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जानें बाबरी फैसला सुनाने वाले जज सुरेंद्र कुमार यादव के बारे में
30-Sep-2020 2:44 PM 15
जानें बाबरी फैसला सुनाने वाले जज सुरेंद्र कुमार यादव के बारे में

-विभुराज

(यह लेख फैसले से पहले का है)

पहली पोस्टिंग फैजाबाद, एडीजे के तौर पर पहला प्रमोशन फैजाबाद में और उसी फैजाबाद (अब अयोध्या जिला) में ही बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर आखिरी फैसला। 28 बरस पुराने इस आपराधिक मुकदमे की सुनवाई कर रहे स्पेशल जज सुरेंद्र कुमार यादव की जिंदगी में ऐसा लगता है कि फैजाबाद रह-रह कर उनके पास लौटता रहा है।

लखनऊ स्थित विशेष न्यायालय (अयोध्या प्रकरण) के पीठासीन अधिकारी की हैसियत से वे 30 सितंबर को इस मुकदमे का फैसला सुनाने जा रहे हैं। पांच साल पहले 5 अगस्त को उन्हें इस मुकदमे में विशेष न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें रोजाना ट्रायल कर इस मामले की सुनवाई दो साल में पूरा करने का निर्देश दिया था। इस मुकदमे की अहमियत का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती समेत कुल 32 अभियुक्तों को जज सुरेंद्र कुमार यादव की अदालत ने उस दिन अदालत में हाजिर रहने के लिए कहा है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के पखानपुर गांव के रामकृष्ण यादव के घर पैदा हुए सुरेंद्र कुमार यादव 31 बरस की उम्र में राज्य न्यायिक सेवा के लिए चयनित हुए थे। फैजाबाद में एडिशनल मुंसिफ के पद की पहली पोस्टिंग से शुरू हुआ उनका न्यायिक जीवन गाजीपुर, हरदोई, सुल्तानपुर, इटावा, गोरखपुर के रास्ते होते हुए राजधानी लखनऊ के जिला जज के ओहदे तक पहुंचा। अगर उन्हें विशेष न्यायालय (अयोध्या प्रकरण) के जज की जिम्मेदारी न मिली होती तो वे पिछले साल सितंबर के महीने में ही रिटायर हो गए होते।

बेंच में उनकी मौजूदगी को लेकर बार के लोग क्या सोचते हैं?
सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ के महासचिव एडवोकेट संजीव पांडेय इस पर कहते हैं, वे बहुत नरम मिजाज के संजीदा किस्म के शख्स हैं। वे खुद पर किसी किस्म के दबाव को कभी हावी नहीं होने देते। उन्हें अच्छे और ईमानदार जजों में गिना जाता है। पिछले साल लखनऊ जिला जज के पद से जब वे सेवामुक्त हुए थे तो बार एसोसिएशन ने उनका फेयरवेल किया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले ही उनकी रिटायरमेंट की मियाद बढ़ा दी थी और उन्हें विशेष न्यायालय (अयोध्या प्रकरण) के पीठासीन अधिकारी के पद पर बने रहकर बाबरी मस्जिद विध्वंस केस की सुनवाई पूरी करने के लिए कहा। यानी वो जिला जज के रूप में रिटायर हो गए, मगर विशेष न्यायाधीश बने रहे।

एडवोकेट संजीव पांडेय बताते हैं, हमने उन्हें इस अपेक्षा के साथ विदाई दी थी वे एक ऐतिहासिक फैसला देंगे जो इतिहास के पन्नों में लिखा जाएगा। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे बिना किसी दबाव के अपना फैसला देंगे।

संविधान का अनुच्छेद 142
रिटायर होने जा रहे किसी न्यायाधीश का किसी एक ही मामले के लिए कार्यकाल का बढ़ाया जाना अपने आप में ऐतिहासिक था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले अधिकार का इस्तेमाल किया था। इस अनुच्छेद के तहत सुप्रीम कोर्ट को ये अधिकार है कि मुकम्मल इंसाफ के लिए अपने सामने लंबित किसी भी मामले में वो कोई भी जरूरी फैसला ले सकता है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट जनहित में पहले भी कई बार अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर चुका है लेकिन जानकारों का कहना है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के मामले में शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने रिटायर होने जा रहे ट्रायल जज को सुनवाई पूरी होने तक पद पर बने रहने के लिए कहा।
जबकि उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट को ये बताया था कि राज्य न्यायिक सेवा में सेवानिवृत्ति की उम्र बढ़ाने को लेकर कोई प्रावधान नहीं है। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या प्रकरण में मुकम्मल इंसाफ के लिए और भी बहुत कुछ कहा, कोई नई सुनवाई नहीं होगी जब तक कि ट्रायल की पूरी प्रक्रिया संपन्न न हो जाए। सुनवाई कर रहे जज का तबादला नहीं किया जाएगा। मुकदमे की सुनवाई तब तक स्थगित नहीं की जाएगी जब तक कोर्ट को ये न लगे कि किसी खास तारीख को सुनवाई करना मुमकिन नहीं रह गया है। इस सूरत में अगले दिन या नजदीकी तारीख को सुनवाई की जा सकती है लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा करने की वजह लिखित में दर्ज करनी होगी।

कांड संख्या 197 और 198
दरअसल, जज सुरेंद्र कुमार यादव को जिस बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले पर फैसला देना है, उसकी पृष्ठभूमि 6 दिसंबर, 1992 को दर्ज किए गए दो एफआईआर से जुड़ी हुई हैं।

