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बिहार की ज्योति पासवान: एक मकान, आठ साइकिलें, लेकिन अब पहले जैसी भीड़ नहीं
19-Oct-2020 11:09 AM 40
बिहार की ज्योति पासवान: एक मकान, आठ साइकिलें, लेकिन अब पहले जैसी भीड़ नहीं

- चिंकी सिन्हा

वो ज़्यादा नहीं बोलती. बोले भी तो कैसे? जब भी कोई पत्रकार, उनकी अविश्वसनीय कहानी के बारे में पता करने के लिए पहुँचता है, उनके पिता आसपास ही मौजूद रहते हैं.

आने वालों से ज़्यादातर उनके पिता ही बात करते हैं. वो ख़ुद ज़्यादा कुछ नहीं बोलतीं और कई बार तो वो बातचीत के बीच में ही अचानक उठ कर चल देती हैं.

लेकिन, आज वो दुबली-पतली लड़की एक सेलिब्रिटी है. लोग उन्हें 'साइकिल गर्ल' कहते हैं.

बतियाते हुए कभी-कभार वो मुस्कुरा देती हैं. और फिर वो वही जुमला दोहरा देती हैं, जो उन्होंने मिलने आने वाले लगभग सभी लोगों को बोला होगा. लड़की का नाम है ज्योति पासवान है.

15 बरस की ये लड़की तब सुर्ख़ियों में आई थी, जब वो लगभग 1200 किलोमीटर साइकिल चला कर, गुरुग्राम से बिहार के अपने पुश्तैनी गाँव पहुँची थी. ज्योति का गाँव बिहार के दरंभगा ज़िले में है.

ये बात इस साल के मई महीने की है, जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा हुआ था. अपने गाँव से शहर जाकर काम कर रहे मज़दूरों पर संकट छाया हुआ था. लॉकडाउन के दौरान शहरों में फँसे बड़ी संख्या में मज़दूर पैदल चल कर, साइकिल से या फिर गाड़ियों से लिफ़्ट लेकर अपने गाँव पहुँच रहे थे.

मार्च महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लगाने की घोषणा की थी.

इसी दौरान ज्योति पासवान अपने बीमार पिता मोहन पासवान को साइकिल पर बैठा कर गाँव ले आईं थीं. उसके बाद से ही, ज्योति के घर पर उनसे मिलने आने वालों का तांता लग गया था.

बिहार के दरभंगा ज़िले के सिंघवारा ब्लॉक में पड़ता है सिरहुल्ली गाँव. मोहन पासवान अब इस गाँव के बहुत ख़ास आदमी हैं. इसकी वजह उनकी बेटी ज्योति पासवान हैं.

लौटने के सिवा कोई चारा नहीं था

मोहन पासवान के घर पर लोगों का तांता लग गया था. न जाने कौन-कौन से लोग उनके घर आए थे. वो ज्योति से मिलना चाहते थे. उसे तोहफ़े देते थे. तमाम तरह के प्रस्ताव आ रहे थे. कोई अपने प्रोडक्ट बेचने के लिए ज्योति को ब्रांड एम्बैसडर बनाना चाहता था, तो कोई कुछ और प्रस्ताव लेकर आया था.

दरअसल अपने बीमार पिता को साइकिल पर बैठा कर गुरुग्राम से अपने गाँव पहुँचने की ज्योति पासवान की कहानी एक त्रासदी है. भले ही इसे साहसिक क़दम बता कर आज इसका जश्न मनाया जा रहा हो. हालांकि, ये अपने आप में साहसिक क़दम भी है.

लेकिन असली साहस तो वो था कि उन्होंने ऐसा करने का फ़ैसला किया. अगर रास्ते में क़िस्मत ने साथ दिया तो बहुत बेहतर और अगर नियति पूरे सफ़र के दौरान रूठी रही, तो वो भी उनके फ़ैसले का ही हिस्सा था. लेकिन, असली बहादुरी इसी बात में थी कि ज्योति पासवान ने उस मुश्किल वक़्त में साइकिल से गाँव तक का सफ़र तय करने का फ़ैसला किया.

