संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : महीने भर की बच्ची लिए हुए सरकारी काम काबिले तारीफ?
13-Oct-2020 2:20 PM 56
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : महीने भर की बच्ची लिए हुए सरकारी काम काबिले तारीफ?

कल से समाचार-मीडिया और सोशल मीडिया दोनों ही यूपी की एक नौजवान आईएएस अफसर सौम्या पांडेय की खबरों से भरे हुए हैं जिनमें वे अपनी एक महीने की बेटी को गोद में लिए हुए एसडीएम का काम कर रही हैं। वे दिल्ली के करीब गाजियाबाद में एसडीएम है, और बच्ची के जन्म के पहले तक वे लगातार काम करती रहीं, और अब प्रसूति के 22 दिन बाद ही काम पर लौट गई। 

सोशल मीडिया पर खासे सोचने-समझने वाले लोग भी इस अधिकारी की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं। लोगों को याद होगा कि पश्चिम के कुछ देशों में संसद में वहां की महिला सदस्य अपने दूध पीते बच्चों को साथ लेकर आती रहीं, और सदन की कार्रवाई के बीच उन्होंने बच्चों के दूध पीने के हक को जाहिर भी किया। एक महिला सांसद तो संसद में अपना बयान देते जब खड़ी थी, तब भी वह बच्चे को दूध पिला रही थी। वह बात अपने बच्चे को साथ रखने की भी थी, और सार्वजनिक जगह पर उसे दूध पिलाकर उसके हक को स्थापित करने की भी थी क्योंकि बहुत सी जगहों पर ऐसा दकियानूसी रिवाज बना दिया गया है कि महिलाएं सार्वजनिक जगहों पर अपने बच्चों को दूध न पिलाएं। 

ये दोनों दो बिल्कुल अलग-अलग किस्म के मामले हैं, और भारत की जिस समर्पित महिला अफसर को अभी तारीफ मिल रही है, उस बारे में हम लिखना चाहते हैं, और सवाल उठाना चाहते हैं कि क्या एक महीने की बच्ची का सुरक्षित सेहत का हक सरकारी काम के प्रति समर्पण के मुकाबले कम मायने रखता है? आज जब हिन्दुस्तान में सरकारों में बैठे हुए लोग हरामखोरी के लिए जाने जाते हैं, तब कुछ गिने-चुने अफसर अगर ऐसे समर्पण से काम कर रहे हैं, तो इस एक पहलू से वे बहुत मायने रखते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब एक छोटी सी जिंदगी इससे जुड़ी हुई है, तो फिर उसे साथ रखकर इस तरह से सरकारी फाइलों को निपटाना क्या उस बच्ची के बुनियादी हकों पर ज्यादती नहीं है? और क्या मां-बाप को भी ऐसा हक दिया जा सकता है कि वे अपने बच्चों को ऐसे खतरे में डालें? यह बात कोरोना जैसी महामारी आने के पहले की होती, तो भी बात समझ आती। लेकिन अभी तो कल ही बीबीसी की एक रिपोर्ट आई है कि किस तरह मोबाइल फोन पर और नोटों पर कोरोना वायरस 28 दिनों तक जिंदा रह सकते हैं। अब जब वे नोटों पर जिंदा रह सकते हैं, तो सरकारी कामकाज की फाइलों पर भी जिंदा रह सकते हैं, उतना अधिक न सही कुछ कम जिंदा रह सकते हैं। ऐसे में महीने भर की बच्ची को खतरे में डालकर काम करने वाली, काम के प्रति समर्पित मां की वाहवाही करते हुए इस खतरे को अनदेखा नहीं करना चाहिए। 

हिन्दुस्तान से न्यूजीलैंड जाकर वहां बसे हुए और काम करने वाले कुछ मां-बाप इसलिए वापिस हिन्दुस्तान भेज दिए गए थे कि उन्होंने पैदा होने वाले बच्चे के बाद अगले कई महीनों तक मां-बाप के काम करने के सीमित घंटों के कानून को तोड़ा था, और अधिक काम किया था। लोगों को याद होगा कि अभी जब सुषमा स्वराज विदेश मंत्री थीं, तब योरप के किसी एक देश में सरकार ही लापरवाह मां-बाप से उनके बच्चे को लेकर चली गई थी, और अपनी हिफाजत में रखा था। सभ्य लोकतंत्रों की खूबी यही है कि वहां उनके अधिकारों की सबसे अधिक हिफाजत होती है जो अपने हक के लिए खुद नहीं लड़ सकते। चाहे वे बच्चे हों, कुदरत हो, पशु-पक्षी हों, या बेघर इंसान हों। 

हिन्दुस्तान के कानून में अभी हाल ही के बरसों में फेरबदल करके महिला को मिलने वाले प्रसूति-अवकाश को बढ़ाया गया है, और छह महीने का किया गया है। तीन महीने का तो शायद पहले से चले आ रहा था, उसे और बढ़ाया गया। इसके पीछे वैज्ञानिक और मानवीय दोनों किस्म की जरूरतें हैं, जिनका ख्याल रखते हुए यह अवकाश लंबा किया गया है। अभी जिस महिला अधिकारी की तारीफ छप रही है, उस पर भी ऐसी जरूरत लागू होती है, और उससे अधिक उसकी महीने भर की बच्ची पर। हमारा ख्याल है कि अतिउत्साही मां-बाप को ऐसा करने से रोकने के लिए भी सरकार को एक कानून बनाना चाहिए कि महिला के लिए कम से कम तीन महीने छुट्टी पर रहकर अपने नवजात शिशु की देखभाल की बंदिश रहेगी। कई देशों में ऐसा है, और शायद ही कोई सभ्य और विकसित देश ऐसा होगा जो कि महीने भर के भीतर बच्ची को ली हुई महिला को ऐसी महामारी के बीच फाइलों का सरकारी काम करने की छूट देता हो।
 
कामकाजी महिलाओं पर पुरूषों के मुकाबले बेहतर काम करने का एक मानसिक दबाव हमेशा बने रहता है। पुरूषवादी और पुरूष प्रधान समाज अक्सर यह मानकर चलता है कि अरे ये तो महिला है, ये कहां से इतना काम करेगी। और ऐसे में महिलाओं के सामने यह चुनौती रहती है कि वे पुरूषों से कम साबित न हों। ऐसी भी बहुत सी स्थितियां देखने में आती हैं जब महिला अधिकारी जरूरत से अधिक कड़ाई बरतती हैं, जरूरत से अधिक मेहनत करती हैं, और पुरूषवादी कसौटी पर अपने को अधिक खरा साबित करने में जुटी रहती हैं। इनमें से किसी बात से हमें कोई आपत्ति नहीं है, आज का यह लिखना सिर्फ इसलिए है कि इस कहानी में एक छोटी सी बच्ची की जिंदगी भी जुड़ी हुई है जो अपनी बेहतरी की बात खुद नहीं कर सकती। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)  

अन्य पोस्ट

Comments