संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : फ्रांस के टीचर का सिर काटने से सीखने की जरूरत बाकी देशों को भी
17-Oct-2020 6:36 PM 153
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  फ्रांस के टीचर का सिर काटने से सीखने की जरूरत बाकी देशों को भी

फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक हमलावर ने एक स्कूल शिक्षक का सिर काट दिया। वह तो कत्ल करने में कामयाब हो गया, लेकिन पुलिस की गोली से इस हमलावर की मौत हो गई। वहां से खबर आई है कि इस शिक्षक ने अपनी क्लास अभिव्यक्ति की आजादी समझाते हुए उन कार्टूनों की मिसाल दी थी, और कार्टून दिखाए थे जो मोहम्मद पैगम्बर पर बनाए गए थे, और जिन्हें प्रकाशित करने वाली एक पत्रिका पर हमले में दर्जन भर से अधिक लोग मारे भी गए थे। शार्ली एब्दो नाम की इस पत्रिका ने कुछ बरस पहले उन्हें छापा था और इसे लेकर उस पर इस्लामी आतंकियों ने बड़़ा हमला किया था जिसमें पत्रिका के कई लोग मारे गए थे। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अभी शिक्षक के कत्ल को इस्लामिक आतंकी हमला बताया है और इसे कायराना हरकत कहा है। राष्ट्रपति उस जगह पर भी पहुंचे जहां इस शिक्षक का सिर काटा गया। उसे रोकते हुए ही पुलिस ने हमलावर को गोली से मार दिया। जब इस शिक्षक ने कक्षा में अभिव्यक्ति की आजादी समझाते हुए मिसाल के तौर पर ये कार्टून दिखाए थे तो कुछ मुस्लिम मां-बाप ने स्कूल से इसकी शिकायत की थी। और अब यह हमला हुआ। 

शार्ली एब्दो पर हुए हमले के पीछे के 14 लोगों के खिलाफ अभी मुकदमा शुरू हुआ है और फ्रांस में एक बार फिर ये कार्टून खबरों में हैं। इस पत्रिका ने अभी फिर से इन्हें प्रकाशित किया है जिन्हें लेकर फ्रांस के बाहर भी कुछ जगहों पर आतंकी हमले हुए थे। अब यह लोकतंत्र और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच का एक जटिल अंतरसंबंध है जो जगह-जगह टकराहट की वजह बनता है। न सिर्फ फ्रांस में बल्कि दुनिया के कई देशों में धार्मिक आतंकी अपने धर्म को देश के कानून और लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं। हिन्दुस्तान में कई लोगों को यह मिसाल खटकेगी, लेकिन हकीकत यह है कि 1992 में जिन लोगों ने बाबरी मस्जिद गिराने का अभियान छेड़ा था, और जिन लोगों ने उसे गिराया था, उन तमाम लोगों की आस्था अपने धर्म पर देश के संविधान के मुकाबले अधिक थी। उन्होंने संविधान और कानून का राज इन दोनों को खारिज करते हुए बाबरी मस्जिद को गिराया था, और उसके पहले से मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा चले आ रहा था, जबकि मामला अदालत में था। लोगों को उस वक्त के बड़े-बड़े नेताओं के बयान याद होंगे जो कि धर्म को संविधान से ऊपर करार देते थे। और इन सब बातों ने देश के माहौल को ऐसा हमलावर बना दिया था कि लाखों लोग मस्जिद गिराने के लिए एकजुट हो गए थे।
 
अलग-अलग देशों में अलग-अलग धर्मों की संवेदनशीलता भी अलग-अलग रहती है, और वहां सरकारों की सोच भी कानून के मुताबिक, या अराजकता को बढ़ावा देने वाली रहती है। लेकिन एक बात हर जगह एक सरीखी रहती है कि धार्मिक आतंक सबसे पहले अपने धर्म का नाम ही खराब करता है, और लोकतंत्र को कमजोर करता है। आज हिन्दुस्तान में धर्मान्धता और धार्मिक कट्टरता के खतरे उसी रास्ते पर बढ़ रहे हैं जिस रास्ते पर आगे जाकर फ्रांस सहित दुनिया के कई देशों में ऐसे हमले होते हैं। 

फ्रांस योरप का एक विकसित और संपन्न देश है, वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकतों में से एक भी है। वहां पर मुस्लिम समाज का लंबा इतिहास रहा है, और फ्रांस की राजधानी पेरिस के कई इलाके तो सिर्फ बुर्कों और दाढ़ी-टोपी से घिरे हुए दिखते हैं। लंबे समय से फ्रांस के समाज में इस धर्म के मानने वाले लोग बसे हुए हैं, और वे दूसरे धर्मों के लोगों के साथ रहना सीख चुके थे। ऐसे में वहां ताजा धर्मान्ध हमलों ने बाकी मुस्लिम समाज के लिए भी एक बड़ी दिक्कत खड़ी कर दी है। लेकिन जो देखने लायक बात है वह यह है कि फ्रांस की सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ खड़ी हुई है, और वह देश के इस बुनियादी हक के ऊपर धर्मान्धता को हावी नहीं होने दे रही है। न सिर्फ फ्रांसीसी सरकार, बल्कि वहां की संसद ने भी इस हमले के खिलाफ प्रस्ताव पास किया है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सबसे ऊपर माना है।
 