लेकिन ज्योति को गाँव क्यों वापिस आना पड़ा?

हाई टेक शहर गुरुग्राम में एक झोपड़ी में बसर करने वाली ज्योति के सामने अचानक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई थी.

अचानक तालाबंदी हो जाने से इतने बड़े शहर में उनके पास गुज़ारा करने का कोई ज़रिया ही नहीं था. सब कुछ अचानक बंद हो गया. काम का कोई ठिकाना नहीं बचा. ज्योति के पिता बीमार थे और अब बाप-बेटी के पास एक ही चारा बचा था. किसी न किसी तरह अपने गाँव पहुँचा जाए.

लॉकडाउन के चलते न तो ट्रेनें चल रही थी और न ही बसें. तो, बहुत से आप्रवासी मज़दूरों ने तय किया कि वो पैदल या साइकिल से यूपी, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के अपने गाँवों तक जाएँगे. ये वो सूबे हैं, जहाँ से काम की तलाश में बड़े पैमाने पर लोग शहरों की ओर जाते हैं.

केंद्रीय श्रम और रोज़गार मंत्रालय के आँकड़े कहते हैं कि लॉकडाउन के दौरान 32 लाख से ज़्यादा आप्रवासी कामगार शहरों से उत्तर प्रदेश लौटे थे. वहीं, बिहार वापस आने वाले मज़दूरों की संख्या 15 लाख के आसपास थी.

'ये बिहार है बाबू. जात ही यहाँ की हक़ीक़त है.'

अगर आप ज्योति के गाँव सिरहुल्ली पहुँचें, तो सड़क से ही उनका घर दिख जाता है. ये गाँव के बाक़ी मकानों से काफ़ी ऊँचा है. तीन मंज़िल का ये मकान, ज्योति और उनके पिता के गाँव लौटने के बाद तीन महीने में बन कर तैयार हुआ था.

अभी भी इस पर रंग-रोगन नहीं हुआ है. लेकिन, घर में एक टॉयलेट बना है. बिहार के इस ग्रामीण क्षेत्र में घर में शौचालय होना बड़ी बात है. घर का बरामदा सामने की सँकरी गली में निकला हुआ है. बरामदे में प्लास्टिक की कुर्सियाँ पड़ी हैं, जिन्हें हाल ही में ख़रीदा गया है.

सिरहुल्ली का भी वही हाल है, जो आपको बिहार के किसी और गाँव में देखने को मिलेगा. ये गाँव भी जात-बिरादरी के हिसाब से टोलों-मोहल्लों में बँटा हुआ है. ऐसे में किसी दलित लड़की को अचानक मिली शोहरत और दौलत को पचा पाना गाँव के बहुत से लोगों के लिए मुश्किल है.

जुलाई महीने में 14 बरस की एक लड़की से बलात्कार के बाद उसकी हत्या की ख़बर ने सुर्ख़ियां बटोरी थीं. वो भी दरभंगा ज़िले की ही रहने वाली थी. इस दलित लड़की को एक बाग़ से आम चुराने की सज़ा दी गई थी. ये ख़बर वायरल हो गई थी.

पेशे से ड्राइवर, प्रेम प्रकाश कहते हैं, "मुझे लगता है कि असल में ये दलितों को दी गई एक वार्निंग थी. ये बताने की कोशिश की गई कि अपनी औक़ात से ज़्यादा मत उछलो. ये बिहार है बाबू. जात ही यहाँ की हक़ीक़त है."

अब एक सेलेब्रिटी हैं, ज्योति

लेकिन ज्योति अपनी उपलब्धि को लेकर बिंदास है, उन्हें कोई संकोच नहीं है. वो जींस और शर्ट पहनती हैं. स्थानीय मीडिया की ख़बरों की मानें, तो ज्योति ने अपनी बुआ की शादी का ख़र्च भी उठाया है. किसी भी आम दिन आप सिरहुल्ली पहुँचें, तो आप उन्हें गाँव की सड़क पर बेतकल्लुफ़ी से साइकिल चलाते देख सकते हैं.

