संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : घर का चूल्हा सुलगाने जिनके सामने देह का ही ईंधन बाकी रह गया
18-Nov-2020 3:50 PM 166
‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय :  घर का चूल्हा सुलगाने जिनके सामने देह का ही ईंधन बाकी रह गया

दुनिया को पिछली एक सदी में सबसे अधिक तहस-नहस करने वाले कोरोना और उससे जुड़े लॉकडाउन ने न सिर्फ जिंदगी खत्म की है, जीने के तरीके खत्म किए हैं, बल्कि लोगों पर एक बहुत बड़ा सांस्कृतिक हमला भी किया है। आज दुनिया के बहुत से देशों में लड़कियां और महिलाएं देह बेचने को मजबूर हुई हैं। इसके अलावा बच्चों की तस्करी बढऩे की भी खबरें हैं जिनमें से अधिकतर का इस्तेमाल सेक्स-ट्रेड में होता है। यह तो पूरे वक्त बदन बेचने के धंधे की बात है। लेकिन एक सामाजिक हकीकत को एक सहज समझ से देखें, तो जब-जब कोई बहुत बुरा अकाल पड़ता है, कोई ऐसी प्राकृतिक विपदा आती है जिससे अर्थव्यवस्था और रोजगार तहस-नहस हो जाते हैं, तो वैसे में घर चलाने की बुनियादी जिम्मेदारी ढोने वाली महिलाओं और लड़कियों के बदन पर पहला बोझ पड़ता है, और उनमें से बहुत सी घर के बाकी लोगों का भी पेट भरने के लिए अपना बदन बेचने पर मजबूर होती हैं। आज अफ्रीका के एक देश इथोपिया की एक ऐसी ही रिपोर्ट है कि वहां नाबालिग बच्चियां भी किस तरह मजबूरी में बदन बेच रही हैं क्योंकि उनके जिंदा रहने का और कोई जरिया नहीं बचा है। 

लोगों को याद होगा कि हमने पिछले महीनों में एक से अधिक बार इसी जगह पर अमरीका में 1930 के दशक में आई भयानक मंदी के बारे में लिखा था कि उस दौर में अमरीकी समाज में अनगिनत घरेलू लड़कियों और महिलाओं को देह के धंधे में उतरते देखा था। जब जिंदा रहने के लिए, खाने के लिए और कोई भी जरिया न रह जाए, तो दुनिया में तकरीबन तमाम जगहों पर औरतों और लड़कियों पर देह बेचने का दबाव बनने लगता है। बात कहने में बहुत कड़वी लगेगी, लेकिन हकीकत यह है कि परिवार के बाकी लोग भी बुझे हुए चूल्हे को देखते हुए परिवार की शर्मिंदगी की ओर से आंखें बंद कर लेते हैं, और यह देखना बंद कर लेते हैं कि चूल्हा सुलग कैसे रहा है। जब बदन में भूख सुलगती है, तो वह तमाम नाजायज काम करने को मजबूर कर देती है। अमरीका की सदी की सबसे बड़ी मंदी में नए लोगों को देह बेचने के धंधे में उतरते देखा था जिन्होंने कभी खुद के बारे में भी ऐसा नहीं सोचा होगा। 

