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100 Women: बलात्कार के मामलों में भारत को नाकाम बताने वाली तीन कहानियाँ
26-Nov-2020 12:46 PM 56
100 Women: बलात्कार के मामलों में भारत को नाकाम बताने वाली तीन कहानियाँ

-दिव्या आर्य

अमूमन भारत में बलात्कार के मामले इतने भयावह होते हैं कि देश में सुर्खियां बनने के साथ साथ दुनियाभर के मीडिया में उनकी चर्चा होती है.

दिल्ली में 2012 में निर्भया के सामूहिक बलात्कार के बाद क़ानून को सख़्त बनाया गया और इसके बाद पुलिस के पास दर्ज होने वाले मामलों की संख्या भी बढ़ी है.

इसकी एक वजह महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली यौन हिंसा पर बढ़ती बहस बताई जाती है, तो कई जानकार क़ानूनी सुधार की ओर भी इशारा करते हैं.

सरकार मौत की सज़ा जैसे कड़े प्रावधान भी लाई है.लेकिन कुछ विश्लेषकों के मुताबिक ऐसे प्रावधान खोखले और आम लोगों का गुस्सा ठंडा करने के लिए लाए जाते हैं और इनमें समस्या की गहराई और उसको जड़ से निपटाने पर ध्यान नहीं दिया गया है.

बीबीसी 100 वीमन सीरीज़ के तहत बीबीसी ऐसी तीन कहानियाँ बता रहा है, जिनसे ज़ाहिर होता है कि भारत के सख़्त क़ानूनों से बलात्कार की शिकार महिलाओं को मदद नहीं मिल रही है.

"यही ख़्वाहिश है कि हमारे जीवित रहते न्याय मिल जाए"

आज इस गांव की पहचान यही है कि यह वो 'गाँव है जहां लड़कियां फंदे पर लटकती' मिली थीं.

15 और 12 साल की दो चचेरी बहनें इस गांव में आम के पेड़ पर 'फंदे पर लटकती' मिली थीं. उनके परिवार वालों का दावा है कि बलात्कार के बाद उनकी हत्या की गई.

2012 के दिल्ली गैंगरेप के बाद यह बलात्कार का पहला बड़ा मामला बना था. घटना को छह साल से ज़्यादा हो चुके हैं लेकिन कइयों के जहन में यह ताज़ी घटना ही है, मानो कल की बात हो.

उत्तर प्रदेश के बदायूं ज़िले की संकरी सड़कों पर जब हमने लोगों से गांव का रास्ता पूछा तो हर किसी ने गांव को पहचान लिया और हमें वहां तक पहुंचने का सही रास्ता भी बताया.

हालांकि बदायूं में प्रभावित परिवार के लिए लड़ाई इतनी आसान नहीं रही है. मैं इन लोगों से 2014 की गर्मियों में मिली थी. तब कार से आठ घंटे लंबा सफ़र तय करके मैं दिल्ली से यहां सबसे पहले पहुंचने वाले संवाददाताओं में थी.

फाँसी लगाने वाली लड़कियों में एक के पिता ने मुझसे उसी पेड़ के नीचे बात की जिस पेड़ पर उनकी बेटी लटकी हुई मिली थी.

उन्होंने कहा था कि वे बेहद डरे हुए हैं क्योंकि स्थानीय पुलिस ने ताने मारते हुए मदद करने से इनकार कर दिया था. लेकिन उनमें बदला लेने की एक चाहत भी दिखी. उन्होंने कहा, "इन लोगों को आमलोगों की भीड़ में फांसी पर लटकाना चाहिए, जैसा इन लोगों ने हमारी बेटियों के साथ किया."

बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य पीड़िताओं के पिता के साथ

जब कानून कड़े किए गए तो मक़सद था कि महिलाओं और लड़कियों को पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने में आसानी हो. बलात्कार के मामलों में मौत की सज़ा को भी शामिल किया गया और मामलों की सुनवाई के लिए विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित किए गए.

नए प्रावधानों में एक के मुताबिक किसी भी नाबालिग़ लड़की के साथ बलात्कार के मामले की सुनवाई हर हाल में एक साल के अंदर पूरी होनी चाहिए. इसके बाद भी बलात्कार के लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

सरकार के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक साल 2013 के अंत तक ऐसे लंबित मामलों की संख्या 95 हज़ार थी जो 2019 के अंत तक बढ़कर एक लाख 45 हज़ार हो गई.

बदायूं में हम फिर उस पेड़ की तरफ गए लेकिन लड़की के पिता ने नज़रें नीची रखीं. बोले कि पुरानी यादें बहुत दर्द देती हैं. उन्हें देख लगा कि छह साल में उनकी उम्र मानो कई साल बढ़ गई है.