लोग उन्हें जानते हैं. उनके बारे में सबने सुन रखा है. अब ज्योति की ज़िंदगी बिल्कुल अलग है.

साइकिल गर्ल ज्योति का शोहरत का सफ़र

पासवान परिवार ने अब अपना पक्का मकान बना लिया है, जिसमें चार कमरे हैं. पहले पूरा परिवार एक कच्ची झोपड़ी में रहा करता था. वो झोपड़ी अब भी घर के पिछवाड़े दिखती है. उधर, ज्योति के दादा के भाई अपने परिवार के साथ वैसी ही झोपड़ी में रहते है.

उस झोपड़ी के बगल में थोड़ी-सी जगह है. जहाँ आठ साइकिलें खड़ी की गई हैं. उसमें एक लाल रंग की साइकिल भी है, जो दीवार के सहारे खड़ी की गई है. ये साइकिल ज्योति की बड़ी बहन पिंकी की है. पिंकी को वो साइकिल, बिहार के मुख्यमंत्री की बालिका साइकिल योजना के तहत मिली थी.

इस योजना की शुरुआत, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साल 2006 में की थी. उनका मक़सद था कि नौवीं कक्षा में लड़कियों के दाखिले की तादाद बढ़ाई जाए. अब वो साइकिल एक प्रतिमा की तरह घर के पिछवाड़े स्थापित है.

गुरुग्राम से गाँव पहुँचने के बाद ज्योति अब एक सेलेब्रिटी बन गई हैं.

पत्रकार, फ़िल्म निर्माता, राजनेता, एनजीओ और भारत की साइकिलिंग फ़ेडरेशन के सदस्यों ने ज्योति के घर आकर, उन्हें चेक, साइकिलें, कपड़े और यहाँ तक कि फल और तमाम तरह के प्रस्ताव दिए थे.

ज्योति को अमरीका में एक दत्तक पिता भी मिल गए, जिन्होंने उन्हें गोद लेने की चाहत जताई. क्योंकि, उनकी अपनी कोई बेटी नहीं है. वो अक्सर ज्योति को अमरीका आने के लिए कहते हैं. लेकिन ज्योति अपने गाँव में ही ख़ुश हैं.

ज्योति की बड़ी बहन पिंकी को स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. दो बरस पहले उनकी शादी हो गई थी. ज्योति का दावा है कि ख़ुद उन्हें आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. क्योंकि, परिवार उसकी फ़ीस भर पाने की हालत में नहीं था.

ज्योति बताती हैं कि उन्होंने 13 बरस की उम्र में साइकिल चलाना सीख लिया था. वो अक्सर अपनी बहन की लाल रंग वाली साइकिल गाँव में चलाया करती थीं. यानी ज्योति की साइकिल का सफर इस तरह शुरू हुआ था.

सितंबर में जब हमारी ज्योति से मुलाक़ात हुई थी, तब वो अपना नाम नौवीं कक्षा में लिखवाने के लिए नीले रंग की साइकिल चलाते हुए पास के पिंडारुच गाँव गई थीं.

ये नीले रंग वाली साइकिल, ज्योति को गिफ़्ट में मिली है. वो कहती हैं, "दरभंगा के डीएम एसएम त्याराजन ने मेरा नाम दोबारा स्कूल में लिखवाया है. मैं पढ़ना चाहती हूँ."

'साइकिल गढ़' बना सिरहुल्ली गांव

जब आप दरभंगा हाइवे से गुज़रते हैं, तो आपको कोई भी सिरहुल्ली गाँव का रास्ता बता देगा. अब वो पहले जैसा छोटा-सा ग़ुमनाम गाँव नहीं रहा. अब लोग उसे 'साइकिल गढ़' के नाम से जानते हैं.