किसी लोकतंत्र की परिपक्वता और उसका विकास इमारतों से और आसमान छूते बुतों से साबित नहीं होता। लोकतांत्रिक विकास देश के बुनियादी सिद्धांतों के सम्मान के लिए डटकर खड़े रहने से होता है। हम अभी किसी की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, लेकिन हम लोकतांत्रिक सरकारों के रूख की बात कर रहे हैं, देशों के लोकतांत्रिक मिजाज की बात कर रहे हैं। फ्रांस उन देशों में से है जहां किसी भी धर्म को लेकर व्यंग्य किया जा सकता है, किसी भी नेता को लेकर लिखा जा सकता है, और वहां की आम जनता में ऐसे तमाम लिखने और गढऩे को लेकर बहुत बर्दाश्त भी है। यह बात पश्चिम के बहुत से देशों पर लागू होती है। अमरीका की बात करें तो वहां सार्वजनिक रूप से किसी धर्मग्रंथ को जलाने के खिलाफ भी कोई कानून नहीं है। लेकिन अब दुनिया में जिन धर्मों के लोग आतंक के रास्ते दूसरे धर्मों को खत्म करना चाहते हैं, जिन्होंने कई देशों में गृहयुद्ध की नौबत खड़ी कर दी है, उन धार्मिक आतंकी संगठनों के रास्ते पर कई दूसरे गैरआतंकी संगठन भी चल निकले हैं, और इन दोनों के बीच का आतंक का फासला खत्म सा हो गया है। 

हिन्दुस्तान ने अपने अड़ोस-पड़ोस में पाकिस्तान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, इन तमाम जगहों पर धर्म के आतंक और धर्म के हमलावर तेवरों का नुकसान देखा हुआ है। दुनिया के बाकी देशों में जहां-जहां किसी धर्म के लोगों ने आतंकी हमले किए हैं, वहां-वहां उस धर्म के बसे हुए आम लोगों को नुकसान हुआ है, आतंकी या तो आत्मघाती हमले में खत्म हो जाते हैं, या कहीं छुप जाते हैं, या फरार हो जाते हैं। वे हमलों के बाद अपने धर्म के लोगों का नुकसान करके ही जाते हैं, कोई फायदा करके नहीं। इसलिए दुनिया के जिस-जिस देश में जिस-जिस धर्म के लोग इस तरह की हरकतें कर रहे हैं, वे कुछ लोगों को जरूर मार पा रहे हैं, लेकिन वे सबसे बड़ा नुकसान अपने धर्म के लोगों का कर रहे हैं। फ्रांस में आज अगर सरकार अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता के साथ खड़ी हुई है, और एकजुट होकर खड़ी है, अपने दर्जन भर लोगों को खोने वाली पत्रिका आज भी अपनी सोच के साथ खड़ी है, और दुबारा कार्टून छाप रही है, वहां की अदालतें इस आजादी के साथ हैं, तो हम दूर बैठे हुए वहां के संविधान की इन बुनियादी बातों का विश्लेषण करना नहीं चाहते। योरप के लोकतंत्रों में आजादी की बुनियाद सैकड़ों बरस पहले की है, और धार्मिक आतंक उनके मुकाबले इन देशों में कुछ नया है।
 
फ्रांस की इस घटना पर हिन्दुस्तान में लिखने का मकसद सिर्फ यही है कि जो देश धार्मिक असहिष्णुता को बढ़ावा देते हैं, धर्मोन्माद को देश की जमीनी दिक्कतों को ढांकने का एक पर्दा बना लेते हैं, उन देशों में इस किस्म का आतंक खड़ा हो सकता है। किसी भी देश की सरकार को यह समझना चाहिए कि सरकार के तख्ता पलट के लिए ही किसी फौज की जरूरत पड़ती है, आतंकी हमले के लिए तो किसी भी धर्म के मुट्ठी भर लोग काफी होते हैं, और ऐसे हमलों को हमेशा रोका नहीं जा सकता, फिर चाहे वे दुनिया के सबसे विकसित देश ही क्यों न हों।
 
सरकारों से परे भी समाज को यह सोचना चाहिए कि वे अपने लोगों के बीच लोकतांत्रिक परिपक्वता कैसे ला सकते हैं, कैसे दूसरे धर्मों का सम्मान जरूरी है, और कैसे उसके साथ-साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जोडक़र देखा जाना चाहिए। उन देशों को खासकर फिक्र करनी चाहिए जहां आज धार्मिक तनाव इस हद तक हिंसक नहीं हुआ है। भारत में धार्मिक तनाव कई वजहों से जिस तरह बढ़ा हुआ है, उससे बढ़ रहे खतरों को अनदेखा करना भी ठीक नहीं होगा क्योंकि धर्मान्धता ने पड़ोस के कई देशों को जिस तरह तबाह किया है, वह एकदम ताजा इतिहास है।  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)  

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