संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बिना कुदाल, महज जुबान से अपनी कब्र खोदने में माहिर कांग्रेस के नेता
19-Oct-2020 4:38 PM 193
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : बिना कुदाल, महज जुबान  से अपनी कब्र खोदने में  माहिर कांग्रेस के नेता

सार्वजनिक जीवन में जो लोग लंबे समय से हैं, और खासकर राजनीति जैसे बेरहम पेशे में जिन्होंने जिंदगी गुजारी है, वे किसी तरह की मासूमियत का दावा नहीं कर सकते। वे लोग कहे हुए शब्दों के खतरे समझते हैं, जनता की भावनाओं को समझते हैं, और अपने देश-प्रदेश की संस्कृति को भी अच्छी तरह जानते हैं। ऐसे में जब मध्यप्रदेश में भूतपूर्व मुख्यमंत्री, और भावी मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए, कमलनाथ जब एक दलित भाजपा महिला नेता को आइटम कहते हैं, तो वे किसी रियायत के हकदार नहीं हैं। ऐसे ओछे बोल के लिए जो भी सार्वजनिक सजा हो सकती है, उन्हें होनी चाहिए, और अगर यह दलित महिला ऐसी ओछी बात को लेकर कमलनाथ के खिलाफ अदालत भी जाती है तो भी वह नाजायज नहीं होगा। ऐसा नहीं कि इस तरह की अवांछित बातें कहने वाले सिर्फ कांग्रेस पार्टी में हैं, दूसरी पार्टियों में खासकर, भाजपा में तो लोग बलात्कारियों से प्रेम उजागर करने में एक-दूसरे से मुकाबला करते दिखते हैं, जातिवाद की हिंसक बातें करने में, कानून के खिलाफ बोलने में भाजपा के सांसद और विधायक इस अंदाज में मुकाबला करते हैं कि कहीं वे दूसरे से पीछे न रह जाएं। लेकिन कांग्रेस पार्टी चूंकि अपने आपको सबसे पुरानी पार्टी, नेहरू और गांधी की पार्टी, दो-दो महिला कांग्रेस अध्यक्ष वाली पार्टी करार देती है, इसलिए सार्वजनिक जीवन में उससे उम्मीदें भी कुछ अधिक की जाती हैं। दूसरी कई पार्टियों में धर्मांधता की बातें, साम्प्रदायिकता की बातें, हिंसा, और संविधान के लिए हिकारत की बातें  होती ही रहती हैं, इसलिए उन्हें लोग गौर से नहीं देखते, लेकिन कांग्रेस के कई नेताओं में बेमौके अटपटी या ओछी बातें करके माहौल अपनी पार्टी के खिलाफ कर देने की अपार क्षमता है, और बेहद हसरत भी है। 

ऐसे हसरती लोग देश की प्रचलित भाषा और राजनीति में बातों को तोडऩे-मरोडऩे के अंतहीन खतरों को देखते हुए भी बेमौके अटपटी बात करते हैं, और फजीहत खड़ी करते हैं। बहुत पहले एक कहानी थी। एक आदमी के तीन बेटे थे, और तीनों ही तोतले थे, इस वजह से उनकी शादी नहीं हो पा रही थी। ऐसे में जब तीन कन्याओं का एक पिता रिश्ते की बात करने आता है तो लडक़ों का पिता उन्हें खूब धमकाकर तैयार करता है कि वे विनम्र बने रहेंगे, और मुंह भी नहीं खोलेंगे, जो बात करनी होगी वह पिता करेगा। इसके बाद की कहानी सभी ने सुनी हुई है और खाने की थाली के आसपास मंडराते चूहे को देखकर एक-एक करके तीनों बेटे अपना तोतलापन उजागर करते हैं, और उनका पिता अपना सिर पीट लेता है। कांग्रेस पार्टी में यह काम पिछले बहुत सारे बरसों से दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, शशि थरूर कुछ इसी किस्म का बड़बोलापन दिखाते हैं, और अपनी पार्टी को एक निहायत गैरजरूरी मुसीबत में डालते हैं। आज जब बिहार में चुनाव होना है, और देश में राजनीतिक ताकतें घरेलू मुद्दों के बजाय सरहदी, और सरहद पार के मुद्दों की तलाश में हैं, तब शशि थरूर पाकिस्तान जाकर वहां के किसी कार्यक्रम में भारत के बारे में कुछ कहकर भाजपा को हमला करने का मौका देते हैं। अब सवाल यह है कि जो संयुक्त राष्ट्र संघ में बरसों काम कर चुका है, जो भारत में यूपीए सरकार में विदेश राज्यमंत्री रह चुका है, उसे आज भारत-पाकिस्तान के बीच चल रहे तनाव का अंदाज नहीं है, दोनों तरफ एक-दूसरे के खिलाफ भडक़ाई जाने वाली भावनाओं का अंदाज नहीं है? जब भाजपा बिहार में कांग्रेस के एक उम्मीदवार को लेकर उसका जिन्ना-कनेक्शन स्थापित करने की कोशिश कर रही है, तब शशि थरूर को क्या पड़ी थी कि वे पाकिस्तान जाकर किसी प्रोग्राम में शिरकत करते, और वहां पर भारत के बारे में ऐसा कुछ कहते जिसका बेजा राजनीतिक इस्तेमाल होने का खतरा हमेशा ही रहता है। शशि थरूर अपनी निजी जिंदगी के हादसों और कहानियों को लेकर वैसे भी पार्टी के लिए शर्मिंदगी की वजह बनते रहे हैं, और ऐसे में अपनी जुबान से इस शर्मिंदगी की आग में ईंधन झोंकना किसी किस्म की मासूमियत नहीं हो सकती। 