गुस्सा अब भी कायम है, लेकिन साथ ही उस कड़वी सच्चाई का एहसास भी है कि न्याय हासिल करने की लंबी लड़ाई अकेले ही लड़नी पड़ती है.

उन्होंने कहा, "क़ानून के मुताबिक मामले की सुनवाई जल्दी होनी चाहिए लेकिन हमारी याचिकाओं को लेकर अदालतें बहरी हैं. मैं अदालतों के चक्कर लगा रहा हूं लेकिन ग़रीबों को शायद ही न्याय मिलता है."

हालांकि मामले की जांच तेज़ गति से हुई. पर जांच करने वाले अधिकारियों ने कहा कि बलात्कार और हत्या को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं, जिसके चलते संदिग्ध छूट गए.

परिवार ने इसको चुनौती दी और मामले को फिर से शुरू कराया. लेकिन अदालत ने इस बार छेड़छाड़ और अपहरण के कहीं कम संगीन अपराध दर्ज किए. अब परिवार ने इसे भी चुनौती देकर दोबारा बलात्कार और हत्या के आरोप कायम करने की याचिका दायर की है.

भारतीय न्यायिक व्यवस्था के पास संसाधन और कर्मचारी, दोनों ही कम हैं. बदायूं मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो रही है लेकिन परिवार के वकील ज्ञान सिंह के मुताबिक यहां भी कोई विशेष सुविधाएं नहीं हैं.

उन्होंने कहा, "फास्ट ट्रैक कोर्ट तेज़ी से सुनवाई करने की कोशिश करती है लेकिन कभी फॉरेंसिक तो कभी कोई अन्य रिपोर्ट में देरी हो जाती है, डॉक्टर और जांच अधिकारियों का तबादला हो जाता है और गवाहों के अदालत में पलट जाने से भी देरी होती है."

बदायूं में परिवार के घर में पिछले सालों में दस्तावेज़ों और फाइलों का ढेर लग चुका है. फांसी के फंदे पर झुलती पायीं गई दो लड़कियों में एक की मां के लिए ये लड़ाई बर्दाश्त से ज़्यादा लंबी चल चुकी है.

उनसे विदा लेने के बाद भी उनके शब्द मेरे कानों में गूंजते रहे. मां ने कहा, "यही ख़्वाहिश है कि हमारे जीवित रहते न्याय मिल जाए."

'मेरे माता-पिता ने मेरे प्रेमी को बलात्कार के मामले में जेल भिजवाया'

उषा (बदला हुआ नाम) 17 साल की थी जब उनके माता पिता को स्थानीय लड़के के साथ उनके प्रेम प्रसंग का पता चला.

गुजरात के पंचमहल ज़िले के छोटे से गांव में यह अनोखा मामला भी नहीं था. लेकिन उषा के माता-पिता ने इस जोड़ी को अपनी मंजूरी नहीं दी.

तब प्रेमी जोड़े ने घर से भागने का फ़ैसला लिया. लेकिन वो कुछ ही दिनों के लिए आज़ाद रह पाए. उषा के मुताबिक पिता ने उन दोनों का पता लगा लिया और घर ले आए.

उषा ने कहा, "उन्होंने मुझे रस्सी और डंडों से पीटा. भूखा रखा और फिर मुझे एक दूसरे शख़्स के हाथों सवा लाख रूपये में बेच दिया."

पर उषा उस दूरे शख़्स के घर से शादी की रात ही भाग निकलीं. वापस अपने प्रेमी के पास गईं, शादी की और गर्भवती भी हो गईं. लेकिन इस प्रेम कहानी में दूसरी बड़ी बड़ी मुश्किल आ गई.

क़ानूनी सुधारों के तहत लड़कियों के लिए सेक्स के लिए सहमति देने की उम्र 16 साल से बढ़ाकर 18 साल कर दी गई थी. ऐसे में ऊषा अपनी मर्ज़ी से प्रेम करे तो भी उन्हें कानून की नज़र में सेक्स के लिए सहमति देने लायक नहीं माना जा सकता.

इसी वजह से उषा के मां-बाप ने उनके प्रेमी पर उनके बलात्कार का आरोप लगाकर जेल भिजवा दिया.

लड़के के परिवार वालों को भी बख़्शा नहीं गया. उषा के बलात्कार के बाद उसके अपहरण करने की साज़िश का आरोप लड़के की मां पर लगाया गया.

लड़के की मां ने बताया, "मैं दो सप्ताह तक जेल में रही. लड़की के परिवार वालों ने हमारे घर को लूट लिया, दरवाज़े तोड़ दिए, हमारे जानवरों को ले गए. हमें अपना जान बचाने के लिए छिपना पड़ा."

