संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : महाराष्ट्र-राज्यपाल ने याद दिलाया कि देश में राजभवन जरूरी नहीं..
14-Oct-2020 6:56 PM 80
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : महाराष्ट्र-राज्यपाल ने  याद दिलाया कि देश में राजभवन जरूरी नहीं..

महाराष्ट्र में शराब खुली है और मंदिर बंद। इस बात को लेकर वहां के राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को एक चिट्ठी लिखी, और उसने बाकी बातों के अलावा यह ताना भी दिया कि क्या उद्धव ठाकरे अब ‘सेक्युलर’ (धर्मनिरपेक्ष) हो गए हैं? इसके लिखित जवाब में उद्धव ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को याद दिलाया है कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद की जो शपथ ली थी उसमें धर्मनिरपेक्षता की शपथ शामिल थी। राज्यपाल की चिट्ठी को लेकर महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ गठबंधन के सबसे वरिष्ठ नेता शरद पवार ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक विरोध-पत्र लिखकर भेजा है जिसमें उन्होंने राज्यपाल की भाषा पर कड़ी आपत्ति की है।

राज्यपाल का लिखा हुआ हक्का-बक्का कर देता है कि क्या इस देश में अब किसी की धर्मनिरपेक्षता उसे ताने कसने का सामान बना दी जा रही है! और यह बात महाराष्ट्र के सबसे आलीशान बंगले में समंदर किनारे रहने वाला वह राज्यपाल कर रहा है जो कि प्रदेश का संविधान प्रमुख भी है। अगर संविधान से इतना ही परहेज है, तो राज्यपाल को यह महल छोडक़र चले जाना चाहिए और खुलकर संविधान का विरोध करना चाहिए, धर्मनिरपेक्षता का विरोध करना चाहिए।

मंदिर न खोलने को लेकर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी थी कि क्या आपने हिन्दुत्व छोड़ दिया है, और धर्मनिरपेक्ष हो गए हैं? एक राज्यपाल की तरफ से एक मुख्यमंत्री को लिखी हुई हमारी ताजा याद में यह सबसे ही घटिया और असंवैधानिक बात है। लेकिन राज्यपालों द्वारा घटिया बात अब अधिक आम होती चल रही हैं। उत्तर-पूर्व में तैनात एक राज्यपाल तथागत राय ने ट्विटर पर लगातार ओछी राजनीति की बात करने के लिए एकदम कुख्यात ही हो गए थे। आज भी एक भूतपूर्व राज्यपाल की हैसियत से उनका ट्विटर अकाऊंट उन्हें कट्टर दक्षिणपंथी हिन्दू बताता है जो कि उनका खुद का लिखा हुआ बखान है।

महाराष्ट्र राज्यपाल की चिट्ठी पर उद्धव ठाकरे ने बढिय़ा जवाब लिखकर भेजा है कि उनके हिन्दुत्व को राज्यपाल के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। यह बात कोई दबी-छुपी नहीं है कि महाराष्ट्र के राज्यपाल के जिस विचारधारा से आए हैं और जिस विचारधारा की वजह से आए हैं, उस विचारधारा में सेक्युलर शब्द को एक गंदा शब्द माना जाता है। लेकिन भारत के संविधान की जो रीढ़ की हड्डी है, वह इसी शब्द से बनी हुई है, और इस शब्द से जिन्हें नफरत हो उन्हें खुलकर संविधान को खारिज करना चाहिए, सेक्युलर शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करने से काम नहीं चलेगा। 

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने प्रधानमंत्री को लिखी चिट्ठी में राज्यपाल की जुबान की शिकायत की है, और कहा है कि उस तरह की भाषा को देखकर वे हैरान हैं। यह पत्र किसी राजनीतिक पार्टी के नेता का पत्र लग रहा है, न कि किसी राज्यपाल का। 