दिग्विजय सिंह कांग्रेस के भीतर एक किनारे पर किए जा चुके नेता हैं, और आज मध्यप्रदेश के मिनी आम चुनाव में भी वे अधिक दिख नहीं रहे हैं। हो सकता है कि पार्टी में या मध्यप्रदेश के चुनाव-प्रभारी कमलनाथ ने सोच-समझकर उन्हें किनारे रखा हो ताकि उनके किसी बयान से हिन्दू वोटों का बहुतायत भडक़ न जाए। मुस्लिम समाज के प्रति हमदर्दी रखना न सिर्फ कांग्रेस बल्कि कई राजनीतिक दलों की घोषित नीति है। लेकिन इस हमदर्दी को इस अंदाज में लोगों के बीच रखना कि उससे गैरमुस्लिमों के बीच एक बेचैनी खड़ी हो जाए, नाराजगी खड़ी हो जाए, यह कम से कम चुनावी लोकतंत्र में जरूरी नहीं है, और जायज नहीं है। और तो और मनमोहन सिंह जैसे देश के एक सबसे संतुलित और कम शब्दों में बोलने वाले नेता ने जब यह कहा कि देश के साधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है, तो वे शब्द भी निहायत गैरजरूरी थे। उन शब्दों से जितना नुकसान कांग्रेस का हुआ, उतना ही नुकसान मुस्लिमों की संभावना का भी हुआ कि वे एक पल में बाकी देश की आंखों की किरकिरी बन गए। 

मणिशंकर अय्यर अपनी पार्टी को नुकसान पहुंचाने वाले बयान देने के मामले में उतने ही माहिर हैं जितने कि उनके गृहराज्य तमिलनाडू से आने वाले भाजपा सांसद  सुब्रमण्यम स्वामी हैं। मणिशंकर तो अभी कुछ अरसा पहले अपनी अनर्गल बातों के लिए कांग्रेस से निलंबित भी किए जा चुके हैं, और सुब्रमण्यम स्वामी को निलंबित करना भाजपा के लिए उतना आसान काम नहीं है क्योंकि देश के बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लडऩे का जो ठोस काम स्वामी ने किया है, उसे अनदेखा करके उन्हें छेडऩे का हौसला शायद भाजपा में नहीं है। 

उत्तरप्रदेश में अनगिनत बलात्कारों और दूसरे वैसे ही जुर्मों की वकालत करते हुए भाजपा के सांसद-विधायक जिस तरह के वीडियो पर कैद हैं, वह भयानक है। कांग्रेस उनके मुकाबले प्रायमरी स्कूल में ही हैं। लेकिन भाजपा के लोग सोशल मीडिया पर अपनी संगठित फौज के साथ पल भर में सक्रिय हो जाते हैं, और कांग्रेस नेताओं के कहे एक भी गलत शब्द पर बवाल खड़ा कर देते हैं। कांग्रेस पार्टी ने ऐसी कोई क्षमता विकसित नहीं की है, और भाजपा के नेता अपने सबसे हिंसक बयानों के साथ भी बच जाते हैं। 

फिलहाल वही पार्टी अपने नेताओं की अवांछित बातों की फिक्र कर सकती है जिसे इनसे नुकसान पहुंचता है। भाजपा के बारे में सबका तजुर्बा है कि ऐसे हिंसक बयान सोच-समझकर दिए जाते हैं, और उनसे फायदा उठाया जाता है। कांग्रेस पार्टी अपनी सोचे, फिलहाल तो मध्यप्रदेश में एक दलित महिला नेता के मानहानि के मुकदमे से कमलनाथ कैसे बचेंगे, उनके वकीलों को इसकी फिक्र करनी चाहिए। 
  
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