आपको किसी से बस ये पूछना होगा कि क्या सामने वाले को उस गाँव का रास्ता मालूम है, जहाँ की लड़की गुरुग्राम से साइकिल चलाकर अपने गाँव पहुँची थी.

अब सिरहुल्ली वैसा मामूली गाँव नहीं, जहाँ के ज़्यादातर बाशिंदे काम की तलाश में दूसरे ठिकानों की ओर कूच कर जाते हैं और अपने पीछे बस परिवार के बुज़ुर्गों को छोड़ जाते हैं.

लेकिन, गाँव में 'ख़ास' लोगों की आमद के बावजूद, अब तक यहाँ आप्रवासी कामगारों के लिए कोई सरकारी मदद नहीं पहुँची है. 30 बरस के गणेश राम, सड़क किनारे बने मंदिर के बरामदे में बैठे युवाओं की तरफ इशारा करते हैं. गणेश राम यानी लॉकडाउन से पहले ही मुंबई से अपने गाँव लौटे थे.

गणेश राम मुंबई की एक फ़ैक्टरी में काम करते थे, जहाँ उन्हें हर महीने 14 हज़ार रुपये पगार मिलती थी.

गणेश कहते हैं, "यहाँ बहुत टेंशन है. पर करें तो क्या करें? यहाँ करने को कुछ है ही नहीं. हम खाने का जुगाड़ करने के लिए साहूकार से क़र्ज़ ले रहे हैं. हम जहाँ नौकरी करते थे, वो अब हमारा फ़ोन ही नहीं उठा रहा है. हमें समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करें? यहाँ हमारी मदद के लिए कोई नहीं आया."

मंदिर परिसर में बैठे लोग अपनी उम्मीदें और डर बयां करते हैं. वो सब के सब सारा दिन यहीं बैठे रहते हैं. इस उम्मीद में कि कभी तो दिन फिरेंगे. जितेंद्र कुमार प्रसाद की उम्र 26 साल है. वो गुरुग्राम में एक एक्सपोर्ट हाउस में काम करते थे.

जितेंद्र ने 16 बरस की उमर में ही गाँव छोड़ दिया था. वो कहते हैं, "इस गाँव में हर आदमी कमाने के लिए बाहर जाता है. गाँव में बस बुज़ुर्ग लोग बच जाते हैं. यहाँ कुछ है ही नहीं. जब वहाँ हमारा पैसा ख़त्म हो गया, तो जैसे-तैसे हम लोग गाँव लौटे. यहाँ हम बस दिन गिन रहे हैं. गाँव में तो किसी को हमारी बात सुनने की भी फ़ुरसत नहीं."

जितेंद्र कुमार के मन में उम्मीद अभी ज़िंदा है, लेकिन खीझ और ग़ुस्सा भी है. वो कहते हैं- "हमको समझ में आ गया है, गाँव में हमसे किसी को कोई मतलब नहीं."

ज्योती कुमारी की ज़िंदगी कैसे और कितनी बदली?

मोहन पासवान के ताज़ा-ताज़ा अमीर बनने से इन लोगों के ज़ेहन में सवाल उठ रहे हैं. सरकार आख़िर ग़रीबों के लिए क्या कर रही है?

जितेंद्र कहते हैं, "हम भी तो शहर से गाँव लौटे. हम भी तो इतनी दूरी तक पैदल चल के अपने घर आए. लेकिन, लोग बस उस लड़की के बारे में पूछने आते हैं. किसी ने हमसे नहीं पूछा कि हमें किसी चीज़ की ज़रूरत तो नहीं."

जितेंद्र, उसी रोज़ गाँव पहुंचे थे, जिस दिन ज्योति घर पहुँची थी. बल्कि, ख़ुद जितेंद्र ने ही मदद के लिए एक स्थानीय पत्रकार को फ़ोन किया था.

