विचार / लेख

किसने शुरू किया था आईसीआईसीआई?
29-Oct-2020 12:21 PM 108
किसने शुरू किया था आईसीआईसीआई?

-मनीष सिंह

मुम्बई की बांद्रा कुर्ला कॉम्लेक्स की ये इमारत..  ये आईसीआईसीआई बैंक का मुख्यालय है। 

क्या आप बता सकते हैं कि इसका मालिक कौन है? अगर नहीं, तो नीचे इस बैंक के मालिकाना हक का पैटर्न देखिये। कुछ पता चला ?

एंटीलिया की फोटो नहीं लगाई। लेकिन उसके मालिक का नाम आप जानते हैं। रिलायंस का शेयर होल्डिंग पैटर्न देखिये। प्रमोटर, पचास फीसदी का मालिक मिलेगा। 

इन दो उदाहरण से समझिये की भारत वैश्विक पटल पर छाने की तमाम योग्यता के बावजूद, हम हिंदुस्तानियों के किस कुटैव के कारण पिछड़ा हुआ है। 

पहले बात आईसीआईसीआई की, जिसे आप 15-20 साल पुराना एक प्राइवेट बैंक, समझते हैं। इसकी शुरुआत नेहरू दौर में हुई। 

जी हां, नेहरु का विजन समझिये। आजादी के बाद 400 से ऊपर छोटे बड़े बैंक थे, जिनकी पूंजी और रिस्क ढोने की क्षमता कम थी। तब भारत में उद्योग नहीं थे, न उद्यमियों उद्योग के लिए बैंक क्रेडिट मिल पाता तब सरकार ने एक वित्तीय संस्था बनाई- इंडस्ट्रियल क्रेडिट एन्ड इन्वेस्टमेंट कारपोरेशन ऑफ इंडिया- आईसीआईसीआई इसमें विश्व बैंक और कुछ बैंकों ने प्रारम्भिक पूंजी दी। कारपोरेशन ने बड़े उद्योगों को फाइनांस देना शुरू किया। जैसे आजकल माइक्रोफाइनेंस वाले घूम-घूमकर लोगों को कर्ज देते हैं, उसी तरह इसने बड़े उद्योगों को आसान फाइनेंस देना शुरू किया। यह एक पीएसयू ही समझिये। दूसरी सरकारी पीएसयू की तरह इसने भी मुनाफा कमाया। 

फिर लिब्रेलाइजेशन का दौर आया। इसमें सरकार ने प्रॉपर बैंक का दर्जा दिया। फिर अपनी हिस्सेदारी बेच दी। तमाम म्युचुअल फंड, आम जनता और संस्थागत क्रेताओं ने हिस्सेदारी खरीदी। प्रोफेशनल मैनेजमेंट हायर किया। टेक्नोलॉजी और आईटी को सबसे पहले अपनाया। 

नतीजा आईसीआईसीआई सबके लिए मुनाफे का सौदा रहा। यह देश का सबसे बड़ा प्राइवेट बैंक है। पर इसका माई-बाप कोई एक आदमी नहीं, कोई परिवार नहीं। यह सही मायनों में एक कारपोरेशन है। दुनिया भर में इसकी शाखाएं हैं, वित्त (सेविंग, इन्वेस्टमेंट, क्रेडिट, इंश्योरेंस, रेमिटेंस) के हर क्षेत्र में दखल है।

इसके प्रोफेशनल लोग चलाते हैं। सैलरी लेते हैं, बात खत्म। चन्दा कोचर जैसे लोग भी इसके शीर्ष पर आए। 400-500 करोड़ के कर्ज में लफड़ा किया। कान पकडक़र निकाल दिया शेयरहोल्डर्स ने .. कभी सोचा है कि वक्त रहते अनिल अम्बानी, विजय माल्या, नरेश गोयल (जेट) के कान पकडक़र बाहर कर दिया गया होता, तो क्या उनकी कम्पनी डूबती। 

मगर यह वंशवादी कारपोरेट में सम्भव नहीं। यहाँ ही मालिक जिएगा, कम्पनी ही मरेगी। 

जॉन डी रॉकफेलर शून्य से शिखर पर पहुंचने वाले ऐसे उद्योगपति रहे जिनकी दौलत आज के चालीस-पचास बिल गेट्स के बराबर रही होगी। स्टेंडर्ड आयल नाम की कम्पनी थी। परिवार के लिए मोटा इंतजाम किया और बाकी एक फाउंडेशन में डाल दिया।

