है बल्कि दुनिया के बहुत से देशों को अपनी अंतरिक्ष क्षमता से व्यापारिक और अन्य स्तरों पर सहयोग कर रहा है। इसरो वर्तमान में धु्रवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (पी.एस.एल.वी.) एवं भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जी.एस.एल.वी.) की सहायता से क्रमश: कृत्रिम एवं भू-स्थायी कृत्रिम उपग्रह प्रक्षेपित करता है।
 इसरो का सफर काफी ने इस ऐतिहासिक क्षण तक की अपनी यात्रा साइकल युग से शुरू की थी। एक समय था जब रॉकिट के पुर्जे साइकलों में ले जाए गए थे। 1960 के दशक में जब अमेरिका और रूस चांद पर आदमी भेजने की तैयारी कर रहे थे, तब गुलामी के जंजीरों से निकला भारत स्पेस के बारे में सोच ही रहा था।  त्रिवेंद्रम से कुछ दूर थुंबा में  हालत यह थी की रॉकिट के कॉन को साइकल पर ले जाया गया था।  ए. पी. जे. अब्दुल कलाम लगातार यहां पर जुटे हुए थे। आखिरकार 21 नवंबर 1963 को नाइक अपाचे रॉकिट  लॉन्च किया गया।  इस रॉकिट को देखकर सोचा ही नहीं जा सकता था कि हम कभी अंतिरक्ष क्षेत्र के इस मुकाम तक पहुंचेंगे। लेकिन आज श्रीहरिकोटा का लॉन्च स्टेशन अपने पूरे दम खम के साथ  खड़ा है।  यहां से यूरोप के देश भी अपने रॉकिट्स भिजवाते हैं। श्रीहरिकोटा में अगले दो से तीन-महीनों में एक अंतरिक्ष म्यूजिय़म बनकर तैयार हो जाएगा, जिससे छात्र भारत की अंतरिक्ष यात्रा के बारे में जान पाएंगे।  इसरो के साथ करीब 40 विश्वविद्यालय जुड़े हैं जहां से छात्र यहां आते हैं।

फल पकने के पश्चात वृक्ष से क्यों टूटकर गिर जाते हैं?
जब कोई फल पकने लगता है तो जिस बिंदु पर डंठल से जुड़ा होता है, वहां एक विलगन-परत का विकास होने लगता है। इस परत के कारण धीरे-धीरे पोषक पदार्थों का फल में पहुंचना कम होने लगता है और अंतत: एकदम बंद हो जाता है। इस प्रक्रिया के पूर्ण होते ही फल अपने-आप शाखा से टूटकर गिर जाता है।
 

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