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अर्नब गोस्वामी की तरह पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन मामले में तेज़ी क्यों नहीं?
20-Nov-2020 12:55 PM 56
अर्नब गोस्वामी की तरह पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन मामले में तेज़ी क्यों नहीं?

-सर्वप्रिया सांगवान

पत्रकार, सरकार की बदले की कार्रवाई, सुप्रीम कोर्ट और आज़ादी का मौलिक अधिकार. पिछले कुछ दिनों से ये शब्द मीडिया में छाए हुए हैं. हाल ही में आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में रिपब्लिक न्यूज़ चैनल के मालिक और पत्रकार अर्नब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली है.

आम लोगों में इस सवाल पर चर्चा हो रही है कि क्या देश की सर्वोच्च अदालत का रवैया और रूख़ सभी पत्रकारों के मामले में समान है या नहीं.

केरल के एक पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. आज उत्तर प्रदेश सरकार ने भी अपना जवाब कोर्ट में दाखिल किया है.

पत्रकार कप्पन को उत्तर प्रदेश पुलिस ने तब गिरफ्तार कर लिया था जब वह एक दलित महिला के साथ बलात्कार और हत्या मामले की कवरेज के लिए हाथरस जा रहे थे.

उन्हें पांच अक्तूबर को हिरासत में लिया गया था. बाद में पुलिस ने उन पर यूएपीए एक्ट के तहत मामला दर्ज किया. उनके साथ तीन और लोगों को गिरफ्तार किया गया था जिसमें दो आंदोलनकारी छात्रों के साथ एक टैक्सी ड्राइवर शामिल है.

पत्रकार कप्पन और तीन अन्य लोगों को मथुरा पुलिस ने पांच अक्तूबर को 'प्रिवेंटिव पावर' के तहत हिरासत में लिया था.

क्या है पूरा मामला?
पत्रकार कप्पन और तीन अन्य लोगों को मथुरा पुलिस ने 'प्रिवेंटिव पावर' के तहत हिरासत में लिया था. सीआरपीसी की धारा 151 के तहत पुलिस किसी अपराध की आशंका के कारण किसी को हिरासत में ले सकती है.

इन चारों को छह अक्तूबर के दिन एक्ज़ेक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और कोर्ट ने उन्हें 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया. जबकि एक्ज़ेक्यूटिव मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र में सिक्योरिटी या बॉन्ड भरवाना है ना कि हिरासत में भेजना.

दूसरी तरफ़, छह अक्तूबर को ही केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स ने संविधान के आर्टिकल 32 के तहत कप्पन के लिए हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल कर दी.

याचिका में कहा गया था कि उनके सहकर्मी, परिवार या किसी को भी कप्पन को हिरासत में लिए जाने की ख़बर नहीं दी गई थी. किसी को नहीं बताया गया कि उन्हें कहां रखा गया है और किस मामले में हिरासत में लिया गया है.

ये सब होने के बाद सात अक्तूबर को पुलिस ने इस मामले में पहली एफ़आईआर दर्ज की.

इस एफ़आईआर में यूएपीए के सेक्शन 17 और 18, भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 124A(राजद्रोह), 153A(दो समूहों के बीच वैमनस्य बढ़ाने), 295A(धार्मिक भावनाएं आहत करने) और आईटी एक्ट के सेक्शन 62, 72, 76 लगाए गए थे.

क्या है एफआईआर में?
सिद्दीक़ कप्पन के साथ-साथ अतिकुर्रहमान, आलम और मसूद पर एफ़आईआर दर्ज की गई. रहमान और आलम छात्र और एक्टिविस्ट हैं और मसूद एक टैक्सी ड्राइवर हैं जिनकी टैक्सी में बाक़ी लोग हाथरस के पीड़ित परिवार से मिलने जा रहे थे.

एफ़आईआर के मुताबिक़ "अभियुक्तों के पास कुल छह फोन पाए गए और एक लैपटॉप. उनके पास 'जस्टिस फॉर हाथरस विक्टिम' लिखा एक पोस्टर था. ये लोग शांति भंग करने के मक़सद से हाथरस जा रहे थे. मीडिया रिपोर्ट्स से प्रतीत हो रहा है कि कुछ असामाजिक तत्व जातिगत तनाव और दंगा भड़काने का प्रयास कर रहे हैं. अभियुक्त carrd.co नाम की वेबसाइट भी चला रहे हैं और इस वेबसाइट के माध्यम से विदेशी चंदा इकट्ठा कर रहे हैं. इनके पास से बरामद पोस्टर 'एम आई नॉट इंडियास डॉटर' सामाजिक वैमनस्यता बढ़ाने और जन विद्रोह भड़काने वाले हैं. वेबसाइट के कृत्यों से यूएपीए के सेक्शन 17 और 18 के अंतर्गत मामला बन रहा है. आईटी एक्ट की धारा 65, 72 और 75 में मामला बन रहा है."

