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बाबरी फैसला, न्याय का भ्रम, और जांच पर सवाल
30-Sep-2020 7:31 PM 7
बाबरी फैसला, न्याय का भ्रम, और जांच पर सवाल

दिव्या आर्य

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के भूमि विवाद मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील रहे जफरयाब जिलानी ने बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत में इस फैसले को गलत और क़ानून के विरुद्ध बताते हुए कहा कि उसके खिलाफ तय समय सीमा में हाई कोर्ट में अपील दाखिल की जाएगी।

सीबीआई की विशेष अदालत ने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है। जज सुरेंद्र कुमार यादव ने बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, बीजेपी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उमा भारती, विश्व हिंदू परिषद की साध्वी ऋतंभरा समेत कुल 32 अभियुक्तों की भूमिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि, ‘ये घटना पूर्व नियोजित नहीं थी।’

28 साल लंबी अदालती कार्रवाई के दौरान 17 अभियुक्तों की मौत हो गई।

हैदराबाद स्थित नैलसार लॉ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फैजान मुस्तफा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये फैसला निराशाजनक है और भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए एक धक्का है।

उन्होंने कहा, ‘बीजेपी, शिव सेना के नेताओं के उस वक्त के भाषण उप्लब्ध हैं, तब जो धर्म संसद आयोजित हो रही थीं, उनमें दिए नारे देखे जा सकते हैं, जो कारसेवक उस दिन आए थे वो कुल्हाड़ी, फावड़े और रस्सियों से लैस थे, जिससे साफ जाहिर होता है कि षडय़ंत्र था।’ राम जन्मभूमि आंदोलन के चरम पर 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को एक भीड़ द्वारा ढहा दिया गया जिसके बाद उसके पीछे के आपराधिक षडयंत्र की जांच के लिए मामला दर्ज किया गया। उसके बाद देश भर में भडक़े दंगों में 2,000 लोगों की मौत हुई, हज़ारों घायल हुए।

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के भूमि विवाद मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील रहे जफरयाब जिलानी ने बीबीसी संवाददाता सलमान रावी से बातचीत में इस फैसले को गलत और क़ानून के विरुद्ध बताते हुए कहा कि उसके खिलाफ तय समय सीमा में हाई कोर्ट में अपील दाखिल की जाएगी।

जिलानी ने कहा, ‘आईपीएस अफसर, सरकारी अधिकारी और वरिष्ठ पत्रकारों ने अदालत में गवाही दी है, क्या उनके बयान झूठे हैं, और अगर ऐसा है तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।’

सीबीआई पर सवाल

प्रोफेसर मुस्तफा ने कहा कि एक लोकतंत्र में एक धार्मिक स्थल के इस तरह से गिराए जाने के इतने बड़े अपराध के लिए किसी का दोषी ना पाया जाना देश की कानून व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं है।

उन्होंने कहा, ‘इससे यही लगता है कि सीबीआई अपना काम ठीक से नहीं कर पाई क्योंकि हमने सरेआम टेलीविजन पर सब होते देखा, इतने ऑडियो, वीडियो साक्ष्य और 350 से ज़्यादा प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के बावजूद ठोस सबूत ना मिल पाने की बात समझ नहीं आती।’

देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी, सीबीआई गृह मंत्रालय, भारत सरकार के तहत आती है। फैसला आने के बाद सीबीआई ने अब तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता जफ़र इस्लाम ने सीबीआई की स्वायत्ता पर उठ रहे सवालों को गलत बताया है। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘हमने जांच में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है, साबीआई एक स्वतंत्र एजंसी है और उसने साक्ष्य के आधार पर काम किया जो की कांग्रेस की सरकारों के दौर में इक_ा किए गए थे।’

प्रोफेसर मुस्तफा के मुताबिक जांच एजेंसी और अभियोजन पक्ष का अलग-अलग और स्वायत्त होना जरूरी है।  उन्होंने कहा कि, ‘षडय़ंत्र का अपराध, भारतीय दंड संहिता 120बी के तहत, दो लोगों के आपस में बात करने सिद्ध हो सकता है, ऐसे में 32 में से 32 लोगों के खिलाफ षडय़ंत्र का सबूत ना मिल पाना आश्चर्यचकित करता है।’