हिन्दुस्तान में चूंकि वर्जित संबंधों से लेकर वेश्यावृत्ति तक ऐसे मामले माने जाते हैं जिन पर चर्चा न करने से ही यह देश गौरवशाली बने रह सकता है। यही वजह है कि दिल्ली और मुम्बई सहित तमाम महानगरों में संगठित रूप से जाने-पहचाने इलाकों में लाखों महिलाएं देह बेचती हैं, और स्थानीय शासन-प्रशासन, कानून और अदालत सब यह मानकर चलते हैं कि हिन्दुस्तान में इनका कोई अस्तित्व नहीं है। आज यह पहला मौका आया है जब हिन्दुस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने खुलकर यह आदेश दिया कि सेक्स-कर्मियों को राज्य सरकारें कोरोना के इस दौर के चलते भूखों मरने से बचाने के लिए मुफ्त अनाज दे। एक किस्म से अदालत ने न सिर्फ इन लोगों का अस्तित्व माना, बल्कि सेक्स का धंधा ठप्प होने की वजह से उनके जीने में खड़ी हुई मुश्किल को भी माना, और जिंदा रहने के लिए अनाज पाने के बुनियादी हक को भी माना। लेकिन आज की यह बात पहले से चले आ रहे सेक्स-ट्रेड के बारे में नहीं है। हम आज उन लड़कियों और महिलाओं, और बच्चों, के बारे में चर्चा करना चाहते हैं जो कि बेरोजगारी और गरीबी के इस दौर में मजबूरी में यह धंधा करने के लिए दुनिया भर में  बेबस हुए हैं। ऐसा भी नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने ऐसी नौबत का अंदाज नहीं लगाया था। जब-जब ऐसी ऐतिहासिक मंदी आती है, जिंदा रहने के लिए लोगों को अपने बदन, और अपने परिवार के दूसरे बदन बेचने के लिए भी मजबूर होना पड़ता है। जो लोग संगठित रूप से किसी चकलाघर में जाकर नहीं बैठते, वे भी अपने काम की जगहों पर, अपने अड़ोस-पड़ोस में, रिश्तेदारी और जान-पहचान में समझौता करके अपने बदन के एवज में जिंदा रहने का जरिया जुटाते हैं। इनमें तकरीबन तमाम मजबूर लड़कियां और महिलाएं ही रहती हैं, और बच्चों को सेक्स-ट्रेड में धकेलने के लिए पूरे वक्त साजिश करते हुए गिरोह रहते हैं। 

जिन देशों से अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं या दूसरे जिम्मेदार अखबारनवीस रिपोर्ट बना रहे हैं, वैसे हालात हिन्दुस्तान में न हों, उसकी कोई वजह नहीं है। लेकिन यह जरूर है कि इस देश के लोग इस देश में देह के धंधे को मानने से बचते हैं, और अपने आत्मगौरव को कायम रखने के लिए ऐसा जाहिर करते हैं कि सेक्स-ट्रेड कोई पश्चिमी संस्कृति है जिससे कि हिन्दुस्तान अछूता है। यह एक अलग बात है कि वात्सायन के भी पहले से इस देश में शहर-कस्बों में नगरवधुओं का चलन रहा है, मंदिरों में देवदासियां रही हैं, और भी तरह-तरह के परंपरागत तबकों को औपचारिक मान्यता देकर इस देश ने वेश्यावृत्ति को चकलों से परे भी एक पर्दा ढांककर जिंदा रखा था, और आज भी रखा हुआ है। 

आज की यह भयानक आर्थिक मंदी, और बेरोजगारी हिन्दुस्तान में दसियों लाख लड़कियों और महिलाओं को अब तक कुछ मौकों पर, या पूरी तरह से देह बेचने को मजबूर कर चुकी होगी। ऐसी कोई वजह नहीं है कि ऐसी बदहाली में आत्महत्याओं के बीच लोग ऐसे समझौते न कर रहे हों। सरकार और समाज चूंकि इस नौबत को ही मानने से बचते हैं, बच रहे हैं, इसलिए इस समस्या के किसी समाधान की कोई संभावना नहीं है। लेकिन फिर भी जिन लोगों में थोड़ा-बहुत भी सरोकार है उन्हें इस बारे में सोचना चाहिए, और यह भी सोचना चाहिए कि खुदकुशी से लेकर वेश्यावृत्ति तक पर जो तबका आज मजबूर नहीं है, वह दूसरों को इस नौबत से बचाने के लिए क्या कर सकता है? समाज में ऐसी मजबूरी शुरू कुछ लोगों से हो सकती है, लेकिन वह आसपास के और गैरमजबूर लोगों को भी लपेटे में ले सकती है, और ग्राहक तो कभी मजबूर होते नहीं हैं। इसलिए किसी देश को अपने समाज को ऐसी नौबत से अगर बचाना है, तो उन्हें लोगों की मदद करने के लिए संगठित कोशिशें करनी होंगी। महज सरकार की तरफ देखना कोई हल नहीं होगा क्योंकि सरकारें इस मजबूरी को ही अनदेखा करके अपनी जिम्मेदारी से बचने का लंबा तजुर्बा रखती हैं। लोगों को समाज के कमजोर तबकों की महिलाओं, लड़कियों, और बच्चों को बचाने के लिए गंभीर और ईमानदार कोशिश करनी चाहिए, यह मानकर, यह सोचकर कि उनका खुद का परिवार ऐसी नौबत में रहता, तो वे क्या करते?  (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक) 

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