उस ब्याज के पैसे से आज भी रॉकफेलर का नाम जिंदा है। पर उस फाउंडेशन के बोर्ड में कोई रॉकफेलर नहीं। फोर्ड मोटर्स में कोई फोर्ड नहीं। फेरारी में कोई फेरारी नहीं। हैरॉड्स का मालिक हैरोड नहीं।
 
ब्रांड बनते हैं, कम्पनी चढ़ती है। जब कम्पनी एक व्यक्ति की सक्षमता से ऊपर हो जाती है, मालिक ‘लेट इट गो’ करते हैं। कम्पनी समाज की, इन्वेस्टर की, बोर्ड की हो जाती है। यह योरोपियन/अमेरिकन पैटर्न है। इसलिए कम्पनी 100 बरस जीती है। मालिक के शेयर उसकी प्रोपर्टी होते हैं, कम्पनी लेगेसी होती है। 
मालिक, शेयरहोल्डर बदलते रहते हैं। ओरिजिनल या परिवर्तित रूपों में..  लेगेसी चलती रहती है। 
 
हमारे यहां कम्पनी के शेयर नहीं, कम्पनी इटसेल्फ एक प्रॉपर्टी समझी जाती है। जिसे 100 बरसों में 100 गुना बढक़र दुनिया पर छा जाना चाहिए, वह चार पीढ़ी में चालीस टुकड़ों में बंट जाती है। रिलायन्स का ही देखिये। दो भाइयों में बंटी, एक भाई का हिस्सा डूब चुका। 

दूसरे भाई के भी दो बच्चे हैं। आगे उनके भी 2-2 तो होंगे। तो फिर कम्पनी भी बटेगी, देहात में जमीन के बंटवारे की तरह,100 एकड़ खेती, पीढ़ी दर पीढ़ी 50-25-12 ... कम्पनी को घटना है, बढऩा नहीं। बंटे हुए में कुछ हिस्से अनिल की तरह डूबेंगे भी। आखिर गलत निर्णय के कारण उन्हें चन्दा कोचर या स्टीव जॉब्स की तरह कम्पनी से निकाला तो जा नहीं सकता। 

तो भारत में 100 साल से पुरानी कम्पनियों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है। उनमें भी इतनी लंबी उम्र का फायदा उठाकर विश्वव्यापी बनने वाली सिर्फ टाटा है। वह रॉकफेलर मॉडल पर चलती है। परिवार, पीढ़ी दर पीढ़ी शेयर बांट लेता है, मगर कम्पनी नहीं। नतीजा ढाई परसेंट शेयर का मालिक रतन टाटा अनडिस्प्यूटेड चेयरमैन है। 

गूगल से लेकर माइक्रोसॉफ्ट तक कम्पनियों को चलाने वाले भारतीय सीईओ,  निपोटिज्म के इस कीड़े की वजह से भारत में कोई मल्टीनेशनल कारपोरेशन और वैश्विक ब्रांड खड़ा करने का मौका नहीं पाते। 

सावर्जनिक/ सरकारी पृष्ठभूमि से उपजा आईसीआईसीआई एक ग्लोबल कारपोरेशन बन रहा है। शायद एयर इंडिया भी संवर जाए, क्योंकि उसे खरीदने की हिम्मत इंडियन ‘बाप-बेटा कार्पोरेट्स’ नहीं करेंगे। पर वो सेटिंग से, दुधारू गाय यानी भारत पेट्रोलियम खरीदने को सारे घोड़े खोल देंगे।

जरा सोचिए, कितना मजेदार विरोधाभास है। यह काम एक ऐसे दल की सरकार जबरन करेगी, जिसके शीर्ष पद पर परिवारवाद नहीं है। पर तब भी 
आईसीआईसीआई की यह इमारत बुलन्द खड़ी रहेगी, जिसे बनाया और फिर लिब्रेलाइजेशन के नारे के साथ जनता के नाम किया था, एक ऐसे दल ने, जिसके शीर्ष पद पर एक परिवार का राज चलता है।  

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