बीजेपी प्रवक्ता जफर इस्लाम के मुताबिक अदालत में सबूतों के आधार पर ही सच सामने आया और इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव की सरकार के दौरान बीजेपी नेताओं को फंसाने के लिए विध्वंस के बारे में एक भ्रम पैदा किया था।

गौरतलब है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के फौरन बाद, दिसंबर 1992 में ही केंद्र सरकार ने रिटायर्ड हाईकोर्ट जस्टिस लिबरहान को इसकी तहकीकात का काम सौंपा।

17 साल बाद लिबरहान कमिशन ने अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें उमा भारती, साध्वी ऋतंभरा और विजयाराजे सिंधिया समेत 68 लोगों को साम्प्रदायिक भावनाएं भडक़ाने का दोषी पाया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री उमा भारती ने इसे ग़लत बताते हुए तब ये कहा था कि वो मस्जिद ढहाए जाने की सिर्फ ‘नैतिक जिम्मेदारी’ लेंगी और उन्हें ‘राम जन्मभूमि आंदोलन का हिस्सा होने पर गर्व है।’

उमा भारती कोरोना पॉजि़टिव होने की वजह से इस वक्त ऋषिकेश के एम्स अस्पताल में भर्ती हैं।

मुस्लिम समुदाय पर असर

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि, ‘इस फैसले से यही माना जाएगा कि न्यापालिका में न्याय नहीं होता है बस एक भ्रम रहता है कि न्याय किया जाएगा।’

उन्होंने कहा कि यही होना संभावित था क्योंकि विध्वंस के केस में फैसला आने से पहले ही जमीन के मालिकाना हक पर फैसला सुना दिया गया, वो भी उस पक्ष के हक में जो मस्जिद ढहाए जाने का आरोपी था।

बीजेपी प्रवक्ता जफर इस्लाम इस सोच से इत्तफाक नहीं रखते और उनका कहना है कि उनकी पार्टी कभी मस्जिद तोडऩा नहीं चाहती थी, सिर्फ  मंदिर बनाना चाहती थी, जो अदालत में सिद्ध हुआ है। नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन के मालिकाना हक का फैसला हिंदू पक्ष के हित में दिया था और मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए एक अलग जगह पर पांच एकड़ जमीन दी थी।

उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘बाबरी मस्जिद का विध्वंस सुप्रीम कोर्ट के आदेश के विरुद्ध था और कानून के खिलाफ हुआ था।’

फैसले में ये भी कहा गया था कि ‘मुसलमान समुदाय को उनकी इबादत की जगह के गैरकानूनी विध्वंस के लिए क्षतिपूर्ति जरूरी है।’

प्रशांत भूषण के मुताबिक विध्वंस पर आए फैसले से मुसलमान समुदाय में द्वेष बढ़ेगा क्योंकि जमीन के मालिकाना हक और मस्जिद गिराए जाने, दोनों मामलों के फैसले उन्हें अपने हक में नहीं लगेंगे।

उन्होंने ये भी कहा, ‘मुसलमान समुदाय को दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है, उनके सामने इस वक्त और बड़ी चुनौतियां हैं, जैसे जैसे हिंदू राष्ट्र के निर्माण की कोशिशें हो रही हैं।’

जफर इस्लाम के मुताबिक मुसलमान समुदाय के लिए ये अब मुद्दा नहीं है, ‘वो इसे पीछे छोड़ कर आगे बढऩा चाहते हैं, पर ये तो कुछ मुस्लिम नेता हैं जो इसका राजनीतिकरण करने में लगे हैं।’

उन्होंने आश्वासन दिया कि अयोध्या के इस मामले के बाद, अब आनेवाले समय में बीजेपी किसी और धार्मिक स्थल के विवादास्पद होने की बात नहीं उठाएगी। (bbc.com/hindi)

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