ज्योति के पिता मोहन पासवान के मुताबिक़, "गाँव में दलितों की आबादी एक हज़ार के आस-पास होगी. मौजूदा जाति व्यवस्था में दलित निचले पायदान पर आते हैं. ख़ास तौर से बिहार में दलितों की स्थिति काफ़ी ख़राब है."

वहीं मोहन कहते हैं कि अब उनके पास चार पैसा आ गया है, तो पूरा गाँव उनसे जलने लगा है.

मीडिया में कैसे फैली ज़्योति की ख़बर?

साइकिल से लंबा सफर तय कर 15 बरस की ज्योति के गाँव पहुंचने की ख़बर को सबसे पहले स्थानीय पत्रकार अलिंद्र ठाकुर ने एक हिंदी अख़बार के लिए कवर किया था. जल्द ही उनकी ख़बर पूरे देश में ही नहीं, बल्कि विदेश तक फैल गई.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ने ट्विटर पर लिखा कि ये सहनशक्ति और प्यार की ख़ूबसूरत उपलब्धि है.

ज्योति, 16 मई को सिरहुल्ली के सार्वजनिक पुस्तकालय पहुँची थीं. वहाँ, बाहर से गाँव लौटे मज़दूरों ने पनाह ले रखी थी. वो सभी, सुबह-सुबह ट्रक से सिरहुल्ली के पास मब्बी बेलौना गाँव पहुँचे थे.

वहाँ से उन्होंने अलिंद्र ठाकुर को फ़ोन किया था. उन्होंने अलिंद्र से गुज़ारिश की कि वो बाहर से आए लोगों के लिए कोई क़रीबी क्वारंटीन सेंटर खोजने में मदद करें.

अगली सुबह, अलिंद्र ठाकुर एक सरकारी स्कूल पहुँचे, जिसे रातों-रात तब अस्थायी क्वारंटीन सेंटर में तब्दील कर दिया गया था. जब उन्होंने गाँव पहुँचे मज़दूरों के बारे में सिंघवारा ब्लॉक के अधिकारियों को ख़बर दी थी, उससे पहले वाली रात ही ज्योति और मोहन पासवान भी गाँव पहुँचे थे.

ठाकुर ने ज्योति और उसके पिता से मुलाक़ात की और उस लड़की के लंबे सफ़र पर एक स्टोरी लिखी. ये ख़बर एक बड़ी न्यूज़ एजेंसी ने भी उठा ली. फिर ज्योति की कहानी मुख्यधारा के मीडिया में तेज़ी से फैल गई.

संकट के उस दौर में ये एक फ़ील-गुड स्टोरी थी. लेकिन, ज़्यादातर लोगों ने ज्योति की कहानी बताने के चक्कर में मज़दूरों को लेकर सरकार के उपेक्षा भाव की अनदेखी कर दी थी.

गाँव पहुंचते ही ज्योति को उसके घर में ही क्वारंटीन कर दिया गया. लेकिन, वो रोज़ स्थानीय नेताओं और दूसरे लोगों से मिलती थी, जो दूर दराज़ से उनसे मिलने आया करते थे. सुपर 30 नाम के कोचिंग सेंटर के संस्थापक आनंद कुमार ने ज्योति को IIT-JEE में दाखिले के इम्तिहान के लिए मुफ़्त में कोचिंग देने का प्रस्ताव रखा.

आनंद कुमार ने ही उन्हें 'साइकिल गर्ल' ज्योति कुमारी कह कर बुलाना शुरू किया. अब ज्योति, भारत के साइकिलिंग फ़ेडरेशन के लिए तैयारी कर रही है. फ़ेडरेशन ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इनडोर स्टेडियम में ज्योति का फ़्री ट्रायल करने का प्रस्ताव दिया है.

ज्योति की माँ फूलो देवी पहले गाँव में मज़दूरी करती थी और दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर रोज़ 180 रुपये कमाती थी. लेकिन, जब से ज्योति की कहानी सुनकर उनके घर कुछ लोग ज्योति का सम्मान करने के लिए पहुँचे, तब से वो खेतों की ओर नहीं गई हैं.