शिवसेना ने राज्यपाल के चिट्ठी के जवाब में एक जुबानी बयान में उन्हें यह ठीक याद दिलाया है कि मंदिरों की कोई तुलना शराबखानों के साथ नहीं की जा सकती। महाराष्ट्र में कोरोना का खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। शिवसेना के इस जवाब से परे भी हकीकत यही है कि शराबखानों में तो शराबियों को काबू करने के लिए बाहुबली कर्मचारी रखे जाते हैं, लेकिन धर्मस्थलों पर आमतौर पर बेकाबू और अराजक रहने वाले भक्तों को कौन काबू करेंगे? हिन्दुस्तान का इतिहास उठाकर देखें तो धर्म, धार्मिक स्थल, और धर्मालु लोग किसी भीड़ की शक्ल में आते ही अराजक हो जाते हैं, वे हथियार निकाल लेते हैं, वे हिंसा पर उतारू रहते हैं, और वे अपने धर्म को संविधान से ऊपर करार देते हैं। अभी-अभी बाबरी मस्जिद गिराने पर जो फैसला आया है, उसने बड़ी मासूमियत से तमाम लोगों को बरी तो कर दिया, लेकिन 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद गिराने का लाईव टेलीकास्ट जिन लोगों ने देखा था, उन्होंने तो यह देखा ही है कि नेताओं के उकसावे पर, कई दिनों से उनके बयानों पर यह भीड़ 6 दिसंबर को किस तरह अराजक और हिंसक थी, और उसने मस्जिद गिराकर ही दम लिया था। धर्म का मिजाज ही लोकतंत्र के खिलाफ होता है, संविधान के खिलाफ होता है, और हिंसक होता है। महाराष्ट्र में धर्मस्थलों को एक बार खोलकर क्या कोई उन पर नियम लागू कर सकेंगे? वहां लगने वाली भीड़ पर काबू किया जा सकेगा? 

और घोर हिन्दुत्व का झंडा लेकर राजभवन में बैठे इस राज्यपाल को कम से कम यह तो समझना चाहिए कि मंदिरों को न खोलकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे या उनकी सरकार एक किस्म से हिन्दुओं पर ही एक अहसान कर रहे हैं क्योंकि मंदिर खुलने से कोरोनाग्रस्त होने का सबसे बड़ा खतरा अकेले हिन्दू समाज पर ही रहता। इस खतरे को अनदेखा करके मंदिरों को खोलने के लिए राजभवन से इस किस्म की फिकरेबाजी करना पूरी तरह शर्मनाक बात है। यह सरकार के काम में एक ओछी दखल भी है, और ऐसी हरकत लंबे समय से चली आ रही एक सोच को फिर जिंदा करती है कि क्या हिन्दुस्तानी संघीय व्यवस्था में राजभवन की सचमुच कोई जरूरत रह गई है? एक वक्त तो अंग्रेज सरकार के एजेंट की तरह राज्यों पर काबू रखने के लिए लोग तैनात किए जाते थे, लेकिन आज महज शपथ दिलाने, और निर्वाचित सरकार को परेशान करने के लिए यह वृद्धावस्था पुनर्वास खत्म करना चाहिए। हम इस घटना की वजह से नहीं, बल्कि लंबे अरसे से यह बात लिखते चले आ रहे हैं कि राजभवनों का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं रह गया है, और राज्यपाल केन्द्र सरकार के इशारे पर निर्वाचित सरकार को इसी तरह परेशान करने वाले एजेंट बनकर रह गए हैं। ऐसी गुजर चुकी संघीय जरूरत को अब विसर्जित कर देना चाहिए। राज्यपाल एक अवांछित बोझ बनकर राज्य पर रहते हैं, और निर्वाचित सरकार की फजीहत करने के लिए केन्द्र से इशारे का इंतजार करते हैं। हिन्दुस्तान के ताजा इतिहास में राजभवन उतनी ही भ्रष्ट जगह बन गई है जितनी भ्रष्ट कोई भी दूसरी सरकारी संस्था रहती है। बहुत से राजभवन दलालों और सप्लायरों का अड्डा बन जाते हैं, और राज्यपालों के परिवार दलाली का धंधा करते हैं। मध्यप्रदेश में अभी कुछ समय पहले तक राज्यपाल रहे रामनरेश यादव व्यापम घोटाले में फंसे हुए थे, और गुजर जाने की वजह से कटघरे से बच गए। बिहार में कांग्रेस के बूटा सिंह ऐसे राज्यपाल रहे कि जिनके बेटे वहां से दलाली का धंधा चलाते थे। 

अलग-अलग कई किस्म की वजहें हैं जिनकी वजह से राजभवन संस्था को खत्म कर देना चाहिए। इसकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई है, इसकी कोई संवैधानिक जरूरत नहीं रह गई है। जहां तक सरकार को शपथ दिलाने की बात है तो खुद राज्यपाल को हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शपथ दिलाते हैं, और ऐसी कोई वजह नहीं है कि वे मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल को शपथ न दिला सकें। 

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