संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकारी अमले को शपथ दिलाने का पाखंड कि ईमानदारी से काम करेंगे!
28-Oct-2020 6:00 PM 217
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : सरकारी अमले को शपथ दिलाने का पाखंड कि  ईमानदारी से काम करेंगे!

हिन्दुस्तान बड़ा गजब का देश है। यहां पर साल में एक दिन देश के तमाम सरकारी दफ्तरों में अफसर-कर्मचारी शपथ लेते हैं कि वे आतंकवाद का विरोध करेंगे। अब कल की खबर है कि देश में मनाए जा रहे सतर्कता सप्ताह के तहत फौज के सारे आला अफसरों ने शपथ ली है कि वे कानून के शासन का पालन करेंगे। उन्होंने ईमानदार और पारदर्शी तरीके से काम करने के लिए ईमानदारी का संकल्प लिया। सरकारी खबर में बताया गया है कि अभी भारतीय सेना की ईमानदारी और अखंडता के मूल मूल्यों को बनाए रखने के लिए सतर्कता जागरूकता सप्ताह चल रहा है। अब अगर मंगलवार की इस फौजी खबर के विशेषणों को छोड़ दें, तो क्या बचता है? क्या फौज इस शपथ के बिना कानून के शासन का पालन नहीं करती? क्या वह ईमानदारी और पारदर्शी तरीके से काम नहीं करती? क्या वह सतर्कता और जागरूकता से काम नहीं करती? 

हिन्दुस्तान में एक नागरिक के रूप में जो बुनियादी जिम्मेदारी है, और जो सरकारी नौकरी में आने के बाद कुछ बढ़ भी जाती है, उस जिम्मेदारी को साल में एक बार या चार बार शपथ दिलाकर दुहराने का क्या मतलब है? सरकारी सेवा नियम सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों को कई ऐसे काम करने से रोकते हैं जो कि गैरसरकारी लोग कर सकते हैं। सरकारी सेवा खत्म करने के लिए लोगों का चाल-चलन गड़बड़ होना भी काफी वजह बन सकती है, जबकि गैरसरकारी लोगों पर ऐसा कुछ लागू नहीं होता है। ऐसे में लोगों की जिंदगी में जो बुनियादी बातें रहनी चाहिए, उन बातों के लिए इस तरह की शपथ दिलाना यही बताता है कि देश का कानून, सरकारी नियम, सेवा शर्तें, और लोगों में अनिवार्य जिम्मेदारी की भावना सब कमजोर हो चुकी हैं। 

क्या परिवारों में लोग रोज सुबह उठने के बाद और रात सोने के पहले यह शपथ लेते हैं कि मुसीबत में पूरा परिवार एक साथ खड़े रहेगा? क्या रिक्शेवाले सवारी को बिठाने के बाद शपथ लेते हैं कि वे उन्हें हिफाजत से मंजिल तक पहुंचाकर रहेंगे? क्या मोची इस बात की शपथ लेते हैं कि वे ईमानदारी से जूते सिलेंगे, मजबूत टांके लगाएंगे? क्या अखबारनवीस साल में एक बार, प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर या किसी और मौके पर ऐसी शपथ लेते हैं कि वे सच्ची खबर ही बनाएंगे? 
शपथ का यह पूरा सिलसिला ही इस समझ पर टिका हुआ है कि यह देश झूठा है, यहां के लोग मक्कार हैं, इन्हें कसम दिलाए बिना ये कोई काम सही नहीं करेंगे! और फिर कसम दिलाई भी किसकी जाती है? संविधान की। पन्नों का एक ऐसा पुलिंदा जिसे मानना किसी के लिए तब तक जरूरी नहीं है, जब तक उसमें देश के लिए जागरूकता न हो, ईमानदारी न हो, कानून का शासन पालन करने की इच्छा न हो। इसी संविधान की शपथ लेकर तो तमाम मंत्री काम करते हैं जिनमें से दर्जनों जेल भी जा चुके हैं। संविधान की शपथ का ही इतना वजन होता तो क्या शपथ लेने वाले कटघरे में खड़े होते? सजा पाते? जेल जाते? 

एक परिपक्व लोकतंत्र को ऐसे पाखंड से उबर जाना चाहिए। असल जिंदगी में देखें तो बात-बात पर, और गैरजरूरी बातों पर भी, सबसे अधिक कसम वे लोग खाते हैं जो कि झूठ बोलने के लिए मशहूर होते हैं। वे मां-बाप की कसम खा लेते हैं, बच्चों की कसम खा लेते हैं, ईश्वर की कसम खा लेते हैं, और तो और जिससे झूठ बोल रहे हैं उसकी कसम खाकर भी झूठ बोल देते हैं। यहां का राष्ट्रीय चरित्र ऐसा हो गया है कि झूठ बोले बिना कई लोगों का खाना नहीं पचता। आज देश के जिन बड़े फौजी अफसरों को ईमानदारी की शपथ दिलाई गई है, उन्हीं की फौज के कई अफसर बड़े-बड़े भ्रष्टाचार में गिरफ्तार हो चुके हैं, और तो और अपने मातहत अफसरों की बीवियों का देह शोषण करने का मुकदमा भी उन पर चल चुका है, और उन्हें बर्खास्त किया गया है। कौन सी कसम ने उन्हें कुछ बुरा करने से रोका?

अब अदालतों में या मंत्री पद या जज के ओहदे की शपथ लेते हुए लोग संविधान, सत्य, या धर्म की शपथ ले सकते हैं। अपनी-अपनी पसंद से लोग शपथ लेते हैं। लेकिन जो लोग धर्म की शपथ लेते हैं, उनमें से बहुत से लोग अपने धर्म को संविधान से ऊपर मानकर चलते हैं। जब बाबरी मस्जिद गिरी तो कल्याण सिंह यूपी के मुख्यमंत्री थे, और शपथ लेकर ही बने थे। उन पर संविधान तो निभाने और लागू करने की जिम्मेदारी भी थी। लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में बाबरी मस्जिद को गिरने देने में उनका जो रूख इतिहास में दर्ज है, क्या वह संविधान की शपथ वाला रूख था? और अकेले कल्याण सिंह की बात नहीं है वह तो हमने एक मिसाल के रूप में कहा है, बात तो देश के पूरे ढांचे की है जिसमें लोगों को बिना जरूरत धर्म और सत्यनिष्ठा, संविधान और कई दूसरे किस्म की शपथ दिलाई जाती हैं। पाखंड का यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। देश के सबसे बड़े फौजी अफसर अगर ऐसी शपथ के बिना कानून के राज का पालन नहीं करेंगे, ईमानदारी से काम नहीं करेंगे, तो फिर क्या वे शपथ लेकर अपना हृदय परिवर्तन कर लेंगे? 

जो समाज झूठ पर जीता है, वही सच की कसमें अधिक खाता है। दुनिया के इतिहास में जो सबसे बड़े सच्चे लोग दर्ज हैं, उनका लिखा और कहा हुआ देख लें, उनमें अपने कहे हुए के सर्टिफिकेट के रूप में कभी कोई कसम दर्ज नहीं होगी।  
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