फूलो कहती हैं, "हमारी ज़िंदगी अब बदल गई है." ज्योति के परिवार ने एक माइक्रो फाइनेंस संस्था से एक लाख रुपए का लोन ले रखा था. इसके अलावा उन्होंने मोहन पासवान के इलाज के लिए गाँव के साहूकारों से भी उधार पैसे लिए हुए थे.

मोहन पासवान अब भी लंगड़ाकर चलते हैं. लेकिन उन्हें उम्मीद है कि सरकार उन्हें नौकरी देगी, जिससे वो परिवार चला सकेंगे.

सबसे पहले इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के कुछ अधिकारी ज्योति के घर आए थे. उन्होंने परिवार को पाँच हज़ार रुपये का चेक सौंपा था.

फूलो देवी, गाँव में बच्चों के लिए बने आंगनबाड़ी केंद्र में काम करती हैं. भारत सरकार ने इस योजना की शुरुआत 1975 समेकित बाल विकास सेवा कार्यक्रम के तहत की थी. इसका मक़सद बच्चों में कुपोषण की समस्या का समाधान निकालना था. अपनी ज़िंदगी में अचानक आए इस बदलाव से ख़ुद फूलो देवी भी हैरान रह गई थीं.

अपनी आमदनी बढ़ाने और बीमार पति के इलाज के लिए वो अक्सर गाँव के खेतों में और आसपास होने वाले निर्माण कार्य में मज़दूरी करती थीं.

बिहार के एक स्थानीय नेता पप्पू यादव ने ज्योति को गाँव पहुँचने के एक हफ़्ते के भीतर 20 हज़ार रुपए का चेक भेंट किया था. इसके बाद बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने उन्हें 50 हज़ार का चेक दिया. फिर, लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान ने भी ज्योति को 51 हज़ार रुपये दिए.

राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने ज्योति की पढ़ाई और शादी का पूरा ख़र्च उठाने का वादा किया. वहीं, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ज्योति को एक लाख रुपये देने का एलान किया. ज्योति के मां-बाप पहले ही भीम आर्मी के सदस्य बन चुके हैं.

भीम आर्मी आंबेडकर की विचारधारा वाला एक दलित अधिकार संगठन है. भीम आर्मी ने एलान किया है कि वो बिहार में 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी.

दो फ़िल्म निर्माताओं, विनोद कापड़ी और शाइन कृष्णा ने ज्योति को फ़िल्मों में काम करने का प्रस्ताव दिया. उनकी फ़िल्म आप्रवासी मज़दूरों के बारे में है. बाप-बेटी ने दोनों ही फ़िल्मों में काम करने के प्रस्ताव पर दस्तख़त कर दिए हैं. जिससे गफ़लत पैदा हो गई है और इस पर क़ानूनी लड़ाई भी शुरू हो गई है.

शाइन कृष्णा गोवा में रहने वाले फ़िल्मकार हैं. उन्होंने दरभंगा आकर ज्योति के परिवार से मुलाक़ात की थी और उन्होंने परिवार को फ़िल्म साइन करने के लिए कुछ पैसे भी दिए थे. वहीं, विनोद कापड़ी का कहना है कि परिवार को इस बात का फ़ैसला करना होगा कि वो किसकी फ़िल्म में काम करना चाहते हैं.

विनोद कापड़ी ने एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाने के लिए ख़ुद भी आप्रवासी मज़दूरों के साथ यात्रा की थी. वो कहते हैं, "ज्योति, साहस की प्रतीक हैं. ये पूरा क़िस्सा इतना लंबा सफ़र साइकिल से करने के फ़ैसले का है. मैं ये समझना चाहता था कि ज्योति ने ये फ़ैसला किस वजह से लिया."