यह 'उषा' के नाम पर दर्ज कराया गया बलात्कार का एक 'झूठा' मामला है, जबकि क़ानून का काम 'ऊषा' की सुरक्षा करना था.

अदालतों तक पहुंचने वाले ऐसे झूठे मामलों की संख्या के बारे में कोई आंकड़ा मौजूद नहीं है. पर वकीलों का कहना है कि उनके पास इस बात के पुख़्ता सबूत हैं कि ऐसे मामलों से पहले से चरमरा रही व्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है.

वहीं, विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामले गहरी समस्या की ओर इशारा करते हैं जिसे कोई क़ानून नहीं बदल सकता.

गरिमा जैन नीदरलैंड्स के टिलबर्ग विश्वविद्यालय के इंटरनेशनल विक्टिमॉलॉजी इंस्टीट्यूट से अपने शोध के लिए बलात्कार पीड़िताओं की साइकॉलोजी पर अध्ययन कर रही हैं.

गरिमा के मुताबिक किसी भी युवती के लिए अपने माता-पिता के फ़ैसले से अलग जाना काफ़ी मुश्किल भरा होता है ख़ासकर तब जब वह नाबालिग हों और आर्थिक तौर पर अपने घर वालों पर निर्भर भी.

उन्होंने ने कहा, "बलात्कार पीड़िताओं के अनुभव जुटाने के दौरान मैंने देखा है कि जब उनके प्रेमी को बलात्कार के झूठे मामले में जेल भिजवा दिया जाता है तो ना केवल उनके आपसी संबंध नष्ट हो जाते हैं बल्कि महिला अंदरूनी तौर से सहम जाती है और नतीजा ये कि उन पर माता-पिता का नियंत्रण और बढ़ जाता है."

उषा को गैर सरकारी संगठन 'आनंदी' की मदद मिली. इसी के चलते ऊषा अपने पति के परिवार वालों को ज़मानत पर बाहर निकलवा सकीं और अपने माता-पिता के ख़िलाफ़ खड़ी हुईं.

सामाजिक कार्यकर्ता सीमा शाह

जैसे ही उषा 18 साल की हुईं तो उन्होंने अपने ही माता-पिता के ख़िलाफ़ तस्करी का मामला दर्ज कराया. हालांकि वो ये नहीं चाहती थीं कि उन्हें ऐसा करना पड़े.

उषा ने कहा, "अगर युवतियां अपने पसंद के शख़्स से शादी कर पाएं तो दुनिया कहीं ज़्यादा सुखी होगी."

लेकिन दुर्भाग्य से, जब लड़कियां समाज की तय सीमाओं को लांघने की कोशिश करती है तो माता-पिता उन्हें रोकने के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हो जाते हैं.

उषा के परिवार वालों ने भी आनंदी के सामाजिक कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ तस्करी का मामला दर्ज करने की धमकी दी.

इस ग्रामीण इलाके में सहमति देने के उम्र वाले क़ानून का ऐसा ग़लत इस्तेमाल काफी हो रहा है. 'आनंदी' की ओर से किए गए 2013, 2014 और 2015 में दर्ज की गई प्राथमिकियों के अध्ययन के मुताबिक इनमें से 95 प्रतिशत मामले माता-पिता की ओर से दर्ज कराए गए थे.

आनंदी की सामाजिक कार्यकर्ता सीमा शाह ने कहा, "ऐसा लगता है कि क़ानून का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा है. यह एक बड़ी समस्या है जहां युवतिओं को वस्तु के तौर पर देखा जाता है और उन्हें स्वतंत्र रूप से बोलने की अनुमति नहीं होती है."

'क़ानून की पढ़ाई कर अपनी जैसी दलित महिलाओं के लिए लड़ना चाहती हूं'

माया की मुस्कान उनकी आंखों तक नहीं पहुंचती. पर अपना दर्द छिपाने के लिए वो उसका इस्तेमाल करने की खूब कोशिश करती हैं.

वो अपनी ज़िंदगी की कहानी विस्तृत ढंग से बांटना चाहती हैं लेकिन पिछले साल में जिस सदमे से गुज़री हैं उसे याद करने में बार-बार गला रुंध जाता है.

माया दलित हैं. और महिला भी. यानी भेदभाव दोगुना है. वो इंजीनियर बनने की चाह से पढ़ाई कर रही थीं जब एक ऊंची जाति के शख़्स ने उनका पीछा करना शुरू किया. उस शख़्स ने अपने हाथ की नस काट ली और माया की 'ना' सुनने के तैयार ही नहीं हुआ. आख़िर में उसने माया के साथ बलात्कार किया.

माया ने कहा, "वह काफी भारी भरकम था, मैंने कोशिश की लेकिन उसे रोक नहीं सकी."

