संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकार और कारोबार संग मीडिया की कदमताल...
20-Oct-2020 9:30 PM 182
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकार और कारोबार संग मीडिया की कदमताल...

इन दिनों कोई फिल्म रिलीज होने वाली रहती है, या कोई टीवी सीरियल या रियलिटी शो शुरू होने वाला रहता है तो उससे जुड़े ढेर सारे समाचार एक साथ सैलाब की तरह टीवी और प्रिंट मीडिया की वेबसाईटों पर छा जाते हैं। मीडिया का जो हिस्सा सिर्फ डिजिटल है, वह शायद और तेज रहता है, और एक फिल्म या एक शो के अलग-अलग कलाकारों के बारे में अलग-अलग फिल्म इतने सुनियोजित ढंग से सब छापा जाता है कि किसी आर्केस्ट्रा पार्टी में कोई गाना बजाया जा रहा हो। पूरे का पूरा मीडिया मनोरंजन को लेकर, खेल को लेकर, या राजनीति को लेकर ओलंपिक में होने वाली सिंक्रोनाइज्ड स्वीमिंग की तरह बर्ताव करने लगता है। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण के मुख्यमंत्री रहते हुए जब चुनाव हुआ, तो महाराष्ट्र के बड़े-बड़े अखबारों में सरकार की स्तुति में एक सरीखे परिशिष्ट निकाले, जिनमें कामयाबी की एक जैसी कहानियां थीं, और मजे की बात यह है कि सभी का शीर्षक अशोक पर्व था। अब मानो दीवाली-पर्व हो, या होली-पर्व हो, वैसा ही अशोक-पर्व मनाने में बड़े-बड़े कामयाब-कारोबार वाले अखबार टूट पड़े थे। बाद में प्रेस कौंसिल ने उस पर एक बड़ी सी रिपोर्ट भी बनवाई थी, जो कि सबकी सहूलियत के लिए बखूबी दफन कर दी गई, उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
 
बहुत पहले जब मीडिया प्रिंट तक सीमित था, टीवी महज सरकारी दूरदर्शन था, और इंटरनेट था नहीं, तब गिने-चुने अखबारों को भी इस तरह से मैनेज नहीं किया जा सकता था जिस तरह आज मीडिया के एक बहुत बड़े हिस्से को खर्च करके मैनेज किया जा सकता है। वह एक वक्त था जब मीडिया में कोई भी जानकारी बिना हवाले के नहीं छपती थी कि वह कहां से मिली है, किसका कहना है, और अमूमन ऐसी जानकारी के साथ सवाल भी पूछे जाते थे। आज वह सब कुछ खत्म हो गया है। आज सरकार या नेता के स्तुति गान के बड़े-बड़े सप्लीमेंट बिना किसी हवाले के छपते हैं, खबरों की तरह छपते हैं, और उनका इश्तहारों की तरह सरकारी भुगतान भी हो जाता है। बीते दस-बीस बरसों में समाचार-विचार का इश्तहार से फासला खत्म कर दिया गया है, और अब इश्तहार समाचार के कपड़े पहनकर खड़े हो जाते हैं, मेहनताना भी पाते हैं। 

लेकिन इस मुद्दे पर लिखने से क्या होगा? क्या यह तस्वीर कभी बदल सकती है? अब तो हाल के कुछ बरसों में देखने में यह आ रहा है कि कारोबार और सरकार का साथ देने के लिए मीडिया जिस अनैतिक तरीके को बढ़ाते चल रहा है, वह अनैतिक तरीका अब चरित्र-हत्या के लिए, साम्प्रदायिकता को बढ़ाने के लिए, जातियों के संघर्ष को बढ़ाने के लिए, किसी धर्म को बदनाम करने के लिए, और आज की कारोबारी जुबान में कहें तो परसेप्शन मैनेजमेंट के लिए बढ़ते चल रहा है। अब सरकारों या राजनीतिक दलों से परे, बड़े-बड़े कारोबार मीडिया के इतने हिस्से को अपनी गोद में या अपनी पैरों पर रखते हैं कि उनसे मनचाहा जनधारणा-प्रबंधन हो जाए। अभी लगातार बलात्कार और लगातार साम्प्रदायिक घटनाओं से जब उत्तरप्रदेश की बदनामी सिर चढक़र बोलने लगी, तो यूपी सरकार ने एक नामी-गिरामी जनसंपर्क एजेंसी को रखा है ताकि देश-विदेश में होती सरकार की बदनामी कम हो, उसे यह जिम्मा दिया गया है।
 
एक वक्त जिस तरह इश्तहार की एक ही डिजाइन हर अखबार में एक साथ दिखती थी, और अब अखबारों के अलावा टीवी चैनलों पर भी वीडियो-इश्तहार एक साथ दिखते हैं, कुछ उसी तरह का मामला खबरों को लेकर, कुछ चुनिंदा मुद्दों और विषयों पर एक साथ लेख को लेकर, कदमताल करते हुए इंटरव्यू को लेकर हो गया है। अब मीडिया का सत्ता या कारोबार के साथ ऐसा कदमताल इस हद तक बढ़ गया है कि वह जलते-सुलगते जमीनी मुद्दों की तरफ से ध्यान को भटकाने के लिए उसे किसी एक्ट्रेस के बदन पर ले जाता है, या किसी की की हुई बकवास पर बाकी लोगों की जवाबी बकवास को दिखाने में जुट जाता है। हम इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में कई बार लिख चुके हैं, लेकिन पांच-दस दिन गुजरते हुए इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया की सोची-समझी कदमताल फिर इतनी दिखने लगती है कि अपनी सलाह दोहराने को जी करता है कि अखबारों को मीडिया नाम के इस दायरे से बाहर निकलना चाहिए, और प्रेस नाम का अपना पुराना और अब तक थोड़ा सा इज्जतदार बना हुआ लेबल फिर से लगाना चाहिए। 
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