लेकिन, ज्योति पर वो एक फ़ीचर फ़िल्म बनाना चाहते हैं. ज्योति के पिता मोहन पासवान कहते हैं कि फ़िल्म निर्माता ने उन्हें, एडवांस के तौर पर 51 हज़ार रुपये दिए थे, जिसे उन्होंने घर बनवाने में ख़र्च कर दिया. वहीं ज्योति कहती हैं, "मैं पढ़ना चाहती हूँ और अपनी ज़िंदगी में कुछ करना चाहती हूं."

दावे और उनपर उठते सवाल

मोहन पासवान के साथ इस साल जनवरी महीने में हादसा हो गया था. वो गुरुग्राम में अपने ई-रिक्शा से कहीं जा रहे थे. उन्हें देखने के लिए ही ज्योति भी अपनी माँ और जीजा के साथ गुरुग्राम पहुँची थी. ये 30 जनवरी की बात है.

10 दिन बाद उनकी माँ गाँव लौट आई थी. उन्होंने ज्योति को देखभाल के लिए पिता के पास छोड़ दिया था. क्योंकि, मोहन की हालत सफ़र के लायक़ नहीं थी.

मोहन पासवान ई-रिक्शा चलाते थे और रोज़ क़रीब 400-500 रुपए कमा लेते थे. लेकिन, एक्सीडेंट के बाद परिवार के पास कमाई का कोई और ज़रिया नहीं बचा था. अकेले फूलो देवी की कमाई से आठ लोगों के परिवार का ख़र्च चलाना पहले ही मुश्किल था. ऊपर से उस महीने तनख़्वाह आई भी नहीं.

25 मार्च को अचानक पूरे देश में लॉकडाउन लगा दिया गया. ज्योति कहती है कि ये उनके लिए दिल तोड़ने वाला था. उनके पास न दवा के पैसे थे, न खाने-पीने के. वो खाने के लिए उस लाइन में खड़ी हो जाती थी, जहाँ पर लोग खाना बाँटने आते थे. कई बार तो उसका नंबर आने से पहले ही खाना ख़त्म हो जाता था और उन्हें ख़ाली हाथ लौटना पड़ता था. ख़ाली पेट वक़्त गुज़ारना पड़ता था.

तभी, मई महीने में किराने की एक दुकान में ज्योति की मुलाक़ात कुछ आप्रवासी कामगारों से हुई. वो सभी साइकिल से गाँव लौटने की योजना बना रहे थे. तब ज्योति ने एक हज़ार रुपए की गुलाबी रंग की एक साइकिल ख़रीदी. उन्होंने दुकानदार को 500 रुपए दिए. दुकानदार के 500 रुपए उस पर अब भी उधार हैं.

फिर, उन्होंने अपनी माँ को फ़ोन करके बताया कि वो दोनों घर आ रहे हैं. माँ बहुत परेशान हो गई. उन्होंने ज्योति से पूछा भी कि वो ठीक-ठाक गाँव तो पहुँच जाएगी? लेकिन, ज्योति कहती हैं कि उन्हें पता था कि वो क्या करने जा रही हैं.

ख़बरों के मुताबिक़, बाप-बेटी 10 मई की रात 10 बजे गुरुग्राम से रवाना हुए थे.

सफर के पहले दो दिन तो ज्योति के लिए बेहद मुश्किल भरे थे. लगातार साइकिल चलाने से उनके शरीर में बहुत तकलीफ़ होती थी. जब वो आगरा से होकर गुज़रे, तो उन्होंने बड़ी दूर से ही ताजमहल का चमकता हुआ गुम्बद देखा था. उन्हें आज भी याद है कि ताजमहल को देख कर वो दोनों मुस्कुराए थे.

ज्योति कहती हैं, "ये सफ़र बहुत मुश्किल था. न हम ठीक से खा पाते थे और न ही सो पाते थे. लेकिन अब मैं बहुत ख़ुश हूँ."

वो रास्ते में सड़क किनारे सो जाया करते थे और अपना खाना दूसरों से बाँट कर खाते थे.

मोहन पासवान बताते हैं कि उनके साथ मुसलमानों का एक परिवार था. जिसमें छह लोग थे. वो बिहार के ही अररिया ज़िले के रहने वाले थे.