माया के माता पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज भी कराई, लेकिन जब उस शख़्स ने शादी का प्रस्ताव दिया तो समाज के दबाव में आकर मामला वापस ले लिया.

उनका ख़याल था कि उन्होंने अपनी बेटी को बलात्कार पीड़ित होने के सामाजिक 'कलंक' से बचा लिया, लेकिन ये शादी एक दूसरे तरह का नरक साबित हुई.

सुबकते हुए माया ने कहा, "मेरे पति के परिवार वाले कहते थे कि तुम दलित हो, गंदे नाले की तरह, हमें तुम्हें देख कर भी घृणा होती है."

"पति शराब के नशे में घर आता. पुलिस केस दर्ज कराने के लिए मुझे गालियां देता, प्रताड़ित करता और मेरे इनकार करने के बाद भी अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता."

माया के मुताबिक वो इतना असहाय महसूस करने लगीं कि उन्होंने अपनी जान लेने के बारे में तक सोच डाला. पर एक दिन जब उनके पति ने ग़लती से दरवाजा खुला छोड़ दिया, वो वहां से भाग निकलीं.

सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा मशाल

उन्हें आज़ादी का पूरा अहसास तब हुआ जब माया की मुलाकात एक दलित वकील और सामाजिक कार्यकर्ता मनीषा मशाल से हुई.

मनीषा तब हरियाणा में दलित महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार के मामलों का अध्ययन कर रही थीं. उन्होंने पाया कि जाति उन्मूलन और यौन हिंसा मिटाने के लिए बनाए गए क़ानून कारगर नहीं हैं क्योंकि दलित महिलाओं को इन क़ानूनों के बारे में पूरी जानकारी ही नहीं है.

इसके अलावा अमूमन अभियुक्त दलितों की तुलना में बेहतर आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के होते हैं. मनीषा के मुताबिक प्रशासन, पुलिस और न्यायपालिका में भी जातिगत असमानता है जो पीड़िता के इंसाफ पाने के रास्ते में आती है.

मनीषा के लिए समस्या का एक हल दलित महिलाओं को सशक्तीकरण था. लिहाज़ा वह माया जैसी बलात्कार पीड़ितों को क़ानून की पढ़ाई करने में सहायता करने लगीं.

वकालत की पढ़ाई माया के लिए ज़िंदगी जीने की एक नई वजह बनी. जिस जीवन को वो ख़त्म करने को तैयार ती अब उसका एक मक़सद मिल गया. उन्होंने अपने बलात्कार की शिकायत को दोबारा शुरू करवाया और उसमें अप्राकृतिक यौन संबंध के आरोपों को शामिल करवाया.

माया ने बताया, "मनीषा दीदी से मिलने के बाद ही मुझे आवाज़ उठाने और ज़िंदगी की ओर सकारात्मक बने रहने का आत्मविश्वास मिला."

"मैंने तब क़ानून पढ़ने का फ़ैसला लिया ताकि मैं अपनी जैसी दलित महिलाओं के लिए लड़ सकूं जिन्हें अत्याचार के बाद चुप रहने के लिए मज़बूर किया जाता है."

माया उन छह बलात्कार पीड़िताओं में एक हैं जो मनीषा के साथ रहती हैं. इनके छोटे से किराए के फ़्लैट में गर्मजोशी, मज़बूती और एकता का अहसास है. यह उनकी खतरनाक और दम घोंटने वाली पुरानी ज़िंदगी से एकदम अलग है.

मनीषा ने बताया, "दलित महिलाओं को ऊंची जाति के लोग वस्तु की तरह देखते हैं, जिसका मर्ज़ी के मुताबिक इस्तेमाल हो सकता है या छोड़ा जा सकता है. अगर कोई महिला इस अत्याचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की कोशिश करती है तो उसकी हत्या हो जाती है."

अभियुक्तों के परिवार वालों की तरफ से मनीषा को नियमित तौर पर धमकियां मिलती हैं लेकिन इससे उनके क़दम नहीं डगमगाए हैं. मनीषा दलित समुदाय की उभरती हुई नेत्री बनकर सामने आयी हैं और वह युवतियों और न्यायिक व्यवस्था के बीच पुल की भूमिका निभा रही हैं.

उन्होंने कहा, "हमारे समुदाय के लोग हिंसा के शिकार होते रहे हैं और पीड़ित के तौर पर मरते आए हैं. मैं ऐसा नहीं चाहती. मैं एक नेता के तौर पर संघर्ष करना चाहती हूं, एक पीड़िता के तौर पर नहीं."

(भारतीय क़ानून के मुताबिक बलात्कार पीड़िताओं के नाम में बदलाव किए गए हैं.)  (bbc.com)

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