कोर्ट में अब तक क्या हुआ?
कप्पन की हेबियस कॉर्पस याचिका पर 12 अक्तूबर को चीफ़ जस्टिस बोबडे, एएस बोपन्ना, वी रामासुब्रमनियन की बेंच ने पहली सुनवाई की.

कप्पन के लिए केस लड़ रहे वकील कपिल सिबल ने कोर्ट को बताया था कि उनके मुवक्किल से परिवार को और वकील को नहीं मिलने दिया जा रहा.

उनकी मांग थी कि कोर्ट राज्य सरकार को नोटिस जारी करे और मथुरा ज़िला जज को जेल में मानवाधिकार उल्लंघन की जांच करने का निर्देश दे.

लेकिन कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस नहीं दिया और वकील सिबल को पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट जाने की सलाह दी. लेकिन सिबल के आग्रह पर कोर्ट ने चार हफ्ते बाद की तारीख़ दी.

16 नवंबर की सुनवाई के दिन कोर्ट ने कहा कि वो आर्टिकल 32 की याचिकाओं को बढ़ावा नहीं देना चाहता. हालांकि कोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस भेजने के लिए राज़ी हो गया.

उसी नोटिस पर 20 नवंबर को उत्तर प्रदेश सरकार ने कोर्ट ने अपना जवाब दाखिल किया है. सरकार का कहना है कि पत्रकार की याचिका नहीं टिकती क्योंकि वह अपने वकीलों के संपर्क में हैं.

इसके अलावा सरकार ने कहा है कि कप्पन पीएफआई संस्था के सचिव हैं और हाथरस में कवरेज के लिए जा रहे थे जबकि जिस अख़बार में वह काम करने का दावा करते हैं, वो 2018 में बंद हो चुका है.

दूसरी ओर, बाकी तीन अभियुक्तों की हेबियस कॉर्पस याचिका पर सुनवाई इलाहाबाद हाई कोर्ट में चल रही है और अगली सुनवाई 14 दिसंबर को होगी.

लेकिन इसी बीच 11 नवंबर को पत्रकार अर्नब गोस्वामी को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली है जिसमें जस्टिस चंद्रचूड़ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अगर हम एक संवैधानिक कोर्ट के तौर पर आज़ादी की सुरक्षा नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा.

इसके बाद पत्रकार कप्पन के केस की तुलना अर्नब के केस से की जाने लगी है क्योंकि अर्नब 4 नवंबर को गिरफ्तार हुए और 11 को उन्हें ज़मानत मिल गई. वहीं कप्पन 5 अक्तूबर से जेल में हैं.

अर्नब गोस्वामी और सिद्दक़ी कप्पन के केस में तुलना क्यों?

सबसे पहली बात तो दोनों ही केस 'पर्सनल लिबर्टी' यानी निजी आज़ादी के बारे में है. आर्टिकल 21 कहता है कि किसी भी व्यक्ति से उसकी ज़िंदगी या निजी आज़ादी नहीं छीनी जा सकती और सिर्फ़ कानून पालन की प्रक्रिया में ही ऐसा हो सकता है.

दोनों ही केस में कोर्ट के सामने सवाल था और है कि क्या अभियुक्त को हिरासत में रखना क़ानून के हिसाब से सही है.

दोनों ही केस में अभियुक्त पत्रकार हैं. कप्पन को जब गिरफ्तार किया गया तो वह रिपोर्टिंग के लिए जा रहे थे.

हालांकि अर्नब के केस में उन्हें एक पुराने मामले में गिरफ्तार किया गया था जिसका संबंध उनकी पत्रकारिता से नहीं था. लेकिन आरोप है कि महाराष्ट्र सरकार ने उनकी पत्रकारिता के जवाब में ऐसी कार्रवाई की.