कांड संख्या 197 में लाखों कार सेवकों के खिलाफ डकैती, लूटपाट, चोट पहुंचाने, सार्वजनिक इबादतगाह को नुकसान पहुंचाने और धर्म के नाम पर दो समुदायों के बीच वैमनस्यता बढ़ाने का आरोप लगाया गया है। कांड संख्या 198 में लालकृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल, विनय कटियार, उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा, मुरली मनोहर जोशी, गिरिराज किशोर और विष्णुहरि डालमिया जैसे लोग नामजद किए गए थे। इन पर धार्मिक वैमनस्यता और भडक़ाऊ भाषण देने का आरोप है। हालांकि इन दोनों एफआईआर के अलावा 47 और मामले भी अलग से दर्ज किए गए थे। बाबरी मस्जिद विध्वंस केस में सीबीआई ने कुल 49 लोगों को अभियुक्त बनाया था लेकिन बरसों से चल रही सुनवाई के दौरान 17 लोगों की मौत हो गई है। इस मामले में जो 17 अभियुक्त अब नहीं रहे उनमें बाल ठाकरे, अशोक सिंघल, गिरिराज किशोर, विष्णुहरि डालमिया शामिल हैं।

मुकदमे के दौरान सामने आई चुनौतियां
अभियुक्त व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हैं, गवाह गैरहाजिर है क्योंकि मजिस्ट्रेट के सामने दिए गए बयान में उसने अपना जो पता दिया था, उस पर वो रहता ही नहीं है। अभियुक्तगण व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हैं, कोई साक्षी भी उपस्थित नहीं है। साक्षी को गवाही के लिए तलब किया गया था किंतु आज वे न्यायालय में उपस्थित नहीं हो सके. उनके द्वारा कोर्ट को बताया गया कि वे कल उपस्थित होंगे।

गवाह को वीएचएस वीडियो कैसेट देखकर साबित करना है। सीबीआई के पास कैसेट दिखाने के लिए कोर्ट में उपकरण ही नहीं है। सीबीआई का कहना है कि दूरदर्शन के दिल्ली केंद्र के टेक्नीकल स्टाफ ही आकर इस कैसेट को चला सकते हैं।

साक्षी द्वारा ईमेल के जरिये ये सूचना दी गई है कि वे दिल्ली में हैं और 69 वर्ष के हैं और यात्रा करने में असमर्थ हैं।
ये सब कुछ बानगियां हैं जो मुक़दमे के दौरान जज सुरेंद्र कुमार यादव की अदालत में रिकॉर्ड पर दर्ज की गईं थीं। इसके अलावा उन्हें हाजिरी माफी की दर्जनों याचिकाओं का भी निपटारा करना पड़ा।

एक ट्रायल जज के लिए ये सब कितना चुनौतीपूर्ण होता है?
रिटायर्ड जज एससी पाठक कहते हैं, जो लोग गवाही नहीं देना चाहते हैं, वो टाल मटोल करते ही हैं। किसी मुकदमे के दौरान ऐसी परिस्थितियां आती रहती हैं लेकिन कोर्ट के पास ऐसे अधिकार होते हैं कि वो गवाह को तलब कर सके। अगर गवाह नहीं आता है तो उस पर सख़्ती की जा सकती है, उसके खिलाफ वॉरंट जारी किया जा सकता है। उसे गिरफ्तार करके कोर्ट के सामने पेश कराया जा सकता है। न्यायालय के पास ऐसी शक्तियां होती हैं।

30 सितंबर की तारीख
मुगल बादशाह बाबर के दौर में बनी जिस मस्जिद को 6 दिसंबर, 1992 को ढहा दिया गया था, उससे जुड़े एक ऐतिहासिक मुकदमे का फैसला सुप्रीम कोर्ट पहले ही कर चुका है। पिछले साल नवंबर में अयोध्या में हिंदू पक्ष को राम मंदिर निर्माण का हक देते हुए जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा था कि 70 साल पहले 450 साल पुरानी बाबरी मस्जिद में मुसलमानों को इबादत करने से गलत तरीके से रोका गया था और 27 साल पहले बाबरी मस्जिद गैर-कानूनी तरीके से गिराई गई।

दूसरा मुकदमा स्पेशल जज सुरेंद्र कुमार यादव की अदालत में फैसले के लिए मुकर्रर की गई 30 सितंबर की तारीख का इंतजार कर रहा है।
क्या गैर-कानूनी तरीके से गिराई मस्जिद के कसूरवार लोगों पर फैसला करना अपने आप में दबाव भरी जिम्मेदारी नहीं?

बाबरी विध्वंस कथा के पांच सबसे अहम पड़ाव
रिटायर्ड जज एससी पाठक कहते हैं, किसी जज को इस बात से फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या कहेंगे। वो इस बात का ध्यान भी नहीं रखता है कि उसके फैसले की प्रशंसा होगी या आलोचना होगी। मुख्य बात ये है कि एक जज के रूप में आपके सामने कैसे साक्ष्य रखे गए हैं और उन सबूतों की विश्वसनीयता कितनी है, एक जज को इन्हीं बातों पर फैसला देना होता है।

इस मामले में एक सितंबर को जज सुरेंद्र कुमार यादव की अदालत ने सुनवाई पूरी कर ली थी और दो सितंबर से फैसला लिखना शुरू कर दिया था।
सीबीआई ने इस मामले में अपने पक्ष में 351 गवाह और करीब 600 दस्तावेज पेश किए थे। (bbc.com/hindi)

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