हालाँकि कई स्थानीय लोग ज्योति और उनके पिता के दावे पर सवाल भी उठाते हैं. कई लोग ये भी दावा करते हैं कि ज्योति और उनके पिता ने रास्ते में कई बार लिफ़्ट ली.

ज्योति की कहानी सबसे पहले छापने वाले अलिंद्र ठाकुर कहते हैं कि भले ही रास्ते में उन्होंने लिफ़्ट ली हो. लेकिन पिता को बिठाकर इतनी दूर साइकिल चलाना कोई मामूली बात नहीं है.

उस सुबह, ज्योति के पिता ने हमें उनसे स्कूल में नहीं मिलने दिया. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमें ज्योति के स्कूल से घर लौटने का इंतज़ार करना होगा.

'सब पैसे का खेल है, पैसा ही जात है'

उससे एक रात पहले, ज्योति का परिवार अपने नए मकान की पहली मंज़िल पर इकट्ठा हुआ था. अब निचली जाति का होने के बावजूद गाँव में उनका बहिष्कार नहीं होता. बल्कि, फूलो देवी तो ये कहती हैं कि अब तो बाबू साहब लोग हमारे घर चाय पीने आना चाहते हैं. ये सब तो पैसे का खेल है. फूलो देवी कहती हैं कि "पैसा ही जात है."

फूलो देवी को आज भी वो दिन याद है, जब दोनों गाँव पहुँचे थे. बेटी तो सूख कर काँटा हो गई थी. उनके हाथ और पैर में घाव थे. वो थकी-थकी रहती थी. उस समय बहुत से लोग ज्योति से मिलने आते रहते थे. लेकिन, अब कोई नहीं आता. मीडिया ने अब दूसरी कहानियाँ तलाश ली हैं. शोहरत की वो चकाचौंध ग़ायब है.

अब सुर्ख़ियाँ बटोरने वाले वो पल इतिहास बन चुके हैं. पिता और बेटी को एक मशहूर टीवी शो सारेगामा में भी बुलाया गया था. मोहन पासवान को अब सरकारी नौकरी चाहिए. मोहन को पता है कि बैंक में जमा पैसे समय से पहले भी ख़त्म हो सकते हैं.

'गांव का कोई फ़ायदा नहीं हुआ'

अब ज्योति के पास ख़ुद अपने नाम से बैंक में फ़िक्स्ड डिपॉजिट हैं. अब वो दरभंगा में पढ़ाई करना करना चाहती हैं. ज्योति अब एक स्थानीय कोचिंग सेंटर में भी पढ़ने जाया करती हैं. ज्योति की बहन मानसी और उनके दो छोटे भाइयों को पढ़ाने के लिए एक अध्यापक घर भी आते हैं. तीनों भाई-बहन पास के ही एक स्कूल में पढ़ते हैं.

अब पिता को इस बात की फ़िक्र ज़्यादा है कि घर का प्लास्टर और रंगाई-पुताई कैसे हो.

अब लोग ज्योति को उसके साहस के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नामांकित करने की बातें भी कर रहे हैं. ज्योति को वो दिन याद आते हैं, जब लोग उनसे मिलने के लिए क़तार लगाए रहते थे.

जब मैंने चलते हुए उनकी ओर देख कर हाथ हिलाया, तो वो एक कोने में खड़ी थी.

मकान के दूसरे छोर पर 30 बरस के गणेश राम खड़े थे. वो मुंबई में काम करते थे और लॉकडाउन से पहले ही मुंबई से गाँव लौटे थे. वो तब से गाँव में ही अटके हैं.

गणेश राम कहते हैं, "अगर लॉकडाउन से किसी को फ़ायदा हुआ है, तो वो ज्योति का परिवार है. ज्योति ने हमारे गाँव को मशहूर बना दिया. लेकिन इससे ज़्यादा हमारी ज़िंदगी में कुछ नहीं बदला."(bbc)

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