कप्पन मामले में भी उत्तर प्रदेश सरकार पर आरोप है कि ये पत्रकारों पर दबाव बनाने की कोशिश का हिस्सा है. यानी मामला मीडिया की आज़ादी का भी है.

लेकिन ये दोनों मामले कई वजहों से अलग भी हैं.

क्यों हैं दोनों मामले अलग?
अर्नब गोस्वामी को 2018 के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन पर आरोप है कि उन्होंने अन्वय नाइक को आत्महत्या के लिए उकसाया. अन्वय नाइक ने अपनी मौत से पहले एक ख़त में लिखा था कि अर्नब और अन्य दो लोगों ने उनके लाखों रूपयों का भुगतान नहीं किया.

अर्नब ने पहले हाई कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की थी. हेबियस कॉर्पस को आसान शब्दों में समझाया जाए तो अगर किसी व्यक्ति को ग़ैर-कानूनी तरीक़े से हिरासत में रखा गया है चाहे पुलिस की या किसी और अथॉरिटी की तो वह इसके ख़िलाफ़ कोर्ट में जा सकता है.

कोर्ट में पुलिस को या अथॉरिटी को हिरासत में रखने की वजह बतानी होगी और अगर कोई वाजिब और क़ानूनी वजह नहीं सामने आती है तो कोर्ट याचिकाकर्ता की रिहाई का आदेश देता है.

भारत में ऐसी याचिका सुनने का अधिकार सिर्फ़ हाई कोर्ट (आर्टिकल 226) और सुप्रीम कोर्ट (आर्टिकल 32) के पास है.

लेकिन अर्नब की हेबियस कॉर्पस याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट ने ख़ारिज कर दी.

फिर उनके वकील हरीश साल्वे ने अंतरिम ज़मानत के लिए हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. उसे भी कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया और कहा कि पहली नज़र में ऐसा केस नहीं दिख रहा कि कोर्ट आर्टिकल 226 के अंतर्गत अर्नब को ज़मानत दे और अर्नब सीआरपीसी के मुताबिक़ ही सेक्शन 439 के तहत ज़मानत के लिए सेशन कोर्ट जाएं.

ज़मानत याचिका ख़ारिज होते ही अर्नब ने 10 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट का रूख़ कर स्पेशल लीव पीटीशन दाखिल की और अगले ही दिन वहां से उन्हें ज़मानत मिल गई. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि हाई कोर्ट ने अर्नब को ज़मानत ना देकर ग़लती की है.

वहीं, कप्पन के केस में हाई कोर्ट का रूख नहीं किया गया है और सीधा सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की गई है. ज़मानत याचिका में ये तर्क दिया जाता है कि किसी ट्रायल के लिए अभियुक्त को हिरासत या जेल में रखने की ज़रूरत क्यों नहीं है. वहीं, हेबियस कॉर्पस में तर्क दिया जाता है कि क्यों किसी की हिरासत ग़लत है और कानून के मुताबिक़ नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में ही अब कप्पन के लिए ज़मानत याचिका भी दाखिल कर दी गई है.

कप्पन पर मथुरा पुलिस ने यूएपीए के सेक्शन भी लगाए हैं. इसलिए भी मामला अर्नब के मामले से अलग हो जाता है. जब किसी पर राज्य सरकार यूएपीए कानून के तहत मामला दर्ज करती है तो इसकी जानकारी केंद्र को दी जाती है.

केंद्र को 15 दिन के अंदर रिपोर्ट बनानी होती है कि जिस अपराध में मामला दर्ज किया गया है क्या वो अपराध नैशनल इन्वेस्टिगेटिव एजेंसी एक्ट 2008 के अंतर्गत बनता है, अगर बनता है तो क्या उस पर राज्य सरकार मामला चलाएगी या एनआईए. लेकिन अब तक इस पर कोई जानकारी सामने नहीं आई है.

केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स के लिए याचिका दायर करने वाले वकील विल मैथ्यूस ने बताया कि उन्होंने हाई कोर्ट जाने की बजाय सीधा सुप्रीम कोर्ट का रूख क्यों किया?

"हम पहले हाई कोर्ट में नहीं गए, उसके कुछ कारण हैं. पहला तो ये कि याचिकाकर्ता की मर्ज़ी है कि वह पहले कहां जाना चाहता है. हमें ये नहीं पता कि अभी हम कहां स्टैंड कर रहे हैं. डीके बसु बनाम स्टेट ऑफ़ वैस्ट बंगाल केस में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन थी कि अगर किसी को हिरासत में लिया जाए तो उसे बताया जाए कि क्यों लिया जा रहा है, उसके परिवार में किसी को ख़बर दी जाए. लेकिन कप्पन के केस में पुलिस ने ऐसा नहीं किया. ये सिर्फ़ ज़मानत की बात नहीं है, कानूनी प्रक्रिया की बात है. ये केस मीडिया बनाम सरकार का भी है. कप्पन किसी निजी केस में नहीं पकड़े गए हैं, वह एक रिपोर्ट करने के लिए जाते हुए हिरासत में लिए गए हैं. तो ये मीडिया की आज़ादी की बात भी है. सुप्रीम कोर्ट को इस मामले पर जल्द फ़ैसला देना चाहिए."

लेकिन बाक़ी तीन अभियुक्त हेबियस कॉर्पस पिटिशन लेकर पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ही गए हैं. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 18 नवंबर को राज्य सरकार, केंद्र सरकार और पुलिस अधिकारियों को नोटिस देकर जवाब मांगा है.

इस मामले में उनकी पैरवी कर रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के वक़ील शाश्वत आनंद. वे बताते हैं कि इस मामले में पुलिस ने उनके मुवक्किल को ग़लत तरीके से हिरासत में लिया, गिरफ्तारी की जानकारी नहीं दी गई, एक्ज़ेक्यूटीव मजिस्ट्रेट ने अपने दायरे से बाहर जाकर हिरासत में भेजने का आदेश दे दिया और मुवक्किल से मिलने भी नहीं दिया जा रहा.

वे कहते हैं, "इसलिए ही अर्नब मामले से इस केस की तुलना की जा रही है क्योंकि वहां हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जिस तेज़ी से सुनवाई कर रहे थे, वो तेज़ी और ज़रूरत इस केस में नहीं दिखाई जा रही. हमें अगली तारीख 14 दिसंबर की दे दी गई है. तो क्यों कप्पन के केस के लिए वकील कपिल सिबल को हाई कोर्ट जाना चाहिए?"

सुप्रीम कोर्ट में इतनी जल्दी कैसे हुई अर्नब की ज़मानत याचिका पर सुनवाई?
कोई भी मामला सुप्रीम कोर्ट में एओआर (एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड) दाखिल करता है और उसके बाद मुक़दमा रजिस्ट्री विभाग में जाता है.

रजिस्ट्री विभाग को याचिका में कोई ग़लती नज़र आती है तो उसे ठीक करने के लिए वापस भेज देता है. ग़लती ठीक होने के बाद मामला सुनवाई के लिए लिस्ट हो जाता है.

कोर्ट में हेबियस कॉर्पस और ज़मानत की याचिकाओं को वरीयता दी जाती है. उसके बाद ऐसे केस जिसमें तुरंत दख़ल की ज़रूरत है और फिर बाक़ी मामले आते हैं.

अर्नब मामले में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को ख़त लिख कर सवाल पूछा था कि 'एक तरफ़ हज़ारों नागरिक जेल में लंबे वक्त से हैं और उनका मुकदमा सुप्रीम कोर्ट में हफ्तों महीनों तक लिस्ट नहीं होता है.'

'ये चिंताजनक है कि अर्नब गोस्वामी का केस हर बार कोर्ट में इतनी जल्दी कैसे सुनवाई के लिए लिस्ट हो जाता है.'

लेकिन सुप्रीम कोर्ट में वक़ील बजिंदर सिंह कहते हैं कि जिस तरह से रजिस्ट्री ने अर्नब के मामले में पर्सनल लिबर्टी को लेकर तेज़ी दिखाई या काम किया, वैसा ही होना चाहिए. लेकिन समस्या ये है कि ऐसा अधिकतर मामलों में नहीं होता.

ऐसा ही एक मामला जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का भी था. आर्टिकल 370 हटने के बाद से ही उन्हें हिरासत में रखा गया था.

उनकी बेटी ने सुप्रीम कोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका भी डाली लेकिन लंबे वक्त तक उस पर सुनवाई नहीं हुई.

आख़िरकार, जब एक साल बाद सरकार ने ही उन्हें रिहा कर दिया तो सुप्रीम कोर्ट ने याचिका ये कहते हुए ख़ारिज कर दी कि इसे सुनने की ज़रूरत नहीं क्योंकि अब वे हिरासत में नहीं हैं.(bbc.com)

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